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Full text of "Japan Ki Bhogolik Sameeksha"

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४४28(८8 ४ [6 ॥705[. 


आप 5 005 शछाद्षाद 9080/श एम 





डॉ० भानुपसाद चौरसिया 
प्रवक्ता, भूगोल विभाग 
मदन मोहन मालवीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय 
कालाकांकर, प्रतापगढ़ (उ० प्र०) 


रह 


वसुन्धरा' प्रकाशन 


गोरखपुर 


- सर्वाधिकारं-लेख के 


प्रथम स स्करण, .987 





38726 


उन. शक 


वसुन्धरा प्रकाशन 
236, दाउदपुर, गोरखपुर 


जज 


मुद्रक 
मु प्र० (ो० उ०) सहकारो समिति लि० 
हमायू उर उत्तरी, गोरबपुर 


अग्रज श्री राभशकल चोरसिया 
के चरणों में 
अद्धा-समत 
सर्मापठ 


आसुख 


जापान की भोगोलिक सपम्ीक्षा पुस्तक राष्ट्रभापा हिन्दी के माध्यम से 
जापान पर लिखी गई एक उत्कृष्ट रचना है । जहां तक मुझे ज्ञात है हिन्दी में 
विश्वविद्यालय स्तर की जापान पर ऐसी सुव्यवस्थित पुस्तक उपलब्ध न होने 
के, कारण अध्ययन-अध्यापत में कठिनाई होती रही है। डा० भानु प्रताप 
चौरसिया बधाई के पात्र हैं जिन्होंने इंस उत्कृष्ट कार्य को लगन और निष्ठा के 
साथ किया है । पुस्तक को स्तरीय बनाने के लिए विविध मान्य संस्थाओं द्वारा 
प्रकाशित आंकड़ों और सूचनाओं का प्रयोग कर पुस्तक की उपादेयता बढ़ाने 
के लिए हर सम्भव प्रयास किया है। जापान के भूगोल के विविध पक्षों को 
आकंपक बनाते के लिए सुन्दर और स्वच्छ मानचित्रों को प्रस्तुति प्रसंगनीय है । 
यद्यपि अंग्रे जी भाषा में अनेक विद्वानों ने जापान के भौगोलिक स्वरूप को भ्रस्तुत 
करने का प्रयास किया है छेकिन विशाल हिन्दी भाषा भापी क्षेत्रों के छात्रों के 
लिए एक संतुलित पाठ्य पुस्तक की आवश्यकता महसूस की जा रही थी । 
फलत: डा० चौरसिया ने इस पाठ्य पुस्तक को प्रस्तुत कर जहां एक ओर 
जापात के भौगोलिक स्वरूप को उजागर किया है वहीं मातू भापा हिन्दी की 
सेवा भी की है। लेखक ने इस कृति को ग्यारह अध्यायों में वाट कर जापान के 
विविध भौगोलिक पक्षों को उजागर करने का हर सम्भव प्रयास किया हैं । 
भोतिक और सांस्कृतिक भू-दुश्यों के निरूपण में उपलब्ध नूतन सूचनाओं को 
प्रयोग से लाया गया हैं । लेखक ने कुछ अध्यायों के प्रस्तुतिकरण में जैसे कृपि, 
उद्योग, जनसंख्या और नगरीकरण तथा भौगोलिक प्रदेशमें सराहनीय कार्य किया 
है। 

मुझे पूर्ण विश्वास है यह पुस्तक विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों के लिए 
अत्यन्त उपयोगी प्रिद्ध होगी | इसके लिए लेखक बधाई का पात्र है| 


दिनांक ! बॉ० ए० एस० जौहुरो 
स्वतन्त्रता दिवस अवकाश प्राप्त प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
5 अग्रस्त, 9#| भूगोल विभाग 


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय 
वाराणसी-5 


प्राककथमे 


विश्वविद्यालयीये पाठ्यक्रम को दृष्टि में रखकर (लिखी गई पुस्तक 
“जापान की भौगोलिक समीक्षा अपने प्रिय पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करते 
हुए मुझे आहलाद का अनुभव हो रहा है। विश्व के विकसित देशों में अपना 
अक्षण्ण स्थान बवाने वाले इस देश का भौगोलिक विवरण प्रस्तुत करना अत्यन्त 
आवश्यक था। साथ ही हिन्दी में जापान पर बी तक सम्भवतः कोई उच्च 
स्तरीय पुस्तक प्रकाश में नहीं आईं है। इससे अध्ययन्त एवं अध्यापन कार्यों में 
असुविधा होती रही है। इसी अभाव की पूर्ति एवं राष्ट्र-भाषा के माध्यम से 
जापान के भौगोलिक व्यक्तित्व को बोधगम्य वत्ताने का यथाशक्ति प्रयास किया 
गया है । इस दिणा में मुझे कितनी सफलता मिली है, इसक्रा निर्णय पराठकंगण 
ही कर सकते हैं । 


छात्रों की समस्याओं को देखते हुए पुस्तक की रचना में उनकी आवश्य- 
कता और क्षमता को आधार माना गया है। यही कारण है कि जहां विषय- 
वस्तु का चयन उन्तको आवश्यकता के अनुरूप है, वहीं उत्तको ग्राह्यय क्षमता को 
देखकर अत्यन्त सरल एवं बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया गया है। जापान के 
भौगोलिक परिवेश के सभी पक्षों का विस्तार से विवेचन किया गया है। वर्ण- 
नात्मक पक्षों की पुष्टि के लिए सांख्यिकीय सूचनाओं का सहारा लिया गया है। 
जापान सरकार एवं संयुक्त राष्ट्र संघ आदि द्वारा प्रकाशित नवीनतम आांकड़ों 
को प्रतिशत में बदलकर अधिक ग्राह्य बचा दिया गण हैं क्‍योंकि निरपेक्ष 
आंकड़ों की तुलना में सापेक्ष आंकड़े अधिक प्रभावशाली होते हैं। पाठकों से यह 
अनुरोध है कि वे अपने बहुमुल्य सुझावोंसे अवगत करावें ताकि आगामी संस्करण 
में इन सुझावों को समाहित कर पुस्तक को और अधिक सारगर्भित बनाया 
जा सके | 


मैं अपने पूज्य गुरूदेव प्रो० आनन्द स्वरूप जौहरीं, पूर्व अध्यक्ष भूगोल 
विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी का क्वृतज्ञ हूं, जिन्होंने शोध काल 
से ही मुझे सर्देव प्रोत्साहित किया है। अमुल्य सुझावों के लिए श्री शीतल 
प्रसाद श्रीवास्तव, डॉं० रामबचन राव, डॉ० गिरीशचन्द्र शुक्ल, डाँ० अजय 
कुमार त्रिपाठी, श्री प्रदीप कुमार सिह, डॉ० महेन्द्र नारायण सिंह और डॉ० 
अशोक कुमार सिंह का में परम आभारी हूं । पुस्तक को लिखने में प्र रणा-ज्नोत 


(५॥) 


श्री दिलीप कुमार, भूगोल-विभाग, का मैं हृदय से आभारी हूं क्योंकि श्री कुमार 
के सहयोग के अभाव में प्रस्तुत थुस्तक का अपने मौलिक रूप में आना कदापि 
सम्भव न था, में प्र रणा-स्लोत एवं सतत सहयोग के लिए पारिवारिक संदस्ो 
फा भी ऋणी हूं क्योंकि आज मैं जो कुछ भी अर्जित कर सका हूं. उन्हीं की 
अमुल्य देन है। पुस्तक की पाण्डलिपि एवं मानचित्रों में आवश्यक संशोधन 
डॉ० वी० पी० राव ने निःसन्देह पुस्तक की उपादेयता बढ़ाने में महत्वपूर्ण 
योगदान दिया है। मैं हृदय से उनके प्रत्ति आभार व्यक्त करता हूं । 


पुस्तक को मूर्त रूप देने में बसुन्धरा प्रकाशन के प्रबन्धक श्री प्रमोदकुमार 
राव के प्रति आभार व्यक्त करना भेरा कर्तव्य है. जिनके अदम्य उत्साह भर 
प्रयास से पुस्तक मूर्त रूप ले सकी है । 


भानु प्रताप घोरसिया 
दिनांक : " 
गुरु पृणिमा 
26 जुलाई, 99॥ 


अनुक्रमणिका.. 


(८00॥8॥45) 2 
प्रध्धाय पृष्ठ संख्या 


।- सामान्य परिचय --6 
(07070000॥07 ) रु 
जापान का अतीत, सामन्‍्ती जापान, तोकूगावा शोगूनेट, आधुनिक 


जापान, भोगोलिक स्थिति, राजनैतिक स्वरूप, जापान के प्रदेश- 
ओर कफेन । 


2- भोम्यक्ृतिक स्वरूप ]7--43 
((.80 0०775) 


संरचनात्मक विशेषतायें, धरातलीयस्वरूप, भौतिक प्रखण्ड-होकीडो, 
उत्तरी-पूर्वी प्रखण्ड, मैध्यवर्ती फोसा-मैग्ना-कान्टो प्रखण्ड, 
दक्षिणी-पश्चिमी प्रखण्ड, जापान की पहाड़ियां, जापान के मैदान 
प्रवाह तन्‍त्र, जापान की तट रेखा, मृकम्प एवं ज्वालामुखी । 


3- जलवायबिक विशेषतायें 44-75 
(0०॥77960 ०॥०४४०(०॥५७/५७) 
वायुसशियाँ-ध्‌ वीय. महाद्वीय वायुराशियां, ध्यूवीय समुद्री वायु 
राशियाँ उष्णकटिवन्धीय समुद्री वायुराशियां, उष्णकटिवन्धीय महा- 
द्वीपीय वायुराशियां, जापान की जलवायु को प्रभावित करने 
वाले प्रमुख तत्व, मौसम और दाइफून, जापान के जलवायविक 
प्रदेश-होकडो, तोहोकू, द०5प० सागर तटीय, द०प० प्रशान्त 
तटींय, उत्तरी क्यूशू । 
4- मिट्टी (5०8) *” 76-82 
मृदा रचना, जापान की मिट्टियां-पाडजोल मृदा मण्डल, भूरी 
जंगली मुदा मण्डल, लाल एवं पीली मृदा भण्डल, लीथोसोल 
मिट्टी, पाडजोल मिट्टी, प्लानोसोलिक मिट्टी, एण्डो मिट॒टी, 
जलोढ़ मिट्टी, भूमिक्षरण की समस्या । 


5- प्राकृतिक वनस्पति एवं वन सम्पदा 83-89 
((६8४पा4। ४७प्रछ/ाधधा०ए भाप 069६ 4७४०77०४५) 
जापान में वन विस्तार, शीतोप्ण कोणधारी वन मण्डल, शीतोष्ण 
पर्णपाती बच मण्डल, उपोष्ण वन मण्डल, जापान में बनों का 
महत्व, वनसम्पंदा का उपयोग । 


£»7) 


6- कृषि (88970ए६ए7४) 90-464 


जापानी कृषि की मुख्य विशेषतायें, जापानी कृषि के प्रकार, 
जापान में कृषि का विकास, जापान के आथिक जीवन में कृषि 
का महत्व, एदो काल, तोकृगावा काल, 850 ई० के वाद कृषि 
का विकास, 4945 के वाद कृषि को विकास, युद्धोत्तर काल में 
भूमि सुधार, जापानी कृषि की समस्याये, जापान के कृषि प्रदेश- 
प्राचीन जापान, केन्द्रीय. मण्डल, परिधीय मण्डल, सीमान्तीय 
मण्डल, मुत्सू उप कृपि प्रदेश, देवा उपकषि प्रदेश, पूर्वी काण्टो 
उप कृपि प्रदेश, होकेैडो-परश्चिमी होकैडो उप क॒पषि प्रदेश, मध्य 
होकडो उप कृपि प्रदेश, पूर्वी होकैडो उपकृषि प्रदेश, कृषि में 
परिवतेन, कृषि उत्पादनों में परिवर्तत, धान, नेहूं, जो, फलों, 
सब्जियों ओए फूलों का उत्पादन, नारंगी, सेव, अन्य ' फल गौर 
सब्जियां, चायु, चुकंत्दर, पशु, चुअर गौर चिकेन, रेशम, उत्पादन 
में वद्धि, भूमि-सुधार, भूमि-संशोधन, जल अपवाहू, कूषि योग्य 
बनाई गयी भूमि, यन्त्रीकरण, सरकारीं नीति ! 
- झौद्योगिक विकास (#ए४एं8। 0०५०॥०97707) 65-245 
औद्योगिक विकास की नींव का काल, शौद्योगिकरण का प्रथमच रण, 
ओऔद्योगीकरण का द्वितीय चरण, ओद्योगीकरण का तृतीय चरण, 
शक्ति संसाधन-कोयूला, उत्पादक क्षेत्र/ उत्तरी क्यूझु, होकडो 
व्यापार, खनिज तेल, प्राप्ति के क्षेत्र, व्यापार, विद्युत, लोह एंवं 
इस्पात उद्योग, अन्य खनिज, इंजीनियरिंग उद्योग, जहाज निर्माण 
् उद्योग, मोट्रगाड़ी उद्योग, वेद्यतिक उच्योग, हल्के इंजीनियरिंग 
उद्योग, रसायन उद्योग, वस्त्रोद्योग सृती- वस्त्रोद्योग, रेशमी वस्त्रो- 
योग, ऊनी वस्वोद्योग, केमिकल, फाइबर, खाद्य उद्योग, पशु-उत्पादन 
वनोत्पाद, अन्य सामान, वर्तेन बनाने की कला, रबड़, ५ मत्स्य 
उद्योग, मछली पकड़ने के बन्दरयाह, मछली पकड़ने के क्षेत्र एवं 
प्रकार, मोती संस्कृति, जापान में भत्स्य उद्योग के विकास का 
कारण, 'ओद्योग्िक प्रदेश-कीहिन औद्योगिक प्रदेश, हान्शिव 
औद्योगिक प्रदेश, चुक्‍्यों औद्योग्रिक प्रदेश, कानमान औद्योगिक 
प्रदेश, जापान में जौद्योगिक विकास की समस्याएं, 

8- यातायात के साधन (१(6४॥8 ०॑ प7979००7/) 246-258 


मध्यवर्ती आपूर्ति स्लोतों का अभाव, परिपुरकत।), विनिमय क्षमता 
सड़कें, रेलमार्ग, समुद्री मार्ग, वायु मार्ग, यातायात की समस्‍यायें । 


| 


(|) 
| 9- व्यापार प्रतिरूप (77809 ?४४श7) 259-294 


। स्थानीय व्यापार, प्रादेशिक व्यापार, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार, आयात, 
एवं निर्यात, व्यापार संतुलन, वन्दरगाह । 


40- जनसंख्या ओर नग्रीकरण प्रारूप 295-.327 


(?07प्रवाणा क्षात एफ्रधारटिशाीणा शाला) 

जापान में जनसंख्या का वितरण बौर घनत्व, जनसंख्या में वृद्धि, 

जन्म दर और मृत्यु दर, लेग्रिक अनुपात, व्यवसायिक संरचना कास्टो 
किनकी मैदान, नोवी मैदान, जापान की बढ़ती जनसंख्या की 
समस्‍यायें और निराकरण, जापान में सगरीकरण का प्रतिरूप, 
नगरीकरण की पृष्ठभूमि, जापान के महानगर-टोकियों, याकोहामा 
ओसाका, कोवे, नगोया, क्योटो, किताक्यूश-नगरों की उत्पत्ति, 
विकास कौर आकारिकी । 


44- जापान के भौगोलिक प्रदेश 328-370 
(980घ़4ए70व डि600००8 ० उ0था) 


होकडो प्रदेश-पूर्वी होकैडो प्रदेश, इशीकारी-युफ्त्सु का निम्नवर्ती 
मैदानी प्रदेश, प्रायद्वीपीय या दक्षिणी-पश्चिमी होकीडो प्रदेश, 
उचरी हांशू या भोऊ प्रदेश-पूर्वी उच्च प्रदेश, पूर्वी निचला में दाती 
प्रदेश, मध्य पर्वेतीय प्रदेश, पश्चिमी मध्यवर्ती वेखसित प्रदेश, पश्चिमी 
पर्वतीय प्रदेश, पश्चिमी तटवर्ती मैदानी प्रदेश, मध्य हानच्श अथवा 
चृव्‌ प्रदेश-मध्यवर्ती पर्वतीय गांठ प्रदेश, जापान सागर तदीय 
निम्नवर्ती मंदानी प्रदेश, प्रशोच्त महासागर तटीय निम्नवर्ती 
मैदानी प्रदेश,.कांटो या टोकियो का मैदानी प्रदेश, दक्षिणी-पश्चिमी 
जापान का आच्तरिक प्रदेश-पूर्वी सेतोयूची या किच्की मैदानी 
प्रदेश, वीवा वेसित प्रदेश, नारा वेसिन प्रदेश, क्योदो का मैदानी 
प्रदेश, ओसाका मैदान या सेत्सू वेसिन प्रदेश, कियो वेसित प्रदेश, 
मध्य सेतायूची प्रदेश, सेन-इन समुद्र तटीय प्रदेश, उत्तरी क्यूक् 
प्रदेश, दक्षिणी-पश्चिमी जापान का बाह्य प्रदेश-दक्षिणी व्यूद्ु 
प्रदेश, काई प्रायद्वीपीय प्रदेश, 


सामान्य परिचय 


जापात विश्व का एक ऐसा देश है जो आधुनिकता और प्राचीतता का 
समन्वय कर दुनिया के प्रगतिशील देशों के लिये चुनोती बन गया है । द्ीपों 
का यह देश पुरव का ब़्िढेन कहा जाता है क्योंकि इसकी अनुसमुद्रीय स्थिति, 
भौतिक स्वरूप और औद्योगिक अर्थ व्यवस्था ब्रिटेन के लगभग समात है। लेकित 
जापान ब्िटेव से कई सणने में शिक्ष है | जापएएन के व्यक्तित्व की विशिष्टता 
उसकी राष्ट्रीय गुणवत्ता में निहित है। अपनों इसी गुणवत्ता के कारण जापान 
एशिया महाद्वीप का सिरमौर बन गया है। चीन और भारत जैसे बड़े देश 
इससे सबक लेने के लिये बाध्य है द्वितीय विश्व युद्ध काल में तीसरी शक्ति के 
रूप में उभड़ा जापान एटम बम से डराया गया। सारी वरबादी के बावजूद 
जिस लगन और साहस के साथ इसने युद्ध के बाद नवनिर्माण का रास्ता अप- 
नाया वह अनुकरणीय है। अपने सीमित प्राकृतिक संसाधनों के वावजूद औद्यो- 
गिक उन्नति का चमत्कार केवल जापात में देखने को मिलता है। अपने इसी 
बल वृते पर यह संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे शक्तिशाली औद्योगिक देश को 
चुनौती देने में सफल हो सका हैं । 

जापान का अतीत -बतीत वर्तमान का आधार होता है। कोरिया, चीन 
और सोचियत संघ का पड़ोसी जापान अपने द्वीपीय, स्वहूप के कारण सदियों 
तक जन विहीन रहा क्योंकि यहां पापाण कालीन सानव के चिन्ह नहीं पाये गये 
है। अनुगान है कि इस प्रशान्त सागरीय द्वीप माला में उत्तर पायण काल में 
प्रथम मानव का प्रवेश हुआ क्गेंकि मेसोलिथिक काल से ही अवशेपों की प्राप्ति 
होती है। यहां इसी काल में सम्भवत्त: उत्तरी एवं दक्षिणी एशिया तथा कोरिया 
के प्रवासी आये। आज भी जापानी संस्कृति पर उत्तरी एवं दक्षिणी 
एशिया की छाप दिखाई पड़ती है । 


जापान के द्वीपों में सर्व प्रथम ऐनू (#॥४) जाति के लोगों का प्रसार 
3500 से 300 ई० पु० तक रहा। आज भी होकीडी में ये जातियां पाई जाती 


रॉ 


2 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


है । इन जातियों का मुख्य कार्य शिकार करना था । सवंप्रथम इन जातियों का 
प्रसार होकेडो और क्यूशू मे हुआ । जल की सुविधा के कारण ये जातियां धीरे- 
धीरे तटीय भागों मे वद्धने लगीं । 


300 ई० पृ० के बाद यहां की संस्कृति में परिवर्तेन आथा । पापाण युग 
के बाद ताम्र और लोह युग जाये। इसके बाद यहाँ यायोई (४०५०)संस्क्ृति वा 
विकास हुआ | इस काल में धान की कृषि, धातु निर्माण आदि का कार्य होने 
लगा । यायोई संस्कृति से अनेक समुदायों का अभ्युदय हुआ। प्रब्नजक़ों का 
आगमन मुख्य रूप से चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया से हुआ जिनमे अधिकांश 
मंग्रोल्वायड थे । इन्ही जातियों का अधिक विकास भी हुआ ।यायोई संस्कृति 
के प्रारम्भिक केन्द्र सम्भवत: उत्तर-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व क्यूशू एवं सैन- 


इन थे जो कोरिया से निकट थे । धीरे-धीरे यायोई संस्कृति का विकास 2 0 
ई० पूर्व तक उत्तर में भी हो गया और किनकी तक इसवा प्रसार हो गया । 
शिजुओका में 00 वर्ष ई० पूर्व और कान्‍्टों मैदान मे ई० बर्ष के प्रारम्भ होते- 
होते यायोई | सस्क्ृति फैल गई । 400 ई० में जोमोन (3०7००) लोग तोहोक्‌ 
ओर होकीडो के पर्वतीय भागों की ओर चले गये । 


जिन लोगों ने इस संस्कृति का विकास किया उन लोगों ने संगठित होफर 
यामातो रटेट की स्थापना को । यह अत्यन्त सगथक्त जाति थी जिसने चौथी 
शताब्दी में ही अन्य लड़ाकू आदिवासी जातियों पर विजय प्राप्त किया । लगभग 
]00 वर्ष ई० पू० में जिम्मू (3दगधा०) यामातों (टेट का प्रथम शासक बना । 
क्योटो ओर नारा का विकास राजधानी के रूप मे हुआ। कोरिया और जापान के 
राजवंशों के पारस्परिक सम्पर्क से वस्त्र बुनाई, घातुकर्भ आदि ब.लाओ काविकास 
हुआ । सन्‌ 538 ई० में भारत का बौद्ध धर्म कोरिया और चीन के द्वारा ही 
जापान पहुंचा । ठठवी शताब्दी भें चीनी प्रभाव की एक उल्लेखनीय लहूर आयी 
जब चीनी तांग (गथ79)साम्राज्य, जो सभ्यता की पराकाष्ठा पर था, का अधिक 
प्रभाव पड़ा। जापानी शासकों ने ग्राह्य चीनी संस्कृति के अध्ययन के लिये 
लोगों को चीन भेजा । इसी भांति 9 वी शताब्दी में कई प्रतिनिधि मिजी 


(४९४॥ग) काल में यूरोप और अमेरिका गय्ने । ये जापानी सभ्यता के मुख्य परि- 
वर्तेन काल थे । 


छठी से उन्‍नीसबवी शताब्दी तक चीनी प्रभाव का प्रवाह जापान की ओर 
अधिक हुआ | जापानियों ने चीन की केन्द्रित राजनीतिक संगठन पद्धति को अप- 
नाया परन्तु स्थातीय श्रशासन के लिये उन्होने वंशानुगत लाड्ड पद्धति को 


सामान्य परिचय [ 3 


कायम रखा । नगमरों के नियोजन में जापानियों ने चीन की नियोजन पद्धति का 
सहारा लिया | 70 ई० में नारा और 784 में क्योटो को राजधानी के रूप में 
चीौकोर प्रारूप (5४0 7६६७४) पर बसाया गया | क्योदो का अस्तित्व राज- 
धानी के रूप में 4009 वर्ष तक रहा | चौकोर प्रारूप को आज भी क्योटो और 
विभिन्‍न ग्रामीण एवं नगरीय क्षेत्रों में देखा जा सकता है। शिन्टदों (ञञतंत्रा०) 
की भांति बुद्ध धर्म को भी अपनाया गया। चीनी बर्तन बनाने की कला, पेन्टिग, 


साहित्य, दर्शन, वास्तु कला आदि का स्वरूप जापान में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। 
उद्यानों एवं फूलों की व्यवस्था में आज भी जापानी कला अग्रगण्य है| 
मकानों तथा आस-पास के भृदृश्यों को सजाने में जापानी सिद्धहस्त हैं। इसी 


काल में 'हेईयान! काल का अभ्युदय हुआ जिसका समय 492 तक रहा । 
492 से 573 ई० तक मिनामोतों होजो एवं मोरोबाची परिवारों का शासन 
रहा | सोचहवीं शताब्दी के अन्त में जापान में गृह-युद्ध छिड़ गया जिसके 
परिणाम स्वर्य जापान की प्रगति को आशिक धक्का लगा। इसके पश्चात 
]590 ई० में हीडियोशी तोमोतोम्मी ने अपने अथक प्रयास से शान्ति स्थापित 
किया । 


चीनी पद्धति की लिखावट की विधि चीनी दर्शन और साहित्य से उप- 
लब्ध हुई। जापान में कान्‍्जी (॥(४॥॥) और हिरागाना (॥989॥9) के मिश्रित 


लिखावट से पू्वे चीनी भाषा का ही प्रयोग होता था। कानन्‍्जी और हिरागाना 
अत्यन्त जटिल हैं क्योंकि इन्हें सीखने के लिये कम से कम 3000 शब्दों का 
ज्ञान आवश्यक है | जटिल शब्दावली के वावजूद जापान में साक्षरता 98 
प्रतिशत से भी अधिक है। 


सामन्ती जापान-5 वीं शत्ताव्दी से 7590 ई० तक जापाव हीडियोशी 
(।40०५४०७॥४) और तोकगावा शोगूनेट के अधीन केच्द्रित था। इयेयासु ने 
शोगूनेट की स्थापतता 4600 ई० में की । इयेयासु ने राजतीतिक, आथिक और 
सामाजिक जीवन के ढाचे में आमूल परिवर्तत किया जो 265 वर्षो तक सुरक्षित 


रहा । यह एक संघर्ष-काल था जिसमें सम्राट का नियन्त्रण अत्यन्त अल्प था । 
शक्ति प्रदर्शन में अनेक लार्डों में प्रायः संघर्प होता रहता था । इस संघर्ष के 
बावजूद उद्योग और व्यापार में प्रगति हुई और 543 ई० भते-आते जापान 
की ओद्योगिक प्रगति की तुलना यूरोप से होने लगी । जापान नौकायन, अस्त्र- 
शस्त्र तथा दवाओं के उत्पोदन में पुतंगाल को पीछे छोड़ दिया। कुछ नगर 
अपने विशेष प्रकार के उत्पादनों के लिए प्रसिद्ध हो गये । -सेतो और एरिता 


[4 | जापान की भोगोलिक समीक्षा 


बरतंन उद्योग, क्योटो रेशम उद्योग तथा ओसाका सूती वस्त्रोद्योग में अग्रगण्य 
हो गये । 


कुछ जापानी व्यापार की प्रगति के लिए विदेशों की ओर प्रस्थान किये । 
फिलीपाइन, मलेशिया और भारत के साथ जापान का व्यापार होने लगा | 
543 ई० में जापान में यूरोपीय व्यापार की लहर पुर्तंगालियों द्वारा आाई। 
इसके पश्चात जापान में सेन्ट फ्रान्सिस जेवियर (9६मद्याअंश #2णं०७) के, जो 
4549 ई० में कामोशिमा आये, नेतृत्व में अनेक मिशनरियों की स्थापना हुई । 
इसके पश्चात 600 ई० में डच व्यापारी जापान आये | 4577-० मे 
आरगैन्टिनों (0997/7०0) नामक पुतंगराली ने जापानियो की प्रशंसा करते हुए 
लिखा है, “ ये लोग ऋर नहीं है । यदि धर्म को हटा दिया जाय तो हम लोग 
जापानियो की तुलना में अधिक क्र है! । पुतंगाली जापानियों को मित्रवत्‌ 
व्यवहार करते पाये । प्रत्येक लाड्ड अपने क्षेत्र मे पुरतेगालियों को बसाने तथा कुछ 
सीखने के लिए उत्सुक रहता था । यहां तक कि कुछ लार्डो ने अपने अधीनस्थ 
लोगों को इसाई धर्म स्वीकार करने के लिए प्रेरित भी किया | 


तोकगावा शोगूनेट (77०५३ 9॥09फ079०)--4600 ई+ में 
तोकूगावा परिवार ने गृहयुद्ध समाप्त करके सम्पूर्ण जापान में आधिपत्य कायम 
कर लिया। इन्होंने अपना शासन येदो (टोकियो) से किया । यह शासन काल 
मिजी काल (868 ई०) तक चला । शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए 
इन्होने सामाजिक और राजनीतिक सगठतों का निर्माण किया । विदेशियों के 
बढ़ते साम्राज्य से सशंकित होने के कारण इन लोगो ने नागासाकी बन्दरगाह 
को छोड़कर अन्य बन्दरगाहों से व्यापार बन्द कर दिया । इन्होंने सामंती सामा- 
जिक संरचना को चार पदानुक्रमों (#ाशा2०॥५) में विभाजित किया। ये थे--- 
प्रथम डम्यो (08॥790' या ला्ड, द्वितीय समुराय (इागणववों) या योद्धा, 
तृतीय कृपक और व्यापारी तथा चतुर्थ निम्नवर्गंके लोग जो(६(8|ईटा कहलाते थे। 
अत्येऊ वर्ग अपने उच्च वर्ग वा सम्मान करता था । जब तोकगावा को स्थानीय 
लाडों से भय लगने लगा तो उन्होंने एक नियम बनाया जिसके द्वारा वर्ष मे एक 
बार कुछ समय के लिए येदो जाना पड़ता था और जब वापस लौटता था तो 
अपने परिवार को योदो में ही छोड़ आता था । 


४४23 कल 3 जबकि नल सकल मनन लीक 


[. 7शा[ए9क', 7, उ38[098)7.. #09०॥०७5७, शएशथशा & (० ([(६0. 
[0॥00॥, 4969, ?, 68, 


सामाच्य परिचय (६85 


देश में एकता लाने के लिए आवागमन के साधनों का विकास अत्यन्त 
आवश्यक था क्योकि व्यापार की प्रगति के लिए यह कार्य आवश्यक था । 
इसलिए विभिन्न अधिवासीय क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सड़कें बनाएँ गई। तोकू- 
गावा काल में अनेक महत्वपुर्णसड़कोंका निर्माण किया गया। प्रारम्भिक तोकूगावा 
काल में टोकैडो(॥0/800) भागे, जो प्राचीन राजधानी बयोटोसे नयी राजधानी 
येदो तक बनाया गया था, अत्यन्त महत्वपुर्ण था। इसी समय क्योंटो के स्थान 
पर येदो (टोकियो) को राजधानी बनाया गया । आच्तरिक सागर के समाना- 


न्‍्तर सैत यो (380 ५0०) तथा क्यूश होते हुए तागासाकी तक का मार्ग भी 
महत्वपूर्ण था। अधिवासों का सर्वाधिक विकास इन्हीं मार्गों पर हुआ। इस 
प्रकार टोकाई और किनकी प्रदेशों की जनसंख्या में तीद्र वृद्धि हुयी । इन मार्गों 
से माल की ढुलाई की अपेक्षा यात्रियों द्वारा गमनागसन अधिक होता था। 
अधिकांश माल मनुष्यों अथवा घोड़ों द्वारा ढोया जाता था । महत्वपूर्ण व्यक्ति 
पालकी ( 78॥4ए०ं7१5५) में बंठकर आते-जाते थे । 


सड़क की तुलना में समुद्री मार्ग सामान ढुलाई के लिए अधिक उपयुक्त 
था । तोकगावा प्रशासन ने 50 टन से अधिक क्षमता के जहाजों के निर्माण पर 
रोक लगा दिया था | इसलिए व्यापारी जापान के विभिन्‍न बन्दरगाहों से छोटी- 
छोटो नचौकाओं द्वारा व्यापार करते थे । 


तोकूगावा काल में औद्योगिक विकास पर अधिक ध्यान दिया यया। 
दस्तकारी से सम्बन्धित उद्योगों का विकास छोटे-छोटे वककेशापों द्वारा हुआ । 
इस काल में उद्योगों का विकास तीन प्रकार से हुआ | स्थानीय बआावश्यकताओं 
की पूर्ति के लिए ग्रामीण उद्योग, कस्बों के लिए घरेंलू उद्योग तथा व्यापक 
स्तर पर बकेशाप उद्योग विकसित किये गये , क्योंटों में प्रसाधन सामग्रियों के 
निर्माण के लिए दस्तकारी उद्योग का विकास हुआ जिनमें बतंन, रेशम आदि 
उद्योग प्रमुख थे । प्रारम्भ में दस्तकार केवल राजपरिवार के लिये ही रेशमी 
वस्‍्न्रों का उत्पादन करते थे परन्तु 47वी शताब्दी के उत्तराद्ध में दस्तकार डैम्यो 
(09790) परिवारों की आवश्यकताओं को पूर्ति के लिये येदो की ओर प्रस्थान 
किये । क्योटो के अधिकांश रेशम का उत्पादन किनकी के उच्च श्रुमि क्षे क्षेत्रों 
में होता था । 

जिन स्थानों पर उत्तम किस्म की मिट्टी की पूर्ति हो जाती थी वहां बर्तेन 
उद्योग का विकास हुआ । नगोया के निक्रट सेतों तथा पश्चिमी वयूज् में एरिता 


वर्तन उद्योग के के प्रमुख केन्द्र थे। ओसाका में नील और सूती वस्नोद्योग का 


6 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


विकास हुआ । तीसरे प्रकार के उद्योग का विकास बड़े पैमाने पर सम्पन्न लार्डो 
द्वारा किया गया | विभिन्‍न वक्कणापों में तांबा, सोना और चाँदी को सांफ किया 
जाता था तथा खानों से कोयला और लौह खमिज का उत्पादन होता था। 
दक्षिणी क्यूशू में सत्सुमा (9850778) के लोड ने 852 ई० में लोहे के ढलाई 
के कारखानों को स्थापित किया जिप्में लौह खनिज एवं स्थानीय लकड़ी का 
प्रयोग होता था । 


तोकगावा काल में यद्यपि स्थिरता थी परन्तु सामाजिक और आर्थिक 
असन्तोप के कारण इसका पतन हुआ । समुराई ($क्राएाव) समुदाय तौकूगावा 
शासन से मुख्य रूप से असंतुष्ट था । मिजी काल में इस समुदाय के लोगों की 
संख्या लगभग 20 लाख थी जो सम्पूर्ण जनसंख्या का 6% थी। कृषकों की 
जनसंख्या 75% थी। ये कृपक भूमि के उच्च किराये और टैक्स से परेशान 


रहते थे क्योंकि कृपि उत्पादन का 30% क्षे 40% भाग शासक ले लेते थे । 
इसके अतिरिक्त कृषकों को सूखे और ठण्डें मौसम के कारण फसल उयगाने में 
अत्यन्त कठिनाई का सामना करना पड़ता था। 48वी शताब्दी के उत्तराद्ध में 

अकाल के कारण कृषकों को अनेक प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना 
पड़ा । 

तोकगावा शासन के पतन का सबसे बड़ा कारण उद्योग और व्यापार 
का विकास था जो नगरों में मध्यम वर्ग के व्यापारियों द्वारा संचालित था । 
परम्परानुसार ये लोग निम्न वर्ग की श्रेणी में आते थे | इस वर्ग के लोग उच्च 
चर्म के प्रशासकों द्वारा लगाये अधिक कर से परेशान थे। जैसे-जैसे ये लोग 
सम्पन्त होते गये अपनेको निम्न वर्गकी श्रेणी से उच्च वर्ग मानने लगे। अतःस्तर 
और धन को लेकर इन लोगों और पू'जीपतियो के मध्य संघर्ष होता रहता था 
जिसके परिणाम स्वरूप तोकूगावा साम्राज्य को पतनोन्मुख होना पड़ा । उद्योगों 
और व्यापार के विकास के कारण नगरों में खाद्य पदार्थो की मांग में वृद्धि हुई, 
परन्तु इस आवश्यकता की पूति जापान में अपने सीमित खाद्य उत्पपादनों द्वारा 
नही हो सकी, जवकि 600 ई० से 730 ई० के मध्य कृपि क्षेत्र में दो गुनी 
वृद्धि हुई । 

आन्तरिक और वाह्य दवावों एवं परिस्थितियों के कारण जापान को नये 
सिरे से विचार करना पड़ा । अधिकांश जापनियों ने नयी पश्चिमी तकनीक को. 
सीखने के लिये विदेशियों से सम्पर्क किया । इसके अतिरिक्त रूस, संयुक्तराज्य 


अमेरिका आदि देश जापान के व्यापार को बढ़ाने में सक्तिय भूमिका निभाये। 


साभानन्‍्य परिचय 


4853 और 4854 ई० में एडमिरल एम० सी० पेरी (४. 0. एका५) के 
नेतृत्व में अमेरिकी नौसैनिकों का एक जत्था जापान आया और जापानियों को 
यह विश्वास दिलाया कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में वे अलग-थलग नहीं हैं । 
तोकगावा काल की रूढ़वादिता के कारण इस प्रकार की प्रगति नही हो सकी 
थी । दक्षिणी क्युश्‌ के चोशु(000900) और सत्सुमा (8#8फए779) आदि लड़ाकू 


जातियौं ने मिजी साम्राज्य को शक्ति प्रदान की । अतः 867 ई० में तोकूगावा 
की सामन्तशाही नष्ट-भ्रप्ट हो गयी । फलतः 4 अक्टूबर 867 को सम्राट 
मिजी बलशाली होकर अस्तित्व में आया और राज्य पर अधिकार कर लिया | 
868 में सम्राट ने मिजीतेन्नों वी उपाधि धारण को | इस प्रकार 4868 ई० 
पें सजी साम्राज्य का अभ्युदय हुआ। मिजी शासन काल से ही आधुनिछकत 
जापात का प्रादुर्भाव हुआ । 


इसके बाद जापान ने हर क्षेत्र में प्रगति की ओर ध्यान देता प्रारम्भ 

किया । एतदर्थ उसने पाश्चात्य देशों से सम्बन्ध स्थापित करके नई तकनीक 
प्राप्त करने का प्रयास प्रारम्भ किया | जर्मनी से फौज, शासनतन्त्र तथा चिकित्सा 
के क्षेत्र में, ब्रिटेन से नौसेना, जहाज और रेल निर्माण के क्षेत्र में तथा संयुक्त 
राज्य अमेरिका से उद्योग धच्धों के क्षेत्र में विविध प्रकार के तकतीकी ज्ञान 
प्राप्त किये गये । अतः उद्योग, व्यापार, फीज आदि के क्षेत्र में आग्ातीत प्रगति 
हुई जबकि सामाजिक व्यवस्था, कृषि, अविवास आदि में उल्लेखनोय परिवर्तत 
_भहीं हुए । इस प्रकार जापान 9वीं शताब्दी तक एक साम्राज्यवादी शक्ति के 
रूप में उभरा | जापान ने 875 में क्यूराइल द्वीपों, ।879 में रिउक्‍्यू, 895 
में फारमोसा और कोरिया पर अधिकार कर लिया । 902 में अंग्रे ज-जापानी 
संधि के अनुसार ही जापान प्रथम विश्व युद्ध में शामिल हुआ । रूस को उसने 
4905 में परास्त किया और मंचूरिया तथा दक्षिणी सखालिव पर अधिकार कर 
लिया । इस प्रकार प्रथम महायुद्ध तक जापान का साम्राज्य उत्तर मे क्यूराइल 
दीपों से छेकर दक्षिण में दक्षिणी चीन सागर तक 4000 क्रिमी० की दूरी में 
विस्तृत हो गया । सन्‌ 942 मे मिजी की मृत्यु के पश्चात सम्राट ताइशों तथा 
उन्तके वाद सम्राट हिरोहितो ([926 ई०) उत्तराधिकारी हुए। इस काल में 
सेनिक, औद्योगिक और व्यापारिक प्रगति सर्वाधिक हुई। जापानको अपनी बढ़ती 
जनसंख्याके लिए भोजन, सुरक्षित अधिवासीय भूमि, उद्योग धन्धों के लिए कच्चे 
माल एवं तैयार माल की खपत के लिए विस्तृत एवं सुरक्षित बाजार की आव- 
शयकता थी । इस काल में खतिज पदार्थों, रेल मार्गो एवं लौह इस्पात उद्योगों 


8 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


में पर्याप्त विकास हुआ | इसने 937 में चीन और 944 में रूस से हस्तक्षेप 
रहित संधि करके ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया । 
शीघ्र ही उसने सारे दक्षिणी-पूर्वी एशिया पर (थाईलैण्ड को छोड़कर) अधि- 
कर लिया । इस प्रकार उत्तर मे ऐल्यूशियन द्वीपों से लेकर इण्डोनेशिया तक 
जापान का अधिकार हो गया। 


6 तथा 9 अगस्त 4942 में संयुक्त राज्य अमेरिका के द्वारा हिरोशिमा 
ओर नागासाकी पर बम के प्रहार से जापान टूट गया। 45अगस्त945को रूसके 
हस्तक्ष प के परिणामस्वरूप जापान अलग पड़ गया। विजयी राष्ट्रों ने जापान 
से सभी अधिक्षत क्षेत्रों को छीन लिया । जापान को सखालिन, कोरिया और 
फारमोसा से हाथ धोना पड़ा । जापान का सम्राट नीहन कोकू टेनो कह- 
लाता है । मिजी संविधान को समाप्त कर दिया गया और मई 4947 में नया 


संविधान लागू हुआ | सम्राट केवल राज्य तथा जापान निवासियों के संगठन 
का प्रतीक है। टोकियो मित्र राष्ट्रों का प्रधान कार्यालय वना और 28 अगप्रल 
]952 में जापान स्वतन्त्र हो गया | जापान को 953 में रिउक्‍्यू, 968 में 
धोनिन तया बालकनों द्वीप और 972 ई० में औकिनावा द्वीप पुनः लौटा दिये 
गये । 


नवम्बर, 4955 में विरोधी राजनीतिक कनन्‍्जरवेटिव पार्टी मिलकर 
लिबरल डेमोक्रेटिव पार्टी ([ 0 7?) बनी । संयुक्त राज्व अमेरिका के अधीनस्थ 
बोनिन और ओकीनावा जैसे द्वीप क्रमशः जून, 4968 और मई, 4972 में 
जापान को वापस मिल गये । जापान को रक्षार्थ संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा 
सैनिक संरक्षण भी प्राप्त था। 4982 ई० के पश्चात संयुक्त राज्य अमेरिका ने 
जापान को सैनिक शक्ति बढ़ाने के लिए प्रेरित किया । 4983-84 में जापान 
ने सम्पूर्ण राष्ट्रीय आय का 0,9% व्यय सैनिक सामग्री पर किया । 


दक्षिण-पूर्व एशिया में शान्ति एवं स्थिरता जापान के लिए अत्यन्त 
महत्वपूर्ण है क्योंकि जापान का अधिकांण व्यापार इसी क्षेत्र से होता है । 978 
में चीन और जापान के मध्य शान्ति समझौते पर हस्ताक्षर हुआ । 4964 ई० 
में ईघ्वाक सेतोी (६980५ 5900) जापान के प्रधानमन्त्री बने और 4972 में 
प्रधानमन्त्री पद से त्यागपत्र दे दिये। इसके पश्चात जुलाई, 972 में काकुई 
तनाका (॥(४/(५७ [9॥8९9) प्रधानमन्त्री बने परन्तु दिश्वम्बर, 974 में इन्होंने 
भी त्याग-पत्र दे दिया। इनके त्याग पत्र का मुख्य कारण संयुक्तराज्य अमेरिका के 
लाकहीड कारपीरेशन के साथ रिश्वत था | इसके बाद ताकियों मिकी(8॥८8० 


सामनन्‍्य परिचय [ 9 


॥९|४)तने 974में प्रधानमन्त्री पद सम्भाला। दिसम्बर 976में लिवरल डेमोक्रे- 


टिक पार्टी ने प्रथम बार डाइट (080)के निचले सदन में अपना वहुमत खो दिया 
जिसके परिणामस्वरूप ताकियों फुकुदा (ग080 ॥शातात9), जो पहले उप 
प्रधान मंत्री थे, प्रधान बने । 4978 में फुकुदा लिवरल डेमोक्रेटिक पार्टी 
के महासचिव मासायोशी जोहिरा (७४४५७४४०७४ 0॥#79) द्वारा परास्त 
हुए और दिसम्बर 978 में ओहिरा जापान के प्रधान मन्त्री बने । जूब, 980 
में भोहिरा की मृत्यु के बाद जुलाई, 980 में जेंकों सुजुकी (3७॥|८० 5प[धॉ६॥) 
जापान के प्रधान मन्त्री बनाये गये । 2 वर्ष बाद 982 में याशुहि रो ताकासोने 
(१४०४५ए७४7० [४४/८७५०॥8) प्रधान मच्ती बने । 4984 में नाकोसोचे लिबरल 
डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष चुने गये । 


प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से जापान सम्पन्न नहीं है। जापान का 
6722 से अधिकभागपु वनों से आच्छादित है ओर मात्र 45% भूमि ही कृषि 
व अधिवास के योग्य है। जापान चावल के उत्पादन में आत्म निर्भर है परल्तु 
अन्य उत्पादनों का 50% आयत करता है। 984 में जापान के सम्पूर्ण 
आयात में 332 भाग आयातित पेट्रोलियम का था। इसलिए सरकार ने तीन 
आणविक तथा 8 कोयले के ताप विद्य॒त केच्द्रों को स्थापित करने का आदेश दे 
दिया, फिर भी जापान सम्पूर्ण शक्ति का 88% शक्ति आयात करता है। 978 
में खन्तिज तेल की खोज के लिये जापान नेशनल आयल कम्पनी (3 ४ 0 ८) 
को स्थापना की गई । 


945 के पश्चात पेट्रोलियम उत्पादकों के निर्यात में पर्याप्त समृद्धि आऑजित 
की है जिसके परिणामस्वरूप ग्रास राष्ट्रीय उत्पादन (5 ३ 7?)।962 से 972 
के मध्य ओसत दर बढ़कर 0.3% हो गयी । 972 में जापान में ग्रास राष्ट्रीय 
उत्पादन की दर विश्व में संयुक्तराज्य अमेरिका के पश्चात द्वितीय स्थान पर थी। 
वर्ड बेक के सर्वेक्षण के अनुसार 984-83 के मूल्यों के आधार पर जापान में 
प्रति व्यक्ति ग्रास राष्ट्रीय उत्पादव 020, अमेरिकी डालर थी जो विकसित 
एवं ओद्योगिक पश्चिमी यूरोपीय देशों के समाच थी । 965-83 के मध्य ग्रास 
राष्ट्रीय उत्पादन को वाषिक वृद्धि दर 4,8% थी। जापान में ग्रास डोमेस्टिक 
शेडक्ट (507) की औसत वाधिक वृद्धि दर 9.8% थी परन्तु 4973-84 के 
मध्य यह दर 8.3% हो गईं यह दर 982 में मात्र 23% रह गई । 983- 
84 में इस दर में पुतः वृद्धि (5,3%) हुई। 4984-85 में 5.7% की वृद्धि 
985-86 में घटकर 4.6% रह गई जिसका प्रमुख कारण येन (५७७) के 
मूल्यों में वृद्धि और डालर के मूल्यों में गिरावट थी । 


।0: ] जापान की भौगोलिक समीक्षे। 


जापान की अर्थ व्यवस्था पर बुरा प्रभाव 4979 में पेट्रोलियम के मूल्य 
में वृद्धि के कारण पड़ा जिसके परिणामस्वरूप 977-78 में 43459 मिलियन 
डालर की कमी हुई जो 980-83 में घटकर १0720 मिलत्रियन डालर हो 
गई। व्यापार मे निर्यात में वृद्धि के कारण 78-82 में 8740,5 सिलियन 
डालंर की अतिरिक्त आय हुई जो 982-83 में घटकर 6900 मिलियन डालर 
हो गयी । इसका प्रमुख कारण निर्यात में 87% और आयात में 7.9% की 
गिरावट थी। 983-84 में निर्यात में 43,9% की वृद्धि और आयात में4.3% 
की गिरावट हुई जिससे जापान को 20534 मिलियन डालर की विदेशी मुद्रा 
प्राप्त हुई । जापान के निर्यात में निरन्तर वृद्धि के कारण]984-85 में 33647 
मिलियन डालर की आय हुई । 985-86 में निर्यात में 9.7% तथा आयात 
में 7% की वृद्धि के कारण 40000 मिलियन डालर की विदेशी मुद्रा प्राप्त 
हुई । जापान से सर्वाधिक निर्यात (40%) संयुक्तराज्य अमेरिका को होता था। 
984-85 में संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चात जापान' के लिये चींन द्वितीय 
सबसे बड़ा वाजार वन गया। इसके अतिरिक्त जापानी सर ममानों का निर्यात 
जर्मनी, सठदी अरब, कोरिया, ताईवान, हाँगकांग आदि को होता था। जापान 
में 980 में औद्योगिक उत्पादन में 3 और 98 में 3 2% की वृद्धि हुई । 
परन्तु 4982 में निर्यात में गिरावट के कारण औद्योगिक उत्पादन मात्र 0.6% 
रह गया । ' इसके पश्चात जापान ने निर्यात पर विशेष ध्यान दिया जिसके परि- 
णामस्वरूप 983 में 3.6 प्रतिशत और 984 में 44.2% ओऔद्योगिक उत्पादन 
में वृद्धि हुई । 
जापानी क्ृपि श्रम प्रधान है, परन्तु कृषि में लगी जनसंख्या मों दिनों-दिन 
गिरावट आ रही है। कृषि, वन और मत्स्य उद्योग में लगे लोगों की संख्या में 
4970 ई० (79% ) की तुलना में, 4984 ई० (8.7%) में ग्रिरावट 
आई है । 4984 में कृषि कार्यो में लगे व्यक्तियों की संख्या 4 7 मिलियन थी । 
जापान अपनी आवश्यक का 70% खाद्य पदार्थ उत्पन्न करता है। चावल यहां 
की मुख्य फसल है। इसके अतिरिक्त गेहूं, जी और भालू का भी उत्पादन होता 
है। मत्स्य उद्योग में जापान का 4976 तक प्रथम स्थान था परन्तु 976 के 
बाद अनेक देशों में मत्स्य उद्योग केन्द्र स्थापित हो जाने से जापान का यह 
उद्योग अत्यधिक प्रभावित हुआ है। 


खनन, विनिर्माण और निर्माण के कार्यो मों 4484 में सम्पूर्ण श्रमिकों के 

0८ का थे ४० रे 
33% श्रमिक के थे जचकि 4970 # यह दर 44 ८4 थी । मोटरगाड़ी, 
इस्पात, मशीनरी, वंद्युत्िकी तथा रसायन यहां के महत्वपूर्ण उद्योग हैं। 4983 


सामान्य परिचय [| 4! 


ई० तक जापान जल पोत ओर यात्री कार के उत्पादन में प्रथम स्थान पर तथा 
सिनन्‍्वेटिक फाइबर, सीमेंट, सिन्थेटिक रेजिन और इस्पात के उत्पादन में द्वितीय 
स्थान पर था। सारांश में, औद्योगिक उत्पादन में संयुक्तराज्य अमेरिका के 
पश्चात जापान का विश्व में द्वितीय स्थान है। जापान ने तकनीक एवं विज्ञान 
पर 984-8 5 में 28800 मिलियत्त डालर खर्चे कियां जो संयुक्त राज्य अमे- 
रिका को छोड़कर विश्व में सर्वाधिक है । 


भौगोलिक स्थिति 

जापान के विकास में इनकी भौगोलिक स्थिति का महत्वपूर्ण योगदान 
रहा है। जापान चार बड़े द्वीपों से मिलकर बना है जिसकी पूरी लम्बाई 3800 
किसी 9 है। होकडो (॥400<800) (7843 वर्ग किमी० ), हान्श (230772 
वर्ग किमी ०) शिकोक्‌ (8772 चर्ग किमी ०) और क्यूशू (4993 वर्ग किमी०) 
चार बड़े तथा अन्य कई छोटे द्वीपों से बने जापान की आकृति एशिया के पू्व सें 
धतुषाकार है। इस द्वीपीय देश को एशिया से जापान सागर अलग करता है । 
इस देश का कुल क्षेत्रफल 377384 वर्ग किमी० है। इन चारों द्वात्रों में हान्छू 
हीं सबसे बड़ा द्वीप है। इस प्रकार इसका क्षेत्रफल संयुक्तराज्य अमोरिका का 
/20, तथा भारत का /8 है। यह ब्रिटेन से डेढ़ गुना बड़ा है। हानश्‌ के 
उत्तर-पश्चिम सादो द्वीप सबसे बड़ा है । 


कोरिया के समीप जापान 475 किमी० चौड़े सुशिमा (809॥79) जल 
संयोजक द्वारा एशिया महाद्वीप से अलग है | होकैडो के समीप सोया जलडमरू- 
मध्य द्वारा यह सखालिन द्वीप से 40 किमी० दूर है। क्यूराइल द्वीपों से होकैडो 
द्वीपों की दूरी 45 किमी० है। इस प्रकार जावान का कोई भाग समुद्र से 45 
किमी० से अधिक दूर नहीं है। जापान द्वीप समृह के पूर्व में प्रशान्‍्त महासागर 
उत्तर में ला पेराउज जलडमख्मध्य ([8 ?९7009७ था) पश्चिम में कोरिया 
जलडमरूमध्य और जापान सागर तथा दक्षिण में प्रभाग्त महासागर का विस्तार 
है । होकेडो और हाच्शू के मध्य सुगारू (प5पछक्व0०) जलडमरूमध्य, हात्श 
और क्यूशू के मध्य शिमोनोसेकी (7 राणा0० 5७0) जलडमरूमध्य और हाजू 
तथा शिकोक्‌ के मध्य सेतोऊची (8००४०॥४) जलडमरूमध्य है । 


जापान द्वीप समृह का विस्तार 30 उत्तरी अक्षांश से 45? उतरी अआरक्षाश 
तक और १29" पूर्वी देशान्तर से 46? पूर्वी देशान्तर के मध्य हैं। वर्तमान 
समयु में [750 से अधिक अनेक छोटे-छोटे द्वीप सम्मिलित हैं द्वीपों में हान्सू 
सबसे बड़ा है जो जापान के समस्त क्षेत्रफल का 64 प्रतिशत है। जापान के 
विभिन्‍न द्वीपों का विवरण तालिका !4 से प्राप्त हो जाता है । 


42:.. ४ जापान की भौगोलिक समीक्षा 
तालिका .4 


जापान के भुझ्य द्वीपों का विवरण 


_गयापााक-, 























क्रम सं ० द्वीप क्षेत्रफल वर्ग किमी ०) प्रतिशत 
।-. होकेडो 78543 24.00 
2- हान्शू :--- 230772 6.00 

टोहोक्‌ प्रदेश 66950 

कान्टो प्रदेश 32248 

चुवू प्रदेश 66704 

किनकी प्रदेश 33005 

चुगोक्‌ प्रदेश 3488 
3-. शिकोकू 8772 05.00 
4-.. क्यूज् 44993 44.00 
5- अन्य द्वीप 73864 02.00 
योग 37738 4 400.00 








त्रोत-स्टेटिस्टिकल हैण्डबुक आफ जापान, 4979, 


आधुनिक काल में जापान की प्रगति का मुख्य कारण उसकी भौगोलिक 
स्थिति है । यह कई प्रमुख व्यापारिक मार्गों के मध्य स्थित है। मलेशिया, धाई- 
लेण्ड, वर्मा हिन्दचीन, इण्डोनेशिया, फिलीपाइन द्वीप समूह, श्रीलंका, भारत 
आदि एशियाई राष्ट्रों के व्यापारिक भार्गो में ॥घत होने के कारण जापान ने 
तीन्न गति से प्रगति की है। समुद्र से चारों ओर से घिरा होने के कारण इसे जल 
यातायात »ी पर्याप्त सुविधा उपलब्ध है। यही कारण है कि पूर्वी एशियाई 
देशों के साथ-साथ पाश्चात्य देशों से जाणान के अच्छे व्यापारिक सम्बन्ध हैं। 
इसीलिये जापान को एशिया का 'प्रवेशद्वार' कहते हैं। जापान की प्राकृतिक 
बनावट इसके विकास में कुछ सीमा तक जहां बाधक है (क्योंकि सभी द्वीप 


सामान्य परिचय [ 3 


एक दूसरे से अलग है) वही कठे-फटे तट होने के कारण जापान को उत्तम बन्दर- 
गाह की सुविधा उपलब्ध है । इसको भौगोलिक स्थित्ति से प्रभावित होकर डा० 
क्रेसी से कहा है, 'जापान की द्वीपीय स्थिति और इसका अपने पड़ोसी देशों के 
साथ समुद्री सम्ध्न्ध ही देश के भूगोल का केन्द्रीय विन्दु है ।' 

राजनेतिक स्वरूप 


प्रशासन की दृष्टि से जापान को 47 राजनैतिक विभागों में विभाजित 


किया गया है जिसे प्रिफेक्चसे([7४०८एछा5)अथवा केन(।(७॥)कहतेहै(चित्र.) ' 
प्रत्येक केन की शासन व्यवस्था अलग-अलग है। समुचित शासन व्यवस्था के 
लिये प्रत्येक प्रिफेक्चर को लघू भागों में विभाजित किया गया है जिन्हें शी 
(90) अर्थात शहर और शी को माची (5०४) अर्यात नगर तया माची को 
मुरा (७७३४) अर्थात ग्राम में विभाजित किया गया है। शी नगरीय क्षत्र है 
जबकि माची और मुरा ग्रामीण क्षेत्रों के अन्तर्गत आते है। ब्विटेन को भांति 
जापान में भी प्रशामनिक क्षेत्र भीगोलिक इकाइयों से मेल नहीं खाते । सबसे 
छोटो इकाई को बुशक (87780) कहते है । इसके अन्तगंत 40 से लेकर 400 
अधिवासों का समूह होता है। ये मास्य (860०पगरंट७व) प्रशासनिक इकाई 
नहीं है । प्रायः इसका प्रयोग स्थानीय अभिकेखों एवं सामाजिक और आर्थिक 
समूहों में सहकारी कार्यो हेतु होत। है। पिटी (09) में छोटे-छोटे पड़ोसी 
समह होते है जो स्थानीय कार्यो को सम्पन्त करते है। ठोनाये गुमी (॥"9४) 
5पाएं) मे 5 से 40 अधिवास होते है। चोताईकाई ((॥णाक(8) अथवा 
वार्ड (४४४४०) अपेक्षाकृत आकार में बड़ा होता है। मुरा (७०४)अथवा गाँव में 
अधिवासों की संखया अधिक होती है जिसके मध्य में एक व्यापारिक केन्द्र 
(50079079 ८७7४8) हं।ता है । इसके अन्तर्गत कई बुराक आते हैं । ग्रामीण 
क्षेत्रों मे कई मुरा मिलकर एक माची (४७०४) अथवा टाउन (पर0५७॥) 
का निर्माण करते हैं । यद्यपि वह भोगोलिक इकाई नही है परन्तु प्रशासनिक 
क्षेत्र अवश्य है | मारी से बड़े आकार वाली इकाई को थी (800) अथवा सिटी 
कहते है । 4953 में कई छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों को मिलाकर शी 
बनवाया गया जिसकी जनसंख्या 3000 से अधिक थी । ऐसे शी में जहां 50% से 
अधिक लोग कपि कार्यो में छग्रे थे उन्हें फामिग सिटीज (पद्वाभाठ 2ध8७) 
की संज्ञा दी गई । 4969 से पहले सीटीज की संख्या 42 थी। ब्रिटेत की 
एक काउन्टी (00५79) के वरावर केन अथवा प्रिफेक्च र होता है । टोकियो, 
ओकास! और क्योटो स्वतन्त्र' केन हैं जिन्हे टू अथवा फू (0 ७7 ॥७) कहते 
हैं। जापान के सुख्य प्रदेश एवं केन का विवरण तालिका 4.2 में दिया गया हैं । 


बम 


44 ॥] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


॥१000/6७ 


५<000०।९७ 
४४४५/४७७८ रा | 





चित्र .4 जापान के राजन तिक विभाग 
4- श्रिफेक्चर ( ।४८८ा७ा७५ ) सीमा, 2- क्षेत्रीय ( +6४०॥4।) सीमा 


क्रम सं० 


५ 


प्रदेश 


होक॑डो. 


टौहोक 


कान्टो 


किसकी 
(॥॥॥/0 ) 


चुगोकू 


(0%ण०६०८०) 


रे , «८ पे पोज 





तालिका 4.2 
जापान के प्रदेश एवं केन 
क्षेत्र फल 
केन (उप प्रदेश) 
वर्ग किमी. 





, होक॑ँडो तांगाात्त ०) ॥ 7853 
! आओमोरी (४०४॥०7) 9643 


2. इवाटे (॥४४३७) 45275 
3. सियागी (५०७7) - 7287 
4. अकीटा (2)0॥8) ११609 


5 यामागाटा (४४79699) 9325 
6 फूकृशिमा(सपा(७5॥४79) | 3780 


. इबारागी (097 ०5वां) 6087 
2 टीचोगी (00/॥४870) 6444 
3. गुम्मा (50७॥॥79) 6356 
4. संटामा (59778) 3800 
5 चिवा (०॥४७७) 5073 
6. टोकियों (0/:४०) 239 


7. कानागाबा(।(808099५/8) | 2379 
]- निगाता (१४४४४०) ]2677 


2, टोयामा(098॥78) 4252 
3. इशीव वा 05४#708५४/४ ) 495 
4, फुकुड [#७/८७४) । 487 
5, यामानाशी (४३शध्ा9आआ)। 4463 
6. नगानो (५६७४०) 43582 
7. गिफू (5#0) १0599 
8. शीजूओका (5927009) | 7770 
9, आइशी (/[०४) 5075 
[.मी (४४४) 5768 
2, शीगा (8/#छ8) 406 
3. बयोटो (९५०0०) 462 
4 ओसाका (05९8) 4850 
5. हियोगा ((+४०७४) 8348 
6. नारा (08॥8) 3692 
7. वाकायामा (७४४४५४॥०) | 4748 
॥ टोटोरी (0007) 3492 
2 शीमाने (8/४078॥8) 6526 


3 ओकायामा (0.8४4॥9 7074 
थै हिरोशिमा([॥४0$7708 ) 8454 


46 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 





क्षेत्रफल... 
ऋमसं0 प्रदेश केन 
ँ वर्ग किमी 
प. शिकोक्‌ 
(9॥|00(ए) 4. टोकूशिमा(70009॥४॥॥779) | 444 
2, कगावा ([((853५08 4866 
3. एहिसे (६॥॥७) 5557 
4... क्यूशू ((/७७॥७) 4, कोची ([(5०४ 7406 


49[4 
2438 
4095 
7383 
6349 
7733 
942 


. फुकुओका (07068 
2. सेगा (9909 

3, नागासाकी (३४७०४५8/८ 
4. कुमामोटो ((9700 
5. ओईंटा (0]84) 

6. मियाजाकोी (५४२०४ 


5. यामा गुची (४७॥॥9800॥7 6082 
कागोशिम।(।(9505]/74 








भोम्याकृतिक स्वरूप 


संरचनात्मक विशेषतायें-- 
जापान की भूवैज्ञानिक संरचना अत्यन्त जटिल है। भूगभिक दृष्टि से 
जापान की पवेतीय संरचना अत्यन्त नवीन है। हान्यू वक्त ( ० ) हान्यू दीप 
की आकृति के अनुरूप है। रिउक्यू चक्र दक्षिण-पश्चिम में रिउक्यू द्वीप की 
रचता करता है जो फारमोसा में लूजोन वक्र से मिल जाता है।। क्यूराइल 
चक्र होकैडो और वयूराइल ट्वीपों से कमचटका तक फैला है | तृतीय वक्त होकैडो 
से उत्तर पश्चिम सखालिन तक ( सखालिन बक्र ) तथा चौथा बोनिन वक्त मध्य 
जापान से दक्षिण की ओर फैला है([चित्र 20 )। यह वक्रमैरियाना द्वीपो तथा गुमाम 
( 50थ॥ ) होते हुए च्यूजीलेण्ड तक॑ फैला है । इस प्रकार जापान द्वीप प्रशान्त 
महासागर से घिरा हुआ परवेतीय सिल्सिल का वह भाग हैं जो अण्डसमान निको- 
बार से दक्षिण-पूर्व एशिया, ताईवान, ओकिनावा तथा एल्यूशियन द्वीवों से होते 
हुए अलास्का तक फैला है। यह उस नवीन वलित्त पर्वत माला ( £046० 
7709॥0895 ) का ही भाग है जो एशिया के पूर्वी तट पर मिलता है । जापान के 
उच्चावचन ( १७॥|७9 ) के मानचित्र देखने से जात होता हैं कि लगभग समस्त 
जापान पहाड़ी हैं जो अतियमित रूप से फैले हुए हैं ( चित्र 2.3 )। 
जापान की संरचना पर्वतीय जटिल मोड़ों द्वारा निर्धारित होती है जो 
भ्रन्शों के द्वारा विखण्डित है। पर्वतीय भाग बक्रों के प्राय: समानानन्‍्तर हैं और 
जठिल पर्वेद्ीय गांठ ( ॥8098 ) का निर्माण उन स्थानों पर हुआ हैं जहाँ पर दो 
या तीन वक्र आपस में मिलते हैं । ( चित्र 2.4 ) 
उत्तर में क्यूराइल बोर सखालितन वक्र होकंडो गांठ ( |४०0०७ ) पर मिलते 
हैं और डेजेट्सुजान ( 0858(5प22॥ ) पर्वत का चिर्माण करते हैँ। हान्शू वक्त 
मध्य हान्शू में वोनिव आरके ( /० ) से चुवू गाँठ ( [४००७ ) पर मिलता है। 
यहां पर जापान का उच्चत्तम पर्वेतीय शिखर हैं । जापानी आल्पस ( उहकध्ा 
#!95 ) इपी भाये में स्थित है । रिउक्यू और शिकोक्‌-काई वक्त क्युश्‌ विन्दु पर 
एक दूसरे से मिलते हैं (चित्र 2.)। 


8 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


जाकर पतक जापान में पर्चतों की 
जापात “१ ३ दो समान्चर क्षेणियां 
4 उत्तर दक्षिण दिशा में 

फैली हुई हैं । एक पूर्वी 
तट के निर्कदः जिसे 
आन्तरिक क्षेणी कहते 
हैं तथा दूसरी पश्चिमी 
तट के निकट जिसको 
वाह्य क्षेग़ी कहते हैं। 
उत्तर में दोनों श्लेणियां 
पास-पाव हैं परन्तु 
दक्षिण में उनकी दूरी 
अपेक्षाकृत अधिक पायो 
जाती है। इन दोनों 
पर्वतमालाओ के बीन 
मध्यवर्ती घाटी स्थित है 


जो उत्तर में'दृष्टिगोचर 





चित्र 2.] जापान : पव॑त मोड़ एवं समुद्री गर्तें 


वही होती परन्तु दक्षिण पश्चिम ये पूर्ण रूपेण परिलक्षित होती है! दिन्‍दीं-किनन्‍्द्दी 
स्थानों पर ज्वालासुखी उदयार से प्राप्त अवसदों के जमाव के फलस्वरूप यह 
पाटी समाप्त प्रायः हो गई है । भूवैज्ञानिक काल के अनुसार जापान द्वीप नवीन 
हैं ( चित्र 2.4) जापान का लगभग 66 प्रतिशत भाग जिनमे अधिकांश ज्वाला 
शुखी पतीय भाग सम्मिलित हैं, तृतीय महाकल्प (॥र७ 0५ धि8 ) अथवा 
उससे भी अधिक नवीन है, कुछ चट्टाने ऐसी है जो पौलियोजोइक ( २8920- 
टकष० ) समय की हैं | जापान का लगभग 66 प्रतिशत भाग परतदार चद्ठानों 
से युक्त है जो मिप्न तालिका (2.4) से स्पष्ट है -- 


जापान का भूवेज्ञानिक इतिहास बलनों (700॥9), (भअ्रन्शो) (#७७॥॥॥६) 
ओर ज्वालामुखी प्रक्रियाओ से परिपूर्ण है। वे प्रक्रियाये सभी प्रकार की चट्टानों 
( आरनेय, परतदार भौर कायान्तरित ) को समान रूप से प्रभावित की है! 
इसलिए किसो भी स्थान की चट्टानों के काल का वाह््तविक निरूपण अत्यन्त 
कठिन कार्य है । दोहोकूं और चुगोक्‌ की पर्वतमालाओं की ग्रेताइट शैल 
अपरदन के द्वारा पूर्णरूपेण दिखाई पड़ाती है। 











भोम्याकृतिक स्वरूप ( 9 


तालिका 2,॥ 


जापान की चट्टानों का विवरण 





कक चथ 


चंदन सम्पूर्ण जापान के क्षेत्रफल का प्रतिशत 


(अ) परतदार चढ्ान 67.84 
4. आकियन 3.78 

2, पैलियॉजोइक ह 40.24 * 
3. मेसोजोइक 7.95 
4, वीनोजोइक एवं नवीनतम 45.87 
(ब) आग्नेय चद्ान डे 32.6 
4. प्राचीन .24 
2. टःशियरी एवं नवीन 20 92 





नर 


नवीच और सतत्‌ ज्वालामुखी क्रियाओं, विवर्तनिक (००(०07ा० ) ग्रतियों, 
भारी मौसमी वर्पा द्वारा तीत्र अनाच्छादन और पुनर्यवन प्राप्त (७70४७9/०८) 
धाराओं ( 509०7 ) में अवसतादी निक्षेप के कारण जापान के भरदृश्यों का 
स्वरूप तीवत्रगति से परिवर्तित होता रहता है। यही कारण हैं कि ढाल अधिक 
तीव्र पाये जाते हैं और धारानों में असाम्पता ( ७॥9/8098#0॥ ) पायी जाती 
है| इसके परिणामस्वरूप अत्यधिक कटे-फटे व्युत्यित पर्वत ( 800९ ॥॥0प॥- 
$8४5 ) जो ज्वालामुखीयुक्त हैं, छोटे छोटे मैदानों, संकरी घाटियों और छोटी 
टेक्टोनिक वेसिनों द्वारा एक दूसरे से अलग किये जाते हैं । 


धरातलीप स्वरूप--जापान का धरातलीय स्वरूव सर्वेत्र एक जैसा नहीं 
है । पर्वतीय क्रम एकाएक समुद्र से उठ हुए लगते हैं [अधिकांश भू-संरचनायें 
उत्तर-दक्षिण दिशा में एक दूसरे के समान्तर फंली हुयी है। एक ओर जहाँ 
मध्यवर्ती विशाल पर्वतीय क्रम है वहीं दूसरी ओर जापान के वाह्य भाग में 
अनेक संकरे समुद्री तट, मंदान और खाड़ियां फीली हुयी हैँ । निष्कपेत: हम कह 
सकते हैंकि जापान विभिन्‍न स्वछूपीय पर्वतों, पठारों, नदी मिमित घादियों अथवा 
दरार घाटियों , तटीय मैदानों, प्रायद्वीपों आदि से युक्त प्रत्येक दृष्टि से समूद्रो- 
न्मुख है। जापान के धरातलीय स्वरूप पर दृष्टिपातकरने से यह स्पष्ट होता हैकि, 
इस संकीर्ण देश में दो समान्‍्तर पर्वत क्षेणियां इष्टिगोचर होती हैं। दोनों पर्व 








20 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 




















श्रे णिया पश्चिमी एवं पूर्वी 
| तट के निकट है । उत्तर 
दिशामें दोनों पर्वत श्रेणियों 
के मध्य की धाटी दिखायी 
नहीं पड़तो परन्तु दक्षिण- 
] पृण्निम में आन्‍न्तंरिकसागर 
कि ४०५०४४४८.. "धर 2०४8 के पास यह अवश्य दुष्टि- 
गज मे न गोचर होती है। भनेक 
स्थानों पर ज्वालामुखी 
पर्वतों का प्रसार है। जापान 
में 69 ज्वालामुखी है 
जिसमे 30 अब भी जाग्रत 

' अवस्था में है। जापन के 
580 से भी अधिक 


जापान 


िठारा।॥ ६४5७7 
॥6॥9..5१30 





5(0७97॥)|+ ४४६५7 
($4:४9 &0॥8 





09 ॥00 २०० 3006 
)॥।६ ६ ५ 


चित्र 22 जापान : विवर्तनिक क्षेत्र एव स्थल रूप 


शिखरों की उचाई 2000 मीटर से अधिक है। फ्यजी एक प्रसुप्त (007779ग7) 
ज्वालाथुखी पर्वत है जिसका अंतिम विस्फोट 707 मे हुआ था। फ्यूजी शिखर 
जिसे जापान में अधिक पवित्र माना जाता है 3776 मीटर (386फीट) ऊचा 
है | होण्डो नामक स्थान पर श्रेणियों के द्वारा मध्य घाटी आच्छादित हो गयी 
है | ये श्र णिया जापानी आल्पस (&।99) के नाते से विड्यरात है जिसमे अधि- 
कांश की ऊंचाई 3000 मीटर से अधिक है 


मध्यवर्ती पर्व॑ती अश्रीणी पर्वतीय रीढ की भाति उत्तर से दक्षिण फेली 

हुयी है । चौडाई कम होने के कारण अनेक तीबगामी छोट।-छोटी नदियों का 

विकास हुआ है जो जल विद्युत उत्पादन के लिए अनुकुल हैं परन्तु परिवहन के 

' लिए सर्व॑था अनुपयुक्त है। जापान मे समुद्र, आन्तरिक जलाणयीय एवं पर्वतीय छटा 

दृष्टव्य है । यही कारण है कि जापानी प्राकृतिक भृदृश्य को सानयुईइ (8979) 
कहते है । सान का अर्थ पर्वेत और सुई का अर्थ जल है । 


हान्शू की, जो जापान का सबसे बड़ा द्वीप है, पश्चिमी पर्वत श्रेणी की 
रचना हिंदा ओर अकाइसी नामक पव॑त श्रेणियों से हुई हैं। इनकी कचाई 


3500 मीटर से भी अधिक है। हिंदा पर्वत जापान का सबसे ऊ'चा पर्वत है 
जिसकी मुख्य चोटी परीग है !। इसे मटर हाने आफ जापान (#शछाा0ता ० 


भौस्याक्तिक स्वरूप 


3०0४7) के नाम से पुकारते हैं। इन श्रेणियों के दक्षिण पौन्टेक एवं नोरीकुरा 
पर्वत श्रेणियाँ हैं जिनकी ऊंचाई क्रमशः 385 मीटर और 3000 मीटर है। 
इस श्रेणी के पूर्व मे काईगेन (339 मीटर), आइनों (309 मीटर) तथा 
कोमागा (2987 मीटर) पर्वत श्रेणियां स्थित है। थे - सभी पर्वत श्रेणियां 
. अकाइसी पर्वत श्रेणियों के ही अग है | हिंदा श्रेणी के पश्चिम में हिंदा पठार 
है जो नगोया के पास अत्यन्त सकरा हो गया है। पूर्वी पर्वत लू णी का विकास 


अधिकता है ! यहाँ के ज्वालामुद्दी पव॑तों की छुट्व विशेषता यह है कि फ्यूजी- 
' थामा पर्वत को छोड़कर किसी भी पर्वत श्रेणी की ऊंचाई 500 मीटर से 
अधिक नही है | केगामाइन ((७४808एं/8) जे; पयूजीयासा पर्वत के भिकट 
है, 4200 मीटर ऊंचा है। यहां का प्राकृतिक दश्य इतना सुडावना है कि 
गापानी इसे स्वर्ग सानते -हैं। इससे स्पष्ट हैं कि जापान विविध संश्लिष्ट 
भू-दुश्यों का देश है | फियोकू (900) में गच्धक के झरतो वी उपस्थिति छे 
कारण दुर्गन्धित वातावरण है >िससे जापानी इसे महान नरक (छत ॥0॥) के 
नामसे सम्बोधित व रते हैं। जो सड़क केनपमाइन से फ्युजीयामा होकर फिग्ेक्कू तक 
जाती है उसे स्वर्ग से नरक जाने वाली सड़क कहते है । यही पर मध्य भाग में 
क्योटो के पास बीचा (88५७8) नामक मनोरम झील पर्यटव केन्द्र है जिसकी 
समुद्र तल से ऊंचाई 90 मीटर है । यह जापान की सवसे वड़ी ताजे पानी की 
झील है। यह सुरगा की खाड़ी से एक छोटे जलडप्ररूमध्य द्वारा पृथक है । योदी 
और यमा नदियां दक्षिणी भाग से झील में गिरती है । 


हान्यू के दक्षिण-पश्चिम में स्थित चुगोक ((७६०६७) प्रायद्वीप की 
रचना में पश्चिमी श्रेणी का विशेष हाथ हैं जिसता प्रमुख काधार जुगोक पवेत 
है। यह प्रायह्वीप दो बलित पर्वत श्रेणियों से बना है। उत्तरी बलित श्रेणी 
एशिया महाद्वीप के सिनलिग (आंग9) तथा दक्षिणी वलित श्रेणी नानशात 
पर्वत श्रेणी से सम्बन्धित है | शिकोक द्वीप दक्षिणी द्वीप है जो रवेदार शिप्ट 
शैलों से बना है। इशीजुणी (॥कुणणां) चोटी 2073 मीटर तथा सुरगी चोटी 
498॥ मीटर ऊची है। इस क्षेत्र में सर्वाधिक अनाच्छादन हुआ हैं। दक्षिफ 


जापान की भौगोलिक समीक्षा 





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चित्र 23 जापान : उच्चावचीय स्वरूप 
- 00 मीटर से कम, 2- 00-000 मी ०, 
3- 4000 मी० से अधिक ऊचे भाग । 


भोम्याकृतिक स्वरूप॑ [ 23 


पश्चिम में काई ग्रायद्वीप, व्यूशू और शिकोक के दक्षिण में मोड़दार पर्वतों का 
प्रसार है । अतः मैदानी भाग की कमी है । उत्तरी भाग में ग्रंनाइट चट्टान का 
सर्वाधिक मौसमी क्षरण (४४७४७॥०) तथा अ्रश्नन (छ2एताए) हुआ है । 
मध्यवर्ती भाग में आन्तरिक सागर का निर्माण भूमि के धसने के परिणामस्वरूप 
हुआ है। पूर्वी भाग में सेत्सू, किवी, बीचा, यामातों (नारा वेसिव) तथा क्‍्योंटी 
(यामाशिरो) आदि छोटे-छोटे मैदान हैं (चित्र 2.4 व)। 





चित्र 2.4 जापान : (अ) भीमिकीय संरचना 
।- टशियरी, 2- पेलेजोइक, 3- ज्वालामुखी 
(व धरातलीय स्वरूप 4- पर्वत एवं पहाड़ी, 
2- डेलूवियल (9॥0णं४) उच्च भाग, 
3- जलोढ़ निम्तमूमि । 


पूर्वोदत घरातलीय विपसताओं एवं उच्चावचीय स्व्झूपों (+8॥९्४/ 
/९8४(०:४5) में विभिन्‍तता के आधार पर जापाव को चार भौतिक प्रखण्डों 
(799०४ एशंभंणा9) में विभवत किया जा सकता है:-. 


24 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


4- होकेडो ([॥00(8700) 
2- उत्तरी-पूर्वी प्रखण्ड ((४०7॥॥-6996॥7 पि680०07) 
3 


मध्यवर्ती फोस-मेस्ता-कान्‍्टो प्रखण्ड 
(0७.8 60598-9979-(४0 +०9)0॥) 


4- दक्षिणी-पश्चिमी प्रखण्ड (50 ७0-/0769७7 #१७वां०॥) 


4- होकडो:--- (॥00८900)- दो पर्वत मालायें होकैडो के धरातलीय स्वरूप 
की रचना करती है । ये पर्वत मालायें इशीकारी और यूफुत्सू निम्नवर्ती मैदान 
के पूर्व में किटामी और हिडाका पर्वत-क्रम के नाम से जानी जाती हैं ३ ये पर्वत 
मालायें उत्तर से दक्षिण फैली हुई है। इनकी संरचना पश्चिमी ठोहोकू के 
समान है। ये पर्वतीय क्रम पूर्वानुवर्ती (8770९ ०७॥/) नदियों द्वारा विखंडित हैं 
जिसके परिणामस्वरूप यहाँ पर 5 नदी बेसिनों की उत्पत्ति हुई है । कामीकावा 
वेसिन का निर्माण उतरी इशीकारी नदी द्वारा हुआ है । इसके पूर्व में विस्तृत 
चिशिमा (2॥5/॥॥74) पहाड़ी है जहां पर कई ज्वालामुखी पाये जाते है । यह 
पहाड़ी शिरेटोको (89720०0/60) प्रायद्वीप तक फैली है । चिशिमा और किटामी 
हिडाका पहाड़ियाँ हौकैडो के मध्यवर्ती भाग में एक दूसरे से मिलती है 

ओर मिलकर डजेटसुजान (0/9७॥5५2०॥) पर्वतीय क्रम की रचना करती हैं । 
इन तीनों पर्वतमालाओं के क्रम के मध्य तीन प्रमुख मैदान पाये जाते है। इन 
मंदानों की रचना तीत्रगामी नदियों द्वारा लाये गये अपरदित अवसाद के 

परिणाम स्वरूप हुआ है। इन मेदानों में टोकाची मंदान सर्वाधिक विस्तृत हैं । 

यह दक्षिण से पूर्व दिशा में फैला है | यहां पर नदी वेदिकः पंखो (॥छ70०86 

8878) का निर्माण चार क्रमों में हुआ है | यह समुद्र तल से 500 भीटर ऊ'चा 
है। इस मैदान के ऊपरी भाग पर ज्वालामुखी राख की एक मोटी परत बचिछी 


हुई है ! 


इशीकारी-युफुत्सू मैदान का निर्माण जलोढ़ मिट्टी द्वारा हुआ है। यहां 
का जन अपवाह अत्यन्त क्षीण है | इसके अत्तिरिक्त उत्तर में छोटे-छोटे मैदान 
है। पूर्वी होकेडो मे. कोनसेन (((0०७७7) का मैदान ज्वाल!मुखी राख से 
आच्छादित 'है । यहां की घाटी अत्यन्त उथली (909॥0५) है जिसके परिणाम 
स्वरूप दलदल की बाहुलता है । ; 


.. होक॑डो के उच्चावचन में अत्यधिक विपमताये नही है क्‍यों कि पर्व॑तों की 
चोटियों की ऊंचाई लगभग समान है| यहां पर अपरदन एवं अपक्षय अधिक 


भौम्याकतिक स्वरूप [ «2 


मात्रा में हुआ है। इसके अतिरिक्त नदियों द्वारा अपरदन के परिणाम स्वरूप 
धरातलीय ऊचाई कम है। नदियां आवागमन का मार्ग प्रस्तुत करती है। यहां 
की कोणीय तथा प्र शित तटरेखा सर्वत्र पायी -जांती है । केप एरिमों (29७ 
धिगगग0) के सभीष तटरेखा की ऊचाई सर्वाधिक (समुद्र तल से 300 मीटर) है। 
2- उत्त री-पूर्वो प्रदेश (॥ए०॥-84580 विधधु/णा ):०+- उत्तरी-पूर्वी जापान 
की संरचना तृतीय कल्प की चट्टानों द्वारा हुई है। ओअज और युएत्सु (00 
गाव (65प) दो व्यूत्यित पर्वतों की श्रेणियां एक दूसरे के समान्तर उत्तर से 
दक्षिण फैली हुई हैं। इसे इशिगो-देवा (६छऋांठु0-06५४8) क्रम भी 'कहते हैं। 
आमन्तरिक सण्डल में वलने और प्रशन को छियायें स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं । 
ओोऊ पर्वत के पूर्व मे टोहोकू क्रम है जो दक्षिणी होकेडो क्रम के समान है । पूर्वी 
मण्डल एक दर्शनीय स्थाच है। इशियो देवा क्रम की श्रेणियों की ऊ चाई 2000 
से 3000 मो० है जिनमें यत्र-तत्र ऊचे दर हैं। यहां पर प्रधम जीव कप 
(?४॥०९०2०० ६79) की (55 करोड़ वर्ष पूर्व) चद्ठानें पायी जाती हैं जिनके 
ऊपर तृतीय कल्प (काश शिव) की (6 करोड़ वर्ष) चढ्ानों का ,जमाव है, 
परन्तु शंक्वाकार ऊची चीटियां ज्वालामुखी शंकु का स्वरूप प्रस्तुत करती है। 
इसमें असामा और निकी के पास नैनटाई (पक्ष) श्रेणियां प्रमुख हैं । इसमें 
असामा की ऊचाई 2000 मी० से अधिक है | ज्वालामुखी विवर (2४6०४) 
के चारो ओर घने जंगल है और उत्तर में टोवादा (7०0४४३०४) झीन अत्यन्त 
रमणीय है । इसलिए जापान निवासी यहां आकर अपनी छूटिव्यां तिताते हैं । 
भोऊ पर्वत आगे चलकर यूएत्सू द्वारा पश्चिम में विभाजित है अतः यहां छः: 
विवर्तनिक (7620770) वेसियों का उद्भव हुआ है। इसमे प्रत्येक वेसिन का 
ढाल तीत्र है और पर्वतीय स्कन्ध (६9०६|०॥7०7१४) का विस्तार पूर्व और पश्चिम 
में हुआ है । 


युएत्स पर्वतीय क्रम दो भागों में विभाजित हो गया। इस विभाजन 
का कार्य मोगामी (१४०58277) वदी करती है । उत्तरी विभाजित क्रम, देवा 
क्रम और दक्षिणी विभाजित क्रम एशिगो क्रम के नाम से विख्यात है। मोगामी 
नदी जो पूर्व में ओऊ पर्वतीय ऋम से निकलती है और वेधित के समान्तर 
सहायक नदियों के साथ बहती हुई तटीय हुयी तटीय श्रेणियों पर अपरदन कार्य 
करती है । यह एक पूर्वानुवर्ती (&78०४१॥६) जल अपवाह (0/क॥996 
5५8७॥7) प्रस्तुत करती है। पूर्वाचुवर्ती जल अपवाह क्रम के कारण तटीय 
श्रेणियों में खड्ड (90६06) एवं गम्भीर खड्ड (087/07) का निर्माण हुंआ है। 


26 ] 'जापाल की भौगोलिक समीक्षा 
यद्यपि तटीय श्रेणियों का अपरदन अध्कि हआ है फिर भी ज्वालामुखी 
चोटियों को ऊँचाई अधिक है । ईंन श्रेणियों में सुगारू प्रजी (॥8प९20 
70७), हिरोशाकी का प्युजी शिखर, चोकाई ((.॥०८४) गसन (5858वद॥) 
ओर आईड (॥0७) उल्लेखनीय हैं । 
उपयुक्त धराचलीय विषमताओं एवं उच्चावच के आधार पर उत्तरी- 

पूर्वी जापान को दो उप भोतिक विभागों में विभक्त किया जा सकता है। 

(अ) जापान सागरीय आंतरिक भाग, हु 

(व) प्रशान्त महासागरीय बाह्य भाग । 


(अ) जापान साग्ररीय आन्तरिक भाग-(रा्कः रिक्षा। त॑ उ्ऊणा 
568)--पर्श्चि मी टोहोकू की तट रेखा अत्यन्त श्र॑णशित है और ऐतिहासिक 
काल से ही इसका पर्याप्त अपक्षरण एवं अपरदतनत हुआ है | टेक्टोनिक खाड़ियाँ 
तीब्रगामी नदियों द्वारा लाये गये अवसादो से भरती रहती .है। यह अपरदन 
मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम के पश्चिमी ढालों पर सर्वाधिक होता है। अत्यधिक 
अवसादीय निक्षपों के परिणामस्वरूप यहां पर दलदली गैदानों का निर्माण हुआ 
है| इन गैदानों का निर्माण लगून झीलों ([89०07$) के भर जाने के परि- 
णामस्वरूप हुआ है । इस निक्ष प में पश्चिमी त्तट पर वायु द्वारा निर्मित बालुका 
सस्‍्तुपों (5६00 १0785) का अधिक योगदान रहा है। पश्चिसी तट प्रशन के 
कारण तीजन्र ढाल प्रस्तुत करता है क्योंकि तटीय कगारों ((शा५9) की ऊंचाई 
अधिक पायी जाती है । 


(ब) प्रशान्त महासागरीय वाहय भाग (007 9०० २४णॉी० 
(0०९७॥)-पर्वी टोहोकू एक टेक्टोनिक खाई(प७०॥०४० ॥/8॥०॥) द्वारा विभाजित 
है। इसके पूर्व में क्टाकामी और अवृकुमा ((0विथाएं आत /४७ए॑८७॥8) 
पठारों पर अपरदत कार्य अपेक्षाकृत कम हुआ है जिसका प्रमुख कारण यहां हे 
कठोर एवं रवेददार चद्ठाने है। यहाँ के समप्राय मैदानी (७७०।०॥००) भागों 
की भाँति यत्र-तत्र मोचाडनाक (/0790॥0०५७) दिखाई पड़ते है । किटाकामी 
पठार पर हयाचीन (॥9५/३०॥॥6) श्रेणी मोनाडनाक की भिति ही दिखाई 
पड़ती है | दक्षिणी फिटाकामी प्रदेश की तद रेखा नदियों के भपरदन के कारण 
अत्यधिक कटी फटी (0॥5500७60) है । यहां पर निम'ज्जन (509&60॥0७) के 
कारण तटरेखा अत्यन्त सुहावनी हो गयी है। 


इसके विपरीत उत्तरी किटाकामी और अबृकुमा उच्च प्रदेश तटीय मैदान 
द्वारा घिरे हुए है। पश्चिम में ये उच्च प्रदेश एक भ्रश रेखा द्वारा सीमांकित 


भोमयाकृतिक स्वरुप 


हैं। यहीं से किटाकामी और अवूकुमा तदियां निकल कर समुद्र में अपन/ जल 
गिराती हैं। किटाकामी नदी उत्तर मे दक्षिण झौर अबुकूमा चदी दक्षिण- 
पश्चिम से उत्तर-पूर्व दिया में बहती हुयी प्रशान्‍्त्र महासागर में गिरती है । 
इत दोनों नदियों के मध्य इनके द्वारा लाये ग्रग्ने अपसादों से किटाकामी मैदान 
का निर्माण हुआ है। - 


3-मध्यवर्ती फोसा-मग्ना-काण्टो प्रदेश (७0 १०४४४: ४8078- 
(870 मि69०॥)-मध्य जापान में हाच्शू, शिकोकू और बोनिन मोड़ (/७४०)' 
मिलकर चुवू गांठ (१०0७) की रचना करते है। यह जापान का उच्चतम 
व्यूत्थित पर्वत (8॥007 ॥॥9 प्राध्षा।] है। इसी क्रम में जापान का आल्यस_ आता 
है जो 300 मी. से भी अधिक ऊ'चा है। जापानी आल्पस में पश्चिमी भाग की 
अपेक्षा पूर्वी भाग अधिक ऊंचा है। पूर्वी भाग में ही हिंदा श्रेणियां स्थित हैं | 
यहां फोप्ता-मैग्ता निम्नवर्ती क्षेत्र जायान के प्रत्येक सोतिक विभाग को एक दूसरे 
से अलग कर देता है। यह संरचनात्मक निम्तव्ती क्षेत्र लगभग 40 मोल चौड़ा 
है जो पश्चिम में ऊची और श्रशित आल्पस्‌ श्रेणियों से घिरा है| यहां उत्तर में 
तोयामा (709५8॥9) में जापान सागर के तद से हाइम (#॥79) उत्तरी 
सिलानो और तेनरियू (प७॥५छ) नदियों के सहारे शिजयोक्रा.( 5॥#200९8) में 
प्रशांत तट तक फैला है। इस्त प्रकार इसके पश्चिम में जापानी आल्पक्त_और पूर्वे 
में जोशिन येत्सू (3०शंता ६&5प५) पठार स्थित हैं । 


इस निम्नवर्ती क्षेत्र का विकास कब हुआ यह ज्ञात नही है ' यह भाग 
मायोसीन (०८७7७) काल (2करोह वर्ष पूवे) में जलमर्न था | इस काल में 
मायोसीन काल की चट्टानों को अपरदित कर नदियां इस गर्ते को भरती रहीं । 
दक्षिण में फ्यूजी ज्वालामुखी, उत्तर में यःत्स (४४5७) और म्योको (५०८०) 
पर्वतों के अवसादों से फोसा-मैम्ता गर्त निक्षेषित होता रहा । कई ज्वालामुखी 
पर्वेतों के मध्य संरचनात्मक घादियों का निर्माण हुआ जिसमें मत्सूमोदो 
(४४४णा००), चुवा (8099) और कोफ्‌ (/(0॥7) घाटियाँ पश्चिम में 
ओर नगानों ([४७७०॥०) तथा युएडा (७०४४) घाटियां पूर्व में उल्लेखनीय है | 
ये घाटियाँ जलोढ़ मिट्टी द्वारा आंशिक रूप से निक्षेवित होती रहती है जिसके 
परिणामस्वरूप यत्र-ततर वेदिकाओं और मैदानों का निर्माण हुआ है। फोसा- 
मेग्ता संरचनात्मक घाटी वोनिन-मैरियाना मोड़ तक है। 


काण्टो मंदान सबसे ऊंचा मेंदान है जिराका निर्माण होकौडो के टोकादी 
मेंदान की भाँति बाढ़ के समय निक्षेपण से हुआ है। यहां पर निश्षेवित एवं 


28 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


अपरदित वेदिकारयें (88089) स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती हैं। नदी के 
प्रत्येक पृनर्य वन (प७] ५४७९७॥०॥४०॥) अवस्था में नई नदी वेदिकाओं की उत्पत्ति 
हुयी है । किन्ही-किन्हीं वेदिकाओं की ऊंचाई एक दूसरे से 50 से 50 फीट 
है । टोन (प0॥७) तथा अन्य नवियां प्रशान्तर महासागर और टोकियो की खाड़ी 
में निक्ष पण से मंदानों का निर्माण कर रही है। पश्चिम में जो अपेक्षाकृत प्राचीन 
उच्च क्षेत्र है, छोटी-छोटी धाराओं द्वारा अपरदन के कारण नई जलोढ मिट्टी 
का निक्ष प हो रहा है । निम्नवर्ती वेदिकाये कही-कही समतल हैं और कही- 
कही ऊबड़-खाबड़ है। इस् प्रमुख कारण नदियों द्वारा अपरदन है। निम्नवर्ती 
टोन का निनश्ष पित भाग अत्यन्त दलदली है । नदी वेदिकायें अम्ल प्रधान पयुजी 
ज्वालामुखी की राख द्वारा आच्छादित है। 


4- दक्षिणी-परिचमी प्रदेश (७०७७-ए०४७प॥ पि०वां०व)--इस भाग की 
रचना प्राचीन पैलियोजोइक चद्टानों द्वारा हुयी है। यह एक जटिल प्रदेश है। 
उत्तरी जापान की अपेक्षा यहाँ पर अपक्षय (५४४०४४७॥॥३७) एवं अपदन 
(हा०आं०)) अधिक मात्रा मे हुआ है। क्‍्योटा, नारा और वीवो नदियों द्वारा 
अपरदन कार्य उल्लेखनीय है । यही कारण है कि यहाँ पर पर्वतीय श्रेणियों की 
ऊंचाई अपेक्षाकृत कम है। पठार अत्यधिक कट्टे-फटे हैं और इनकां ऊपरी भाग 
अपरदन के कारण सपाट दिखाई पड़ता है) इस अदेश में भूगभिक चट्टानों की 
संरचना के अयुसार उच्चावच (सवार) में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है । 

यहां पर आरनेय एवं कायान्तरित शलों की वाहुल्यता है, परन्तु चदी-घादियों में 
अपरदित्त चद्टाने पायी जाती है। भ्रशन की क्रियानें जल प्रवाह (079॥998) 

को सर्वाधिक प्रभावित किया है । इस प्रकार दक्षिणी-पश्चिमी जापान के 

जापान सागरीय एवं प्रश्नान्त महासागरीय भागों के उच्चावच में असमानता 
पायी जाती हैं । अत: इस प्रदेश को दो उपभौतिक विभागों मे विभक्त किया जा 
सकता है--- 


(अ) जापान सागर का आन्तरिक भाग, 
(व)- प्रशान्त महासागरीय बाह्य भाग । 


(अ) जापान सागर का आन्तरिक भाग (॥#0 .047॥ ० 3800॥ 588) 
इसके अन्तगंत चुगोकू, उत्तरी शिकोकू और उत्तरी क्यूथू के क्षेत्र आते 
हैं । यह एक जट्लि प्रदेश है। यहां पर नदियों द्वारा ग्रेनाइट, और मोड़दार 


परतदार शेलों का अपरदन अधिक भात्रा में हुआ है जिससे समुद्री चबुतरों 
((वा॥6 +80॥9) का निर्माण हुआ है “यहां के व्यूत्यित पर्वतों (8॥00५ 


भीम्याक्तत्तिक स्वरूप 


॥0079॥5) का विखण्डन क्योंटी, तारा ओर वीवा नदियों द्वारा हुआ है। 
आन्तरिक सागर से दर चुगोक  प्रदेण में यद्यपि भ्रणन का कार्य बधिक हुआ है 
फिर भी छोटी-छोटी घाटियां यहां बर्तंम्गन है। यहां के अधिकांश क्षेत्र सुदृढ़ 
एवं प्राचीन है। सगप्राय मैदानी स्वरूप की भाँति यत्र-तत्र गोल पहाड़ियां 
तथा छोटे-छोटे ज्वालामुखी पर्वतों की उपस्थिति से ऐसा ज्ञात होता है कि ये 
मोनाडनाक हों । इस क्षत्र में कहीं-कही घाटियां विद्यमान हैं | यहां पर प्राच्ीन- 
- तम आग्नेय एवं नवीनतम परत्दार चद्गानें पायी जाती हैं। इसलिए इन भौग- 
भिक चट्टानों की भिन्नता के कारण पूरे प्रदेश में उच्चावच एक जैसा नही है। 
इशीजुशी चोटी 2073 मीटर और सुरगी चोटी तो ऊंचाई 984 गीटर है 
परन्तु नदी घाटियों मे स्थित मैंदानों की ऊ चाई कही-कहीं 20 मीटर से भी 


का 
कम हू । हे र 


पहाड़ियों की सरचना ग्रेनाइट एवं नीस शलरों द्वारा हुयी है। अधिकांश 
पृठार चूना सिश्चित शै््ोंसे बते हैं जिससे अपरदन कार्य अधिक हुआ है । 
अपश्र शन के कारण अनियमित जल अपवाह पाया जाता है | अतः यत्र-तत्र 
तालाबों (2०005) एव ज्ञीलों (9७७) की उत्पत्ति हुयी है। बीवा झील 
इसका प्रमुख उदाहरण है | वोबगामी नदियों ने युवावस्था में अयनी घाटिय्रों में 
तलीय अपरदन तीज गति से करने के कारण किक वेदिकाओं को जन्म 
दिया है । इन वेदिकाओं की एक दूसरे से ऊचाई अधिक है। 


उथला आन्तरिक सागर पाँच आयत्ताकार वेसिनो का एक क्रम है. जिनमें 
ताडा वेसिन मुख्य है । इस क्रम की उत्पत्ति निमंज्जन ( 8फ्रशाशप्रश०७ ) के 
परिणाम स्वरूप हुयी है । यहां पर कई प्राचीन अपरदित पहाड़ियाँ हैं जो 
सपाट हो गयी हैं । कहीं-कही तटीय भाग जंगलों से आच्छादित होने के कारण 
अत्यन्त रमणीप बन गया है। युग्रोक प्रदेश में नदियों ने कही-कहीं पदवेर्त,य 
क्षेत्रों के पास उपजाऊ जलोढ़ गैदानबों को रचना किया है परन्तु बड़ी-बड़ी 
नदियों ने आन्तरिक सागर के समीप डेल्टा का निर्माण किया है। ओसाका में 
योदो नदी पर और हिरोशिमा मे ऐसे ही डेल्टो का त्तिर्माण हुआ है । वह 
जलाशयी क्षेत्र जो चारो और पव॑तीय क्षंत्रों से घिरा है पर्यटन स्थल के रूप में 
विख्यात हैं। इसी भा॑ति निक्ष पण ओकायामा में कोजिमा खाड़ी और पश्चिमी 
क्यूशू में एरियाकी (&09|९७) घ्ाड़ी में हुआ है । 
(बज) प्रशान्त महासागरीय बाह्य भाग(0एश एच ० 78०४० 006०॥) 


इस भाग में अन्य भागों की अपेक्षा श्रशन ( पाता ) 
कार्य कम हुआ है। यहाँ पर मोड़दार पव॑तों का बाहुलय है। यहां 


30 | जापान की भौगोलिक समीक्षा 


पर भी पैलिपोजोइफक चट्टाने उत्त र-पूर्व से दझिग-परश्चित में फैडी हुयी है यो 
पश्चिचम में दक्षिण क्यूशू से शिकोकू होते हुए काई (0) प्रायद्वीप तक विस्तृत 
हैं। यह एक कमजोर झ्लत्र है। यही कारण है कि दक्षिणी फौ्यूचू में जाग्रत 
ज्वालामुखी ( 8०४५७ ४००७॥०७5 ) यच-त+न दिखाई पड़ते है | जंगली क्षेत्रों 
में प्रायः कठोर कायान्तरित (॥/९४४४0.[४०) शैलें पायी जाती है। इस प्रेदेश 
में बनत्न-तत्र नदी घादियां पायी जाती हैं परन्तु उत्का विस्तार एवं चौड़ाई कम 
है । अत: यहां जलोढ़ मैदानों की रचना नगण्य है। तटीय भाग में विभंजन 
( ((श०76 ) की क्रिया परिलक्षित होती है । इसलिए क्यूश, शिकोक्‌ और 
काईं प्रायद्वीप के पूर्वी और पश्चिमी भाग मे रियातट _ ( क॥ां8 ०००७४ ) का 
विकास हुआ है । इन तटीय भागों में पर्वतीय श्रेणियां तट से समकोण पर 
दिखाई पड़ती है । 


जापान की पहाडियां (।॥5 ० 3०70॥) 


जापान के छः भौतिक विभागों में यद्यपि संरचनात्मक अन्तर थयधिक पाया 
पौया जाता है फिर भी धरातलीय ऊवड़-खावड़ स्वरूप सम्पूर्ण जापान में स्वेत्र 
लगभग एक सा पाया जाता है। पर्वतों फी संरचना प्राचीन एवं नवीन दोनों 
प्रकार की घैलों से हुआ है । जापान के लगभग 75% भाग पर पर्वतीय वि तार 
पाया जाता है । जापान के सभी पर्व॑त्तों का ढाल ।5? से अधिक है। इना(74) 
के निकट तेनरिंड [7979५0) घाटी के पश्चिम मे उच्च पर्वतीय क्षत्र है जो 
फोसामेग्ता के श्रशित स्कन्‍्ध (508॥) का पश्चिमी भाग है| अधियांश पवेतों 
का निर्माण प्लीस्टोतीन (20 लाख बर्य पूर्व , काथ में हुआ जिनका वर्तमान 
समय में सर्वाधिक अपरदन हुआ है। यह अपरदन तीव्र हिसमपात और ग्रीष्म- 
कालीन तूफानों एवं तीब्रगामी नदियों के कारण हुआ है । यहां पर पर्वत्तीय 
ढालों पर भुमि स्खलन सामान्य घटना है । अत. वर्दियों की घारियों में वाढ 
के समय बड़े-बड़े गोलाश्य (80प/0095) वहकर जाते हैं । बाढ़ के समय 
असंग्रठित एवं कमजोर आग्नेय और पर्तदार चट्टाने आसानी से अपरदित हु। 
जाती हैं। कुछ नदिया तीम्र द्वाल पर प्रवाहित होने के कारण उध्वधर(५६7४०४/) 
कटाव अधिक करती है। नदियों के मार्ग में इन स्थानों पर जल प्रपात 
(४४४४ 49॥5) पाये जाते हैं, जहां या तो नदियां भ्रश रेखा को पार करती 
है अथवा जहां कठोर एवं मुलालय चट्टानें क्रम से त्रिछी होती है। नदी की 
युवावस्था मे बनने वाली आक्ृतियों में संक री एवं तंग घाटी, गाज, कैनियन, 
जल प्रपात, समुच्छलिका (8०605), संरचनात्मक सोपान (9#प८०।वां 
56॥7०॥०५) आदि स्थलाक्ठतियां मुख्य है। तीजन्नगामी नदियों द्वारा अपरदन और 


भौम्याक्ृतिक स्वरूप [ 3| 


भूस्खलन इतनी अधिक मात्रा में होता है कि जिन रथानों पर मिद्ठी की पतली 
परत पायी जाती है वहां था तो वनस्पतियों का प्र्ण अक्षाव है अथवा उनकी 
मात्रा नगण्य है । इसलिये बहुत से परवंत्तीय ढाल वनस्पति रहित हैं । तीज श्रशन 
के कारण ऊबड़-खावड़ स्थलाकृतियों का विकास हुआ है। अपरदन द्वारा 
निर्मित वेव्िकाओं को देखने से यह मात होता हैं कि सम्बन्धित भूदुश्य का पुन- 
यंवत् हुबा हो और वह एकाएक अधिक ऊपर उठ गया हो । पुराने जलोढ़ द्वारा 
निर्मित ऐसी वेदिकाए' विशिष्ट भौग्याकृति बनाती हैं । 


जापानी अल्प्स के कुछ पर्वत यूरोपीय आल्प्स के लगभग समान हैं । दोनों 
क्षेत्रों के पर्वतों के तीत्र ढालों थौर खुरबरे इन्टर फ्लूबव में पर्याप्त समानता है 
परन्तु जापान के पर्वतों में चोटियों, एरेट (४०४७) और सक॑ (एणंप७७) का 
पूर्णपहपेण अभाव है; यहां पर हिमनदों( 5309878 ) का विक्राप्त कम हुआ है। 
ट्मिनदों का विकास केवल हान्धू और होकैडो के ऊचे पर्चतीय क्षेत्रों में ही 
हुआ है। ज्वालामुखी पर्व॑तों को छोड़कर अन्य पर्वतों में नुकुली चोटियों का 
अभाव है जिसका प्रमख कारण मपरदन है । 


जापान की पव॑ंतों की ऊंचाई चार हजार मीटर से अधिक नहीं है । 
फ्युजी शिखर सर्वाधिक ऊचा है जिसकी ऊंचाई 3776 मीटर है। अच्य पर्वत 
श्रेणियों में काइगेन (3605 मीटर), हिंदा और अकाइसी (3500 मीटर से 
अधिक), ओनटेक (388 मीटर) आइनो (347 सीट २), नोरीकुरा (3050 
मीटर), परोगा (3000 मीटर), याकुसी और कोमेगा (2897 मीटर), केंगा- 
माइन (200 मीटर), इशीजुशी (2070 पीटर), सुरगी (984 मीटर । 
आदि मूल्य पर्वत श्रेणियां हैं । 


सेदान (?8॥%) 


जापान में मंदानों का विस्तार अत्यन्त अल्प है. (चित्र 2.2) | जायान के 
सम्पूर्ण क्षेत्रफलके बवल। 2 2 भाय पर ही वास्तविक मैंदानोंका चिस्तारहै। दे परमें 
जिन स्थानों पर पर्वेचों का अच्त होता है उस स्थान पर तीज्रगामी नदियां अपने 
साथ वहाउर लाये गये अवसःद को निश्ष पित कर जनोढ़ जंकु[।एशंवा (०7०5) 
तथा जलोड़ पंख (8॥७७४| शा) का निर्माण करती हैं। काण्टो में दान बाढ़ 
के निशक्ष प द्वारा प्रतिवर्ष ऊचा उठ रहा है। इस प्रकार ग्रह्मां निभित वेदिकाओं 
को देखकर निक्ष पण की गहराई का आकलन किया जां सकता है। सदियों द्वारा 
अपरदन के कारण सीढ़ीदार वेदिकाओं का निर्माण हुआ है। किन्‍्ही-किन्ही 


स्थानों पर ऐसी सीढ़ींदार वेंदिकाओं की ऊ चाई 400 फीट से भी अधिक: हैं । 


32 |] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


नदियों में पुनर्यवन (फक्ुंधश७फक्षांए0). के कारण नदियों की सास्यावस्था 
(979080 ह#998) सभाप्त हो गयी जिसके परिणाम स्वरूप जबोढ़ शंक्रुओं एवं 
'जलोढ़ पंखों का अपरदन हो गया । संकरे गार्ज अपरदन के द्वाष्या विस्तृत एवं 
गहरे होकर कैनियन (0०7४07) के रूप में परिवर्तित हो गये है। तेवरिउ नदी के 
समान्‍्तर निक्ष पित गोलाश्म का पुर्णहपेण अपरदन हो गया। इस प्रकार वहां पर 
कगार (20॥#9) की ऊचाई 60 से 720 फीट ऊंची हो ' गयी है। जो बेदि- 
कार्यें स्पष्ट दिखाई पड़ती है और पव॑ततीय ढालों को स्लीमांकित करती है, उनका 

आवार गंगराघाटी के उत्तर मे निर्मित बड़ी ०ध्विाओ दे समान है जो तीव्र वर्षा 
के कारण पर्वेतपदीय अदेशो ((९०४07०/ 7990०0॥79) मे निक्ष प द्वारा निर्मित है ! 


जापान में वाढ के समग्र की निक्षे पित नदी वेदिकाये सिंचाई के लिये अनुकूल 
नही है वयोकि वेदिकाओं के स्तर से नीचे अनेक छोटे-छोटे नाले पाये जाते हैं । 
इसके अतिरिक्त बड़े कणों के कारण सिचित जल शीघ्र ही नीचे चला जाता है। 
ऊपरी धरातल अत्यधिक टूटा-फूटा है । जलोढ पंथ्ो का निक्षेप टोकाची मैदान 
में ओवीहीरो (09#70) के निकट तथा किनकी बेश्चन में हुआ है जो कृषि के 
लिए अनुकूल हैं | थे जापान के असिचित ऊपरी क्षेत्र है । 


कटे-फटे वेविक्ा युक्‍त क्षेत्र के निचले भागो में जलोढ मिट्टी द्वारा निर्मित 
तटीय मेंदानों और घाटियो का निर्माण चीका और सिल्ट द्वारा हुआ है परन्तु 
कही कही मौसमी वाढों, विसपी मोड़ों और मालाकार धाराओं जो मैदान के 
आर-पार प्रवाहित होती है, के कारण बडे-वड़े ग्रोमाश्मों (978५8३3) का 
निक्षेप हुआ है। इस देश की नदियों की मुख्य विशेषता यह है कि ये लम्बाई में 
कम है परन्तु इनकी गति अत्यन्त तीब्र होती है। वर्फ के पिघलने, पतझड़ ऋतु 
के तूफानों और ग्रीष्मकालीन भारी वर्षा से आयतन मे बुद्धि के कारण सर्वाधिक 
अ(रदन करती हैं | वसन्त ऋतु में तीन्र ढालों पर भूकम्प द्वारा असंगठित चट्टानों 
के भूस्खलन से जापान के तटीय भागों में मंदानों के निश्षेप के लिए अधिक 
मात्रा में अवसाद उपलब्ध हो जाता है। ये मैदान विस्तार में छोटे और दल-- 
दली हैं । सम्पूर्ण जापान के 2% भाग पर मंदानों का प्रध्तार है जिनकी रचना 
अत्यन्त नवीन है । पश्चिम में जापान सागर अधिक गहरा है इसलिये गहरे स्थानों 
पर मेंदान अत्यन्त संकरे हैं । ऐसा उन स्थानों पर है जहाँ निम ज्जन (50907- 
शाध्षा०8)की प्रक्रियायें हुई है। विशेषकर दक्षिणी शिक्रोक्‌ में तिमज्जन के कारण 
विस्तृत तटीय मैदान का अभाव हैं । उथले क्षत्रों मे अथवा जहां पर उन्मज्जन 
(प्रश्न ध्ुशा०९) हुआ है वहां पर विस्तृत मैदान पाये जाते हैं । काण्टो, नोबी, 
टोकाची, किटाकामी, सेत्सू, इशियो और सेगा उल्लेखनीय मैदान है । आन्त- 


भोम्याक त्तिक स्वरूप [ 33 


रिक सागर डेल्टा निर्माण के लिये अत्यन्त अनुकूल है क्‍योंकि यहां पर ज्वार की 
लहरें लगभग 40 फीट ऊपर उठती हैं। यहाँ पर धान की सघन खेती होती 
हैं। आन्तरिक सागर में जहाँ पर समुद्र उथला हे[ुअथवा तिक्षेप हुआ है नौका- 
यन[१४४॑पुक्षा०70) कठिन कार्य हैं। प्रायः सभी मंदान नदियों के उच्च तटबन्धों 
(.७४७७७) द्वारा घिरे हैं | ऐसी धाराक्ं को प्रायः तेज्जोगावा (797[098४४8) 

कहते है अर्थात वे धारायें जिन का स्तर निकटवर्ती प्रदेश से ऊपर होता है । 

ग्रीष्म ऋतु में इशिगो नदी का जल स्तर निकटवर्ती अधिवासों से भी ऊपर 
रहता है | ऐसी परिस्थिति में नदी पर पुल का निर्माण करना मुश्किल है क्योंकि 
यदि पुल बना दिया जाय तो नदी उन्हें बहा के जाती है। 


जापान साभर तटीय मंदानों और प्रशान्त महासागर तटीय मैदानों 
की संरचना में अन्तर है| ये मैदात अधिवास एवं कृषि के योग्य हैं। जापान के 
मेंदानों का विवरण तालिका 22 से प्राप्त हो जाता है- 


तालिका 2.2 
जापान के मेदान 





क्रम सं० मैदान स्थिति क्षेत्रफल (लाख हेक्टेबर) 
3. वाण्टो (७४४०). हान्छु 3.00 
2 इशीकारी 6»7र७7) . होकेडो 2.40 
3. नोबी (९०४७) हान्शू .90 
4. इशियो (६०४9०) हान्शू 4.80 
5. किसकी (॥(॥॥9) हान्शू [ 25 
या सेत्सू याकिनाई 
6, सुकुशी ([5000७॥) क्यूश 4.20 
7. टोकाची (॥0/(8०४) होक॑डो .20 
8; किटाकामी (08८). हान्शू .50 





इन सभी मैदानों में काण्ठो, किनकी जौर नोबी ये तीन मेंदान विस्तार 
की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं- 


4. काण्टो मंदान (((४४॥० ?2॥)- यह (मैदान हान्शु के पूर्व तथा 
सैगामी (84927) खाड़ी के उत्तर में स्थित है।इस मैदान की रचना टोन 
नदी द्वारा लाये यये अवसाद के निशक्षेपण से हुई है जो मिकुमी (॥९७४४) क्रम 
के असमा (#89॥7०) शेणी से निकलती है। काण्टों मैदान इस नदी के दोनों 


रब 


34 | जापान की भौगोलिक समीक्षा 


ओर विस्तृत है। इस मंदान का क्षेत्रफल 5000 वर्ग मील है जिसकी जनसंख्या 
20 मिलियय से भी अधिक है। यहीं पर टोकियों-कांवासाको-याकोहासा सन्‍्तगर 
(ट०7प४0ग०णा) स्पित्त है । बह एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र भी है जिसे कोहिन 
([(७॥॥)) औद्योगिक प्रदेश कहते है । टोकियो संसार का सबसे बड़ा मेट्रोपोलिस 
है जिसकी आय दी 40 मिलियम से अभिक है। कीहिन औद्योभिक प्रदेश में 
जनसंख्या का घनत्व 200 व्यक्ति प्रतिवर्ग मील से अधिक है | इस मदान में 
40 से अधिक ऐसे नगर हैं जिनकी आबादी 5000 से अधिक है । 


2. क्विनकी सेदान (गत 9|4॥) यह मैदान वकासा (५४४४/८७७४) 
खाड़ी तथा बीवा झील के दक्षिण मे स्थित है। इसका निर्माण 
योदों नदी द्वारा हुआ है। इसी मैदानी प्रदेश में ओसाका-कोवे-क्योटो 
संश्लिप्ट औद्योगिक प्रदेश स्थित है जिसे हानशिन [#थग5॥ा) औद्योगिक 
प्रदेश कहते है । इस मैदानी प्रदेश की आवादी 40 मिलियन से भी अधिक है । 
उोसाका (3.3 मिलियन) जो जापान का द्वितीय सबसे बड़ा नगर है, यहीं 
स्थित है । 

3. नोबी मेंदान (।७०७ ए|४7॥)--यह मैदान बीवा झील तथा आइस 
(5७) खाड़ी के पूर्व में है। किसो ([80) नदी जो जापान आल्पस से निकलती 
है, इस मोदान का निर्माण करती हुई आइस खांड़ी में, प्रशान्त महासागर में 
मिल जाती है। यह मौदान पश्चिमी टोकाई और पूर्वी किनकी प्रदेश मे आइशी 
(»४0०४) और मी (४४७) भ्रिफ्र क्चर में फैला है । काण्टों ओर फिनकी मौैदानों 
के मध्य स्थित नोवी मौदान जापान का तृतीय सघननतम जनसंख्या का क्षेत्र है। 
इस मेदान का क्षेत्रफल 4 9 लाख हेक्टेयर है। यहां की आबादी 50 लाख से 
अधिक है । नमोया इस प्रदेश का सबसे बड़ा नगर है जिसकी आवादी 20 लाख 
से अधिक है! 

इन दीनों मौदानों के अतिरिक्त जापान में कई छोटे-छोटे मौदान जैते- 
क्रिटाकामी, इशिगो, सेत्सू, सेगा आदि यज्-तत्र फैले है। जिन स्थानों पर 
सघन॑तम कृषि होती है वहां पर जनसंख्या का घनत्व सर्वाधिक पाया जाता है। 
इसके अतिरिक्त जापान के तटवर्ती भागों मे तटीय मैदान संकरी पद्टी में सर्वे 
फंले हैं । जापान में न्यूनतम जनसंख्या जापानी आल्पस, मध्य हान्शू, उत्तरी 
हान्शू ओर होकेंडो में पायी जाती है । 

-.. प्रवाह तस्‍्त्र 

जापान का जल अपवाह जटिल नही है क्‍योंकि पर्वतों के तीन्न ढाल के 
कारण नदियां तीव्र गति से वह॒दी हुई समुद्र में गिरती है। चू कि मौदानी भाग 
का विस्तार अत्यन्त कम (]2%) है इसलिए नदियों की उपशाखाओं की कमी 


भौम्थाकृतिक स्वरूप [ 35 


है । अधिकांश नदियां पूर्वानुवर्ती जल अपवाह क्रम (#ँञ००९७प७॥ ताधाब्वठ्ु० 
5५४शा) प्रस्तुत करती है । 


” जापान की अधिकाँश महत्वपूर्ण नदियां मध्य हान्शु में पायी जाती हैं । 
इशिगो, देवा, मिकमी तथा जापान आल्पूस आदि मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम से 
नदियां हान्शू के पूर्व प्रशान्त महासागर तथा पश्चिमी जापान सागर में गिरती 
हैं। जापान सागर में गिरते वाली नदियों में योनोशिरों, ओमोनो, मोगामी, 
अगानो, शिनानो आदि तथा प्रशान्त महासागर में गिरने वाली नदियों में 
किटाकामी, अबुकुमा, टोव, तेनरिंड, किसो, योदो आदि नदियां उल्लेखनीय हैं । 


शिकोक्‌ भौर क्यूशू ढीप की नदियों की लम्बाई कम है। इसका प्रमुख 
कारण इनका छोटा द्वीपीय आकर है। इन नदियों का आर्थिक महत्व केवल जल 
विद्य त शक्ति उत्पन्न करने के लिए है। होकडो द्वीप की तदियों का जलन दो से 
तीन माह तक जम जाता है। यहां की नदियों में इशीकारी, तेशियो तथा 
टोकाची प्रमुख है। 


जापान की महत्वपूर्ण नदियों का विवरण तालिका 2.3 से प्राप्त होता 





हे लालिका 2.3 
जापान की प्रमुख नदियां 
नाम निकलने का स्थान गिरने का स्थान लम्बाई 
(किमी ०में ) 
प्‌ जीनानों पूर्वी जितानो ...... मिमेठहा .. 3288 7 

2. टोनी ऊपरी कोड़सुक टोकियों की खाड़ी 272 
3. किटाकामी ऊपरी रिक्‍्यूचू रिकजन का पूर्वी तट 224 
4, इशीकारी ऊपरी इशीकारी प्रान्‍्त इशीकारी का पश्चिमी 208 
। तट 
5. तेनरिंड. सुवा झील प्रशान्त महासागर 92 
6. किसो दक्षिणी-पश्चिमी शिनानो  प्रसान्‍त महासागर 484 
7. सकारा दक्षिणी उसेन उसेन क्रा पश्चिमी तठ 76 
8. उकुमा. दक्षिणी पश्चिमी इवाका प्रांत रेकचिउ का पश्चिमीतट 466 


सपडजसयय ता "जाह(इ०८०-जाचण... 





(">> 2». ट्कमं-ड 709ऋमेशापडाइपया0.. "धाएमहनऋक कबल+"एकवजातपाणाम, 


ह जापान को तट-रेखा 
जापान के क्षेत्रफल के अनुपात में जापान की तट रेखा अधिक लंम्बी है । 





36 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


4 वर्गमील क्षेत्र पर एक मील की तट रेखा का औसत हैं। जबकि ब्रिठेन में 
यह अनूपात्त । और 20 का है । जापान का कोई भी अधिवासीय क्षेत्र सागर 
से अधिक दूर नही है क्‍यों #ि जहाँ जापान 4 बड़े द्वीपों का देश है वही इसकी 
तट रेडा अधिक कटी-फटी भी है । जापान के अधिकांश लोग मैदानों में रहते 
है और ये सागर की आसान पहु च मे होते हैं। जापान की तट रेखा मोड़दार 
पर्व॑तो के अक्ष (8४४9) के अनुरूप है। स्थान-स्थाव पर तटरेखा में भिन्‍नता आने का 
मुख्य कारण उसका निमंज्जन (5097799009)और उन्मंज्जन(६॥४छ०॥०७) हैं । 


उत्तरी-पूर्वी प्रदेश के काण्टो मंदान और होकंडो के अधिकांश भाग में 
तटरेखा का उन्मंज्जन (£7४7967०9०) हुआ है । यही कारण है कि यहाँ पर 
वेदिकाओं की ऊचाई सागर तल से 330 मी5 त्तक है। यह ऊचाई दक्षिणी 
होकडो में केपएरिमो में पायी जाती है। इसके विपरीत जापान के दक्षिणी 


पश्चिमी प्रदेश में तटरेखा का निर्मज्जन (5फ्राशध्ध््वा०8) हुआ है। यह 
निमंज्जन विशेषरूप से प्रतों के निकट तथा आन्तरिक सागर के चतुर्दिक हुआ 


है । इसलिए यहाँ पर डूबी हुई घाटियां रियातट का निर्माण करती हैं, साथ ही 
यहां पर भ्रशित आयताकार वेसिन पाये जाते हैं। निमंज्जन के कारण स्थल के 


आन्तरिक भागों तक समुद्र का विस्तार पाया जाता है। नागासाकी वन्दरयाह 
ओर क्यूशू में यात्सुशिरों खाड़ी इसके ज्वलन्त उदाहरण है | शिकोक्‌ मे 
कहीं-कहीं पर भूदृश्यों का स्वरूप तटरेदा के समकोण पर पाया जाता है। यह 
दृश्य उत्तरी-पश्चिमी शिकोक्‌ के सेंदा मिसाकी (9909 ।/४9!0) प्रायद्वीप 
में मिलता है जो सागर से 20 मील अलग फैला है। 


मध्यवर्ती प्रदेश में उन्मज्जन भौर निमंज्जन दोनों क्रियाए' हुई है। दक्षिणी 
कटाकामी उच्च प्रदेश का तट गहरी रिया द्वारा टूट-फूटा है जो स्थातीय 
निर्मज्जन के परिणामस्वरूप घटित हुआ है। मध्य हा श के दक्षिणी त्तट की 
खाड़ियां विशेषकर टोकियो, सेगामी और सुरगा की रचना निम्नवर्ती पम्रशन के 
कारण हुई है । अत: यहाँ की तटरेखा सागरीय सतह की शत्रश रेखा के सहारे 
ट्टी-फूटी दिखाई पड़ती है | होकेडो, क्यूशू और मध्य हान्शू मे आयतादार तट 
(प७लंथाप्ए9 00490) स्पष्टरूप से दिखाई पड़ते हैं ।| जापान सागरीय तट पर 
निम्बर्ती त्रशन के कारण कहीं-कहीं पर छोटी-छोटी खाड़ियों का निर्माण हुआ 
है तो कही पर उन्मंज्जन के कारण वकासा खाड़ी के समीप शिमाने($|778॥8 ) 
तथा अन्य प्रायद्वीपों की उत्पत्ति हुई है। प्रशान्‍न्त तटपर विभंगन (५शशा॥9) 
की क्रियाये हुई हैं जिसके परिणामस्वरूप शिजुओका में मैकिनोहारा पठार पर 
चाय की सफल कृषि हो रही है । 


भौम्याक तिक स्वरूप [3/ 


नदी और समुद्री निक्षेपी द्वारा जापान की तटरेखा पर अत्यधिक प्रभाव 
पड़ता है। जहाँ पर सागर वायु और नदी ये तीनों शक्तियां साथ-साथ कार्य 
कस्ती हैं वहां पर श्र शित खाड़ियों को सर्वाधिक निश्षेपित करती हैं। उत्तर की 
ओर जाने वाली नदी धाराओं ने हवा की सहायता से अधिकॉशतया खार्डियों 
को काट कर खुले सागर का निर्माण कर दिया है । 


जापान के तटीय प्रदेश में यत्र-तत्र खाड़ियों एवं आन्तरिक सागर पाये 
जाते है । जापान में आच्तरिक सागर को सेतोयूची (8580-0७ा) के नाम से 
पुकारते हैं । यह आच्तरिक सागर केवल 6 मीटर गहरा है। इसलिए मछली 
पकड़ने का कार्य व्यापक स्तर पर होता है। वंगो चंचल पर वतंमान हायामोटो 
जल विभाजक 3 फिमी० चौड़ा है। इसके विपरीत अन्य किसी जल विभाजक 
की चौड़ाई 3 किप्री० से अधिक नहीं है । शियानोसे रा तथा यूरा की चौड़ाई 
लगभग 3000 मीटर और नरुटो की चौड़ाई केवल 400 मीटर है । 


इस प्रकार जापान की तट रेखा को कुल लम्बाई 27,200 क़िमी० है 
जो भारत की तटरेखा (5589 किमी ०) से 4,6 गुना अधिक है। जापान की 
तटरेखा और क्षेत्रफल में लगभग :44 का अनुपात है जबकि भारत की तटरेखा 
और क्षेत्रफल में :578 का अनुपात है । 


भूकरप एवं ज्वालासुखी (5870प४९४७ 900 ४०।८७४०४5५) 

भौगसभिक काल ग्रे ही संरचनात्मक गतियां ओर ज्वालामुखी क्रियायें जापात 
में क्रियाशील रही हैं। इसी लिये जापान को भूकम्प और ज्वानामुखी का देश कहा 
जाताहै | इस देश की भोगभिक संरचना तथा धरातलीय स्वरूप का वर्णन अधूरा 
होगा यदि जापान पर भूकम्प एवं ज्वालासुखी के पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन 
न किया जाय | भूकम्प की अधिकता के कारण ही जापान को भृकम्पों का देश 
(00पा५ ए ०७४४त॒एव४८७७) कहा जाता है। संरचतात्मक गतियां एवं 
ज्वालामुछी प्रक्रियायें प्रथभ जीव कल्प (?४४४०४०७ ७8), मेंप्रोजोइक 
(॥॥०४०२००) और टशियरी काल (९08५ हा) में क्रियाशील रहीं जो 
आज भी उसी भांति क्रियाशील हैं । यही कारण है कि जापान के धरातल की 
35% संरचना आरनेय चट्टान एवं ज्वालामुखी राख से हुई है | यद्यपि देश के 
प्रत्येक भाग में भूकम्प का अनुभव किया जाता है फिर भी अधिकांश भूकम्प 
भ्रश रेखा ओर ज्वालासुखी क्रियाओं से सम्बन्धित होते हैं । 


ज्वालामुखी प्रक्रियाओं एवं संरचतात्मक गतियों से सम्बन्धित तीन 
भूऊम्पीय मण्डल है जो इस प्रकार हैं :--- 


38 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


[- आन्तरिक विवतंनिक मण्डल (]707 (6००० 2078 ) 


इस मण्डल में भूकम्प की दो पेटियां है । पहली पेटी टोहोक्‌ के पश्चिम में 
और द्वितीय पेटी पूर्वी होकंडो से क्यूराइल द्वीपो तक फैली है। आन्तरिक मण्डल 
में भूकम्पीय प्रक्रियायें प्राय: कमजोर क्षेत्रों में घटित होती है। 
2- समुद्री गते का निकटवर्ती मण्डल (2070 8०ण६ ॥76 ९७0६8 ०0 
00०७४॥॥० 0९४०5) 


यह मण्डल यत्र-तत्र गहरे गरतों के निक्टवर्ती क्षेत्रों में पाया जाता है। 
3- फोसा-मेग्तना का निकटवर्ती संडल (207० 909ध ॥॥6 5 0558-/8979) 
इसका विस्तार समुद्र में बोनिन द्वीप त्तक है | 


बहुत से हिसात्मक भूकम्पों का अधिकेद्ध (£70०७॥४9) जापान के पूर्वी 
किनारे पर पाया जाता है। ये भूकम्यीय व्यवधान एण्डेसाइट रेखा (#॥ा१8७७ 
॥78) से सम्बधित हैं जहां पर भूपटल भत्यन्त निर्वेल है। जिस अभ्रूकम्पों का 
आगमन समुद्र में होता हे वे वयूशू से टोकियो, पूर्वी टोहोक्‌ के जापान सागरीय 
तट पर सुनामी (7$779॥7 7) की उत्पत्ति करते है जिसे ज्वारीय लहरों के नाम 
नाम से पुकारते हैं। ये लहर बांधों (0/0७5) को तोड़कर आन्तरिक भाग में 
फसलों को अपार क्षति पहुंचाती है। किनकी (॥॥॥|0) में शक्रशन की क्ियायें 
सर्वाधिक होने के कारण सर्वाधिक भूकम्प आते-हैं | हल्की भूकम्पीय लहरें यहां 
के लिए सामान्य हैं । मध्य हान्शू में भ्रश रेखा के सहारे स्थित ग्रिफ (०ांपि) 
में एक वर्ष में 56 से भी अधिक भूकम्प आते है । इस प्रकार यहां पर प्रति- 
दिन एक या एक से अधिक भूकम्पीय घटनायें अवश्य होती है । 


पूर्वोक्त भूकम्पीय मण्डलों के अतिरिक्त प्रशान्त मद्यासागरीय वाहय मण्डल 
में विभंगन ( ४४/०]४7६ ) रेखा के सहारे भूकम्पीय लहरे आती हैं। 20 वी 
शताव्दी का सर्वाधिक विध्वंसात्मक भूकम्प 923 में आया था जिसे ग्रेट काण्टो 
भूकम्प के नाम से पुकारते है। इस कम्प के कारण कानागावा में सग्रामी की 
खाड़ी के दक्षिणी तट का जल 6 फीट भीर उत्तर मे 5 फीट ऊपर उठ गया । 
टोकियो में जो 57 मील भूकस्पीय अधिकेन्द्र ( हशं०शाए० ) से दूर था, में 
लहरों की ऊंचाई 4 फीट से कम थी , उध्वधिर गति के अतिरिक्त क्षेितिजिक 
स्थानान्तरण भी हुआ । सेंगामी की खाड़ी के दक्षिण के प्रायद्वीप का कुछ भाग 
दक्षिण और दक्षिण-पूर्व में 3 फीट 5 इन्च स्थानान्तरित हो गया लेफिन यह 
स्थानान्तरण टोकियो में केवल 7 इन्च हुआ । सुनामी के कारण आन्तरिक सागर 
का जल 36 फीट ऊपर उठ गया जिसके परिणामस्वरूप अनेक जहाज, मकान 


भोम्याकृतिक स्वरूप 5. 


और मनुष्य समुद्र में समा गये। इन लहरों से भयानक नुकसान टोकियो में 
भूकम्पीय धकको और मकानों के गिरने से नहीं हुआ अपितु स्टोवों ( 50४७४ ) 
द्वारा तीक्ष गति से फैली अग्ति के कारण हुआ ! जो सघननम अधिवास लकड़ी के 
बने थे वे तीन दिन तक जलते रहे । जहाँ अनेक व्यक्तियों की मुत्यु दबने से 
हुई वहीं भी भूकम्पीव 4,00,000 व्यक्ति जलने से घायल हो गये । टोकियो में 
घटनायें अत्यन्त सामान्य हैं क्योंकि टोकियो के उत्तर में टोहोकू और होकैडो 
से होते हुए झटके जिटाकामी घाटी तक की अस्थिर पेटी के अन्तर्गत भाते है। अब 
तक टोकियो में एक वर्ष में आने वाले सर्वाधिक भूकरुप की संख्या 450 है। ज्वारीय 
लहरों ( १08। ४०४९५ ) के कारण टोकियों नगर का निम्तवर्ती भांग नीचे डूब 
जाता है। 


4946 में दक्षिणी क्यूशू में आये ततकेडो ( 8९800 ) भूकम्प भ्रन्शन 
। स्थान पर चिमंगन ( ए४छण्ताछ ) के कारण आया था । अत. शिकोक्‌ का 
क्षिणी पूर्वी भाग 3 फीट और कोची 2 फीट तक जलमरन हो गये । 927 में 


गो ( 7808०0 ) भूकम्प के पश्चात यह देखा गया कि शभ्रच्श का पश्चिमी भाग 
पूर्व की अपेक्षा 3 फीट दक्षिण खिसक गया । 


//4 


जय 


६४. .,9 


४४८ 


ज्वालाघुखी ( ४०।०४१४०७५ ) 


अधिकाँश ज्वालामुखी हान्शू मोड़, आन्तरिक जापान सागरीय मण्डल की 
पेटी के पूर्वी पर्वतीय क्षेत्र, टोहोक होकडो, पूर्वी होकेडो की चिशिमा ( 0॥8- 
|7॥78 ) श्रेणी, क्यूद्र और फोसा-मेंस्ना-वोनिन सोड़ों में आते . हैं। इन क्षेत्रों में 
ज्वालामुखियों की संख्या 460 है जिनमें 54 जाग्रत ( 8०॥४४७७ ) ज्वालामुखी 
हैं। अधिकांश जागृत ज्यालासुखी चार प्रदेशों मे पाये जाते हैं जो निम्न प्रकार 

4. पुवी होकंडो में चिशिमा मोड़ प्रदेश :-- यहाँ पर जागृत ज्वाला: 
मुखियों की संख्या 2 है। 

2- पश्चिमी होकंडो :--इसके अन्तर्गत हान्शू मोड़ तथा ज्वालामुखी 
खाड़ी के दक्षिण भ्रमुख ज्वालामुखी क्षेत्र है। माउन्द, अजूमा प्रमुख जागृत 
ज्वालामुखी हैं। 

3- फोसा-मंग्ना-बोलिन मोड़:--इसके अन्तर्गत फ्यूजी ज्वालामुद्ी 
मुख्य है । | 

4- क्यूशू रिउक्यू मोड़:--यहां पर जाग्रत ज्वालामुदियों की संख्या 
अधिक है जिनमें बासो (७8५०) सक्ुराजिमा (58फर्शृगाव ) और उजेन 
(ए0०७०॥) प्रमुख हैं। 


40 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


पश्चिमी हान्शू और शिकोक्‌ में कोई भी जाग्रत ज्वालामुखी नही है। 
जावान मेंअ धिकाँश ज्वालामुखी मिश्रित ज्वालामुखी (00॥70096 ४०।087089) 
हैं जिनका निर्माण लावा और राख से हुआ है। किन्हीं-किन्ही ज्वालामुियों 
की आकृति शंक्‍्वाकर है जिनमें फ्यूजी प्रमुख हैं । अन्य ज्वालामु्रियों का विवर 
विस्तृत हो गया है जिसे कल्डेरा ( 08/08/७ ) कहते है । फ्यूजी का दक्षिणी- 
पूर्वी ढाल अवततल ( 00॥09५७ 8।079 ) है जिसकी ऊँचाई समुद्र तल से 7200 
फीट हैं। यह 708 ई० से शान्‍्त ( 00ग्राधा ) है । निक्‍्को ( शं॥000 ) के 
निकट नैनटाई ( ०४४ ) की भांति जिन शंकुओं की रचना लावा और राख 
से होती है उनका अपरदन नदियों द्वारा अधिक होता है। यहाँ पर भरीय जल 
प्रवाह प्रणाली ( 83909। 'ाधा।त्ु० 5५४0) ) पाई जाती है। बेसाल्ट, सिल 
ओर डाइक के जमाव से जल प्रपातों की ऊँचाई अधिक हो जाती है। निक्‍को 
में नैंनटाई पर्वत के ढाल पर फेगन ( (७6० ) जल प्रपांत का जल 330 फोट 
ऊँचाई से गिरता है। 


साधारण शंक्वाकर ज्वालामुखी पर्वेतों के अतिरिक्त अधिक चोड़े अर्थात 
कैलडेरा ( 0800079 ) युक्त ज्वालामुखी भी जापान में पाये जाते हैं । क्यूश में 
आसो ज्वालामुखी पर्वत, होकैडो में अकान ( &(»॥ ) ज्वालायुखी पर्वत और 
दक्षिणी होकैडी में टोया कौल्डेरा प्रमुख हैं। टोया झोल का निर्माण सर्वे प्रथम 
शंकु और बाद में कैल्डोरा के अपरदन के परिणामस्वरूप उसमें जल भर जाने 
से हुआ। इस झील के आसपास निचले भागों में नये शकुओं का निर्माण हुआ 
है । झील की गहराई 600 फीट है परन्तु इसके फर्श की ऊचाई समुद्र तल से 
200 फींट नीचे हैं । इस कैल्डेरा की गहराई निकटवर्तीं वालकैनों खाड़ी के 
समान है | यूजू ( ५०७ ) पर्वत जो कैल्डेरा के दक्षिणी भाग में है अनेक परि- 
पोषित ( ?ध४४७॥7० ) शंकुओं से युक्त है । इसकी चोटी पर दो नुकीली श्रेणियाँ 
हैं जिनकी ऊँचाई 700 मीटर है । 490 ई० में इसके उत्तरी ढाल पर उद्गार 
हुआ था | और इस ढाल पर यह उद॒गार 45 छिद्रों ( ५००४७ ) से हो रहा था 
4944 ६० में पूर्वी किनारे पर एक दूसरे परिपोषित (एथव०श॥४० ) शंकर शोआ- 
शिन्जन ( #॥0%४8५॥॥97 ) कीं उत्पत्ति हुई | यह उद्गार भूकम्पीय घटनाओं 
की पुनरावृत्ति के कारण हुआ जिसके परिणामस्वरूप ज्वालामुखी राख एवं लावा 
के निक्षेपण से इस क्षेत्र में एक वक्त ग्रुम्बद के अनुरूप ऊ चा उठ गया । ज्वाला- 
मुखी उद्गार से एक 500 फीट ऊंचे शंकु की उत्पत्ति हुई। 945 ई० के अन्त 
में इस गुम्बद के एक ओर लावा के विक्षेप से 4300 फीट ऊंची चोटी का 
निर्माण हुआ। इस चोटी से वर्तमान समय में सल्फर और कार्बन गैसे निकल 
रही है ! 


् 


भौम्याकृतिक /संवरूप 


असामा ज्वालामुखी पर्वत जापान का सर्वाधिक -विनाशकारी 'जागृत 
ज्वालामुखी है। 492 ई० के भयंकर विश्फीट से गोलाश्म 50 फीट की 
ऊचाई ओर 40 मील दूर जाकर गिरे। |783 ई० के स्विफोट में 42000 लोगों 
की मृत्यु हुई थी। वयूश्लू में सफराजिमा [ 586पाक्ुं79 ) ते जो अपेक्षाकृत 
कम विनाशकारी हैं, प्राय: ज्वालामुखी राख कागोशिमा पर गिरती रहती है जो 
तीन मील चौड़े जलडसरू मध्य से दूर है । सक्राजिमा की तीन चोटियां कागो- 
शिमा खाड़ी से ऊपर उठी हुयी है। इसका काल्डेरा समुद्री जल से भर जाता है। 
सम्पूर्ण क्षेत्र अस्थिर है और यहाँ पर निमंज्जन की क्रियायें अधिक मात्रा में हुयी 


हैं। 494 ई० से सक्राजिमा ( ए07५ 8]055ण7 डंध्यात ) दक्षिण पूर्व में 
स्कोरिया ( 80078 ) और ज्वालामुखी राख के निक्षेप द्वारा जापान की मुख्य 


भूमि से जुड़ा हुआ है। लावा के निक्षेप से समुद्र में ज्वालामुखी की उत्पत्ति हुयी । 
पिछले कुछ वर्षों से सक्राजिमा के पवेत पदीय प्रदेश में कृषि कार्य अत्यन्त कठिन 
हो गया है क्योंकि ज्वालामुखी की राख के निक्षेत्र से फसलें ढक जाती हैं। यहां 
का दृश्य अत्यन्त सुहावना है इसलिए कागोसिमा में पर्यटक प्रति वर्ष आते हैं। 
यहां की उपजाऊ राख में मूली का उत्पादन अधिक होता है। मूल्यों का वजन 
6 पौण्ड तक होता हैपरन्तु अम्नीव लावा उवं राख कृषि के अनुकूल नहीं है। 
क्योंकि मिट्टी में रिक्त क्षेत्र ( 7000७ ) की मात्रा इतनी अधिफ है कि जल के 
साथ सभी उपजाऊ खनिज घूुलकर नीचे चले जाते हैं । 

क्यूशू में आसों ज्वालामुखी पर्वत कौल्डेरा की चौड़ाई 46 मील है । इसके 
विस्तार का आकलन इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसके द्वारा निकले 
हुए कीचड़, मोलाश्म और राख क' निक्षप 5029 वर्गमील क्षत्र पर होतो है। 
कैलडेरा के मध्य 5 चोटियां हैं जिसमें वर्तमान समय में केवल एक जागृत है । 
सबसे अधिक ऊचे शंकु की ऊचाई 790 मीटर हूँ | नाकाडाके (२४/८४०७|८७) 
से जो मध्य चोदी हैँ, प्रायः: राख निकलती रहती है । 

होकंडो में कंल्डरायुक्त ज्वालामुखियों की संख्या अधिक है। मिश्रित 
शंकुओं वाले ज्वालामुखी उत्तर-पूर्वी होकंडो के अकान नेशनल पार्क मे पाये 
जाते हूँ । पूर्वी होकेडो के अकात क्षेत्र में अकाबन और कुचरो (( ५(०4०0) दो 


रँ 


42 |] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


प्रमुख कल्डरा हैं । कुचरो कल्डेरा. आसो कल्डेरा की भांति पूर्व से पश्चिम 
46 मील चौड़ा है । इस समय इसमें कई परिपोपित शंकुओं का निर्माण हुआ है 
जिनमें पूव मे माणु ((॥७७/७) कैल्डेरा प्रमुख है। माशु झील की गहराई 
600 फीट है । इस जल के ऊपर एक चोटी निकली हुई है | झील के पर्व कमु- 
इनू पुरी ((ध॥०॥प०० 7) विवर (९7४) हैं जो जापान का दर्शनीय स्थल 
है। मासू कैल्डेरा के पश्चिम में माकवानचिसापू (०८१७४॥०४5४७प०) के 
छः: शंकु है जिनसे ग्रन्धक्तक और उष्ण जल निकलता रहता है । ये ध्रुआरे 
(80/8/978) और उष्ण स्रोतों (40 शआअशातप9) से सम्बन्धित है | इन स्रोतों 
से कुच । झील को जल की आपूर्ति होती है। कुचरो झील के दक्षिण-पश्चिम 


में अकान कंल्डरा है जिसमें एक झील और चार शकु है। इनमें मी अकान 

(७ 8।(87) प्रमुख शंकु है जिसका फ्यूजी की भांति पारिपोशित शंकु अकान 

फ्यूजी है । वातकनों खाड़ी के नोबोरिवेत्सू ((३४०००78०750७) मों अनेक धुआरे 

हैं जिनसे तीन्र आवाज के साथ गैस नि*लती है। (## [१०0079९(5७ 07॥ 

ए०]८६४५७ 2589 40676 8६7९ ए27४ए 8०ए९८ 50|किथा& पर676 5468800 €६०७७८३ 
जप पोल ठंड ठी बा ०597८55 प्रद्वा॥)., ! यहाँ पर गर्म स्रोतों से जल निकलता 
रहता है । अब यहां कई उष्ण जल की ज्ञीलें पायी जाती हूँ । इश्री प्रकार के 

गर्म सोते क्यूशू तथा अन्य क्षेत्रों मों भी पाये जाते है । 


जापान मे ऐसे गर्म ञ्रोतों की संख्या 7000 से अधिक है । ये गर्म सोते 
ज्वालामुखी पेटी में पाये जाते है । अनेक ग्र्मस्नोतों को पर्यटन स्थल के रूप में 
विकवित किया गश्ग है। गर्म सस्‍्तान जापानियों को अधिक पसन्द है। भत्तः 
प्रत्येक होटल के पास प्राय: 2 फीट 6 इंच गहरे गर्म जल के छोटे-छोटे तालाब 
हैँ जहां पर्यटक स्नान का आनन्द लेने हूं । प्रत्येक गर्म सोते के जल की विशेष- 
ताए' अलग-बलग पायी जात्नी हूँ । क्यूश मे ओसो (४50) के जल सल्फर 
और ओकासा के निकट एरिमा (#78) के जल मो रेडियम की अधिकता 
पाई जाती है। पूर्वी क्यूझू के बेप्पू (88970) नगर ओर फ्यूजी के निकट 
आटामी (7४) नग्रर में अनेक होटलों का विकास स्वास्थ्यप्रद और 
'सुहावने खनिज युक्त गर्म खोत्ों वाले स्थान पर हुआ है | टोकियों के अधिकांश 
लोग सप्ताह के अन्त में अठामी अथवा फ्यूजी के दक्षिण पूर्वे में हकोने 
(+०८०॥७)क्षेत्र में स्वास्थ्य लाभ हेतु जाते हैं। ऐसा स्वास्थ्पप्रद स्थान दक्षिणी 
होकौडो मे नोबोरिवेदसू उल्लेखानीय है । ओसाका के निवासी स्वास्थ्य लाभ हेतु 
एरिमा (४॥79) और अनेक लोग छुट्टियां बिताने क्यूशू के वेप्यू नगर जाते 


मिल आओ लललइललबललललललल अल लललललनलनलल लत मल सांप अाााभाााााााभभधभझएएएए्मग नशा थआ्शरणणणणणणणणणणणणणओं 


], 06ग्रए#छा, 9. 09, था. 0. 34 








कैद 
| , पक ६५१७५ 


हैं। बेप्पू में गर्सजजल का प्रयोग व्यापारिक स्तर पर फूलों और सब्जियों को 
बढ़ाने के लिए शीद्दे के घरों 0455 ॥0७५७) में प्रयक्त होता है । इस जल का 
प्रयोग आन्तरिक सागर में वाष्पीकरण द्वारा नमक बनाने, मछलियों को सुखाने 
आदि के लिए भी होता है । 


इस प्रकार प्रूड़म्पस्टर (2७७ 00778) के शब्दों में जापान को 
भौतिक संरचना के सम्बन्ध में निम्न तथ्य अवलोकनीय है-- 


“गुजर फाएशआल्श 8९०ह०्छाए 0 उद्वएथ्वा 48 ॥0०एाॉतिपिं, 00965 
क्षाव बाज्ताज जाध्ाशंत्रड, ये. छाणजव३ 8 तंतिीए्णी लछिाकाा। 0ि (6 
शि९5, 83 गाणपरशाधंड.. जरार॑गाागरबाल बात 079 पाठ हो काशे॥5 
376 05[9808, 7: >ं6 0 फीड कि6 उं्रतशा858 ग्र0ज़ हाएज़ ९8 
तृप्रक्षाशिषर णी 6 4.9 गल्हतवत 0. 400 क्रािणा 9१०७४ ता आधो। 
ए6077॥हव फ़ॉशिए5 00 | 79875 800 ४६।8४४४ ॥8 00 प्रा६त5' 


जलवायबिक विशेषतायें 


प्रदेशिक संरचना एवं ऋत्तविक्र परिवर्ततं झायान की जलवायु 
को विज्ेप रूप से प्रभावित करते हैं| इसलिए ब्रिटेन बने तुलना में जापान की 
जलवायु अत्यधिक जटिल एवं पन्वितेनशील है जबकि विटेन की भाँति जापान 
का भी अक्षाशीय विस्तार अधिक और देशान्तरीय विस्तार अपेक्षाकृत बहुत कम 
है । उत्तर में होकंडो के सप्पोरो (5870०) से लेकर जापान के दक्षिण- 
पश्चिम क्यूजशु में काग,शिमा तक एक सी जलवायबिक विद्येपताये नहीं पाई 
जाती हैं। सप्पोरो में शीत ऋतु अत्यन्त कठोर होती है जहां चार माह तक बर्फ 
जमी रहती है। परन्तु उपोष्ण (509900708|) कटिवन्धीय कागरोशिमा का शीत 
कालीन जनवरी का तापमान 7? से -ग्र ० (450 फा०) पाया जाता है। जापान 
सागर तट शीतकान में कुहरे से आच्छादित होने के कारण अन्धकारमय 
(600079) रहता है जबकि प्रशान्त महासागरीय तट खिली धूप होनेके कारण 
साफ रहता है | पर्वतीय वेसिनों (/0७॥०४ 098॥॥5) में अत्यन्त कठोर जल- 
वायु पाई जाती है। तोसावन (प052॥) में नगानों का वापिक तापान्तर 28 ९ 
से०ग्र ० (5? फा०) रहता है जबकि पूर्वी तटोय मैदान में स्थित टोकियो का 
वापिक ताप परिसर 23? सेग्र ० (44 ? फा०) पाया जाता है। 


ब्रिटेन को भाति जापान की जलवायु भी वायुराशियों (#|7 ॥785565) 
से प्रभावित होती है। जापान की स्थिति एशिया के पूर्व में मध्य अक्षां- 
शय है। इसके अतिरिक्त महासागर का विशाल क्षेत्र विपषुतत रेखीय उष्ण 
कटिवन्ध में स्थित है | इस प्रकार महाद्वीपीय और महासागरीय स्वरूप की 
थ्रवीय तथा उष्ण कटिवन्धीय वायु राशियाँ जापान की जलवायु को सर्वाधिक 
प्रभावित करती हैं । शोत ऋतु में एशिया महाद्वीप में प्रतिचक्रवातीय (/॥॥- 
०५०।०॥४०) दशायें पाई जाती हैं । अत: साइवेरिया में वेकाल झील के निकट 
उच्च वायुदाब ('ींधी [/65506) पाया जाता है। इस प्रदेश से शुष्क एवं 


जनवायबिक विशेषतायें [ 45 


जीतल ध्रवीय तथा महाद्वीपीय पवनें चलकर उत्तरी-एश्चिमी मानसून के रूप 
में जापान को प्रभावित करती हैं । 


ग्रीप्पकालीन दक्शा्ें ठीक इसके विपरीत पाई जाती हैं क्योंकि ग्रीष्मऋतु 
में सूर्य उत्तरायण होने के- कारण करके रेखा पर लम्बव॒त्‌ (2। जून) चमकता है। 
अतः वेकाल झील के पास स्थित शीतकालीन उच्च वायुदाव का क्षेत्र न्यून वायु- 
दाव ([0५४ [7655079) के क्षेत्र में बदल जाता है अतः उपोष्ण कटिबन्धीय 
उच्च वायुदाव युक्त समुद्री क्षेत्र से हवायें चलने लगती हैं जो शीतकालीन हवाओं 
की चुलना में कमजोर तथा कम प्रभावशील होती है। धवीय एवं महाद्वीपीय 
वायु राजियों का प्रभाव मलग-अलग होता है। जापात की जलवायु पर 4 


महत्वपूर्ण चायुराशियाँ विशेष रूप से प्रभाव डालती है (चित्र 39) जो इस 
प्रकार है 


- अभ्रवीय महाहीपीय वायु राशि (?09/ एणापंशाॉर्णि व ॥898$570 ) 
2- प्रूवीय समुद्री वायु राशि (?0[87 गाक्षाएगि8 शा ॥35555 शिएरा) 


3- उष्ण कटिबन्धीय समुद्री वायु राशि (वर0अंत्य गधांधिग8 श। 7955 
सन्यता) 
4- उष्ण कटिवन्धीय महाद्वीपीय चायुराशि (?0कक 0णाविआईवों ध्ुँग ॥955 
6) 
]- थ्रवोय महाद्वो पीय वायुराशि(70|8 ए्षातताश्या। धांए 7॥858 ८: ९०) 
इस वायुराशि का स्वभाव शीतल, शुष्क तथा स्थायी है। इस वायुराश का 
उद्भव-क्ष त्र साइवेरिया है | शींवकाल में उच्च वायुबाब (042 मिलोवार) 
होने के कारण यह मसागयरीय च्यूत वायु दाव की ओर उत्तर-पश्चिम दिशा से 
दक्षिण-पूर्व दिया की ओर चलती है । यह च्यून वायु दाव (000 मिलोबार) 
का क्षेत्र मध्य हांशु के पर्व में स्थित होता है। स्थलीय क्षेत्र से चलने के कारण 
ये हुवायें शुप्क होती है परच्तु जब एशिया महाद्वीप को पार कर भागे बढ़ती है 
तो जापान सागर के ऊपर चलने के कारण ये नमी ध'"रण कर छेती हैं। अत 
जब ये भाष भरी ह॒वायें जापान के मध्यवर्ती भाग में फैले पर्वतीय क्रम से टक-- 
राती हैं तो जापान के पश्चिमी भाग में वर्षा करती हैं। यह वर्षा हिमर के रूप 
में होती है । शीतकाल में जापान सागरीय तट घने बादलों के कारण धुघला 
ता है जबकि प्रशान्त महासागमरीय तट स्वच्छ एवं प्रकाश युक्त रहता है | 
प्रशान्त महासागरीय तट वर्षा रहित रहता है क्य्रोंकि यह वृष्टि छाया प्रदेश 
(+िवंग 88009 ७धवांणा) में पड़ता हैं। जापान. सागरीय तट पर स्थित निपन 


46 ) ह जापान की भौगोलिक समीक्षा 








[7555८] ््नतस्स्त्न्स्ल्त्स्स्पत स्थान शीतकारमें बादलों 
| अं 8६४४४ 5 से आच्छादित रहता है। 
7९ > ः 


जब यह वायु राशि 
दक्षिणी अक्षांशीय प्रदेणों 
में पहुचती है तो 
अपेक्षाकृत .उष्ण हो 
जाती है जो वर्पा करने 
में सहायक होता है । 
2- ध्र्वीय समुद्री 
वायुराशि [ ?०9 
ताक्षाग]8 2# ॥955 
हा 70 )--- 

इस वायुराशि का 
उद्गम-स्थल ओखो- 
8620७ टसक सागर और 


रु (० क्यूराल प्रदेश है । 


यह शीतल तथा. आाद्र 











>85६5।/6 
रि 


(9) पा. वायु है । जुल ई माह 
४४५१5 सर मध्य ए शिया में 
/ ४ श) 6 ४ है| न्यूच वायुदाव ओर 


ठोजैर ४; /' ब्द कप 

सा हर ( ६९३६ १०७४ ओखोटस्क सागर के 
है व 

| ल्स्ट _रक फेर पास उच्च वायुदात्र 


हा का क्ष त्र वन जाता है । 





चित्र 3] जापान : (अ) जनवरी, (व) जुलाई की वायुराशियां 
एवं वायु प्रवाह 


ग्रीष्म ऋतु के प्रारम्भ में जब पछआ हवाओं की गति मन्‍्द पडने लगती है उस 
समय क्यूराइल प्रदेश के पास वर्तेमान उच्च वायुदाव के मध्य एशियाई न्यून 
वायुदाव की ओर हवाये चलने लगती है । क्यूराइल प्रदेश भे वर्तमान उच्च 
वायुदाव 020 मिलीवार तथा च्यून वायुदाव क्षेत्रमे वायुदाव 4000 मिलीबार 
पाया जाता है | जब यह ध्रू वीय समुद्री वायु पश्चिम की ओर आगे बढ़ती है 


जलवायिक विशेषत्ताओं [ 47 


तो समुद्र से गुजरने के कारण अपने अन्दर नमी धारण कर छेती है। इस वायु 
राशि का प्रभाव मध्य तथा दक्षिणी जापान पर विशेष रूप से पड़ता है, मध्य 
जापान की मध्यवर्ती पर्वतमाला से टकराकर प्ूर्वीतट पर घनघोर वर्षा करती हैं। 
दक्षिणी-पश्चिमी जापान में क्यूशू और शिकोक पर्वत मालाओं से टकराने पर 
पूर्वी तटीय प्रदेशों में वर्षा होती है । इस प्रकार की वर्षा को जापान में बाइ-नयू 
(88- 0) वर्पा के नाम से पुकारते हैं। इस वर्षा से प्लम नामक फल में आशा- 
तीत वृद्धि होती है इसलिए इसे प्लम वर्षा भी कहते हैं । 


जब यह हवा मध्यवर्ती पव॑ंतमाला पार कर पश्चिमी ढालों पर उतरती है 


तो सापेक्षिक बाद्र ता (१७४/४४४७ ॥प"7/ं५9) कम होने लगती है और इसका 
तापमान बढ़ने लगता है। अतः ये हवायें पश्चिमी तटीय प्रदेश में वर्षा करने में 
असमर्थ होती हैं और यह प्रदेश वृष्टिछाया प्रदेश में पड़ने के कारण वर्षा रहित 
रहता है । ग्रीष्म ऋतु में उष्ण कटिवन्धीय सागरीय वायु राशियां तथा ध्र्‌वीय 
महांद्वीरीय वायु राशियां जापान के निकट एक दूसरे से मिलती है । अतः यहाँ 
महाद्वीपीय समुद्रीवात्ताम के कारण (00धशाशव। ॥878 707) उत्पन्न 
होता है । वपतन्‍्त और पतझड़ ऋतु में यह वाताग्र जाग़न के ऊपर निर्मित होने 
के कारण मौसम को आदर (४५६99) बना देता है। ग्रीष्म ऋतु और पतलझड़ में 
इस वबाताग्र के कारण तूफानों (/॥४००॥७) की उत्पत्ति होती है । 
3- उष्ण कटिबन्धीय वायुराशि(7707708! 7)877778 । ॥899 5 ]77) 
इस वायुराशि का उद्गम-स्थल जापान के दक्षिण-पूर्ण प्रशान्त महासागर 
में है। इस वायुराशि की दिशा ग्रीष्म कालीन मानसून की भांति उनरी-पश्चिमी 
एवं उत्तरी है। इस वायुराशि की निचली पते शीतल होती है अत: जिन स्थानों 
पर भौर जिस काल तक यह परत रहती है उस काल तवः वहाँ वर्षा नहीं होती 
परन्तु ऊपर की गर्म वायु में आद्र ता अधिक होती है । यह वायुराशि जब मध्य- 
चर्ती पर्वत मेखला से टकराती है तो पूर्वी तटीय भाग में वर्षा करती है। पूर्व 
जापान की अधिकांश वर्षा इसी वायुराशि द्वारा होती है । यद्यपि इस वायुराशि 
से मुख्य रूप से वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है परन्तु कुछ वर्षा बसन्‍त्त और पतझड़ 


48] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


में भी हो जाती है । 
4- उष्ण कटिबन्धीय महाद्वीपीय वायुराशि (पा०्फांठ्य ०गराताशा॥॥। 


४॥ ॥7855 55 0 ) 


इस वायुराशि का उद्गम-स्थल मध्य चीन है। यह अस्थायी वायु है, 
जिसका तापक्रम अधिक होता है । इसलिए इस वायु की आद्र ता कम होती हैं, 
परन्तु जब यह वायु चीन के रथलीय भाग को पार कर चीन सागर भौर जापान 
सागर में पहुचती है तो अपने अन्दर नमी धारण कर लेती है। अतः मध्यवर्ती 
पर्वेतमाला से टकराकर जापान के पश्चिमी तट पर अधिक वर्षा करती है परन्तु 
पृष्ठ प्रदेश अर्थात पूर्वी भाग वर्षा रहित हीता है । 

जापान जलवायविक दृष्टिसे अतिशयता का देश है। ग्रीष्म ऋतुर्म टोकियो 
का दैनिक अधिकतम तापमान 40" सेग्र ० है जबकि शीत ऋतु 'में होकेडो के 
असाहीगावा का तापमान -447 सेग्रे० पाणा जाता है। विशाल महाद्वीपीय 
भाग के निकट होने के कारण जापान में शीत ऋतु में उत्तर से दक्षिण ध्रवीय 
हवाओं का प्रभाव सर्वाधिक्र होता है है। अत मध्य टोहोक्‌ में फरवरी का 
तापमान 07 प्रेग्नें० तक पहुच जाता है। ग्रीष्म ऋतु में उष्ण समुद्री हवायें 
प्रभान्‍्त महासागर के भूमध्य रेखीय और उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों से आने के 
कारण टोकियो के औसत तापमान को बढा देती है । जुलाई में यहां का तापमान 
26० सेग्र ० तक पहुंच जाता है (चित्र 3 2) | मध्य अक्षांशीय प्रदेशों का ताप- 
मान महाद्वीपीय और समुद्री दोनों वायुराशियों से प्रभावित होता है। जब 
होकेडो का सम्पूर्ण भाग नवम्बर से अर्ँप्रेल तक बफे से ढका रहता है, उस समय 
कागोशिमा के पास का वृक्ष बर्फीली हवाओं के कम प्रभाव में आते है और यहां 
का मासिक औसत तापमान 5? सेग्रे० पाया जाता है । भतः यहां फसलों का 
उत्पादन वर्ष भर होता है । इस तापमान में टोकियो के दक्षिण निम्नवर्ती क्षेत्र 
में वर्ष मों दो फसलो का उत्पादन होता है। इसके विपरीत ग्रीष्म ऋतु में 
तापीय विचलन (५०४४००) अपेक्षाकृत कम पाया जाता है । कॉगोशिमा का 
अगस्त का तापमान 27? सेग्र० ( 8।० फा० ) और होकौडो के सप्पोरो 
(98/900) का त्तावमान 24? सेग्र ० पाया जाता है। इस ब्रकार यह अन्तर 
केवल 6० स्लेग्रे ० पाया जाता है परन्तु जनवरी में यह अन्तर 37 सेंग्रे ० पाया 
जाता हैं । 


-जलवायबिक विशेषता५यें [ 4५. 


वलक ध907£६6-0 से शतक 


६४०६३ ४7। ७३६ ॥ 
0६568६&£ 5 हि 
2 


60 





चित्र 3.2 जापान : तापमान एवं वर्षा का क्षेत्रीय वितरण 
(क) फरवरी माह, (ख) अगस्त माह 


जापान की जलवायु पर प्रभाव डालने वाले प्रमुख तत्व 


4- जापान का विखण्डित द्वीपीय आकार :- जापान की जलवायु पर 
जापान के द्वीपीय स्वभाव का प्रभाव अधिक पड़ता है। ये द्वीप न तो शीत ऋतु 
में अधिक शीतल ओर न ग्रीष्म ऋतु में अधिक उष्ण होते हैं। यद्यपि जापान 
सागर का विस्तार कम है फिर भी यह जापान की जलवायु को प्रभावित 
करता है । 


50 ) जापान को भोगोलिक समीक्षा 


2- धाराओं का प्रभाव :-जापान की जलवायु पर क्यूरोशियों (](प्रा05)॥0) 
की गर्म तथा ओयाशियो (0५8७४0) की शीतल घानाओं का गहरा प्रभाव 
पड़ता है (चित्र 33)। वयूरोशिओं धारा दक्षिण के गर्म जल को, बहाकर 
टोकियों के दक्षिणी प्रश्ान्त तट तक ले जाती है। इस धारा का जल प्रवाह 
जिन-जिन स्थानों से होता है वहां के तापक्रम को बढ़ा देती है। जापान साग- 
रीय तल इस घारा से कम प्रम्ावित होता है क्योकि जापान सागर की ओर 
व्यूराशियो की धारा अत्यन्त क्षीण होती है । इसके अतिरिक्त जोयाशियों की 
ठण्डी धारा उत्तर से दक्षिण प्रवाहित होती है जो होकेडो और टोहोक्‌ के 
पूर्वी वटों को अत्यन्त शीतल वा देदी है। जिस स्थान पर ये दोनों धाराये 
एक दूसरे से मिली है वहां घना कुहरा पड़ता है। यह शीतल धारा लेब्रोडोर 
की ठण्डी धारा से अपेक्षाकृत कम शीतल होती है क्यौकि एशिया और उत्त्तरी 
अमरिका के मध्य संकरे और उथले वेरिंग जलडमरूमध्य (5097) से प्रवाहित 
हने के कारण इस धारा को भाकटिक:सागर का शीतल जल लेब्रोडोर की तुलना 


में कम प्राप्त होता है। ४ «5 


पर 
४ 


मर 


3- उच्चावच का प्रभाव :- जापान में उत्तर- प॒व॑ से* दक्षिण- पश्चिम को 
उच्चवचन का अवृत्ति जापान सागर तटीय प्रदेश को महाद्वीपीय प्रभाव से वंचित 
रखती है (चित्र 2.4) | ग्रीष्म ऋतु में जापान सागर तटीय, प्रदेश प्रशान्‍्त तटीय 
प्रदेशों की तुलना में शुष्क रहते हैं क्योंकि जापान सागर तटीय प्रदेश दक्षिणी-- 
पूर्वी हृवाओ के वृष्टि व छाया प्रदेश में पड़ते है। होकैडों के अतिरिक्त प्रशान्त 
तटीय भाग पर समुद्र का उलेडनीय अभाव पड़ता है । होकैडो मे उच्च पवेतीय 
अवरोध न होने के कारण समुद्री प्रभाव नगण्य होता है। प्रशान्त तटीय भाग 
दक्षिणी-पूर्वी हवाओं द्वारा ग्रीष्म ऋतु में अमेक्षाकृत उष्ण एवं नम तथा 
शैति ऋतु मे उष्ण एवं शुष्क रहता है क्योफि यह शीत ऋतु में उत्तरी- 
पश्चिमी हवाओं की वृष्टि छाया प्रदेश मे पड़ता है। फरवरी में 6? सेग्ने० 


समताप (६0७77) रेखा क्यूशू से टोफियो तक प्रशान्त तट,.से होकर 
जाती है । 


पव॑तों से घिरे हुये वेसिन समुद्री प्रवाह से वचित होने के कारण अधिक 
तापमान रखते हैं, जैसे मध्य होकेझो में असाहीगावा में जो समुद्र से 26 किमी० 
दूर हैं, जुलाई का औसत तापनान 247 सेग्रे- तथा जनवरी में औरत तापमान 
-0० सेग्र० पाया जाता है| यहां पर ताप परिसर 3% पाया जाता है| जबकि 
सप्पोरों का ताप परिसर 27 स्लेग्न ० पाया जाता है। इसके अतिरिक्त तापमान 


जलबाविक विभेपतायें [ 35] 


और वर्षा की स्थानीय विपमतांयें, उच्चावचन, ढाल, हवायें और सूर्य की किरणे 
किसी स्थान के तापमान को अधिक प्रभावित करती हैं । 

4- अक्षांशीय प्रभाव :- जापान का देशान्तरीय विस्तार कम और भक्षां- 

शीय विस्तार अधिक है। हम दक्षिण पे ज्यों-ज्यों उत्तर जाते हैं त्यों-त्यों ताप- 

मान गिरता जाता है। दक्षिणी भागमें स्थित कागोशिया का शीतकालीन तापमान 

79 सेग्रे ० पाया जाता है जबकि उत्तर में होकैडो के सप्पोरों का तापमान -86- 
सेग्रे ० पाया जाता है। इसी भाँति का्मोशिमा का ग्रीष्मकालीन अगस्त का त्ताप- 

मान 27? सेग्र ० और सप्पोरों का तापमान 24> सेग्रे० पाया जाता है । 


5- समुद्री प्रभाव :- जापान चारों ओर समुद्र से घिरा है। पश्चिम 
में जापान सागर ओभोर पूर्व में,प्रशान्‍्त महासागर के कारण जापान की जलवायु 

अत्यधिक प्रभावित होती है | शीतकानीन उत्तरी-पश्चिमी साईबेरियाई' 
हवायें यद्यपि शीतल होती हैं परन्तु जब ये जापान सागर को पार करती हैं तो 

जापान की मध्यवर्ती पर्वत माला से टकराकर पश्चिचमी तट पर वर्षा करती हैं । 

यदि जापान साग्र न होता तो यह वर्षा असम्भव थी । इसी भांति दक्षिणी पूर्वी 

ग्रीष्मकालीन हवाओं के द्वारा प्रगान्त तट पर वर्षा होती है। इस प्रक/र जापान 

की जलवायु पर समुद्र अपना अक्षण्ण प्रभाव डालता है ! 


समोसम (४४४४॥॥४४) 

जापात की ऋतु पर छः विभिन्न कालों में पड़ते वाला प्रभाव परिलक्षित 
होता है । शुष्क शीत ऋतु और उष्णाद्र ग्रीष्म ऋतु के मध्य जापान के 
मौसम में पांच वार आंशिक परिवतेन परिलक्षित होता है। पूर्व बसन्‍्त काल में 
घर वीय वाताग्र ([?0।87 7077) जापान की मौसमी दशाओं पर पर्याप्त प्रभाव 
डालता है अप्रैल और मई के महीनों में जापान में प्रति चक्रवातीय दशायें, जून 
ओर जुलाई में बाई-यू (88-४७) वर्षा का मौसम, ध्र्वीय वाताग्र की वापसी 
का समय और पतझड़ (&0०७॥॥)) काल जापान की जलवायु पर विज्ञेप प्रभाव 
डालते हैं | 
3- शीतकाल (श्ाण्रं०) (नवम्बर से फरवरी)- इस काल में प्रूवीय 
महाह्ीपीय वायु प्रबल होती है। इस वायुराशि का उदगम स्थल एशिया महा- 
ह्ीप है। विस्तृत साइवेरिया क्षेत्र पर उत्पन्न होने के कारण इस वायु का शीत- 
कालीन तापमान बहुत कम पाया जाता है। वरखोयान्स्क का जो सबसे कम 
तापमान वाला क्षेत्र है, जनवरी का तापमाव -5? सेग्र ० पाया जाता है जिसके 
परिणाम स्वरूप यहां पर उच्च वायुदाव पाया जाता है। 0 दिसम्बर, 964 
में जब यहाँ का तापमाव -342 सरेग्रें ० था तो यहां पर वायुदाब की मात्रा 


* 


52 | 


जापान की भोगोलिक समीक्षा 


]064 मिलीबार थी । यहां पर औसत वायुदाब की मात्रा 40]2 मिलीवार 
पाई जाती है। इसके अतिरिक्त मध्य जापान के पूर्व में ध्र्वीय महासागरीय 


709 गंदा ध॥0) निम्म वायुदाब का क्षेत्र पाया जाता है जिसका अऑसत 
दाव 000 मिलीवार पाया जाता है। अतः साईवेरिया धुवीय महाद्वीपीय 
(?0)0/ ८८॥॥8'8।) उत्त्व वायुदाव की हवाये उत्तर-पश्चिम दिशा से दक्षिण- 


पूर्व निम्न श्रूवीय महासागीय (7208/ ॥97076) 


चलने नगती है । ये 
शीतल हवाये जापान 
सागर के ऊपर से 
दक्षिण-पूर्व.. निम्न 
थे दीय सहासागरीस 
(?0श ॥27/॥6 ) 
वायुदाब क्षत्र की 
ओर चलने लगती है । 
ये शीतल हवाये जापान 


सागर ने ऊपर से 
आती है, अत' ये 
हवाये निचली 
सतह के तापमान 


आर आद्रता को 
अधिक प्रभावित बरती 





वायुदाब क्षेत्र की मोर 


$ के वी प ५ 


४ 


चित्र 3.3 जाणन : जनवरी में सूर्य प्रकाश का विवरण 


।.क्यूरोशियों गर्म जल धारा, 2. क्यूरोशियो आन्तरिक्र 


गम जलधारा, 3. ओयाशियो ठंडी जल, धारा । 


है। जब ये हवाये जापान के मध्यवर्ती पर्वतमाला से ट*राती हैं तो जापान 
सागर तटीय क्षेत्र वर्षा प्राप्त करता है परन्तु पूर्वी प्रशान्त तटीय भाग वृष्टि 
छाया प्रदेश में पड़ने के कारण शुष्क रहता है। कभी-कभी यह वर्षा हिम के 
रूप में भी होती हैं। निगाता में वर्षा पेछ्ल मात्रा 57 पाई जारत॑ है। यहां पर 
जनवरी में सूर्य की औसतन चमक 56 घण्टे थे होती है जबकि प्रशान्त तटीय भाग 
में स्थित टोकियो में वर्षा 2” स भी कम होती है और सूर्य को ओऔसदठन चमक 
89 घण्टे की होती है ( चित्र 3.3)। कागोशिमा में जनवरी का औसत तापमान- 


जलवाबिक विशेषतायें [ -53 


7>सेग्र ० तथा ओबिहिरो में 07 -सेग्रे ० पाया जाता है। टोहोकू ओर टोसान के 
पर्वतीय भाशों का तापमान 0? सेग्रे० से नीचे पाणश जाता है। फरवरी में 
होकडो का तपमावत -2? सेग्र.० पाया जाता है परन्तु हिम की बर्षा के कारण 
6 नहीं-किन्हीं क्षेत्रों मे यह तापमान -0" सेग्र ० तक नीचे गिर जाता है। 
टोकियो के दक्षिण के प्रशान्त तदीय भाग का तापमान जापान के अन्य क्षेत्रों 
से अधिक पाया जाता है) इस समय यहां का तापमान 6? सेग्रे ० पाया 
जाता है। ' 


2-- पत्र बसन्‍्त काल (£%7५ »०779) :--पूर्षे वसन्तकाल बड़ा अनिश्चित 
रहता है। फरवरी के उत्तराद्ध में साईवेरियाई प्रतिचक्रतात कमजोर पड़ने 
लग्नता है। अत: निम्त वायु-दाव का क्षेत्र साइवेरियाई ध्रवीय महाद्वीपीय (२6) 
तथा उष्ण बोखोटस्क की प्रूवीय समुद्रीय (70) वायुराशि के मध्य निर्मित 
वाताग्र ( न०॥) के सहारे विकसित होने लगता है। ये दशाये जापान 
की जलघायु पर गहरा प्रभाव डालती है। इस काल का मौसम बड़ा अनिश्चित 
होता है,और तूफानी हवायें चलने लगती हैं। के शीतकालीन तूफानी ह॒वाओंके तीज 
गति से चलने के कारण अपने साथ मंगोलियां के मैदानीय भाष से बालू एवं 
धूल के कड़ों को उड़ाकर अपने साथ नाती हैं और जापान सागर के तटीय भांग 
पर निक्षेपित करती है जिससे आवाश पीले-पीछे बालू के कड़ो से अच्छादित हो 
जाता है। उष्ण वाताग्र की दक्षिणी हवायें मौसम के तापमान को बढ़ा देती हैं | 
ये हवायें ज॑से ही पर्वेतों के अपर से गुजरती है पूर्वी भाग के विय्युद्च ढाल 
((९७४०००६ 8078) के वर्फ को उष्ण एवं शुष्क स्वभाव के कारण पिघला देती 
है । इन हवाओ का स्वभाव यूरोप में एल्पाइन फान ( /।७॥8 50७॥॥) हवाओं 
की भाँति है । 

3- उत्तर बसनन्‍्त कारू([ ४७ 897 ॥0):- इस मौसम का समय अप्रैल और 
मई है। इस काल में देश की उच्च दात्र की प्रति चक्रवातीय दशाये उत्पन्न हो 
जाती हैं। अतः भाकाश दिन वे: समय स्वच्छ और शान्त रहता है परन्तु रात्रि 
के समय पड़ने वाली तुपार (सा0७) मध्य हाँशू की शान्‍्तरिक वेसिनों ओर 
टोहोकू के चाय के छोटे-छोटे पौधों तथा भहतृत (४७७७४) वी झाडियों को 
अत्यधिक हानि पहुंचाता है । 


4- बाई-यू काल (8भ 0७ एशां०४) :- इसका समय मध्य जून से भध्य 
जुलाई तक वा है। इस काल में हवाइयन उच्च वायुदाव का क्षेत्र जापान क्े 
दक्षिण-पूर्व में रुवुद्र पर गहरा प्रभाव डालता है। हवाईयन उष्ण कटिवन्धीय 


54 | जापान की भौगोलिक समीक्षा 


समुद्रीय (7॥7) हवायें ओर ओखोटस्क की ध्र्‌वीय समुद्रीय (शा) हवायें इस 
काल में मिलकर एक वाताग्र का निर्माण करती है जिससे मध्य जून से मध्य 
जुलाई तक वर्षा होती है। इसलिए इसे वाई-यू या प्लम वर्षा (?|एा॥ ॥9॥) 
कहते है । हवाईयन उच्च वायुदाब की उष्णाद्व हवायें उत्तर-पूर्व दिशा में चलती 
है जो आगे चलकर वाहय जापान में टोहोक्‌ के दक्षिण ओखोटस्क से आने वाली 
हवाओं से मिल जाती है। इनके मिलने पर पूर्वी टोहोक्‌ और होकडो में धना 
कुहरा पड़ने लगता है। इन हवाओं के द्वारा वर्षा अधिक मात्रा मे होती है । 
कभी-कभी वर्षा इतनी अधिक होती है कि बांधों के टूट जाने के कारण बाढ़ भा 
जाती है और धान की फसलों को काफी हानि'उठानी पड़ती है । 


5- ग्रीष्म काल (8पग्राश७) :--- मध्य जुलाई से ग्रीष्म काल प्रारम्भ होता 
है क्य्रोकि सूर्य के उत्तरायण होने से उत्तरी गोलाद् में तापमान ऊंचा होने 
लगता है | उष्णता के कारण एशिया महाद्वीप पर निम्न वायु-दाब का क्षेत्र बन 
जाता है और हवाईयन उच्च वायु-दाव का क्षत्र और अधिक विस्तृत हो जाता 
है । अतः दक्षिण-पूर्व हृवाईयन उच्च वायु-दाब को हवाए' तीज गति से आगे 
बढ़ती है । इन हवाओं से दंक्षिणी-पश्चिमी जापान के पूर्वी तदीय भाग मे 
अर्थात्‌ पवन के सम्मुख ढाल (४४॥0५४४००० 50009) पर वर्षा होती है । 


अगस्त माह मे ताप परिसर अपेक्षाकृत कम रहता है। कागोशिमा में 
अगस्त का तापान्तर 28? सेग्र ० और भोबिहिरो मे 20" सेग्रे ० पाया जाता 'है। 
होकेंडो में तापान्तर 22? सेग्रे० से कम, टोहोक्‌ में 22" सेप्रे ० 
से 26? सेग्र ० तथा दक्षिणी-पश्चिमी जापान में 26” स्लेग्रे ० से अधिक पाया 
जाता है । 

कागोशिमा में वर्षा की मात्रा अन्य स्थानों की तुलना में अधिक पायी 
जाती हैं। यहा पर जुलाई माह की औसत वर्षा 3” हैं जबकि यह वर्षा 
ओसाका में केवल 6” तथा जापान सागर तट पर स्थित नियाता में 7” होती 
है क्योंकि ये स्थान वृष्टि छाया प्रदेश में पड़ते है। ग्रीष्म काल जापान 'में 
सर्वाधिक वर्षा का मोसम है | यह मौसम यद्यपि धान की फसल के लिए 
अत्यन्त अनुकूल है फिर भी जापानी इसे सुखदायी मौसम के रूप में नही 
मानते है क्योकि अत्यधिक आद्र ता और उष्णता उनके स्वास्थ्य के प्रतिकूल 
होती है । 
6- पतस्ड़ काल (&प७॥॥):-- इसका काल सितम्बर से अक्टूबर तक 
होता है । मौसम प्लम वर्षा के समान होता है । साइवेरियाई उच्च वायु-दाव 
की हवाय अधिक प्रवल होने के कारण जापान की ओर आगे बढ़ती है जहां 


जलवाविक विशैषतायें [ 55 


मिम्न दाव की हवाईथन उष्ण वायु से मिलती हैं तो वाताग्र का निर्माण सितम्पर 
भाह में जायात के ऊपर होता है। अतः वर्षा फुह।र के रूप मे होने लगती है। 
प्रन्तु प्ितम्बर के पश्चात साइवेरियाई प्रतिचक्रशातीय दशायें जब जापान में 
उत्पन्त हो जाती है तो वर्षा बन्द हो जाती है और आकाश चमकोीला एवं स्वच्छ 
हो जाता,है । यह दशायें शीतकाल के प्रारम्भ तक पाई जाती हैं । 

जापान के कुंछ प्रमुख नगरों का तापमान एवं वर्षा तालिक 3,। में दिया 


गयी है । 


तालिका 3.] 
प्रमुख लगरों का तापमान (सेग्रे०) तथा वर्षा (मिलीमी ०) 4962 
चल बज बाल कल कक का अबुअ आज पड वीवलवीलक लीन सलक कल जकबक. शक नरक सनशिनिनिशीशी शक न जा ाअ“म॥ए।”्ध्ध्भ्घ)_स्ध्६्ा।_्घ_्घ्घ्घ्घ्घ्घ्घभ्णभ्६णस्भणस्सर्मभण्ण्णाभाभशश/थशशश/ाश।शशशशश ५00५ -८े/एएएए 








नगर - स्थिति जनवरी अप्रैल जुलाई अनदुवर 
4. वाकात्ताई उत्तरी होकडो तापमान -4.2 6,7 468 9.9 
(५४०0९) वर्षा 4035 93.6 243.6 76.4 

2. ओमोरी उत्तरी हाँशू. तापमान -.0 8.6 22.] 308 
(/४0०॥707 ) वर्षा 484.2. 44.5 35.2. 54.7 

3. टोकियो सेगरामी खाड़ी तावमान. 4.5 444 5: 25.] १67 
(70९५०) तट वर्षा 405. 24.2. 66 9 449.8 

4. क्योंटी. बक़ासा जोड़ी तापमान 32. 43.] 264 6 8 
(९५४००) तट वर्षो 55.5 78.7 2464 584 

5, कामोशिपता दक्षिणी कयूशू तापमान 52 44.4 / 27] 9.4 
(।(8905/॥॥79 ) वर्षा 96... 235.5 355.5 95.3 











टाइफन (५/9॥00०॥) *- ये उष्ण कथिवन्धीय चन्रवार्त हैं जो प्राय: 
ग्रीष्म ऋतु में चलते है। ये मौसम में एकाएक परिवर्तन लाते है। इन री संख्या 
जुलाई से नवम्बर के मध्य औसतन 20 होती है। 958 में 3॥ और 960 
में 45 टाइफून एक वर्ष में आये | अतः यह स्पष्ट है क्रि प्रत्येक वर्ष इनकी संख्या 
में परिवर्तन होता रहता हैं। सितम्बर [964 का बिल्डा (५४७७ ) टाइफून 
प्रसिद्ध है जिसके मध्य में वयुदाव 970 मिलीबार तक पहुंच गया था। इस 
टाइफून मे चलने वाली हवाए 70 नाट ([(४00) से अधिक थी। _ 


ऐसे ढांइफूनों की उत्पत्ति मार्शल, मोरियाना और कैरोलिन द्वौपों के 
ज््मट जापन वे, दक्षिण-पू्वे में होती हैं जहां पर समुद्र के तल का तायमान 





56 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


28? से०ग्रे० से अधिक पाया जाता है। यहां पर विषुवत रेखीय उष्ण हवाए, 
उष्ण कटिवन्धीय समुद्री (॥॥) तथा ध्रूवीय महाँद्वीपीय (7०) हवाओं से मिलती 
है । इस प्रकार यहां पर त्रिकोणात्मक वात्ताग्र (#०७ ०078784 707()बनता 
है | अन्तर उष्ण कटिबन्धीय वाताग्र (#0 ॥70908| +0॥) मध्य भारत से 
फिलीपीन के पूर्व तक फैला होता है जिससे महाद्वीपीय समुद्री वाताग्र (७0॥0॥- 
९79 गधां।।6 ॥02) फिलीपीन द्वीप समूह के पास मिलकर मध्य जापान 
होते हुए कोरिया के दक्षिण तक विस्तृत होता है। ये दाइफून सर्वे प्रथम पूर्व से 
पश्चिम दिशा में और बादमें उत्तर-पूर्वमें जापान की ओर मुड़ जातेहेँ (चित्र 3 4)| 
इनकी गति तीब्र होने के कारण ज्वारीय लहरों एवं तीत्र वर्षा के कारण दक्षिणी 
पश्चिमी जापान में अपार क्षति होती है। इस समय धान की फसल को 
प्रत्येक वर्ष नुकसान होता है क्योंकि यह उसके पकने का समय होता है। उत्तर 
में सेव के वृक्षों को भी पर्याप्त हानि होती है । संक्षेप में, जापान में वर्षा, सूखा, 
तुषार भौर वाढ़ की 
सम्मिलित क्षति से भी 
अधिक क्षति टाइफूनों 
द्वारा होतीहै । 


26 सितम्बर, 959 
में नागोया का जाजिया 
( 6९989 ). नामक 
टाइफून विनाश लीला के 
लिए सर्वाधिक चर्चित है । 
इसका. व्यापक प्रभाव 
आइस खाड़ी से तोसान 
होते हुए जात्रान सायर 
तट तक पड़ा. इसके प्रभाव 
से आइस खाडी में 
ज्वारीय लहरो की अधिक 
ऊँचाई के कारण नोवी 
मंद।त की किसो नदो में 





चित्र 3 4 जातान : समुद्री तुफान (7॥०॥0०४) के मांगे 


जलवाधिक विशेषत | 57 


भयंकर वाढ़ आ गई । लहरों कौ वापसी के पश्चात' तटवर्ती भाग में लोंगों और 
अधिवासों के कोई निशात नहीं बचे । इस विनाश लीला में 35 000 ' मकान 
बह गये और 5,000 व्यक्ति काल कवलित हो गये। जन प्लावित स्थानों से 
जल वो उत्तरने में 6 सप्ताह लग गये थे । 


वर्षा का वितरण (छाज्राफएांणा ० ।धग):-- जापान में वापिक 
वर्षा का वितरण अतमान है क्योंकि ऊ॑ची-नीची भ्ृप्रष्ठीय वनावट के कारण 
वर्षा की मात्रा में असमानता पाई जाती है (चित्र 32 ब)। इस असमानता का 
मुख्य कारण जापान वी यरवतीय वर्षा (070997900 ध्वाा8॥) है। पवन 
सम्मुख (४४॥6५५७:0) ढाल पर वर्षा जी मात्रा अधिक होती है परन्तु पवर- 
विमृख ([68५४४०) ढाल पर वृष्टि छाया प्रदेश (89॥ 80०५४ 78.0॥) 
के कारण वर्षा नहीं होती हैं। सामान्धतया जापान के तीन क्षेत्रों में वर्षा 
सोमान्य से अधिक होती है जो इस प्रक्वार हैं :- 


4- प्रशान्त तटीय क्षेत्र का वह भप्ग जो वंयूशू द्वीप से इज (20) प्रायद्वीप 
तक फेला है ! 

2- 36० उत्तरी क्षक्षांश से अकीता (609) तक का जाउात सागरीय तड | 

3- मध्य हांशू के हिडा (09) उच्च प्रदेश के पश्चिम से फोसा-मंग्ना 
तक | 


उपयुक्त क्षेत्रों मे कही-कहीं वर्षा 200 सेमी० से भी अधिक होती है। 
इसके विपरीत जापान के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहा वर्षा 25 मसेमी० से भी कम 
होती है। होकडो का पूर्वी भाग, मध्य हाशू में फोसा-मैग्ना बेसिन, आन्तरिक 
समुद्र तट तथा उत्तरी हांशू का उत्तरी-पूर्वी एवं पूर्वी आदि क्षेत्रों में वर्षा 
सामान्य से कम होती है। 


जापान के जलवायवबिक प्रदेश 
(टग्राधांठ ह6व6ां0॥5 ० 38704॥) 


दीपीय देश होने के कारण जापान में सर्वत्र एक जैसी जलबयु नहीं 
पायी जाती | इसके साथ ही जापान का स्थलीय भाग चारों ओरा समुद्र से 


58, ] . जापान की भोगोलिक समीक्षा 


घिरा है । इसके अतिरिक्त सागरीय जल धाराओं के कारण जापान सागरीय 


एवं प्रशान्त महासागरीय तट प्रभावित होते हैं। इस प्रकार तापमान, वर्षा, 
वनस्पति एवं अन्य तत्वों के आधार पर जापान की जलवायु को प्रूडेम्स्टर ने 
निम्नलिखित भापों में बांदा है :- 

4 होकडो जलवायु प्रदेश 

2. तोहोक्‌ जलवायु प्रदेश 

3. दक्षिणी-पश्चिमी जापान का सागर तटीय प्रदेश 

4. दक्षिण-पश्चिमी जापान का प्रसान्‍्त महासागर तटीय प्रदेश । 
5 


उत्तरी क्यूशू जलवायु प्रदेश चित्र (3.5) । 


(६ होकेंडो जलवायु प्रदेश (#0९हांधे०ण. एगरधांए० ॥69॥0॥)-एक 
द्वीपीय क्षेत्र होने ५र भी होकेडो क्री जलवायु महाद्वीपीय है। उच्च अक्षांशों 
में स्थित होने के कारण यहां पर ठंडक अधिक पड़ती है। यह जापान का 
शीतलतम प्रदेश है । यहां पर 4 महीने का तापमान हिमाक बिन्दु ([6७2॥8$9 
70०7४) से नीचे पाया जाता है । 


शीतकाल मे साइवेरियाई अ्रवीय महाद्वरीपीय (१०) हवायें जब तीत्र गति 
से उत्तर-पश्चिम दिशा से चलती है तो सम्पूर्ण होकंडो मे शीत लहर का समय 
होता है परन्तु होकेडों का पश्चिमी भाग इन हवाओ से सर्वाधिक प्रभावित 
होता है । ग्रीष्म काल में हकेडो में समुद्री वायुराशि (गा) चलती है। यह 
हवाये जापान के अन्य भागो की तुज्नना में अनुकूल शीतलता प्रदान करती है । 
इस द्वीप के आन्तरिक भाग में सप्पोरों का अगस्त का तापमान 2] ? स्ेग्र "तक 
पाया जाता है जबकि दक्षिणी पूर्वी तठ अपेक्षाकृत शीतल रहता है। नेमुरो जो 
पूर्वी होकडो में समुद्र तट पर स्थित है, का तापमान 47.7 सेग्रे० पाया जाता 
हैं। यहां पर तापमान कम होने का मुख्य कारण ओयाशियों की शीतल धारा 
है जिसके कारण यहां पर घना कुहरा पड़ता है । ओयाशियो की उठण्डी धारा के 
कारण जुलाई और अगस्त का औसत तापमान ग्रिरकर 20 ० सेग्र » से भी कम 
हो जाता है जो घान की कृपि को बढने के लिए अनुकल है। होकेडो 
के उच्चाउचन में अधिक विपमता नही है इसलिए साइवेरियाई महाद्वीपीय और 
ध्र्वीय महासागरीय हवाओं का प्रभाव अवरुद्ध नही होता है, अर्थात दोनों 
हवाओं से सम्पृर्ण होकंडो पर प्रभाव पड़ता है। निम्न उच्चावच के कारण 
भाप भरी हवायें अवरुद्ध नहीं होती है। यही कारण है कि होक॑डो में चर्पा 


जलवाबविक विशेषताएं [ 59 


केवल 40 इन्च् होती है। होकैडो के पश्चिमी तट पर अधिकाँश वर्षा शीत 


ऋतु में हिम के रूप में होती है और पूर्वी तट पर वर्षा ग्रीष्म ऋतु में होती है। 
__ वी तद की अपेक्षा पश्चिमी तट अधिक वर्षा प्राप्त करता है । 

















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चित्र 3.5 जागान : जलवायबिक प्रदेश 


होकडो के सप्पोरों नामक स्थान के विभिन्न महीनों के तापमान एवं वर्पा 
का विवरण इस प्रकार है- 


60 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 














तालिका 3.2 
सप्पोरो नगर का तापमान एवं वर्षा, 946 
स्थिति जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून 
किम किक जनम कलम लअभननअाअाााााााााअअााुााााााभभ्भम्म्मामामशशणणाशशशणणणतनाा लि चलबबइ॥ुुुुुुतरााइाााररईााााााााा 
43०3० तापमान 227 23, 5 30 2 423 52.4 60.0 
फा० 
444 ? पूर्वी 
वर्षा इंच 3.5 2.6 2.4 22 2.7 2.8 
बनना अमर रइरुाअअअ भा 9 पा ४ ७४७७७ए"शशशणणणणाणाा अरमान नकारा पाई पाक मिस निमकिन ली मा 
जुलाई. अगस्त, सितम्बर ' अक्टूबर नवम्बर दिस्नस्बर रेंज 
कर 3 कक 2 424: टी 4६3: 47 कल 2%:5 "न विजय लीग किक के 
68.0 7.3. 622 508 3०55 273 _ 47 
3.3 37. 5.0 4.6 4.4 39 4] 


4 











तन “न >नााआननकन्मकक, "नमन बा) ५७४०० पाइन मम 


<५ ठोहोक्‌ जलवायु प्रदेश ((0॥0[९0७ एग8० [80860॥)-इस जलवायु 
प्रदेश के अन्तर्गत ओमारी, एकित', इवाते, यामागातः, मियागी और फ़ुकृशिमा 
प्रिफेकचर आते है (चित्र 3.5 ) होकीडो के दक्षिण में पड़ने के कारण उसको 
तुलना में यह अधिक गर्म है। अगस्त महीने को औसत तापमान 25 ? सेम्ने ०से 
ऊपर पाया जाता है। चू कि टोहोक्‌ के मध्य इशिगो, देवा, ओऊ और किटा- 
कामी पहाड़ियाँ अधिक ऊची हैं इसलिए जापान सागरीध और प्रशान्त महा- 
'सागरीय प्रभाव सर्वत्र एक जैसा नही होता। टोहोकू के पूर्वी और पश्चिमी 
तटीय भागो के तापमान एवं वर्षा में पर्याप्त अन्तर पाया जाता है | प्रश्चिमी 
टोहोकू में उत्तरी-पश्चिमी साइवेरियाई _ध्रूवीय महाद्वीपीय (?०) वायुराशि 
का प्रभाव पश्चिमी तट पर पूर्वी तट की अपेक्षा शीत ऋतु में अधिक पड़ता है । 
द्वीपीय स्वभाव के कारण ये हवाये शुष्क होती है परन्तु.जब जापान सागर 
को पार करतो हैं तो उस बायुराशि की निचली सतह ॒ अपेक्षाकृत गर्म हो जाती 
है । अतः नमी धारण कर लेने के कारण जब ये 'हवाये मध्यवर्ती पर्वंतमाला से 
टकराती है तो पश्चिमी भाग में अत्यधिक वर्षा करती हैं। यह वर्षा हिम के रूप 
में होती हैं। शीत ऋतु मे हिम वर्षा से 5 मीटर ऊंची बर्फ जम जाती है। 
शीत नहुतु मे पूर्वी तट व॒ष्टि छाया प्रदेश में पड़ने के कारण वर्षा रहित रहता है। 
ग्रीष्म काल मे हान्शु के पूर्व में उच्च दाव की उष्ण कटिवन्धीय समुद्री 
वायुराशि (7) जब मध्य एशियाई न्यूत वायुदाव की ओर चलती है तो 
टोहोकू के पूर्वी तट पर सर्वाधिक वर्या करती है और पश्चिमी जापान सागरीय 


जलवाय विक चविशेषतायें [. 6| 


तट वृष्टि छाया प्रदेश में पड़ने के कारण वर्षा नहीं प्राप्त करता है। शीत काल 
में पूर्वी और पश्चिमी तटों के तापमान में अधिक अच्तचर नहीं पाया जाता है 
क्योंकि पश्चिमी तट को जहां उत्तरी-तश्विसी पध्रवीय महाद्वीपीय हवायें 
शीतल कर देती हैं वही पूर्वी तट पर क्यूराइल व ठण्डी धारा के कारण ताप- 


मान अधिक नीचे गिर जाता है। टोहोक्‌ में पूर्वी तट पर स्थित मियाकों 
(५४९०) के तापमान एवं वर्षा का स्वरूप इस प्रकार है- 


तालिका 3.3 
मियाकों में औसत ता+मान एवं औदत वर्षा, 4974 





स्थान स्थिति जनव्ररी फरवरी मार्च अप्रेल मई जून 





(कक पनकान्‍बबमकननारनज ७" >ामथार-नान न ना नाकनकन- पतन एक नन पिान बन नक+ आन" तन सक कप पहना बन ० आा-. (समान +>फपगान +क पनबतनकब नकल्‍् नानक नरनयकक्‍नननतनन पक पतन न भन- सन "कान न नत*तिनलकिन- बी जाए + का "न प न पान + ५५५ कमान कब +-५५-३७७३०३५-७++जपकनऊ गधा डिक गत 720.क्‍-....%+-२--2  _ इस किन यिल भय ननय न न 


मिथाकों टोडोकू ताममाव -06 -0.3 2.3 35.2 423 60 








का ० सेग्र ० 
प्रशावन्‍्त वर्षा मिमी. 
तट. 

69 66 89 99 १49 ।27 
जुलाई अगस्त पितम्बर अक्टूबर नवम्पर दिसम्बर 
।9.9 22%/7 48 5 2.6 72 2.2 
435 78 246 470 8] 54; 


(मम पापरभाारह& अर पीतक5 भरमार उपर सात? श्याम नकद सर एास्‍ाप॒ाकाजपन रुप न्‍ा22 पा सका५घ० रा स्‍ाएा पर उमर दाह वउेपपधा2ए:2० 52 उ मद उधम रामापकपपस भयानक दा राामकर-कार का कापाह पलक 5*“ सा 5 पद ५३५ णाश पाप परकममपाभाा पाक _अराद्याया “मत यासान्परलफफन-नकर. एक. अमाबमॉऋाा:..पु. 


3, दक्षिगो-पश्चिमोी जापान सागर तटीय जलवायु प्र देश 


(800॥-४५७४६6०॥ 39[20 598 5858४। एगाव्द्वां०. १७४४०॥) 

इस जलवायु प्रदश के अन्तर्गत होकरिक्‌ प्रदेश के नियाता, तोयामा, 
इशीकावा, फुक्रुई, कान्‍्टो प्रदेश के पश्चिमी ग्रुम्मा, तोशान प्रदेश के पश्चिमी 
नगानों, पश्चिमी गिफू, किनकी प्रदेश के पश्चिमी, शीगरा, पश्चिमी क्‍्योटो, 
उत्तरी एवं पश्चिमी हथोगो और चुगोक्‌ प्रदेशके टोटोरी और शिमाने प्रिफेक्चर 
आते हूं । 

मिकुमी, जापानी आल्पस्‌ तथा चुगोक पर्वतीय क्रम, जो मध्यवर्ती जल 
विभाजक्र (४४०/७४४5।॥७४१) का कार्य करता है, दक्षिणी उश्चिमी जापान के प्रशान्त 
तटीय एवं जापाव सागर तटीय जलवायु प्रदेशों को एक दूसरे से अलग करता 
है | आन्‍्तरिक जापान जिसे जापान सागर तटीय जलवायु प्रदेश कहते है, शीत 
ऋतु में ग्रीष्म ऋतु की मपेक्षा अधिकत्तम वर्षा प्राप्त करता है। 


62 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


प्रशात्त तठीय प्रदेश की तुलना में यह प्रदेश शीत ऋतु में अधिक ठण्डक एवं 
ग्रीष्म ऋतु में अधिक उष्णता का अनुभव करता है। फरवरी माह में सनइन 
का तापमाव 4 ? सेग्र ० पाया जाता है जबकि दक्षिणी में शिकरोकू में शीताकाल 
8० सेग्रे० रहता है ।मीष्मकाल मे इन दोनों स्थानों का तापमात क्रमशः 25 ९? 
सेग्रे ०» तथा 27? स्ेग्र ० रहता है । शीतकाल में दक्षि णी-पश्चि मी जापान 
के जापान सागर तटीय भागमों उत्तर से दक्षिण वर्षा की मात्रा मों कमी हो 

जाती है। उत्तर में स्थित निगाता में हमादा (#877909) की तुलता में वर्षा 
अधिक होती है। अतः वर्षा की वैभिन्नता के आधार पर जापान सागर तटीय 
जलवायु प्रदेश को लघु स्तर पर निम्न उप जलवायु प्रदेशों में विभक्त किया 
जा सकता है- 


&. निगाता जलवाश प्रदेश 
8 हमादा जलवायु प्रदेश (चित्र 3१)॥ 
४. निगाहा जलवायु प्रदेश (फांश४३ (7970 7620॥) 


इसके अन्तगंत होक्रिक्‌ प्रदेश के नियाता *टोयामा, इशीकावा, फुकुई, 
टोशान प्रान्त के पश्चिमी ग्रिफू, पश्चिमी नगानो, काष्टो प्रान्त के पश्चिमी 
गुम्मा, पश्चिमी टोचगी और टोहोक प्रान्त दे दर््षिणी-पश्छिमी फ़ुकशिमा और 
फिनकी प्रदेश के उत्तरी शिगा परिफेक्चगर आते है। 


इस जलवायु भदेश में शीतकाल में अधिक सर्दी तथा ग्रीष्म ऋतु मे अधिक 
गर्मी पड़ती है । शीतकाल में जनवरी वा तापमान 2शसेग्रे ० तथा ग्रीष्मकलीन 
अगस्त माह का तापमान 26? सेग्र 0 पाया जाता है| प्रदेश की सर्वाधिक वर्षा 
शीतकालीन उत्तर पश्चिमी ध्रवीय महाद्वीपीय ( ?८ ) हवाओं द्वारा होती है । 
प्रदेश को अधिकतम वर्षा नवम्बर एवं दिप्तम्बर माह मे होती है। दिसम्बर माह 
मे औसतन वर्षा 275 मिलीमीटर से अधिक होती है। इस काल की वर्पा मे 
ज्यों-ज्यों पश्चिम से पूर्व जाते हैं वर्षा की मात्रा मे कमी होती जादी है । नगानो 
जो जापान सागर तटीय भाग से दूर है, वर्षा की मात्रा ।00 से 200 मिमी० 
के मध्य है | 


ग्रीष्म ऋतु से यह प्रदेश उष्ण कटिवन्धीय सप्रुद्री वायु ( तर ) के प्रभाव 
से वंचित रहता है क्योंकि मध्यवत्ती पर्वत मालाये इन हवाओं को भागे बढ़ने से 
रोक छेती है। इसलिए निगाता मे ग्रीष्मकालीन वर्षा की मात्रा कम पायी जाती 
है | अगस्त माह में निगाता से वर्षा की औौध्रत मात्रा 300 मिलीमीटर से कस 


है । 


जलवायुयिक विशेषतायें ! 


8 हमादा जलवायु प्रदेश (909 0॥एक्षां० निश्ठांगा ) 


इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत किनकी प्रदेश के उत्तरी क्योंटो, उत्तरी 
हवोगो तथा चुगोकू प्रदेश के टोटोरी, शिमाने और उत्तरी शामागुद्ी क्रिफेक्चर 
आते हैं। इस प्रदेश की जलवायु पर चुगोक्‌ पर्वत मालाओं का विशेष प्रभाव 
पड़ता है । इस जलवायु प्रदेश का शीतकालीन फरवरी वा औसत तापमान 4 
सेग्रे० तथा ग्रीष्मकालीचव अगस्त माह का औसत तापमान 26 सेग्रे० पाया 
जाता है। चग्रोक पर्वतीय क्रम की ऊ चाई कम होने के कारण यहां की शीत- 
कालीत एव ग्रीषप्मकालीन वर्षा में समानता है । यहां पर औसत वर्षा की मात्रा 
]00 मिलीमीटर से 200 मिलीमीटर है। यह वर्षा शीतकाल में उत्तरी-पश्चिमी 
ध्रवीय महाद्वीपीय तथा अगस्त माह में हवाईयन उप्ण कटिवन्धीय टाइफूनों से 
होती है जिनकी उत्पत्ति जामान के दक्षिण पूर्व प्रशान्‍्त महासागर में होती है। 
यहां विषुवत रेखीय उष्ण हवायें, उप्ण कटिबन्धीय समुद्री ( ग|॥ ) तथा श्र वीय 
महाद्वीपीय ( ?८ ) हवाओं के मिलने में एक ल्िकोणात्मक वाताग्र बनता है। 
अन्तर उष्ण कटिवन्धौय बाताग्र तथा महाद्वीपीय समुद्री वाताग्र के कारण तीक् 
हवाओं के साथ वर्षा होती है । 


दक्षिणी पश्चिमी जापान का प्रशान्त सह धागर तदीय जलवायु प्रदेश 


( 50 ए६४छाा उ्ब0व75 7४णॉ० 009980व एीगव्वांठ पिश्दांणा) 


इस जलवायु प्रदेश के अन्तगंत कान्‍्टों प्रदेश के टीविगी, इवारागी, पूर्वी 
गुम्मा, सेटठामा, चिवा, टोकियों, कानागावा, तोशान प्रदेश के पूर्वी नगानों, 
यामानाशी, पूवी गिफू, टोकाई प्रदेश के शिजुओका, आइणी, किनकी प्रदेश के 
मी, पूर्वी जीगा, पूवी क्योटो, नारा, वाकायामा, ओसाका, पूर्वी हृथोगो. चुग्रोक्‌ 
प्रदेश के ओोकायामा, हीरोशिमा, शिकोक प्रदेश के कामरावा, तोकशिमा, इटहिसे, 
कोची तथा क्यूशू प्रदेश के पूर्वी आइटा, दक्षिणी पूर्की कुमामोटो, सियाजाकी 
ओर कागरोशिमा प्रिफंक्चर आते है । 


इस जलवायु प्रदेश की मुख्य विशेषता यह है कि यहां अधिकांश वर्षा 
ग्रीष्मकाल में होती है । शीत ऋतु में आकाश स्वच्छ एवं प्रकाशयुक्त रहता है। 
इस भाग में वाषिक तापान्तर कम पाया जाता है| यहां रो हक / पक्ृत्ति 
जलवायु प्रदेशों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भुक्ििका निभाती है | इ है 
शिकोक और चुगोक के मध्य आ्तरिक्त सागर यहां की जलवायु 
प्रभाव डालता है । अतः इप जलवायु प्रदेश को चार डप प्रते 
किया जा सकता हैं । 






64 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


४ - उत्तरी तटीय जलवायु प्रदेश 
8- उत्तरी मध्यवर्ती पवेतीय जलवायु प्रदेश 


(- आत्तरिक सागर तटोय जलवायु प्रदेश 
0- दक्षिणी क्युशु-शिकोक्‌ और क्राई प्रायद्वीपीय जलवायु प्रदेश 


/&. उत्तरी तटीय जलवायु देश 
( ९00॥07 (08998| ७॥॥790 २ि७७४०॥) 


इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत कान्‍्टो प्रदेश के इवारागी, पूर्वी सेंटामा, 
चिव्गय, टोजियो, कानागरावा, टोकियों प्रदेश के शिजुओका, आइशी और किनकी 
प्रदेण के ओमाका, उत्तरी नारा, उत्तरी मी और दक्षिणी शीया प्रिफेक्चर भाते 
आते है । इस जलवायु प्रदेश पर थिक्रुमी, अक्षामा, जापान आल्पस तथा फ्यूजी 
मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है । बह पर्वतीय क्रम पूर्वी 
प्रशान्त महासागरीय तट और पश्चिमी जापान सागरीय तट के मध्य जल विभा- 
जक (५/४७४७॥80) का कार्य करता है। इसके अतिरिक्त यह पर्वतीय ऋम शीत- 
कालीन उत्तरी-पश्चिमी ध्र[वीय महाद्वीपीय ( ९८ ) शीतल हवाओं के प्रभाव से 
इस जलवायु प्रदेश को वंचित रखता है। इस मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम वी ऊ चाइ 
4000 फीट से अधिक होने के कारण उत्तरी तटीग्र प्रदेश शीत ऋतु में वर्षा 
नही प्राप्त करता है। यही कारण है कि टोकियों मे जनवरी में केव॒न 50 मिमी, 
वर्षा होनी है । शीतकालीन औसत तापमान उत्तरी-पश्चमी हवाओ के प्रभाव से 
गंचित होने के कारण 4० सेग्र० पाया जाता है । 


शीत्काल में जहां यह मध्यवर्ती क्रम वर्षा के लिए अवरोध का कार्य करता 
है वहीं ग्रीष्मकाल मे हवईयन दक्षिणी पूर्वी उष्ण क़्टिबन्धीय समुद्री (7॥॥7) 
हवाओं को रोककर अधिक वर्पा करता है। टोटियो मे सर्वाधिक वर्षा अगस्त 
ओर सित्तम्बर माह में होती है। इन महीनो में वर्षा 470 से 250 मिमी० 
होता है। टोकियो का ग्रीष्मकालीन तापमान 26 सेग्रे ० पाया जाता है। 


इस जलवायु प्रदेश मे वर्षा टाइफनों से होती है जिसमें हवाये 70 नाट से 
अधिक गति से चलती है। ये टाइफन मार्शल और करोलाइन (0४70 ॥॥8) 
द्वीपो के पास उत्पन्न होते हैं जिनक्री दिशा दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम होती 
है। जुलाई से इन हवाओं की दिशा उत्तर हो जाती है। इस जलवायु प्रदेश में 
टाइफनों का प्रभाव मुख्य रूप से सितम्बर माह में होता है। 

इस जलवायु प्रदेश का प्रतिनिधि नगर टोकियो है जिसके वर्पा एवं ताप* 
मान के आकड़े तालिका 3.4 से प्राप्त हो जाते है । 


जलवाविक विशेषताएं (65 








तालिका 3.4... 
टोकियो नयर का तापमान एवं वर्षा; 4958 
स्थान स्थित्ति जनवरी फरवरी माच- अप्रेल मई जून 
टोकियो 363० तापमान 38.7 39.6 45.6 55.5 63.7 70.0 


[402प ० फा० 
वर्षा इंच. 2.0 3.0 4.3 5.3 5.9 9.7 





जुनाई अगस्त सितस्वर अवक्ट्बवर तवम्बर दिसम्घर रेंज 
77.4... 79.! 72.8 62 52.0 43.0 40 
5.6 7.2 0.0 7.9 35 2.3 64 


(8) उत्तरो-मध्यवर्तों पर्वतीय जलवायु प्रदेश 
(6॥॥87॥ ]॥97॥9089808 770"7कक0 ५5 गाव १6५७70॥) 
कास्टो प्रदेश के टोचियी, पूर्वी गुम्मा, पश्चिमी सैंटामा, ठोशान प्रदेश के 
पूर्वी लगानो, यामानाणी और पूर्वी गिफ्‌ प्रिफेक्चर आते इसमें हैं। इस पर्वतीय क्रम 
की रचना इशिगो, मिक्तुमी, जापान आल्प्स ओर फ्यूजी पर्वतीय क्रम दारा हुई 
है जिनकी ऊ चाई 000 भी० से अधिक है। इस पर्वतीय क्रम का उच्चावच 


सर्वत्र एक सा नहीं है क्योंकि इशिगों क्रम को अभगानों नदी, मिकुमी क्रम को 
सीनानों और टोन नदी तथा जापान आल्प्स को किसो वेवरिए नदियों से काटकर 


गार्ज का निर्माण किया है । इसलिए उच्चावच विषमता के कारण तापमान 
और वर्षा में स्थानीय विष्मतायें पायी जाती हैं। जो वेसिन चारों ओर पर्वतों 
से घिरे हैं वहां पर ग्ियों में अधिक गमीं और सदियों में अधिक सर्दी पड़ती है । 
पर्वेतों से घिरे होने के कारण वेसिन जोतकाल में साइवेरियाई ध्र्‌वीय महाद्वीपीय 
(९४) उत्तरी पश्चिमी हवाओं से वर्षा नही प्राप्त करते हैं। उसी भांति ग्रीष्म- 
कालीन उष्ण कटिवन्धीय समुद्री (70)दक्षिण-पूर्वी वायु के प्रभाव से भी वंचित 
रहते हैं, ज॑से नग्रानों का जनवरी में तापमान -2 सेग्र 0 पाय जाता है जब 
कि जुलाई में यह तापमान 24 ? सेग्रे ० रहता है । इस प्रकार यहां की जलवायु 


»पतिशयता प्रधान है | नयानो वृष्टि छाय। प्रदेश में होने के कारण वर्ष में मात्रा 
(7 सेमी ० वर्पा प्राप्त करता है! 
(०) आन्तरिक सागर तटीय जलवायु प्रदेश 

(भाप 5९8 ००४४ णींजरभा० रि8छ०॥) 

यह जलवायु प्रदेश किनकी प्रदेशके उत्तरी वाकायामा पश्चिमी बोसाको, 
दक्षिणी ह्योग्रो, चुगोक्‌ प्रदेश के मोकायामा, हिरोशिमा, दक्षिणी यामागची तथा 
शिकोकू प्रदेश के कागावा, उत्तरी तोकूशिमा तथा उत्तरी ईहिमे प्रिफेक्चर में 
पायी जाती है । 





66 ] ,. जापान की भौगोलिक समीक्षा 


इस जलवायु प्रदेश की मुख्य विशेषता यह है कि उत्तर-पश्चिम में चुगोकू 
पर्वतीय क्रम तथा दक्षिण-पूर्व में शिकोकू पर्वतीय क्रम से घिरा है। अतः शीत- 
काल में उत्तरी-पश्चिमी साइवेरियाई भ्र्वीय महाद्वीपीय (?0) वायु से चुगोक्‌ 


पर्वतीय क्रम के कारण जिस प्रकार शीत ऋतु में वर्षा प्राप्त करने में असमर्थ 
रहता है उस्ती भाति ग्रीष्म ऋतु मे शिकोक पर्वतीय क्रम के कारण दक्षिण-पूर्वी 
उष्ण कटिबन्धीय समुद्री (॥7) हवाओं से भी वर्षा प्राप्त करने में असमर्थ रहता 
है। ईंसका प्रमुख कारण वृष्टि छाया प्रदेश में पड़ना है। जब शीतकाल में भाष 
'भरी हवायें पव॑तों से नीचे उतरती है तो वे गर्म हो जाती हैं और उनकी सापे- 


क्षिक आदर ता ०७४४४ ॥५७॥709)क्रम हो जाती है । अतः वर्षा नहीं होती है । 
यही कारण है कि ओसाका में वर्ष में केवल 53 इंच वर्षा होती है जबकि 
दक्षिणी-क्यूजू के कायोशिमा में वर्ष भर मे 89 इंच वर्पा होती है। ईंसी प्रकार 
ओसाका में ताप परिसर 23? सेग्रेण० पाया जाता है जबकि कामोसिमा में 20? 
पाया जाता है यदि आन्तरिक सागर का प्रसार न होता तो असाका में ताप 
परिसर की मात्रा ओर अधिक होती |! 


(0) दक्षिणी क्युशू शिकोकू और काई प्रायद्वीगीय जलवायु प्रदेश 

(80 णाशा। (५४७, शप-5गोतततत आप तिं ?शा।इपाए ०70 गि6तां०॥) 

इस जलवायु प्रदेश के अच्ठर्गत किनकी प्रदेश के दक्षिणी तोकूशिमा, 

दक्षिणी' नारा, दक्षिणी मी (४४४७), शिकोक प्रदेश के दक्षिणी-पूर्वी भोईटा इंहिमे. 
कोची (((००४7) तथा क्यूझशू प्रदेश के दक्षिणी-पूर्वी ओइटा ( 0॥9 ), दक्षिणी 
कुमामोंटोी, मियाजाकी और कागोशिमा प्रिफेक्चर आते हैं। यह प्रदेश जापान 
के उप्ण कटिबच्धीय क्षेत्र में पड़ता है। इसलिए प्रत्येक स्थान का औसठ ताप- 
मात जनवरी में 6? सेग्रे० से मधिक पाया जाता है। ज्यों-ज्यों दक्षिण की 
ओर जाते है, तापमान की मात्रा बढ़ती जाती है। कागरोशिमा के दक्षिणी भाग 
का तापमान जनवरी में 8? सेग्रे० से ऊपर पाया जाता है। यही कारण है कि 
इस जलवायु प्रदेश में वर्ष भर फसलें उगाई जाती हैं । 


इस प्रदेश का प्रीष्मकालीन तापमान 38 ९ सेग्रे तक पाया जाता है। शीत- 
कालीन वर्षा उत्तरी-पश्चिमी प्र वीय मह'द्वीपीय हवाओं से तथा ग्रीष्म कालीन 
वर्षा दक्षिणी-पूर्वी उष्ण कटिबन्धीय समुद्रीय (॥॥) हवाओं से होती है । ग्रीष्म- 
कालीन बर्षा की मात्रा शीतकालीन वर्षा की मात्रा से भधिक होती है। यहां 
में शीतकावीन वर्षा का औसत 2 इन्च से 8 इन्च है जब कि भ्रीष्मकालीन वर्पा 
की मात्रा 4 इन्च से 24 इन्च है। कागोशिमा में जनवरी माह में वर्षा का 








जलवाधिक विशेषत्तायें [ 67 


औसत 3.4 इन्च है जबकि जून माह की वर्षा ॥7 इंच है। ग्रीष्म ऋतु में 
दक्षिणी वयूशु में पे को ओर शिकोक में दक्षिण की और तथा किनकी प्रायद्वीप 
के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा बढ़ती जाती है। इन स्थानों पर वर्षा 9 इंच 
से 24 इच तक होती है। ग्रीष्मकालीन सर्वाधिक वर्षा का मुख्य कारण टाइफून 
हैं जिन्हें व्यूश् और शिकोक्‌ पर्वत मालायें रोककर दक्षिणी तटों पर अधिक वर्षा 
कराती है। कोगोशिमा के प्रत्येक महीने की वर्षा एवं तापमाम का विवरण 
तालिका 3.5 से प्राप्त हो जाता है। 


तालिका 3.5 


कागोशिमा में ताप एवं वर्षा का विवरण, 962 





स्थान स्थिति जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून 





कामोशिमा 3]75० तापमान 44 46 5.5 59 66.4 72 
8342 पू ० फ्ा० 
वर्पाइ६ 34 40 63 86 82 70 


(०७५४७ हारा पान»; “>>. फेपपाेपानपत कक, 





जुलाई अगस्त सितम्बर अक्टूवर नवम्बर दिसम्बर रेंज 





80.2 80 8 /5.9 86.5 57 49 37 


[2.2 न 8.7 8 3.6 3.4 8] 


बटालियन पावपकमकक,,..क्‍क-क-कक-क+++-०+.>साका न्‍क, 


5... उत्तरी क्यूशू जलवायु प्रदेश( 087 (५५59७ ०॥॥॥9॥0 रि९ध 00) 


इस जलवायु प्रदेश के अन्तगंत क्यू प्रदेश के फकुओका, सेगा, नागासाकी 
ओइटा और दक्षिण-पश्चिमी कुमामोटो प्रिफेक्चर आते हैं। इस जलवायु प्रदेश 
की मुख्य विशेषता यह है कि यहां पर वक्षिणी-पण्चिमी जापान के जापान सागर 
तटीय और प्रणान्त महासाषर तटीय जलवायु प्रदेशों के मध्य की विशेषतायें 
पायी जाती हैं क्योकि यहां पर शीतकाल में ध्र्‌वीय महाद्वीपीय (?०) उत्तरी- 
पश्मी हवाओं से तथा ग्रीष्मकाल में जापान के पूर्व मों उत्पन्न टाइफूनों की 
दक्षिणी-पूर्वी उष्ण कटिकन्धीय समुद्री हवाओं (770) से वर्षा होती है । इंस 
जलवायु प्रदेश में शीतकालीन वर्षा 50 से 7000 मिलीमीठर तथा प्रीष्मकाल में 
00 से 200 मिलीमीटर होती है । इस जलवायु प्रदेश में भी अधिक ठण्डक 
नहीं पड़ती क्योंकि बयूरोशियों की गर्म घारा इस जलवायु प्रदेश के तटीय भाग के 
तापमान को बढ़ा देती है तथा ग्रीष्मकल सें समुद्री प्रभाव के कारण यहां की 
जनवायु सम रहती है। नागाशाकी का फरवरी का तापमान 6? संग्रे० तथा 
. अगस्त का तापमान 28 ? झेंग्रे5्पाया जाता है। 














68 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


कुमारी ई० एम० सेन्‍्डर्स ने भी जापान को जलवायु प्रदेश में विभक्त 
किया है । इनका यह विभाजन आचन्तरिक सागर के प्रभावों को लक्ष्य कर नहीं 
किया गया है। इनका विभाजन इस प्रकार ह- 


4-दक्षिणी जापान 
2-मध्य जापान 
3-उत्तरी जापान 


[-दक्षिणी जापान (5000७7॥ थ »०आ)-यहां का शीतकालीन ताप- 
मान 40 से 8 सेग्रे ० तक्त तथा ग्रीष्मकालीन तापमान 26?से 288 सेग्रे० पाया 
जाता है। इस जलवायु प्रदेश में शीतकानीन वर्षा उत्तरी-पश्चिमी ध्र्वीय महा- 
द्वीपीय (?८) हवाओं से तथा ग्रीष्मकालीन वर्षा उष्ण कटिबन्धीय दक्षिणी-पूर्वी 
समुद्री (॥7) हवाओं से होती है । ग्रीप्मकाल में शीत ऋतु की अपेक्षा अधिक 


वर्षा होती है । दक्षिणी जापान में वर्षा 2 इच से 8 इच तक होती है परन्तु 
आन्तरिक सागर के कुछ तटीय क्षेत्रों मे वर्षा 2 इंच से भी कम होती है । 


-कायावा में वर्षा 2 इंच से कम होती है| ग्रीष्म ऋतु में टाइफूनों से दक्षिणी 
जापान में वर्षा पूर्वी तट पर अधिक होती है । पूर्वी तटीय भागों में वर्षा 8 से 
46” होती है। मियाजाकी (क्यूश), कोची (शिकोक) वायायामा तथा भी 
(किनकी) के तटीय भागों मे वर्षा की मात्रा 46” है । पूर्वी तटीय भागों से हम 
ज्यों-ज्यों पश्चिम की ओर जाते है वर्षा में कमी होती जाती है | अतः चुगोक्‌ 
के तटीय भागों में ग्रीष्मकालीन वर्षा की मात्रा 4 से 8” है । 


2 सध्य जापान ( 0९७॥88। .9008॥) इस जलवायु प्रदेश को सैन्डस ने 
मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम के आधार पर दो उप प्रदेशों में विभाजित है जो इस 
प्रकार है- 


अ. पूर्वी जापान ै 
व. पश्चिमी जापान 


ञ. पूर्वो जापान (5६48४७॥ 39[7०72-इस जलवायु प्रदेश के अन्तर्गत 


टोकाई प्रदेश, पूर्वी काण्टो, पूर्वी टोहोकू तथा दक्षिणी-पूर्वी होकैडो के क्षेत्र आते 
है | इस जलवायु प्रदेश में उत्तर से दक्षिण तापक्रम बढ़ता जाता है| होकैडो के 





. 8870878, ((55) 7, ४. ; २७, ४0 'श(०परए एव्बाधा' 7२९शं०७ 
गधाए, 4920,(076 93] 77 0९80278977०8 7२९५०४९०७, ५४० जा, 92], 0. 446 
870 68582 79५ 7., ॥72., 8७770, [0. 594. 


ज॑लवायबविक विशेण्ताए' ( .69 


दक्षि णी-पूर्वी भाग में शीतकालीन तापमान -4 ? सेग्रे० (25 ९ फा०) पाया 
जाता है जबकि दक्षिणी भाग में शीतकालीन तापमान 4 ? सेग्रे (40 ? फा०) 
पाया जाता है । इसी प्रकार ग्रीष्मकाल में उत्तरी भाग का तापमान 20? 

सेग्र ०तथा दक्षिणी भाग का तापमान 26 ० सेग्रे ० (79 ? फा0) पाया जाता हैं । 


यह जलवायु प्रदेश वर्ष की अधिकांश वर्षा ग्रीष्मकालीन उष्ण कटिवन्धीय 
समुद्री (779) हवाओं से प्राप्त करता है| इन हवाओं की दिशा दक्षिण-पूर्व 
से उत्तर-पश्चिम और उत्तर होती है। मध्यवर्ती पच्तीय क्रम के कारण ये 
हंवायें पूर्वी तटीय भाग में अधिकतम वर्षा करती हैं, जबकि यह प्रदेश शीत- 
कालीन उत्तरी पश्चिमी ध्रूवीय महाद्वीपीय (?८) हवाओं के दृष्टि छाया प्रदेश 
में पड़ता है। यही कारण है कि शीतकालीन वर्षा केवल 2“ से 47 के मध्य: 
होती है | पूर्वी तटीय भाग में ग्रीष्मकालीव वर्षा 4“ से 49” होती है परच्तु 
सुरुगा खाड़ी के तटीय भाग में वर्षा |6” से 24” होती है । 


व. पश्चिसी जापान (५॥८७०॥ 3०0७7)-इस जलवायु प्रदेश के 
अन्तर्गत उत्तरी चुगोक्‌, उत्तरी फिनकी, उत्तरी-पश्चिमी ठोशान, होक्रिक, 
पश्चिमी टोहोकू और दक्षिणी-पश्चिमी होकडो के क्षेत्र आते हैं। होकेडो के 
पश्चिमी भाग का तापमान शीतकाल में -6० सेग्रे० पाया जाता है जबकि 
दक्षिणी भाग का तापमान 4० सेप्रे० पाया जाता है। ग्रीष्मकालीन पश्चिमी 
होक॑ंडी का तापमान 20? सेग्रे० और दक्षिणी भाग का तापमान 267 सेम्रे ० 
पाया जाता है । इस भाग की अधिकतम वर्षा शीत ऋतु में होती है । इस समय 
उत्तरी-पश्चिमी साइवेरियाई (९७०) हवायें दक्षिण-पूर्वं दिशा की ओर चलती 
हैं। यद्यपि ये हवायें शीतल एवं शुष्क होती हैं किन्‍्तू जापान सागर के ऊपर 
चलने के कारण नमी ग्रहण कर लेती है। जब ये हवायें मध्यवर्ती पर्वतीय क्रम से 
टकराती है तो पश्चिमी तटीय भाग में वर्षा करती है और पूर्वी तटीय भाग 
वृष्टि छाया प्रदेश में रहने के कारण कम वर्षा प्राप्त करता है। पश्चिमी तटीय 
भाग में वर्षा की मात्रा 4 से 6” इच होती है जबकि उत्तरी निगाता में 


वर्षा की मात्रा [67 से 247” के मध्य पायी जांती है। आनन्‍्तरिक वेसिनों में 
वर्षा की मात्रा 2 इच से भी कम होती है। ओोमोरी तथा एकिता में वर्षा की 
मात्रा 2 इच से कम है। यह प्रदेश ग्रीष्म ऋतु में प्रशान्त महासागरीय उष्ण 
कटिवन्धीय समुद्री (॥ हवाओं के प्रभाव से वंचित होने के कारण ग्रीष्म- 
काल में केवल 4 से 8” वर्षा प्राप्त करता है । 


3. उसंरी जापान (४०४७४ 38०47)--इस प्रदेश में शीतकालीन 
तापमान -4 ? सेग्रे से भी कम गाया जाता है। मध्यवर्ती पतंतीय क्षेत्रों मे 


70] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


शीतकालीन तापमान -0 ? संग्रे० तक गिर जाता है, जबकि ग्रीष्मकालीन 
तापमान 48० सेग्रे ० से 200 सेग्रे० तक पाया जाता है । इस जलवायु प्रदेश 
में उत्तरी होकंडो आता है। उत्तर में किटामी, दक्षिण में हिंडाका और पूव्व॑ में 
डेजेसुजान पर्वत श्रेणियों के कारण आत्तरिक वेसिनों में वर्षा कम होती है । 
शीतकाल में प्रदेश का पश्चिमी तट वर्षा प्राप्त करता है । वर्षा की मात्रा 2” से 
47” पायी जायी है, परन्तु ग्रीष्मकाल में पूर्वी होकैडो के कुछ भाग को छोड़कर 
सम्पूर्ण प्रदेश में वर्षा दक्षिणी-पूर्वी हवाओं से 4” से 8” के मध्य होती है। इस 
जलवायु प्रदेश में कृषि कार्य केवल प्रीष्ण काल में ही सम्भव होता है क्योंकि 
शीत ऋतु में लगभग 4 महीनों का तापमान हिमांक विन्दु से चीचे पाया जाता 
है । | 
ब्लाडिमीर कोपेन (ए]३७४॥॥ [(०)०थग)) ने जापान को तीन जलवायु 

प्रदेशों भें विभक्त किया है जो इस प्रकार है-- 

4. 07 (होकडो) 

2. 0० (उत्तरी हान्शु) 

3. (र्श (दक्षिणी जापान) 

जलवायबिंक विविधताओं एवं उच्चावच के कारण उत्पन्न जलवायबिक 

विषमताओं के आधार पर जापान को 20 जलवायु प्रदेशों में विभक्त किया जा 
सकता है जो इस प्रकार है- 
. उत्तरी होक डो 
, दक्षिणी होकैडो तथा उत्त्तरी हांशू का प्रशान्त तटीय भांग 
, दक्षिणी होकेडो तथा उत्तरी हांशू का जापान सागरीय ठतट। 
. मध्य हान्श का जापान सागरोय तद। 
, मध्य हान्शू का प्र शान्त तटीय भाग । 
, मध्य हानन्‍्श का आन्‍न्तरिक भाग । 
. दक्षिणी हान्शू का जापान सागरीय तद। 
. आन्तरिक सागर तटीय प्रदेश । 
- पश्चिमी कक्‍्यूशू । 
0., दक्षिणी क्यूशू तथा दक्षिणी शिकोक । 


| आल 


७09 6७० 3 ७४ (आ -+» 2 [७ 


4. उत्तरों होकडो (४०७९० प्त०ाप्धंत0)-यहू जापान का शीतल- 
तम जलवायु प्रदेश है । जनवरी माह में यहां का तापमान -4 ? 
सेग्रें' (2१5० फा०) से भी नीचे पाया जाता है। मध्यवर्ती प्रदेशों में तापमान 


जलवायविक विज्येपताए' [ 77 


“40 ० सेग्र ० तक पहुंच जाता है। पूर्वी होकैडो का तापमान ग्रीष्म काल में 
8 ० सेग्रे ० पाया जाता है जिसका मुझय कारण क्यूराइल की ठण्डी धारा है । 
यहां की भूमि जार माह तक बर्फ से ढकी रहती हूं तथा पाला रहित दिनों की 
संख्या 430 से 445 तक होती हैं। शीतकालीन वर्पा उत्तरी-पश्चिमी धर वीय 
महाद्वीपीय (7७) हवाओं से हिम के रूप में और ग्रीप्मकालीन वर्षा दक्षिणी- 
पूर्वी उष्ण कटिवन्धीय सागरीय धरा) ठाइफनों से होती ह. । शीतकालीन चर्पा 
की तुलना में ग्रीष्मकाईं/अलरल्छसे माता अधिक पायी जाती हैं । शीतकालीन 
जनवरी माह की 5 47%: ५. 2५९४ _लीत जुलाई माह को वर्षा 4” से 
87 के मध्य ॥। //#/ 53 







पे हि *्ट् 075 9 
इस प्रदेश केपर्वी/तिखकी, ,ग्रष्म॑कालोत...जलचायु-सम-रहत्ती है जिसका 

प्रमुख कारण क्यूराइल की ठण्डी घारा एवं समुद्री प्रभाव है | इसके विपरीत्त 
णीतकाल में क्यूराइल की धारा के कारण तापमान काफी नीचेगरिर जाता हैं । 
इस प्रदेश का शीतकालीन तापमान -20 (29? फा०) से 0० ऊूँग्रे 
(32? ) तक पाया जाता हू जबकि ग्रीप्मकालीन तापमान 2] ० सेंग्रे ० 
(70 7? फा०) से 23? सेग्रे० (74०९ फा०») पाया जाता है । शीतकाल में यह 
प्रदंश उत्तरी-पश्चिमी साइवेरियाई हवाओ से वर्षा कम प्राप्त करता हूँ क्योंकि 
यह वष्टि छाया प्रदंग में पडता हूं । शीतकालीन वर्षा की सात्रा जनवरी में 2/! 
से 47 के मध्य पायी जाती हूं | ग्रीष्मकालीन वर्षा दक्षिणी-पर्वी ह्वाईयन 
हवाओं से होती हूँ । जुलाई माह में यह वर्षा 4 से 6” के मध्य होती है । 
दक्षिणी होकैडों में जुलाई माह में 8” से कम वर्षा होती हूँ । यहाँ पाला रहित 
दिनों की संख्या 770 से 80 है। वाधिक वर्षा की मात्रा 400 से 50 
सेमी० हैँ । 

- दक्षिणी होकंडो तथा उत्तरी हाशू का जापान सामरीय तद- 

(9000॥ नण॑त(क्वांप० बात ?िजीठ ००३७ 0 . नि०एा४॥७) 


यहां ग्रीष्म ऋतु में सामान्य गर्मी पड़ती है परन्तु शीत ऋतु अत्यन्त 
शीतल होती है । शीलकालीन जनवरी माह का तापमान -2? सेग्रे० से ९ 


सेग्रे: पाया जाता है। गीत ऋतु में यद्यपि साइवेरियाई उत्तरी-पश्चिमी हवाओं 
से ठण्डक बढ़ जाती है किन्तु क्युरोशियों की गम धारा के कारण तापमान में 


72 ] जापानकी भौगोलिक समी क्षा 


अधिक गिरावट नही भाती है। इसके विपरीत ग्रीष्म कालीन तापमान 24०सेग्र० 
से 257 स्े्ने ० पाया जाता है। इस प्रदेश में वर्षा शीत एवं प्रीष्म दोनों ऋतुओं 
में होती है । शीत ऋतु में इस जलवायु प्रदेश का मध्यवर्ती पश्चिमी भाग जब 
कि ग्रीष्म ऋतु में उत्तरी भाग अधिक वर्षा प्राप्त करते है। शीतकालीन वर्षा 
की मात्रा जनवरी में 8” से 2'” और ग्रीमष्म ऋतु में जुलाई की वर्षा 8” 
से 6” के मध्य होती है। मध्यवर्ती बेसिनों में वर्षो कम (2 इन्च से कम) 
होती है। यहां पाला रहित दिनों की संख्या 470 से 75 है। वाधिक वर्षा 
का औसत मात्रा 440 सेमी० है। शी 


4- मध्य हांश का जापान सागरीय तट 
([087 968 00835 रण ग्रा0 407४0) 

इस प्रदेश का शीतकौलीन जनवरी माह का भोसत तापमान ॥)? सेग्रे ० 
तथा ग्रीष्मकालीन जुलाई का औसत तापमान 25० सेग्न ० पाया जाता है। यहां 
पाला रहित दिनों की संख्या 20 से 220 है। अदेश की अधिकांश वर्षा शीत 
ऋतु में होती है । जनवरी माह की औसत वर्षा 4” से 24” के मध्य होती है 
जबकि ग्रीष्म कालीन वर्षा 4” से 8” तक होती है। वापिक वर्षा का औसत 
456 सेमी० है। क्यूरोशियो की गर्म धारा उत्तर-पश्चिम से आने वाली ध्र्‌वीय 
महाद्वीपीय हवाओं के शीतल प्रभाव को कुछ कम कर देती है। 


5- सध्य हान्श प्रशान्त तटीय भाग (&8नाए 504७ ० ग्रांगत०१छा०) 

यह जलवायु प्रदेश आन्तर्रिक पवतीय क्रम के पूर्व का क्षत्र है जहां शीत- 
कालीन जनवरी का औसत तापमान 3? सेग्ने ० तथा ग्रीष्मकालीन औसत ताप- 
मान 25? सेग्रे० पाया जाता है। इस जलवायु प्रदेश की मुख्य विशेषता यह है 
कि एशिगो, मिकुमी, अस्ामा, आल्प्स और फ्यूजी परव॑त श्रेणियों की स्थिति 
के कारण ध्रवीय महाद्वीपीय (7०) उत्तरो-पश्चिमी हवाओं के वृष्टि छाया 
प्रदेश में पड़ता है इसलिए शीतकाल मे यहां वर्षा कम होती है। यहां पर शीत- 


6 


कालीन वर्षा जनवरी में 2” से 4” के मध्य होती है । 


प्रीष्मकाल में यह भाग दक्षिणी-पूर्वी उष्ण कटिबन्धीय (प॥) हवाओं के 
मार्ग में पड़ता है। इसके साथ ही मध्यवती पर्वतीय क्रम के अवरोध के कारण 
प्रशान्त महासागरीय तट पर भारी वर्षा होती है । वर्षा की यह मात्रा जुलाई में 
8” से 287 के मध्य होती है। किन्ही-किन्हीं स्थानों पर (सुरुगा खाड़ी का तटीय 
भाग) जुलाई में वर्षा 24 इन्च से भी अधिक होती है । यह्‌ वर्षा ग्रीष्मकालीन 


जलवायविक विशेषता /> 


टाइफूनों से होती है जिनसे अपार धन-जन की हानि होती है । वार्षिक बेर्षा-का 
ओऔसत १45 सेमी० है । यहां पाला रहित दिनोफ्ली:, सख्या 225 से, 
240 है । ६ ह पा 


किनारा 


डे कक 7 है घर भ आर ४ 


6- भष्य हान्शू का आन्तरिक भाग ([ वश छा एॉ 'भांध पल छ॒ ) 

यह एक पहाड़ी प्रदेश है जिसकी रचनां एशियो, मिकुमी, जावान आल्प्स 
ओर फ्यूजी पर्वतीय क्रमों द्वारा हुयी है । यहां की जलवायु महाद्वीपीय है अर्थात 
गर्मियों में अधिक गर्मी और शीत ऋतु में भधिक सर्दी पड़ती है। ऊचे परव्व॑त्तीय॑ 
भागों में तापमान कम पाया जाता है। इस भाग द। शीतकालीन जनवरी का 
भोसत तापमान 2” सेग्रे० तथा ग्रीष्म कालीन जुलाई का ओसत तापमान 25 
सेग्र ० पाया जाता है । वर्षा आन्तरिक बेसिनों को छोड़कर वर्ष पर्यच्त होती है 
परन्तु पवन सम्मुख पवंतीय ढालों (४/२१४४ककत ४००७) पर वर्षा की मात्रा 


अधिक है । शीतकाल में जनवरी माह में वर्षा की मात्रा 2” से 4” के 
मध्य जबकि ग्रीष्मकाल में जुलाई में 4” से 6” के मध्य होती है। शीतकालीन 


वर्षा उत्तरी-पश्चिमी साइवेरियाई हवाओं (?०) और प्रीष्मकालीन वर्षा उष्ण 
कटिबन्धीय दक्षिणी-पूर्वी (॥)) हवाओं से होती है। इस जलवायु प्रदेश में 


वाषिक वर्षा का औसत 800 से 425 समी० है। यहां पर पाला रहित दिनों 
की संख्या 60 से 470 है । 


7- वक्षिण हान्श का जापान सागरोय तट-- 

(3४[0श 568 ९०089 ० 50 परगाश)7 नि0॥9प0) 

इस प्रदेश की जतवायु सम रहती है | शीतकाल में यद्यपि श्रवीय महा- - 

द्वीपीय (?०) उत्तरी-पश्चिमी हवायें अत्यन्त शीतल होती है किन्तु क्यू रोशियों की 
गरम धारा के कारण तटीय भागों का तापमान बढ़ जाता है । यहां का जनवरी 
का भौसत तापमान 4? स्ेग्न ० पाया जाता है, परन्तु ग्रीष्मकालीन औसत ताप- 
मान 26 ०सेग्र ० पाया जाता-है | इस जलवायु प्रदेश में ढीत एवं ग्रीष्मकालीन 
वर्षा समान मात्रा में होती है। शीतकालीन वर्षा उत्तरी-पश्चिमी ध्रवीय महा- 
द्वीपीय तथः ग्रीष्मकालीन वर्षा उष्ण कटिबन्धीय दक्षिण-पूर्वी टाइफनों से होती 
है । जनवरी एवं अगस्त की वर्षा 4” से 8” के मध्य होती है। वाविक वर्षा 
की मात्रा 60 सेमी० और पाला रहित दिनों की संख्या 200 से 225 हैं। 
दोनों ऋतुओं में वर्षा की समान मात्रा का मुख्य कारण चुगोक्‌ पर्वत श्रेणियों 
की कम ऊंचाई (300 से 3000 फीट) है। 
8- आचत्तरिक सागर तटीय प्रदेश(॥वातव॑ 588 00०5। मि०6807) 


यह जापान का सबसे कम वर्पा प्राप्त करने वाला जलवाधु प्रदेश है क्‍योंकि 
यह शीतकालीन श्रूवीय महाद्वीपीय उत्तरी पश्चिमी (१०) हवाओं तथा औष्म- 


74 ] जापान की भौगोलिक समौक्षा 


कालीन दक्षिणी-पूर्वी उष्ण कटिबन्धीय (77) हवाओं की वृष्टि छाया प्रदेश में 
पड़ता है। उत्तरी-पश्चिमी हवओ की चुगोक्‌ श्रेणियाँ तथा दक्षिणी-पूर्वी 
हवाओं को शिकोक्‌ पवेत श्रेणियां रोक लेती हैं। यहां पर जनवरी का तापमान 
4" सेश्रें० (40? फा ०) से 6० सेग्रे ० पाया जाता है परन्तु ग्रीष्मकालीन ताप- 


ऐ 


मान 26? संग्र ० पाया जाता है। शीतकालीन जनवरी माह की वर्पा 2” से 
47 और ग्रीष्मकालीन वर्षा 3” से 8” के मध्य होती है। ग्रीष्मकालीन वर्षा 
टाइफनों से होती है। यहां पाला रहित दिनों की संख्या 220 है। वाषिक 


वर्षा की मात्रा !00 से 480 संभी० के मध्य होती है । 


9-- पश्चिमी पयुश (५४९४७॥ |(५०५७॥७) 

यहां पर ग्रीष्म ऋतु अत्यन्त गर्म तथा शीत ऋतु सामान्य शीतल रहती 
है । जनवरी का औसत तापमान 6? सेग्ने ० पाया जाता है जो पाम के वृक्षों को 
बढ़ाने में अत्यन्त अनुकूल है। यहाँ पर ग्रीष्मकालीन जुलाई का औसत तापमान 
27? सेग्रे ० रहता है । शीत्काल में क्यूरोशियो की गर्म धारा के कारण तटीय 
जलवायू अनुकूल एवं सुहावनी होती है। 


इस प्रदेश में वर्षा साल भर होती है। शीत ऋतु में उत्तरी-पश्चिमी 
थ्र्‌वीय महाद्वीप (?०) तथा ग्रीष्म काल में दक्षिणी-पूर्वी उष्ण कटि बन्धी समुद्री 
(ग) हवाओं से वर्षा होती है। ग्रीष्मकालीन टाइफूनों द्वारा होने वाली वर्पा 
अत्यन्त विनाशकारी होती है । शीतकालीन जनवरी की वर्षा की मात्रा 2” से 
8” तथा ग्रीष्मकालीन जुलाई की वर्षा की मात्रा 4 से ]2” त्क पाई जाती 
है | यहां पाला रहित दिनों की संख्या 200 से 225 है। वाषिक वर्षा का 


ओऔसत 50 से 200 सेमी है! 


0- दक्षिणी क्यूशू तथा दक्षिणी शिकोक्‌ 
(90006 (फफ्शाए क्ाप॑ 50प07॥ 5॥00|(०) 

यहां पर शीत ऋतु का मौसम सामान्य रहता है परन्तु उष्ण कटिवन्ध 
में पड़ने के कारण ग्रीष्म ऋतु का मोसम असमान्य पाया जाता है। ग्रीष्म ऋतु 
में गर्मी अविक पड़ती है । शीत ऋतु मों जनवरी का औप्तत तापमान 7 ? सेग्रे० 
तथा ग्रीष्म ऋतु में जुलाई का औसत तायमाव 27 ? सेग्रे० पाया जाता है। 
शीत ऋतु में दंस जलवायु प्रदेश में अवेक्षकृत कम वर्षा होती है क्‍योंकि वृष्टि 
छाया प्रदेश में पड़ने के कारण उत्तरी-पश्चिमी हवाओं से - कम वर्षा होती है। 
इस काल में जनवरी में वर्षा की मात्रा 2” से 47” के मध्य पायी जाती है। 
प्रीष्म काल में प्रदेश अधिकतम वर्षा प्राप्त करता है क्‍योंकि हवाई द्वीप से आने 


जलवायिक विशेपतायें 


आले उष्ण कटिवन्धीय तृफान क्युश॒ और शिकोक्‌ प्॑तों से टकराकर प्रशान्त 
तटीय ल्लत्र में अधिकतम वर्षा करते हैं। जुलाई माह में वर्षा 67 से 247 
तक हो जाती है | टाइफ्‌न की हवायें तीत्र होने के कारण फसलों को भी अधिक 
हानि पहुचती है । वापिक वर्षा का ओऑसत 200 से 300 संमी० है। यहां 
पर पाला रहित दिनों की धंडया 249 है । 


सारांश में जापान में वर्ष के प्रत्येक माह में वर्षा होती है. जिसका प्रमुख 
कारण जापान की सागर के मध्य स्थिति है। बायान में पाला रहित 200 दिन 
कृषि कार्यो के लिए अनुकूल होते हैं जो दक्षिणी-पश्चिमी जापान में पाया जाता 
है । इसके विपरीत जापान का आधा उत्तरी भाग जाड़े की भयंकर चपेट में 
आता है। जापान की जलवायू को ग्रीग्मकालीन टाइफून अत्यधिक प्रभावित 
करते हैं क्योंकि उनमें जहां अधिकतम वर्षा होती है। वहीं खड़ो फस वोंकी पर्याप्त 
हानि होती है | वाई-यू वर्षा, टाइफून द्वारा वर्षा तथा पवंतीय बर्फ के पिघलने 
से नदियों का जल स्तर उठ जाता है जिससे बाढ़ की विभीषिका बनी रहती है। 
उत्तरी भाग में निम्न तापक्रम हानिप्रद होता है। यदि जुलाई और अगस्त का 
औसत तापमान 20 ? संग्रे० से कम हो जाता है तो धाव की फम्नल को काफी 
क्षति होती है । 


मिट॒टी 


मिट्टी प्राकृतिक वातावरण का वह महत्वपूर्ण संसाधन है। यह खनिज तथा जैव 
तत्वों का गत्यात्मक (0५79॥70) प्राकृतिक सम्मिश्न॒ (0077[9/९) है । मिट्टी में 
पेड़ एवं पौधों को उत्पन्न करने की क्षमता होती है| मिट्टी की गुणवत्ता 
खतनिजों एवं जैव तत्वों की मात्रा पर आधारित होती हैं । 


जापान का 85% भूभाग पर्वतीय एवं पठारी है जो कृषि के लिए पूर्ण 
रूपेण अयोग्य है। शेप 5 2८ भूभाग की अधिकांश मिट्टी अद्ध विकसित है। 
तदी घाटी क्षेत्रों की ही मिट्टी विकसित है जो अतेक्षाकृत उपजाऊ है। ऊचे 
भागों की मिहे वर्ड कड़ों की अनुपजाऊ है जिस पर लीचिग की क्रिया अधिक 
होने से उपजाऊ तत्व वष्ट हो जाते हैं। मंदानी भागों की मिट्टी में एक ही फसल 
(धान) +ी गहन कृषि से मिट्टी की उ्वेराशक्ति दिनों-दिन क्षीण होती जा 
रही है । जापान के मृदा वैज्ञानिओं (९०१००855) का पहले मत था कि 
जापान की भिट्टी पर जलवायु और कृषि के स्थान पर केवल भृपृष्ठीय संरचना 
का ही प्रभाव पड़ता है | यहां पर मिट्टियों का अध्ययन सर्वे प्रथणथ 882 ई० 
में कृषि विभाग ने किया जिसका प्रस्तुतीकरण कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि सम्बन्धी 
मानचित्रों द्वारा किया । 


इसके पश्चात 4924 में डा० टोयोटारो सेकी (07. 7070०270 8९४) 
ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास किया। इसके अध्ययन के आधार पर 
इम्पीरियल कृषि अनुसंघान केन्द्रतआएशाश 6870प्रॉधा6 रिल९्श्याणा (€प्राप8) 
ने मिट्टियों को प्रदर्शित करते हुए एक मानचित्र बनाया । परन्तु इस बार भी 
मिट्टी पर जलवायु और वनस्पति के प्रभावों पर जोर नहीं दिया गया । 930 
में डा0 सेकी ने एक दूसरा मानचित्र बनाया जिसमें जलवायु और वनस्पति के 
प्रभावों को ध्यान में रखा गया । इस प्रकार 930 ई० तक जापान के मृदा 
गैज्ञाननकों (0०4०]0५७) का मत था कि जापान की मिट्टी का विभाजन 
विश्व की मिट॒टी के विभाजन के प्रारूप के अनुसार नही किया जा सकता है 
क्योंकि रूसी मृदा वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत विभाजन के अनुसार यहां की मिट्टी 


मिट्टी [ 77 


में विविधता एवं विपमता है। यहां के वैज्ञानिकों ने जलोढ़ (“गीएशंधा) और 
ज्वालामुखी रांख द्वारा निमित मिटद॒ठी के अतिरिक्त अन्य भिटिटयों का विभाजन 
मात्र कणों के आधार पर किया । जापान की जनवायु एवं धरातलीय स्वरूप में 
पर्याप्त विषमता पायी जाती है । इसलिए 930 ई० के पश्चात जो विभाजन 
प्रस्तुत किया गया वह चलवायु, वनस्पति तथा रासायनिक संरचना को आधार 
मानकर किया गया । विश्व प्रतिरूप स्तर पर॒ जापवात की मिट्टी को तीन 
मण्डलों (70769) में विभाजित फिया जा सकता है (चित्र 4.) 


4.. पाइजोल मिट॒टी मण्डल (20050| 80॥ 20796) 
८ भूरो जंगली मिट्टी मण्डल (87099 (07088 80]। 207८) 
3- लाल एवं पीली मिट॒टी मण्डल (रि०४ शा एश[०0७ $0 2078) 


यह विभाजन मुख्य रूप से जलवायु एवं वनस्पति के आधार पर किया 
गया है क्योंकि जापान की मिट्टी पर इन्हीं दोनों कारकों का प्रभाव परिलक्षित 
होता है । उत्तर से दक्षिण तक तापक्रम एवं वर्षा की भिन्‍नता के कारण 
वनस्पतियों में भिन्‍नतता पायी जाती है, जिसके फलस्वरूप एक स्थान से दूसरे 
स्थान की मिट॒टी में अच्तर पायः जाता है। पाडजोल मिट॒टोी कोणधारों बस 
क्षेत्रों में, भूरी जंगली मिट॒टी पतझड़ वाले क्षेत्रों में तथा लाच एवं पीली मिट्टी 
दक्षिणी-पश्चिमी जापान के अपेक्षाकृत अधिक वर्षा के क्षेत्रों में पायी जाती है | 


!-- पाउजोल मिट्ठी सण्डल (९०१६०! 5० 2076) 

पाडजोल मिटटी शीत जलवायु के कारण सम्पूर्ण होकेडों में पायी जाती 
है । अधिक वर्षा के कारण मिट॒टी में अयक्षालच (-००णांपढ) की क्रिया अधिक 
होती है । अतः इसके उपजाऊ तत्व बह जाते हैं । इसलिए यह मिट्टी अपेक्षाकृत 
कम उपजाऊ होती है। इस मिट॒टी में ज॑वीय तत्वों की कथी होती है । 


2- धूरोी जंगली मिद्दो मण्डल (370ए7 078७६ 50 20०) 

भरी जंगली मिटटी उत्तरी हांशू में पायी जाती है। मिटटी अम्लीय 
होती है जिसमें ह्यूमस की कमी पायी जाती है । यहु मिटटी कम वर्षा के क्षेत्रों 
में पायी जाती है। ऊचे क्षेत्रों में जहां वर्षा अपेक्षाकत अधिक होती है वहां _ 
अपक्षालन की क्रिया अधिक होती है । इस मिट्टी में जैवीय तत्व पाडजोल मिट्टी 
की तुलना में अधिक पाये जाते है क्योंकि ग्रीष्म काल में पतश्नड़ वारे वक्षों की 


पत्तिया गिरकर सड़ती रहती हैं इसलिए यह मिटटी पाडजोल मिट॒टी से 
अधिक उपजाऊ होती है । 


78 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


हाथ 


0.7440 50६8 
&५६ ७४७४५ 


ै ४०0.८४/२।० 





चित्र 4.4 जापान : (क) मूदां एवं मृदा मण्डज 
4- पर्वतीय, 2- जलोढ़, 3- ज्वालामुखी, 4- अन्य 
(ख) वानस्पतिक प्रदेश 
&- कोणधारी वनस्पति, 8- सनशीतोष्ण वनस्पत्ति, 
(:-- उपोष्ण वनस्पति । 
३- लाल एवं पीली मिट्टी सण्डल (११९८१ ४॥0 ५४८!०७ &0) 2076) 


लाग और पींली मिट॒टी पश्चिमी हांशू, क्यूशू और शिशोकू में पाई 
जाती है। इन क्षेत्रों में उच्चतम तायमानव तथा वर्षा की अधिकता पाई जाती 


है । इसलिए यहां अपक्षालन की क्रिया होने के कारण मिट्टी में खनिज तत्वों 
एवं ह्यूमस को कमी पाई जाती है। इस प्रकार जापान की मिट॒टी में उपजाऊ 


तत्वों की कमी के कारण अतिरिक्त उर्वेरकों की आवश्यकता पड़ती है जिसकी 
पूति करने पर वर्ष में दो या अधिक फसलें उगाई जाती हैं। 


पूर्वील्लिखित विवरण से जापान की मिट्टी का विस्तृत विवरण नहीं प्राप्त 
होता है । इसलिए जापान की मिट्टी का सूक्ष्म विवेचन अत्यन्त भावश्यक है। 


मिट्री | 79 


जापान की मिट्टी को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर 40 भागों में विभाजित किया गया 
ग़या है जो इत्त प्रकार है :- 


4- लाल पाडजोल, 2- पीली पाडजोल, 3- खाकी पाडजोल, 4- भूरी 
लाल लेटेराइट, 5- प्लेनोसिलिक, 6- एण्डो, 7- अंद्ध दलदली, 8- जलोढ़, 
9- बालू और 0- लीथोसोल । 


इस विश्लेषण के आधार पर जायाव की मिद्यों की 5 भागों में विभक्त 
किया जा जसकता है :- ४ 

4- लीथोसोल मिट्टी, 

2-. पाडजोल मिट॒टी, 

3- प्लेनोसिलिक मिट्टी, 

4-  एण्डो मिट॒टी, 

5- जलोढ़ मिटटी । 


3- लीथोसोल मिट्टी ((॥०5० 80०) 


यह जापान की अद्ध॑ विकसित सिदटी है जी समस्त जापान के 68% 
क्षेत्र पर पाई जाती है । पधरीली एवं पतली सनह की यहें मिटटी पर्वतीय ढालों 
पर मुख्य रूप से पायी जाती है | यह मिटटी उन क्षेत्रों में भी पाथी जाती है 
अहां वनस्पतियां पायी जाती हैं | चट्टानों में अपक्षय (शै८४॥०४78) और 
अपरदन (4०श/ं०7) होता रहता है। अपक्षय के कारण वियोजन (0९८07770- 
707) भौर विघटन (/097/०६४7४४0०॥) होने से चटटानें टूव्ती-फूटती रहती 
हैं। अपने ही स्थान पर ट्टमे-फटने तथा वनस्पतियों के सम्मिश्रण से बनी बह 
मिट्टी बड़े कड़ों की होती है । पर्ववीय तीन ढाल के कारण वर्षा का जल इसे 
तीव्र गति से बहुता हुआ घाटियों तक जाता है । इसलिए मिट्टी के खनिज 
युक्त वारीक कण आसानी से वह जाते हैं। कहीं-कहीं चट्टान को ऊपरी सतह 
दिख्षाई पड़ने लगती है । 


2- पाडजोल मिट्टी (?0050। 5०)॥) 


यह पूर्ण विकसित मिट्टी है जो पर्वतीय ढालीं पर जंगली क्षेत्रों में पाई 
जाती है। यह मिट्टी जापान के 7% क्षेत्र पर पाई जाती है। उत्पत्ति के 
लाधार पर कहीं पर यह वालू प्रधान तथा कहीं पर चीका प्रबाव होती है। 


80 ] जापान की भोगोलिक समोौक्षा 


वर्षा होने पर तीन्र ढाल के कारण अपरदन अधिक होता है जिससे उपजाऊ 
तत्व घुलऋर वह जाते हैं। धरना के आधद्यार पर इस मिटटी को दो उप भागों 
में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम- ऊगरी भागों की बड़े कणों की मिट्टी 
तथा द्वितीय-निचले भागों में निम्न कणों की मिश्‌टी जो प्रथम की अपेक्षा अधिक 
उपजाऊ होती है | 


यर्पा ऋतु में चट्टानों में उपस्थित लोहांश वह जाता है जिससे अपने 
पैतृक गुण के आधार पर चटटानें कई प्रकार की हो जाती है । रंग के आधार 
पर लाल पाडजोच, पीली पाडजोल, खाकी पाडजोल, भूरी पाडजोल आदि उप 
भागों में विभाजित किया जा सकता है । लाल एवं पीली पाडजोल मिट्टी मध्य 
एवं दक्षिणी हांशू और क्यूशू में, भूरी पाडजोल उत्तरी हांशू तथा होकैडो में पाई 
जाती है ! 


3- घप्लेनोसोलिक मिट्टी (?|90050॥0 50 


इस प्रकार की मिट॒टी 2 प्रतिशत क्षेत्र पर पायी जाती है .जिसका प्रसार 
पर्वेट्रीय ढालो पर है | पाडजो 4 मिट्टी की तुलना में यह्‌ अधिक उपजाऊ होती 
हैं । निम्न पर्ववीय ढाली तथा ऊबड़-खाबड़ क्षेत्रों मे सीढदार खेत बनाकर 
कृषि की जाती है । इस मण्डल ॥ मिटटी अपेक्षाकृत चीक़ा एवं बारोक केणों 
से युक्त होती है क्योकि उच्च भागों की अपरदित मिट॒टी का अवसाद यहां 
जमा होता रहता है । उपजाऊ मिट्टी के कारण (इस पर धान की कृषिकी 
जाती है । 


यह जापान की विकसित मिट्टी है, परन्तु पर्वतीय ढालों पर कृषि कार्य॑ 
श्रमसाध्य है | मध्य पर्वतीय क्रम के पूर्व एवं पश्चिमी ढालों पर इस प्रकार की 
मिट्टी पाई जाती है । इस धण्डल में जल अपवाह (0/97368) अविकसित 
अवस्था में पाया जाता है क्योकि सीढदार खेत तथा ढाल वर्षा के जल को अवरुद 
करते हैं । शीत ऋतु मे यह मण्डल शुष्क रहता है जबकि इस समय गेहूं औः 
जी को कूपि के लिए सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए शीतकाल 
सिंचाई की सुविधा के लिए संकरी खट्गयो की आवश्यकता पड़ती है जिन 
जव सुरक्षित रह सके, परन्तु यह अधिक श्रम एवं व्यय साध्य है। नगोया के 
निकट नोवी के मेंदान में शीतकाल में कुछ ही फतलें उगाई जा सकती हैं 
अविकसित जल अपवाह के कारण ही टाइफून की वर्पा द्वारा समुद्र में बाढ़ के 
कारण सर्वत्र फैले नमक को दूर करना अत्यन्त कप्टसाध्य है । 


- मिट्टी [ 8] 


4-एण्डो मिट्टी ( ६&60 80 ) 

यह जापान की विकसित मिट्टी है जो समस्त जापान के 8./ भाग पर 
पाई जाती है। इसका निर्माण ज्वालामुखी राख से हुआ है जो अपेक्षाकृत कम 
उपजाऊ है। यह मिट्टी दक्षिणी क्यूशू के कागोशिमा प्रिफेक्चर, पूर्वी-मध्यवर्ती 
हान्शू के कास्टो मैदान तथा दक्षिणी-पूर्वी होकैडो में पायी जाती है। सकुराजिमा 
( 58ए४। ) माउण्ट अजूमा आदि ज्वालामुखियों की राख का. निश्लेष 
होता रहता है। कहीं-कहीं पर ज्वालामुखी राख की गहराई 00 फीट तक 
“ पाई जाती है। 960 में सक्राजिमा ज्वालामुखी की राख से चारो ओर कई 
इन्च मोटी परत जम गई । 707 और १709 के मध्य मांउण्ट फ्यूजी ने सम्पूर्ण 
कान्‍्टो मंदान पर 3 इन्च मोटी राख की पते का निक्षेप किया था। अपक्षालन 
को क्रिया के कारण मिट्टी में उपजाऊ तत्वों की कमी पाई जाती है। जेचीय तत्वों 
तथा ह्यमस की पूति करके इस मिट्टी को कृषि योग्य बनाया जाता है। 


ऊचे भागों की तुलना में निचले भागों की मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है 
वयोकि ऊपरी भ्ञागों से अपरदित मिद्ठी का निश्षेप निम्तवर्ती भागों ने होता रहता 
हैं। वर्षा ऋतु में खाइयों तथा डौलों के निर्माण के बावजूद नालीदार कटाव 
अधिक होता है। इसके अतिरिक्त शुष्क ऋतुओं में हवा द्वारा कटाव से अधिक 
समस्या उत्पन्न हो जाती है । 


5 जलोढ़ मिट्टी ( &॥५४ं० ४० ) 


इस प्रकार की मिट्टी जापान के 45./ क्षेत्र पर पाई जाती हैं। जापान के 
सभी मँदानों में इस प्रकार की मिट्टी पाई जाती है जो सभी प्रकार की मिट्दियों 
से उपजाऊ होती है । इस मिट्टी में सिलिका तथा चीका की प्रधानता होती है । 


इप्त मिद्ठ में जंवीय तत्वों की अधिकता होती है। तटीय भागों पर शुष्क क्षेत्रों 
में बलुई मिट्टी पाई जाती है जो भ्रपेक्षाइत कम उपजाऊ होती है। ऐसी मिट्टी पर 
बागाती कषि की जाती है परन्तु जलोढ़ मिट्टी जिसमें चीका की प्रश्मानता होती 
है वहां धान की गहन कृषि की जोती है । 


भूम्ति अपरदन ( 80 ६&/09ा०॥ ) 


जापान में छोटे-छोटे मैदानी भागों को छोड़कर भूमि कटाव एक ज्वलन्त 
समस्या है। एक ओर मात्र 45'/. भूमि पर कृषि योग्य होना तथा दूसरी ओर 
अत्यधिक भूमि का अपरदन जापानी कृषि पर अधिक प्रभाव डालते हैं। जापान 


82 ] ,जापान की भौगोलिक समीक्षा 


एक पं तीय एवं पठारी देश है। इसलिए ऊचे पर्वतीय भागो से निकलने वाली 
नदियां तीत्नगति से प्रवाहित होती है जिससे अपरदन अधिक होता है। जिन 
भागों में वृक्षों का अभात्र हैं वहां पर अपरदन अधिक होता है। ऐसे भागों की 
मिट्टी कटकर वह जाती है और वह कृषि के योग्य नहीं रहती है । अपरदन और 
कम क्षेत्रफल की कृषि योग्य भूमि ने जापान में धान की क्राप को प्रोत्साहित 
किया है क्योकि धान की फसल सीढीदार खेतों में उगाकर भूमि के कटाव को 
रोका गया है । अपरदन द्वारा मिट॒टी-क्षरण से उसमें उपजाऊ तत्वों का अभाव 
हो जाता है जिसकी पूर्ति उर्वेरकों द्वारा की जाती है। 


“प्राकतिक वनस्पति एवं वन सम्पदा 


जापान में जंगलों का बड़ा महत्व है क्योंकि समस्त भोद्योगिक मुल्य का 
5% उत्पादन जंगलों से होता है । जापान के समस्त क्षेत्रफल के 67% भूभाग 
प्र वनों का प्रसार है। शीतोष्ण कटिबन्धीय किसी भी देश (फिनलैण्ड को 


छोड़कर) में इतनी अधिक भूमि पर वन नही पाये जाते हैं। इस प्रकार जापान 
वी अर्थ व्यवस्था में वनों का अभूतपूर्व योगदान है। (तालिका 5.) 4984 


में , 899,46,000 घन्र मीटर लकड़ी फर्नीचर के लिए, 7,48,000 घन मी० 
लुगदी के लिए, 4,57000 घन मीटर प्लाईवुड के लिए, तथा ,43,60,000 


घनमीटर लकड़ी औद्योगिक कार्यो के लिए उपलब्ध हुई थी। इस प्रकार कुल 
3,25,4000 घनमीटर लकड़ी औद्योगिक कार्यो में प्रयुक्त हुई जो 985 में 


वढ़कर 3,29,44000 घनमीटर तक पहुच गई। 985 में कुल 3,34,65000 
घनमीटर लकड़ी का उत्पादन हुआ । 985 में जापतन ने जंगल पर आधारित 


5,87,5,28000 डालर मुल्य के उत्पादों का आयात किया तथा 770543000 
डालर मूल्य के उत्पादों का निर्यात किया ( तालिका 5.2 )। इसका तात्पयें 


यह है कि विश्व के अनेक देशों में जहां जंगलों का तीन्र गति से शोपण हो रहा 
है वहीं जापान अपने जंगलों के विकास के लिए प्रयत्नशील है। 


धरातलीय बनावट एवं अनुकूल जलवांयु के कारण जापान में वनों का 
प्रसार अधिक है। जापान के पर्वतीय क्षेत्र वनों से अच्छांदित हैं। जाणान की 
मात्र 8% भूमि जेन्या [ 6907५8 ) या जंगली घोषित की गई है। वनों से 
लकड़ी , कोयला, लुगदी, फल और वांस प्राप्त होते हैं । इनसे रेयाच, कागज, 
फर्नीचर, प्लाईवुड, तारकोल आदि की प्राप्ति होती है। जापान की मात्र 4% 
शक्ति वनों की लकड़ी से प्राप्त होती है। ईघन तथा मकान बचाने 


के लिए भी लकड़ी का अधिक प्रयोग होता हैं । जापान के अधिकांश फार्मो 
के पास जंगल है जिनसे ईघन के लिए लकड़ी, पद्ुओं के लिए चारा तथा खाद 


बनाने के लिए पत्तियाँ प्राप्त होती है । जापान में अधिकांश क्षेत्र के बन आज भी 
प्राकृतिक अवस्था में हैं । चौड़ी पत्ती वाले वत् अधिकांश क्षेत्र (44% ) पर पाये 


84 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


जाते है। मिश्रिद और शंक्रुधारी वर क्रमश: 27% और 26% क्षेत्र पर पाये 
जाते है । 


नियोलिथिक ( |४४०॥॥४० ) काल में जापान का सम्पूर्ण क्षेत्र जंगलों से 
आच्छादित था । जैसे-ज॑से जनसंख्या वढती गई, समतल क्षेत्रो को कृषि योग्य 
बनाया गया | अब देश के 5% क्षेत्र पर कृषि कार्य होता है) जेंगल के लिए जो 
अनुकूल परिस्थितियां हैं वह कृषि के लिए नहों हैं क्योंकि उपजाऊ मिट्टी 
की पर्त दी मोटाई बहुल कम है| साथ ही पव॑तीय क्षेत्र होने के कारण तीब्र- 
गामी नदियों तथा वर्षा जल के कारण अपरदन अधिक होता रहता है । इसलिए 
पर्वेत्तीय ढाल बेवल् जंगल के लिए ही अनुकूल है । जब इन ढालो पर जंगल 
काट लिया जाता है तो वहा पुनः वृक्षारोपण करके मिट॒टी के कटाव को रोकने 
का प्रयास फिया जाता है। यदि वृक्षारोपण न किया जाय तो अपरदित अवसाद 
नदियों की घाटियों में निक्षेपित होकर नदियों को उथला वना देता है जिसस्ते 
बाढ़ की सम्भावना बढ़ जाती है। 


वनों में मिश्रित वृक्ष पाये जाते हैं। इसलिए जापान के वनों को मण्डलों 
में विभाजित करना कठिन है । जिन भागों मे जिस कार के व॒क्षों की अधिकता 
है उसी आधार पर जापान की वनस्पति को 3 मण्डलो में विभक्त किया जां 
सकता है (चित्र 4.] ब) । 
!, शोतोष्ण कोणधारी वव मण्डल (7 ॥#07886 (0फ्रीकिणा$ 068 2076) , 
3. शीतोप्ण पर्णपाती बन मण्डल (70॥रए९78९ त€८ंता0प5 076४६ 2076) 


2 उपोष्ण वन मण्डल (506-00०फ्रांटब] [07९५ 20॥0) 
[-शोतोष्ण कोंगधारी वचन मण्डल (770०० (006700७8 407९5६ 2070) 


शीतोष्ण कोंगधारी वनो का विस्तार पूर्वी और & मध्य होकीडो में पाया 
जाता है । यहां की जलवायु अत्यस्त शीतल है । शीतकालीन तापमान हिमांक से 
भी नीचे पाया जाता है । इसके अतिरिक्त ये वन हान्शु के उच्च पर्बयीय प्रदेश में 
भी पाये जाते हैँ । अर्थात ऐसे वन 4200 मीटर से अधिक ऊचाई वाहले क्षेत्रों में 


पाये जाते हैं । फ्यूजी पव॑त्तीय क्षेत्र में ऐसे वव 4800 मीटर को ऊँचाई पर 
पाये जाते है । 


अत्यधिक शीतलता के कारण बर्फ से बचने के लिए शंकुधारी वृक्ष पाये 
जाते हैं जिककी पत्तिगंं कोणधारो होती है। ध्क्षों की शाखाये भी नीचे की ओर 
झुकी होती है । जिससे फिसलकर नीचे की गिर जाती है। फर ओर स्प्रूस 


प्राकृति वनस्पति एवं वन सम्पदा | 85 


इस मण्डल के प्रमुख वृक्ष हैं परन्तु कहीं-कहीं पर पर्णपातीं वृक्ष बचे, एल्डर, 
आस्पेन आदि भी पाये जाते हैं । पाडजोलीकरण के कारण मिट्टी अनुपजाऊ है । 
पवेतों के खड़े ढालों पर वक्षों का अभाव है । भीतरी हान्शू के अनेक उच्च भाग 
दुर्गम्य हैं। अतः ऐसे क्षेत्रों की लकड़ी का शोपण नहीं हो पाता है। इन वनों से 
औद्योगिक कार्यो के लिए मुलायम लकड़ी प्राप्त होती है जिनसे लुगदी, कागज, 
प्लाईबुड व फर्नीचर तैयार किया जाता है। औद्योगिक कार्यो हेतु घरेलू मांग 
अधिक होने के कारण मुलायम लकड़ी की पति नहीं हो पाती है । इसलिए लकड़ी 
की कमी को कोरिया, कनाडा, न्यूजीलेण्ड आदि देशों से आयात करके पूरी की 
जाती है।. _ 

2. शीतीष्ण पर्णपाती चन सण्डल (6॥709799 १6८000प७ गिल 
2079) -इस बन मण्डल का विस्तार दक्षिणी-पणम्चिमी होकैडो, उत्तरी तथा 
मध्य हांशू के टोहोक प्रदेश के उत्तरी निगाता प्रिफेक्चर, तोशान प्रदेश के 
नगानो और यामानाशी प्रिफेक्चर तथा पश्चिमी कान्‍टों प्रदेश के गुम्मा, टोचिगी, 
पश्चिमी सेटामा तथा पश्चिमी ठोकियो प्रिफेक्चर में है। इसके अतिरिक्त ये 
बन दक्षिणी-एश्चिमी जापान के उच्च परववेतीय क्षेत्रों पर भी पाये जाते हैं। शीत- 
कालीन तापमान --2 ० सेग्र॑ ० से 2 सेग्रे० तथा ग्रीष्मकालीन तापमान 20०? 
सेग्रंछसे 36? सेग्र ० तक पाया जाता है। यहां पर सिश्चित वन पशये जाते 
हैं। ऊचे पर्वतीय क्षेत्रों में कोणधारी तथा निचले भागों में पर्णपाती वन पाये 
जाते हैं परन्तु पर्णपाती वनों की वाहल्यता पाई जाती है। वक्षों के बीच, ऐश, 
चेस्टनट पाप्लर, ओक, वालनट, एल्डर, बाँस, चेरी आदि हैं। ऊचे भागों में 
कहीं-कहीं फर और स्प्रस के कोंणधारी वन पाये जाते हैं । 


पर्णपाती वनों की तुलना में शंकुधारी वृक्षों का व्यावसायिक महत्व 
अधिक है। पर्णपाती वृक्षों की लकड़ी अपेक्षाकृत कठोर होती है जिनका प्रयोग 
फर्नीचर व मकान वनामे के लिए किया जाता हैं। हांशू जापान का प्रमुख 
लकड़ी उत्पपादक द्वीप है क्योंकि यहाँ पर पर्णवाती और कोंणधारी दोनों प्रकार 
के वृक्षों के लिए अनुकूल पारिस्थितियां है । 

3, उपोष्ण बन झण्डल (590 ॥70[0098। ॥0789६ 2006)--इप प्रकार 
के वचन मध्य हशू के तटवर्ती तथा दक्षिणी-पश्चिमी जावयान के 3000 फीट 
ऊँचे भागों मे पाये जाते हैं। इध प्रकार के वनों का विस्तार होक्रिक (उत्तरी 
पूर्वी निगाता प्रिफेक्चर को छोड़कर) तोशान प्रदेश के गिफ्‌, दोंकाई प्रदेश, 
कान्टो प्रदेश के इवारागी, चिबा, पूर्वी सैटामा, उत्तरी-पूर्वी टोकियों तथा 
फानागावा प्रिफेक्चर, चुगोकू प्रदेश, किनकी प्रदेश, श्लिकोकू और व्यूझ 


86 ] जापान को भोगीलिक समीक्षा 


प्रदेशों में है । इन व॒क्षों की लकड़ी कठोर होती है । व॒क्षों की पत्तियां चौड़ी 
होती है । इन प्रदेशों में शीतकालीन तापमान 4? सेग्र॑०« से 8? सेग्र ० तथा 
ग्रोष्मफालीन तापमान 26 ० सेग्ने से 28 सेग्र . पाया जाता है । 

इस पेटी में चौड़ी पत्ती वाले वन पाये जाते है। प्रमुख वृक्षों में ओक, लारेल, 
कैस्फर, कसेलिया, पाइन, फर, हेमलाक, सीडार भादि है । इस प्राकृतिक वन 
की लकड़ी व्यावसायिक दृष्टि से कम उपयोगी होती है। इसलिए जापान सर- 
कार सीडार, साइप्र स तथा पाइन वृक्षों को लगवा रही है | 


इस वन मण्डल में वृक्षों की अधिक कटाई की गयी है क्योंकि तापमान 
एवं वर्षा की भनुकलता के कारण यहाँ वर्ष में दो से अधिक फसलें उत्पन्त की 
जाती हैं । इसलिए भूमि को बढ़ाने एवं सुधारने के उद्देश्य से जंगलों को साफ 
कर दिया गया। होकूरिकू, किनकी, शिकोकू और क्यूशू प्रदेश के उच्च भागों 
में फर और स्प्रस के वृक्ष पाये जाते हैं । 


जापान में वनों का महत्व--जापान की अर्थ व्यवस्था में वनों का बड़ा 
महत्व है | ये वन जापान के लिए औद्योगिक कच्चा माल (जैसे लुगदी) इमा- 
रती लकड़ी, ईंधन तथा खाद्य पदार्थ की प्रति करते हैं । चिराई के योग्य लकड़ी 
का भाग 27 प्रतिशत है जो होकीडो, हांशू के पर्वतीय क्षेत्र और दक्षिणी- 
पश्चिमी जापान में पायी जाती है। ईंधन के रूप में मात्र एकश्रतिशत शक्ति जगलों 
से प्राप्त होती है। गेस और विद्य्‌त शक्ति के बावजूद जापान में लकड़ी का अक्षुण्य 
महत्व है । लकड़ी से कोयला भी तैयार किया जाता है । 


दक्षिणी-पश्चिमी जापान में लुगदी से रेयान बनाया जाता है। चुगोक्‌ 
और शिकोकू प्रदेशों में यह कार्य व्यापक पैमाने पर होता है | वृक्षों की पत्तियो 
को सड़ाकर कृषक खाद बनाते हैं जिससे अनुपजाऊ मिट्टी में ह्यमस और 
जुवीय तत्वों की पूर्ति की जा सके | वालनट के फल और मशरूम (॥/०७॥४- 
7/00775) को भोजन के रूप में उपभोग किया जाता है। कैम्फर का प्रयोग दवा 
के रूप मे तथा बांस का प्रयोग टोकरी और फर्नीचर बनाने में होता है । इसके 
अतिरिक्त बांस का प्रयोग कागज और मकान बनाने के लिए भी किया जाता हैं । 
जापान के पर्वेत्तीय ढालों पर वृक्षों की उपस्थिति से अपरदन नही हो पाता है 
क्योंकि तीत्र वबहते हुए जल को जहां ये वृक्ष रोकते है वहीं उनकी जड़े मिट्टी को 
क्षरित होने से वचाती हैं । 





प्रकृतिक वनस्पति एवं वन सम्पदा 


[ 84 


966 में युद्ध से पूर्व की तुलवा में 3 भुती लकड़ी काटी गईं। 974 में 
कुल 3,98,99,000 घन मीटर लक्षड़ी की कटाई की गई जो 982 में बढ़कर 
3,28,43,00 घतमीटर तथा 985 में बढ़कर 3 3465000 घनमीटर हो 
गई। जापान में उत्पादित लकड़ी का 90 प्रतिशत भाग का उपयोग औद्योगिक 
' कार्यो के लिए किया जाता है । 4985 में 3.34,65,0000 घनमीटर लकड़ी में 
3,29,44,000 घनमीटर लकड़ी (98.44 प्रतिशत)का उपयोग औद्योगिक कार्यो 
के लिए किया गया । युद्ध के बाद से लुगदी के उत्पादन में चार गुनी वृद्धि हुई । 
4974 में 88 48,000 मीट्रिक टन लुगदी का उत्पादन हुआ था जो [9835 में 
बढ़कर 9279000 मीट्रिक टव हो गई । विभिन्न प्रकार की लकड़ी का उत्पादन 
एवं उपयोग का वित्तरण तालिक 5. से प्राप्त हो जाता है । 


तालिका 5. 


लकड़ी का उत्पादन एवं उपयोग 


प्रकार 
974 





4 समस्त उत्पादन 39,899 
(000 घनमीट र। 

2, ओद्योगिक उत्पादन 38,874 
(000 घनमीट र) 

3 लुगदी (000 मीद्रिक 0,07 
ठन) 

4. कागज एवं कागज 5,645 

बो्डे (000 मीट्रिक टन) 


5 अखबारी कागज 2,233 
(0:0 मी०्टन) 
6. छपाई तथा लेखन 2,937 


(000 मी ० टन) 
7. सैनिटरी पेपर(000मी टच ) 69। 





मे 


चर्प 


4975 
35,087 


34, 54 
8,643 

१3606 

2,460 

# लक 


022 


/-स्‍९--स्‍अमाहार-पभानपक ००००. सिनिवममयानेडम० राम". भा? >प्रइकमाकफामाए "पर पथामेकममानपनन दाम... >न्‍ममनन-माजापवायाओ 


[9890 . वत्छ&5 
34,622. 33,465. 
34,054.. 32,944 
9,773 9,279 
46,499 20,469 
2,482. 2,592 
3,4]6.. 4,786 
769 4,559 


स्रोत : ईयर बुक आंफ फारेस्ट प्रोडक्टस, 4974-85, 











यदि जापान में वृक्षारोपण व्यापक पैमाने पर ले किया जाता तो जापात्त 
में पर्वेतीय क्षेत्र वृक्ष विहीच होते क्‍योंकि औद्योगिक माँग की अधिकता के 


88 ) जापान की भोगोलिक समीक्षा 


कारण बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई की जाती है। 4996 में लकड़ी में 60 
मिलियम घन मोटर की प्राकृतिक वृद्धि हुई जवक्ति 75 मिलियम घन मीटर 
लकड़ी काटी गई । जापान के सम्पूर्ण जंगली क्षेत्व का केवल 25 प्रतिशत क्षेत्र 
सुग्ग्य ( &८०८६७४०।४ ) है । इसलिए ऐसे छोत्रों से लकड़ी का उत्पादन कम 
हो पाता है। जापान में लकड़ी की वापिक वृद्धि केवल 2-7 प्र तिशत है जबकि 
यह वृद्धि नावें में 4. प्रतिशत है । पर्णपाती और उपोष्ण चोड़ी पत्ती वाले 
वृक्षों में अपेल्लाकृत वृद्धि कम पायी जाती है । इसके विपरीत कोंणधारी वृक्षों 
(साइप्रस, सीडार और पाइन में वृद्धि दर अधिक (6 प्रतिशत) पाई जाती है। 
जापान में भूमि-क्षरण तथा जल-प्र बाह को नियन्त्रित करने के लिए यह 
आवश्यक है कि वृक्षों की कटाई कम की जाय | इसलिए 4954 में एक 40 
वर्षीय योजना तैयार की गई जिसके आधार पर 42,50,000 एकड क्षेत्र को 
संरक्षित (१०७०४४००) जंगल और 0,00,000 एकड़ क्षेत्र जंगलों के विकास 
के लिए छोड़ दिया गण । ओौद्योगिक्त पूर्ति के लिए औद्योगिक उपयोग की लकड़ं 
वाले वृक्षों को नगयाया जा रहा है । ऐसे वृक्षों का प्रसार 3-9 प्रतिशत क्षेत्र पर 
है परन्तु ये मकान, कागज तथा रेयान बनाने के लिए 85 प्रतिशत लकड़ी को 
पृति करते हूँ | 

जापान के 50 प्रतिशत जंगलों पर सरकार का नियन्त्रण है। ऐसे क्षेत्रों 

में व्यावसायिक ल्तर के वृक्षों को लगाया जा रहा है। जापान में 25,00,000 
व्यक्तियों के पास निजी जंगल हैं जिनमें 60 प्रतिशत लोगों के पास मात्र 2.5 
एकड़ क्षेत्र हैं। जापान में अधिकांश कृपकों के पास जंगल इसलिए हैं क्‍योंकि 

इससे वे ईम्वन के लिए लकड़ी व पतियों से खाद तैयार करते हैं । 

जापान की वढ़ती औौद्योगिक माँग की पूर्ति तभी सम्भव हैं जब व्यापक 

स्तर पर वृक्ञारोपण हो परन्तु देश के सामने सबसे बड़ी समस्या कम क्षेत्रफल 
है। जापान का कागज उद्योग संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा के वाद 
तृतीय स्थान पर है । जापान अपनी आवश्यकता की 26 प्रतिशत लकड़ी का 
जायात करता है | युद्ध से पूर्व जापान अपनी जावश्यक॑ता का 65 प्रतिशत 
लकड़ी का आयात संबुक्त राज्य अमरीका से करता था परन्तु यहाँ से आयात 
करने में अधिक मूल्य चुकाना पड़ता था। इसीलिए जापान ने निकट के देशों - 
से लकड़ी का आयात करना प्रारम्भ किया । दक्षि ण-पूर्व एशिया से कठोर 
लकड़ी का आयात प्लाइबुड के लिए होता है। इसके अतिरिक्त फिलीपाइन्त 
तथा इण्डोनेशिया से भी लकड़ी का आयात फिया जाता है। विभिन्न वर्षो में 
जंगल उत्पादों के आयात व निर्दात का विवरण इस प्रकार है। (तालिका 5.2) 


प्राकृतिक वनस्पति एवं वन सम्पदा [.. 89 


तालिका 5.2 
जंगल उत्पादों का आयात-निर्यात (000 डालर में) 





ुः 


प्रकार वष 

4974 4975 १980 4985 
आयात 84,77,844 35,76,738 96,व3496 58,7,528 
निर्यात 6,54,330 5,.58,934 8,.78,732 7,70,543 








” स्रोत- ईयर बुक आंफ फारेस्ट प्रोडक्ट्स, 4974-85 








तालिका से स्पष्ट है कि जापान ने 985 में 5,8/,5,28,000. डालर 
मूल्य के उत्पादों का आयात किया ओर 77,05,43,000 डालर मूल्य के 
उत्पादों का निर्यात किया । इस प्रकार स्पप्ट है कि वर्तमावत समय में जापात 
विश्व का सबसे बड़ा लकडी आयातक हैँ । * 


क़्षि 


जापान में कृपि छोटे पैमाने पर की जाती है परन्तु यह कृषि सघनतम 
और अधिक उत्पादन करने वाली होती है । धान यहाँकी क्ृपि की मुख्य फसल 
है जो,जापान के कृषि योग्य भूमि के 50 प्रतिशत भाग पर उगाया जाता है। 
बहुत से कृपक गेहूं, जौ, सोयाबीन, सेब, नारंगी, मलबेरी त्तथा सब्जियों की भी 
क्ष्षि करते हैं । संयुक्त राज्य अमेरिका (औसतन 350 एकड़) और ब्रिटेन (औस- 
तन 50 एकड़) की तुलना में जापान में कृषि क्षेत्रों का आकार अत्यन्त छोटा 
(औसतन 2.7 एकड़) पाथा जांता है। केक्‍्ल कुछ ही कृषकों के वास 5 एकड़ 
या इससे अधिक के खेत वर्तमान में हैं। 69 प्रतिशत कृपकों के पास औसतन 2.5 
एकड़ या इससे भी कम क्ृपि क्षेत्र है। उन्नत बीज, रासायनिक खाद एवं उत्तम 
तकनीक के कारण जापान में चावल को पैदावार भारंत की तीन गुनी है । 
पाश्चात्य देशों की क्रपि भय की तुलना में जापान की कृषि-आय बहुत कम है । 
जापान में चावल की पैदावार प्रति एकड़ 60 बुशेल (809॥099) होती है 
जबकि ब्रिटेन में प्रति एकड़ गेहूं का उत्पादन केवल 40 बुशैल है। छृपि क्षेत्रों 
का आकार छोटा होने के कारण जापान में कृषि कामगाँरों की आय ब्रिटेन की 
तुलना मे केवल 20 प्रतिशत है। इसका मुख्य कारण अनुपजाऊ मिट्टी, लघ्‌ 
आकार के कृषि क्षेत्र और अत्यधिक रासायनिक खादों का प्रयोग है। इसलिए 
जापानी कृषि अत्यधिक खर्चीली है। सरकारी नीति के कारण यहां के क्ृपकों 
को संरक्षण मिलता है क्योकि विश्व बाजार की प्रतिस्पर्डा के कारण सरकार 
जापानी चावल को दो-तिहाई मुल्य यर वेचती है। ईससे प्रभावित होकर यहां 
के कृपक बढती जनसंख्या की पूर्ति के लिए अधिक चावल का उत्पादन करते हैं 
जिसले विदेशी मुद्रा की बचत हो । यह नीति जापान में अत्यन्त सफल है और 
सचावल के मामले में जापान आत्मनिर्भर है परन्तु अन्य खाद्य पदार्थों का 23 
प्रतिशत बाहर से आयात करना पड़ता है ! 


सन्‌ 959 में कृपि की संरचना में कुछ आधारभूत परिवर्तन हुए । इससे 
पूर्व सम्पूर्ण कृपि क्षेत्र (काता) पर बड़े पुत्र का अधिकार होता था। परल्तु 


कृपि ( 9] 


959 के पश्चात कृषि के स्थान पर वह नगर जाना अंधिक पसन्द करने लगा। 
अत: जापाने में खेतों की संख्या में तेजी से ह्वात होने लगा। 4960 में कपि 
क्षेत्रों की सख्या 6 मिलियन थी जो 966 में घटकर 5.5 मिलियन तथा 
967 में 3.7 मिलियत्त से घटकर 9.4” मिलियन हो गयी परच्तु । खंतों के 
आकार वृद्धि में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ। सन्‌ 4960 और 966 के मध्य 
खेतों का आकार 2.4 एकड़ से बढ़कर 2.7 एकड़ हो गया । 


जापान का दो तिहाई भाग पर्वतीय है जो जंगलों से ढका है । कृषि कार्य 
लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र पर ही सम्भव हो पाता है (चित्र 6.) जबकि इंग्लेण्ड 
ओर वेल्स में कपि कार्य 80 प्रतिशत क्ष त्र पर होता है। कृपि क्षेत्रों का प्रसार 


मुख्य रूप से संकरी नदी-घाटियों और छोटे-छोटे मैदानों में है। घाटियों भौर 
गैदानों में समतल क्षेत्र कम होने के वरण संसार में ग्रामीण जनसंख्या का 
घनत्व सर्वाधिक (340 व्यक्ति प्रति वर्ग क्रिमी०) है जो नीदरलैण्ड की ग्रामीण 
जनसंख्या जो विश्व में द्वितीय स्थान पर है, के घतत्व (495 व्यक्ति प्रति वर्ग 
किमी ०) से लगभग तीन ग्रुनी अधिक है । खेतों का क्षेत्रफल वहुत कम (औस- 
तन 2.7 एकड़ ) है । इसलिए यहां पर अत्यन्त सघन कृषि की जाती है । यही 
कारण है कि अपेक्षाकृत उष्ण दक्षिणी-पश्चिमी जापान में वर्ष भर में दो या दो 
से अधिक फसलें उगाई जाती हैं। सघन कृपि का महत्व वहां और बढ़ जाता 
हैं जहां. ढालों पर भी फसलें उगाई जाती है। गेहूं की फसल की पंक्तियों के 
मध्य सब्जियों की कृपि की जाती है। यही कारण है कि जापान में चारागाह 
का अभाव है। 


जापान की कपित भूमि के 44 प्रतिशत भाग पर धान की कृषि की 
जाती है जो सम्पूर्ण कपि उत्पादनों का 42 प्रतिशत है । धाच की कृषि सर्वेत्र 
होती है । कहीं-कही पर ऊ चे क्षेत्रों में भी धाव का उत्पादन होता है। यहां 
के कृपकों का मुख्य ध्येय अधिक से अधिक चावल उत्पन्न करता है। जापान में 
धीरे-धीरे व्यापारिक फसलों का महत्व बढ़ रहा है इसलिए अधिकांश कृषक 
ग्रीप्म ऋतु में धान और शीतकाल में गेहूं, जो और सब्जियों की कृषि करते 
है । इसके अतिरिक्त असिचित ऊचे क्षेत्रों में फलों और सब्जियों की कृपि की 
जाती है । अध्किंश कृपक किसी एक प्रकार की कृपि के विशेषज्ञ होते है। 
इसलिए घरेलू उपयोग के लिए मिश्चित कृषि 60 प्रतिशत तक की जाती है । 


एशियाई देशों की भाँति यहां के लोगों का मुख्य कार्य केवल कृषि ही 
नहीं है। सन्‌ 967 में कृषि और फारेस्ट्री (09979) में सम्पूर्ण श्रमणक्ति 


92 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 








8£[(0४ ॥2 % में कम 
2 + 7 5 


47- 26 १9५ 
मई । ट्‌ 


चित्र 6.4 जापान : (अ) कृषि केटअन्तर्गत भूमि 
(व) भूमि उपयोग प्रतिरूप 

]- वन प्रधान,)2- वन एवं कृषि मिश्रित 

3- उच्च भूमि कृषि क्षेत्र, 4- उच्च भूमि 

धान क्षेत्र, 5- उच्च भूमि सघन धान 

6- निम्न भूमि सघन घान ज्लेत्र । 


का केवल 9 प्रतिशत श्रम लगां था और इससे सम्पूर्ण राष्ट्र की केवल 2 
प्रतिशत आय हुई । यह श्रमशक्ति 880 में 82 प्रतिशत थी । सन्‌ 4958 में 
सम्पूर्ण कृपि कार्यो में लगी जनसंख्या 74 मिलियन यी परन्तु मशोीनीकरण के 
कारण यह जनसंख्या घटकर 9.7 मिलियन हो गई। इस प्रकार शेष 4.3 
मिलियन जनसंख्या वेरोजगार होने के कारण अन्य कार्यो की ओर उन्मुख हो 
गई । सन्‌ 968 में 60 लाख 50 हजार व्यक्ति कृषि कार्य छोड़कर नगरों की 
ओर प्रस्थान कर गये । कृषि कार्यो मे घटती जनसंख्या के वावजूद कृषि उत्पा- 


कषि : [93 


०] 


दनों में हाट होने के स्थान पर वृद्धि हुई। औौद्योगिक भू-दृश्यों को विकसित 
करने में 3 सिलियत एकड़ भूसि की कमी हो गई । 


वर्तमान समय में कृषक परिवार कृषि पर कम क्ाश्चित रहते हैं| द्वितीय 
विश्वयुद्ध से पूर्व धात वी निरवहिसूुलक कृषि(9008789760 86770५।09७)और 
दालों, सब्जियों और फलों पर ही कृषक परिवार आश्रित रहता था। परच्तु 
वर्तमान समय में 50 प्रतिशत से अधिक आय परिवार के कुछ सदर्स्यों द्वारा 
बाहर के कार्यो से होती है। जापान में 68 प्रतिशत खेतों का क्षेत्रफल 2.5 
एकड़ से कम है जो परिवार के भरण-पोषण के जिए अपर्याप्त है। यहां की 
स्त्रियां सप्ताहान्त में पुरूषों के साथ कार्य करके परिवार के लिए अधिक मात्रा 
में घानऔर सब्जियां उग्राती है। शेष दिलों में पुरूप और बच्चे स्थानीय 
नगरों के कारखानों और दुकानों में काम करते हैं। यह अंशकालिक कार्य जिसे 
४४४९६ ॥॥0. ७ा77॥  0॥4 शिव कहते है, यह विशेषकर उन स्थानों 
पर प्रचलित है जहां कृषि क्षेत्र अत्यन्त छोठे होते हैं अथवा जाप न सागरीय तट 
के उन क्षत्रों में जहां शीतकान में कोई कार्य नहीं होता है। सन 966 में 79 
प्रतिशत कृषि परिवारों की घर की 52 प्रतिशत आय कृषि के अतिरिक्त अन्य 
स्रोतों से होती थी | केवल 33 प्रतिशत कृषि परिवारों की अधिकांश आय क॒षि 
से होती थी | जापान में बहुत से खेतों का छ्लेत्रफल 0,5 एकड़ से भी छोटा हैं 
जो इ रलैण्ड के किन्‍्हीं-किन्हीं बागीचों के क्षेत्रफल से भी कम है। 


जापान में यद्यपि अधिकाँश फसलें घरेलू कार्यो के लिये उगायी जाती हैं 
फिर भी नगरीय जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिकांश मुद्रा- 
दाथिनी फसलें उग्रायी जाती हैं। जायान के कपक एशिया महाद्वीप के कृषकों 
की तुलना में अधिक सम्पन्न हैं। इसका मुख्य कारण मशीनीकरण है। झुद्रादा- 
यिन्री फसलों के उत्पादत से जापान में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति आय में 


वृद्धि हुई है। 4966 में 94 प्रतिशत कृपकों के पास दूरदर्शन, 76 प्रतिशत 
कपको के पास धुलाई मशीन और 682 प्रतिशत कृषकों के पास रेफ़रिजरेट्र थे । 


जापान में फूषि दा महत्व एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्‍त पाया 
जाता है। टोहोकू और क्यूशू के उपान्तीय मण्डल (सजाएंश' 207०) में 
इसका महत्व सर्वाधिक है क्योंकि यहां पर 20 प्रतिशत से अधिक श्रम कपि 
कार्यो मे लगा है जबकि कृषि का महत्व टोकियो से उत्तर क्यूजश के औद्योगिक 
मण्डल में कम है जहां 6 प्रतिशत से कम श्रम्त कृपि कार्यो में लगा है। 


जापान कूषि उत्पादनों में पहले आत्म-निर्मर था। तीज जनसंख्या में वृद्धि 


94 | जापान की भौगोलिक समीक्षा 


के कारण वर्तेमान समय में जापान खाद्यान्न का आयात कर रहा है। वर्तमान 
समय में जापान में कृपि कार्य केवल 44 मिलियन एकड़ (45 प्रतिशत) क्षेत्र 
पर ही हो रहा है। कृपि क्षंत्रों के घटने का मुख्य कारण यहाँ की बढ़ती हुई 
जनसंख्या है । एति वर्ष वढ़ती हुई लगभग 6 लाख जनसंख्या का भार जापानी 
कपि पर पड़ रहा है। ओऔद्योगिक भू-दृश्यों के विकास के बावजूद जापान 
कषकों का देश है। जापान में |4 मिलत्रियत व्यक्ति प्रत्यक्ष और अध्वत्यक्ष रूप 
से कपि कार्यो में लगे हैं। यदि कपक*“पँरिवार के समस्त सदस्यों को इसमें 
मम्मिलित कर लिया जाय तो यह जनसंड्या 20 प्रतिशत तक पहुच जाती है 
फिर भी जापान में कृपित क्षेत्रों में दिन प्रतेदित कमी आ रही है। यहा के 
गैंग कपि क्षेत्रों के विका, के लिए सतत प्रयत्नशील है जिसका उल्लेख घोस 
चेगलियांग ने इस प्रकार किया है-- 


॥[वर6 0१0०फएाॉ०8 7 णीाश 7र05077 शापै5, (8 9.0280858 


विवाश5 ता ००५७५. वात णाप्राएं साबशंग्व छा ॥06 0 (० 


धिएा 
होकडो में खेती का क्ष त्रफल लगभग 7 एकड प्रति परिवार है। 


जापानी कृषि की सुख्य विशेषताये([॥9 ॥ णा०३३8०श४ं४(893 ०) 29088 


(970प्राए्ा9)--र्त विश्लेषणों के आधार पर यह ज्ञात होता है. कि जापानी 
कपि मे जलवायबिक विपमताओ के क।रण विविधताये यायी जाती हैं जो निम्न 
प्रकार है--- 


- सघन कृषि, 

2- श्रम-सघन युक्त कपि, 

3- प्रचुर उत्पादन युक्त कृपि, 

4- वैज्ञानिक एवं मशीनीकृत कृषि, 


5- भूमि स्वामित्व और फार्म कन्शानिड शन युक्त कपि, 
6- प्रभावशाली क्वपि-योग्य भूमि युक्त कृषि, 

7- सीढ़ीदार कृषि, 

8- वहुफसली कृपि, 

9- मिश्चित फसली कृषि । 





- *60॥ शा (6णापव + 05007 /४9, 02४/००७, | 976, 7. 9| 


क्‌पि [ 95 


!-- सघन कृषि (!7॥909४8 स्थ्9) 


कृषि क्षेत्र की कमी के कारण जापान में सघन कृषि की जाती है। एक 
ही कृपि फार्म से व में अनेक फसलों का उत्पादन होता है। इन 
उत्पादनों में धाव, गेहूं, सब्जियां, फल इत्यादि प्रमुख हैं। इसे बहुफतली 
आर्य (थएणाा -एा०णआाए एशाश्षय) कहते हैँ । इस प्रकार की कषि मुख्य रूप 
से अपेक्षाकृत उष्ण दक्षिणी-पश्चिमी जापान में की जाती है। जिसका उल्लेख 
घोसचेंग लियंग ने इस प्रकार किया है । 


# [0 गादार6 परए6 0 €एटाए क्राणी णी कह 8॥0, शिक्राशा5$ शा 
58 ठाशिशा ००७8 9 8 इक्कार शिफा 8४ 6 इधवाा6 प6.,7 


निचले क्षत्रों में धान की सघन कपषि के साथ-साथ ऊपरी भागों में 
आलू और सब्जियों की कृषि की जाती है । दूसरी ओर ढलानों पर फलों और 
चाय वा उत्पादन होता है। जापान में इस पद्धति को अन्तर्फसलोत्पादन 
(४-70) कहते हैं। उत्तरी अमेरिका के प्रेयरी प्रदेश में बड़े-बड़े 
कृषि क्षेत्रों में केवल गेहूं की फसल उत्पन्न की जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है 
कि छोटे-छोटे कृपि क्षेत्र जापातियों को सघन कपि के लिए वाध्य करते हैं। 


2- अम-सपतन युक्त क्षि ([.90007-4778758५8 +ध0७७:७) 


अन्य देशों की तुलना में जापानी कृषि श्रम साध्य है क्योंकि यहाँ के खेतों 
का क्षेत्रफल बहुत कम है। किन्ही-किन्ही खेतों का क्षेत्रफल 
0.6 चो) एक चो -- 2.5 एकड़) से भी कम है । दक्षिणी जापान में उत्तरी 
जापान की अपेक्षा खेतों का औसत क्षेत्रफल कम है। इसलिए मशीनों द्वारा 
कार्य जहां अत्यन्त दुष्कर है साथ ही अधिक खर्चीला भी है। यही कारण है कि 
यहाँ मशीनों के प्रयोग के साथ-साय यानव श्रम भी मधिक लगता हैं। परिवार 
के सभी सदस्य मिलकर कृषि कार्य करते हैं | यहां तक कि विद्यालयों से बच्चे 
लोटकर कृषि कार्यों में अपना हाथ वंटाते है । 
3 प्रचुर उत्पादन युक्त क्षि (व89॥ श8४तााइ-(:09 4807६ए॥४) 

सघन कृषि के करण कृपि क्षेत्रों की मिट्टी में उपजाऊ तत्वों का हास 
हो जाता है। अतः मिट॒टी को अधिक उत्पादन युक्त बनाने के लिए जापानी हरी 


खाद, कम्पोस्ट खाद, मछली की खाद, फसलों का अवशेप आदि विशेष रूप से 
प्रयोग में लाते हैं । साथ ही रासायनिक खादों का अधिकाधिक प्रयोग किया 





#. (उ07 (एथाए [.6०7९, ० था, 9. 9 


96 |] : जापान की भौगोलिक समीक्षा 


जाता है । यह कथि कार्प कृषि विशेषज्ञों की देख-रेख में होता है। अतः जापान 
में प्रति चो पँदावार विश्व मे सर्वाधिक है। जापान में चावल का उत्पादन वर्मा 
का दुगुना, भारत का तीन गुला और कम्बोडिया का चार गुना अधिक होता है। 


4- वेज्ञानिक एवं मशीनीकृत कृषि (50क्ला0०. क्राप॑ ४०शआं४९० 
#570एॉ५8) 


जापान एशिया का विकसित देश है जिसने कपषि कार्यों में आधुनि- 
कतम मशीनों का सफल प्रयोग किया है। पौधों की कलम (॥97/-97०80॥79 ) 
ओर वृक्षारोपण से जलवायु का महत्वपूर्ण प्रभाव फसलों पर स्पष्ट परिलक्षित 
होता है । कपि करने की अनेक नई-नई विधियों का आविष्कार किया गया है ! 
अब जूलाई (ट्रेक्टरों) से लेकर फमल की कटाई (हार्वेस्टर) तक सभी कार्य 
मशीनों द्वारा सम्पादित होते है । छोटे-छोटे खेतों में उपयोग आने वाली छोटी 
मशीनों का अविष्कार किया गया है। फसलों पर क्रीटनाशक दवाओं का प्रयोग 
उन्‍नतिशील मशीनों द्वारा होता है । जापान कृषि यन्त्रों और कीटनाशक दवा 
का विश्व में बहुत वड़ा निर्यातक देश है। मलेशिया में जापान के बने हुए ट्रैक्टर 
हल (क्रोवुटा-](00५9) और हारवेस्टर (इसेकी 586) सर्वाधिक लोकप्रिय हैं । 


5- श्रुमि स्वामित्व और संगठनात्मक क्षेत्र युक्त कृषि ([भाव 0जाश- 
579 शाप लि 52078077उत्तारत 88707 णा०५) 

जापान की अधिकांश भूमि पर्वतीय एवं पठारी है । ऊबड़-खाबड़ भूमि पर 

बने खेतों का क्षीत्रफन वहन कम है। साय ही विभिन्‍न पीठ़ियों से खझोतों का 

जाकार और भी छोटा होता गया है ' बहुत से फाम पहले जमींदारों के अधीन 

थे जिसे जमीदारों ने किसानो को पटटे पर दे दिया। हितीय विश्व युद्ध के 

पश्चात इस प्रकार की कृषि (ल्ाशा शिय॥॥8/ को प्रोत्साहन नहीं मिल सका 

क्योंकि सरकार की ओर से भूमि बविग्रहण के लिए किसानों को सहायता दी 

गई जिसके परिणामस्वरूप छोतों के आकार में वद्धि हुई । अतः आकार वद्धि के 

' कारण मशीनों के अधिकाधिक प्रयोग से कृषि उत्पादन मे तीज गति से वृद्धि हुई। 


6- प्रभावशाली कृषिय्योग्य भूमि युक्त कृषि(0०7रशंगरशा०७ एा ४:0७ 
+8॥7770) 


जापान में तीन्न गति से वढ़ती हुई जनसंख्या का भार दिनोदिन कृषि 
योग्य भूमि पर बढ़ता गया अतः खाद्यान्न की कमी होने लगी। फलतः ऊबड़- 
खाबड़ क्षत्रों को समतल करके फसलोत्पादन हेतु कृषि योग्य बनाया गया । 


कृषि [ 97 


चावल के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया गया । वर्तमान समय में 50 प्रतिशत 
से अधिक भूमि पर ॒ धान का उत्पादन हो रहा है (चित्र 6.3)। यही कारण 
है कि जापान में चारागाह का क्ष त्रफल बहुत कम है । यह सम्पूर्ण धरातलीय 
क्षेत्र के 4 प्रतिशत से भी कम क्षेत्र पर फैला है। अतः जापान में दुग्ध उद्योग 
अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण है जिसके परिणामस्वरूप इस देश में मास की अपेक्षा 
मछली का महत्व अधिक है। 


हान्शू भोर दक्षिणी जापान में उपयुक्त मोसम के कारण फलों की अच्छी 
कृषि होती है अत: मैन्डारिन (#०70त०77) तारंगियों के निर्यात में प्रयति 
हुई है । 
7- सीहोदार कृषि ([॥740७ 607०प्रा०७:७) 


सीढ़ीदार कृषि जापाती कृषि की प्रमुख विशेषता है। दक्षिणी-पश्चिमी 
जापान में इस प्रकार की कृषि की बाहुल्यता है। इस प्रकार की कृषि को दो 
भागों में विभाजित किया जा सकता है : प्रथम-निचले भागों की सिचित कृषि 
जिसमें धान का उत्पादन होता है और द्वितीय-असिचित ऊपरी भागों की कृषि 
जिसमें फसलों के साथ-साथ फलों एवं सब्जियों की कृषि होती है। इस प्रकार 
की कृषि श्रमसाध्य है क्योंकि कहीं-कहीं पर खोतों का ढाल 40" से 2 
मिलता है। असित्तित क्षेत्रों में वे फसलें उगाई जाती हैं जिन्हें अपेक्षाकृत कम 
नमी की आवश्यकता होती है । 
68-- बहु-फसली कृषि ((७४-०००००० ७४870एॉ६०:७) 

यहां के खोतों का आकार छोटा होने के साथ-साथ कृषकों के पास कृषि 
योग्य भूमि की कमी है। यहां 2.5 एकड़ से भी कम क्षेत्र वाले खेत पाये जाते है। 
अतः अन्य देशों की भांति वर्ष में केवल एक ही फल नहीं उगाई जाती है 
अपितु अधिक उत्पादन के लिए एक फसल के साथ-साथ कई अन्य फसलें उगाई 
जाती है । ढ़ालों पर सब्जियों की खोती तथा आलू के साथ-साथ गेहू की फसल भी 
८्ठ्गाई जाती है । ऊचे सीढ़ीदार खछोतों में फलों की सफल कृषि की जातो है। 
सन_4960 से जापान में 6 मिलियन हेक्टेयर पर कृषि की गई परन्तु फसलों 
का उत्पादन 8 मिलियन हेक्टेयर पर हुआ । खोतों में ऐसी फसलें बोई जाती हैं 
जिनको तैयार होने का समय कम होता है ताकि वहां साथ में बोई गई दूसरी 
फसलों की कृषि सुगमता पूर्वक की जा सके । इस अकार 960 में कृषि योग्य 
भूमि का 433 प्रतिशत उपयोग किया गया जबकि 4955 में यह अनुपात 59 
प्रतिशत था। 


98 || जापान की भौगोलिक समीक्षा 


उत्तरी पूर्वी जापान विशेषकर होकडो में इस अनुपात की मात्रा 40 से 
भी कम है क्योंकि होकडो का अधिकांश क्षेत्र शीत ऋतु में बर्फ से ढका रहता है। 
यहां पर ग्रीष्म ऋतु में ही कृपि कार्य सम्भव है | अतः स्पष्ट है कि जापान में 
बहु-फसली कृषि तापक्रम की मात्रा पर निर्भर है। इसके अतिरिक्त पहाड़ी एवं 
पृठारी ऊबड़-खानड़ क्षेत्रों में भी बहुफसली कृषि का अनुपात कम पाया जाता है। 


9. मिश्चित फसली क़षि' (४४७० (7०0080 8987/:0078) 


जापान में बहुफसली कृषि होनें के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति अधिक 
क्षीण हो जावी है जिसकी पूति के लिए अनेक प्रकार की खादों का प्रयोग होने 
के साथ-साथ फसल चक्र (0009 709०) पद्धति को अपनाया जाता है। 
इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति सुरक्षित रहने के साथ-साथ मिट्टी का अपरदन 
भी नही होता है! 


0. जापानी क्षषि के प्रकार (7॥०७५ ए॑ 307287696  #पध70ए७४०) 


देश की द्ीपीय स्थिति, उच्चावच, प्राकृतिक दशा, जलवायु मिट्टी भादि 
की भिन्‍नता के कारण जापान में सवंत्र एक जैसी कृषि नही होती है! पर्वतीय 
ढाल, तटीय संकरे मैदान तथा मध्यवर्ती मैदानों में भिन्न-भिन्न प्रकार से कृषि की 
जाती है | जापानी कृषि पर तापक्रम, वर्षा एवं उच्चावच का गहरी प्रभाव 
पड़ता है । इस आधार पर जापानी कृपि के विभिन्न प्रकांरों को इस प्रकार व्यक्त 
किया जा सकता है । 


(4) तर कृषि ( ४/४ #०॥४४7१५):---इस प्रकार की कृषि जलोढ़ मिट्टी 
वाले उन क्षेत्रों में की जाती है जहां की वाधिक वर्षा 200 सेमी. से अधिक होती 
है | क्यूश में एरिया की खाड़ी वा तटीय क्षेत्र, तथा दक्षिणी पूर्वी तटीय संकरे 
मेदानी क्षेत्, दक्षिणी शिकोकू में संकरे तटीय मैदान, किचकी प्रायद्वीप में सेतनू 
मैदान, नोवी मैदान, टोकाई प्रदेश में तटवर्ती मंदान, दक्षिणी कान्‍्टों मैदान, 
तथा हानन्‍्शू के तोयामा खाड़ी और वकसा खाड़ी के निकटवतीं मैदानों में इस 
प्रकार फो कृषि की जाती है ! हु 


लॉ 


2. आईं कृषि (#एाएंत #क्षत॥9) :--यह कृषि कांप मिट॒टी के उन 
क्षेत्रों में की जाती है जहाँ वर्षा 400 से 200 सेमी० के मध्य होती है । इस 
प्रकार की कृषि होकैडो के पश्चिमी एवं पूर्वी तटों, हान्शू के पूर्वी एवं पश्चिमी 
तटों, आन्तरिक सागर के तटीय भागों, चुगोक्‌ के तटीय भाग और उत्तरी क्यूश्ृ 
के तटीय भागों में की जाती है । 


4305 


कपि 99 ] 


3, शुष्क कृषि (07५४ ४47४॥9):--इस-प्रकार कीं कृषि उन क्षेत्रों में 
की जाती है जहां वर्षा की कमी के कारण शभिंचाई द्वारा नमी की पूत्तिकी 
जाती है। 75 सेमी० से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में सिंचाई द्वारा फसलें तैयार की 
जाती हैं| इसे उच्च भूमि की कृषि (0०076 पवार) भी कहते हैं। तर 


कृषि और भांद्र कृषि के निकटवर्ती क्षेत्रों में इस प्रकार की कृषि की जाती है । 


4. सीढ़ीदार पहाड़ी कृषि (708 >वणाएह् ):--पहांड़ी को 
अपरदन से बचाने के लिए सीढ़ीदार खेत बनाये जाते हैं | जांपान के सर्वाधिक 
संकरे सीढ़ीदार खेत की चौड़ाई मात्र एक फुट है। 


5, चल कृषि (8909 /6ए८ं०पॉ७४७) इस प्रकार की कृषि वन क्षैत्रों 
में की जाती है | जंगलों को साफ कर क्षेत्र प्राप्त कर लिया जाता है और कृपि 
करने के बाद जब उसकी उपजाऊ शक्ति क्षीण हों जाती है तो उसे छोड़कर 
अन्यत्र कृषि की जाती है। 


जापान सें कृषि का विकास 


जापान में कृषि योग्य भूमि (5 प्रतिशत) की अत्यन्त कमी हैं। चावल 
ही जापान का प्रमुख खाद्यान्न है । इसलिए जापान सरकार ने 980 के दशक में 
चाषि की प्रगति के लिए कुछ अ।वश्यक मार्गदर्शन तैयार किया जिससे देश खाद्यान्न 
के मामले मे जात्मनिर्भर हो सके । जापानी कृषि पर भौतिक, आथिक और 
सास्कृतिक कारकों का अक्षुण्य प्रभाव पड़ता है। वर्तमान नीति के अन्तर्गत अधिक 
से अधिक कपि योग्य भूमि को क्ृषित बनना है जिससे सेतो का आकार बड़ा हो 
सके। जापानी कृषि में कामगार जनसंख्या की 50 प्रतिशत्त जनसंख्या लगी हुई है। 
प्रत्तु सर्वाधिक आय अंशकालिक कार्यो (?४7॥ धंता० 3०0७) से होती है । 
बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण नगरीय भुदृश्यों का प्रसार ग्रामीण भृदुश्यों पर 
होता जा रहा है। इसलिए अतिरिक्त भृदृश्यों के विकास के सतत प्रयास जारी 
हैं। 

जापान की निम्नवर्ती भूमि पर ही गहन कृषि की जाती है । इस भूमि पर 
बाढ़ का जल फैल जाने से जलोढ़ मिट्टी की नई परत बिछ जाती है | इसलिए 
यह मिटटी अधिक उपजाऊ हो जाती है परन्तु ऊचे क्षेत्रों की मिट्॒टी ज्वाला« 
मुखी की राख भौर लावे से बनी है। वह अपेक्षाकृत निम्त कोटि की और अनु- 
पजाऊ है ! ऐसी मिद्विदयों में जीवांश की मात्नञा अम्लीय है साथ ही यह 
(&००१०) मिट्टी है । बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण पोषण के लिए उच्च भूमि 
की कपि अनिवार्य हो गई है जो भधिक श्रम साध्य हैं । 


400 ॥|' जापान की भौगोलिक समीक्षा 


- प्रारम्भिक काल से ही धान जापान की मुख्य फसल रही हैं । जापान की 
कृषि पर ताय व वर्षा का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। मध्य बसन्‍्त ऋतु (975) 
की चक्रवातीय वर्षा के द्वारा कृपि का कार्य सुगम हो जात है! परन्तु शीतकाल में 
शुप्क क्षेत्रों से कृषि कार्य कठित होता है। सितम्बर माह में आने वाले टाइफूनों 
से धान की फसल की पर्याप्त हानि हीती है । बाढ़ की विभीषिका से फसलें 
डूब जाती है। इस प्रकार असमतल एवं अनुपजाऊ भूमि, उपजाऊ मिट्टी की 
पतली पर्त, मौसम एवं जलवायु की अतियमितता, श्रमसाध्य कृषि कारये 
खेतो का छोटा आक्रार तथा उत्पादन लागत की अधिकता आइि जापानी कृषि 
की मुख्य समस्याय हैं । 


जापान के आथिक जीवन में कृषि का महत्व 


यद्यपि इस देश की 5 प्रतिशत भूमि ही ऐसी है जिस पर कृषि कार्ये 
किया जा सकता है| कृषि के महत्व को इस प्रकार समझा जाता हैं कि जापान 
में आयातित खाद्यान्न उत्पादित खाद्यान्न से सस्ता पड़ता है, फिर भी विदेशी 
मुद्रा की बचत के लिए जापान सरकार कुंषि की प्रगती के लिए प्रयत्नशील हैं । 
जापानी कृषि के विकेस्त विश्लेषण को इस प्रकार रेखांकित किया जा सकता है- 


एदो काल (800 ७700) 

तोकगावा (एदो) काल के प्रारम्भिक चरण में कूपि मे उल्सेखनीय प्रगति 
हुई । सन्‌ 600 से 7720 ई० तक का यह काल कृषकों के लिए अनुकूल रहा 
इस काल में देश की आथिक स्थिति ठीक नही थी फिर भी कृषि में आई प्रगति ने 
आश्थिक तंगी की दूर करके सम्पन्नता प्रदाव की | प्राचीन जापान के अधिकांश 
जलोढ मिट्टी के भेंदानों पर धान की खेती की जाने लगी । खाड़ियों के शीर्ष 
भागों, तालाबो ओर झीलों की उचली भूमि को सुधार (१७०४॥४४०ा) करके 
कृषि योग्य क्षेत्र बनाया गया । टोहोकू में तर कृषि (ए७॥ ज्शायं79) को 
अन्तर्गत विस्तृत क्षेत्र की उपलब्धि हुई। इशिगों (वियाता) सैदान में धान की 
महत्वपूर्ण कृषि की जाने लगी । इस प्रकार चावल संस्कृति (०० ०पाधपा0)क्ो 
जापान की आर्थिक समृद्धि में महत्वपृर्ण योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। 


सन 


तोकूगावा काल के उत्तरार्ध में महत्वपूर्ण प्रगति विक्रय के स्थान पर 
चावल की विनिमय पद्धति (8087 9/७शा) के कारण हुआ। भूस्वामियों 
भोर पू'जीपतियों के स्तर का सूचक चावल का अधिक उत्पादन था । इसलिए 
इस स्तर को वनाये रखने के लिए कृषि में नई तकनीक, शोघ, उर्वरक और 
उन्‍नतिशील बीजों का प्रयोग किया जाने लगा। साथ ही अतिरिक्त भूमि की प्राप्ति 


्् 


कृषि [ 40| 


के लिए प्रयास किये जाते रहे । सरकार की ओर से विशेषज्ञ उपलब्ध कराये 
गये । पु'जीपतियों ने कूपि के विकास के लिए आवश्यक पूजी प्रदान किया । 
सस्ते दर पर प्रचुर श्रमिकों की उपलब्धि भी कृषि के विकास में महत्वपूर्ण 
भूमिका निभायी । जलोढ़ पंखों और डेल्टाई क्षेत्रों को सुधारने एवं जल अपवाह 
पर नियन्त्रण का कार्य यद्यपि सेंगोक्‌ (5७70प00)काल से ही चल रहा था परन्तु 
इस काल में यह कार्य और तीज गति से होने लगा | नगानों और यामानाणी 
प्रिफेक्चरों में ज्वालामुखी पव॑तों के किनारे 30 किसी० लम्बी नहर की खूदाई 
'की गई जिससे उच्च भूमि की सिंचाई सम्भव हो सकी। 


तालाबों भोर झीलों को कृषि योग्य बनने ( प66क्राशक्ांणा ) के लिए 
अनेक धोजनायें चलाई गई । इस काल के अन्त तक वर्तमान समय की सम्पूर्ण 
सुधारी गई भूमि के 70 प्रतिशत भाग का संशोधन कृषि हेतु किया गया। यह 
कार्य मुख्य रूप से सध्य और पश्चिमी जापान में किया गया | कत्‌ 720 के 
आस-पास आइस खाड़ी में 70 प्रतिशत, ओसाका खाड़ी में 68 प्रतिशत, 
कोजिमा खाड़ी में 50 प्रतिशत, उत्त री-पश्चिमी व्यूशू के एरिया की खाड़ी में 
40 प्रतिशत भूमि का सुधार किया गया। नदियों के बाढ़ को नियन्त्रित करने के 
लिए तटों पर बांध (धा०्शंताशा) बनाये गये। चुक्‍्यो प्रदेश के नोवी 
मैदान के दक्षिणी भाग के डेल्टा को संशोधित करके विस्तृत किया ग्रया जो 
आइस की खाड़ी के शीर्ष पर स्थित है । 75 प्रतिशत निम्नवर्ती संशोधित भाग 
( ?०१७7-४५०|७) को कृषि के योग्य तोकूगावा के प्रारम्भिक काल में बनाया 
गया । ऐसे 70 निम्नवर्ती भागों ( ?04७5 ) का संशोधन हुआ । सबसे लम्बे 
संशोधित भाग का होत्ञफल 4964 वर्ग किमी० था | इस सभी क्षोत्रोंमें सितम्बर 
माह में आने वाले टाइफूनों से वाढ़ का भय बना रहता है। वर्तमान समय में 
घीरे-धीरे इन्हें बांधों तथा पम्पों के द्वारा बाढ़ रहित बनाया जा रहा है । 


6वी शताब्दी के उत्तरांद्ध में टोहोकू में सैनिक बसाव हिंदेयोशी (।4(08- 
४०७४) कालमें हुआ । ईंस कालमें अनेक दलदली क्षेत्रों को संशौधित किया गया 


तोकगावा काल में इस क्षेत्र का विकास स्थानीय लार्ड और प्‌जीपत्तियों हारा 
प्रचर मात्रा में किया गया। ऐसे लाडडों में सेन्डाई के डेट (0898) परिवार का 


योगदान सराहनीय है । जापान सागर के तटीय भाग में भूमि संशोधन की ग्रहि 
तीत्र थी। निगाता, शोनाई और एकिता मैदानों का विकास पू'जीपतियों लाड्डों 


आदि द्वारा किया गया जिनमें यामागाता के होम्मा (#०ा॥78) परिवार का 


कार्य उल्लेखनीय है जो शोनाई मैदान के संशोधन हेतु ओसाका से श्रमिक ले 


आये जिसके परिणामस्वरूप 720 ई० तक जापान सागर तट की भूमि का 


03 ॥ जापान की भौगोलिक समीक्षा 


सुधार हुआ | उक्त र में हान्‍न्श और होकेडो के मध्य सुगारू जलडमरू मध्य 
(ब्पप्रआप आग) के चिकट के विस्तृत भाग को कृषि योग्य बनाया गया। 


तोकूगावोन्तर काल ([.96 0](0989५/० ?०॥४०० ) 


तोकगावा काल के बाद के समयों में कृषि विकास दर पूर्व जैसी नहीं 
थी अर्थात कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुईं | सनू 4720 ई० के बाद भूमि 
सुधार, विशेषकर खाड़ी क्षेत्रों के निकट हुआ। आइस, कोजिमा और एरियाकी 
खाड़ी के शीर्ष भागो में भूमि-सुधार अधिक मात्रा में हुआ। ज्वालामुखी पर्व्॑तों 
के ढालों तथा कम ऊचाई के पठारी क्षेत्रों को धान के नये क्षेत्रों के रूप में 
विकसित किया गया जिसे शिन्डेन (8भ्रांगवंशा ८ ॥9५४ 2860५ ॥6|05) कहते 
हैं । शिन्डेंन का आकार तठः के समानान्तर आयताकार है। इस प्रकार का सुधार 
पश्चिमी कान्‍्टो के मुसाशिनों उच्च भूमि ( /ए३8७॥70 पधाव ) पर किया 
गया । तत्कालीन मीडा ( ४००४ ) लार्ड को अब तोयामा ( ॥0%978 ) के 
नाम से जाने जाते हैं, का प्रयास उच्च भूमि के संशोधन में इस दिशा में सर्वा- 
धिक रहा । सन्‌ 720 के बाद प्राकृतिक विपदाओं और बढ़ते हुए लागत मुल्य 
के कारण भूमि सुधार की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं की संख्या में कमी होती गई 
और यह क्रम उन्‍नीसवीं शताव्दी के मध्य तकरहा। 


]850 ई० के बाद कृषि का विकास 


950 ई० के बाद जाथान में आधुनिकीकरण और ओऔद्योगीकरण की 
लहर का प्रभाव जापानी कृपि पर अधिक पड़ा । नई-नई तकनीकों के प्रयोग से 
कृषि में सुधार हुआ । समान्‍्ती शासन (6५08)9॥) के अन्त के कारण आथिक 
संरचना पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा । सन्‌ 868 में भूमि स्वामित्व के ढांचे में 
परिवर्तत लाया गया जिसके परिणामस्वरूप जापान की आधिक संरचना में 
क्पकों का स्तर निम्व समझा जाने लगा । यद्यपि इसके पूर्व कृषकों का स्तर 
सामाजिक दृष्टि से समूराई वर्ग के बाद दूसरे स्थान पर था । सामनन्‍्ती काल में 
कृषकों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं होता था परन्तु 4868 के बाद अधिकांश 
लोगों का भूमि पर स्वामित्व हुआ । 


धान ही जापान की प्रमुख फसल है जिसके उत्पादन में अधिक श्रम की 
आवश्यकता होती है। अपनी परम्परानुसार जापानी अधिक अनुशासित तथा 
मिल-जुलकर कार्य करने के अभ्यस्त होते है। इसलिए धान की क्ृपि को 
पर्याप्त विकास हुआ । अधिवासों के निकट सामन्ती भ्रूमि प्रथा को समाप्त कर 
दिया गया और अनेक छोटे-छोटे क्षेत्रों पर वेयक्तिक स्वामित्व का प्रचलन हुआ । 


कृषि [ १03 


ध् 


इस प्रथा का सबसे वड़ा दोप यह है कि ऐसे क्षेत्रों को एक स्थान पर लाकर 
चकबन्दी (0050॥69०07) नहीं की जा सकी है क्योंकि अनेक छोटे-छोटे खेत 
निम्नवर्ती भागों से लेकर विभिन्‍्त ऊ चाइयों तक विखरे पड़े है। खेटों का क्षेत्रफल 
0.5 चो (लगभग 4.25 एकड़) तक हैं। यही कारण है कि सभी खेतों में मशीनों 
के प्रयाग में कठिनाई होती है । 

868 के वाद कृपि के विकास काल को दो भागों में विभाजित किया 
जा सकता है--प्रथम वह काल जो 868 और प्रमुख भौद्योगीकरण काल 
(890) के मध्य और द्वितीय 890 के बाद | प्रथम काल के अन्तर्गत्त तोक- 
गावोत्तर काल का क्रमिक विकास अर्थात इस समय अविकसित और भअगम्यं 
( ॥800659706 क्षेत्रों का धान के कृपि क्षेत्रों में परिवर्तेव हुआ । इस प्रकार 
होकडो, टोहोकू और क्यूशु में नये धान के कृषि क्षेत्रों का विक्रास हुआ । 
प्राचीन जापान में उच्च भूमि पर भी धान की कृषि की जाने लगी । भूमि सुधार 


सम्बन्धी परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया। यूरोप तथा संयुक्तराज्य 
अमेरिका से नई तकनीक तथा मशीर्े आयात की गई । क्षयातित तकनीक और 


मशीनों से उच्च भूमि को धान के उत्दादन के योग्य बनाया गया। सिंचाई के 
साधनों के विकास के कारण चावल के उत्पादन में अधिक प्रगति हुई। परन्तु चीन 
जापान युद्ध (994-9 5) के कारण कृषि की प्रगति अपेक्षाकृत मन्द पड़ गरयीः 
क्योंकि भूमि सुधार सम्बन्धी वड़ी-बड़ी प्रयोजनायें माथिक समस्याओं के कारण 
बन्द कर दी गई । 


जापान में सन्‌ 4809 के बाद भौद्योगिक उत्पादनों में तीव्रता आ गई। 


इसके परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में आशातीत सुधार हुआ क्‍यों कि कृषि 
कार्यो में नई-नई मशीनों, तकनीकों, उन्‍्वतशील बीजों, श्लोधों आदि का प्रयोग 


होने लगा । जिन क्षेत्रों की जलवायु और मिट्टी घाव उत्पादन के लिए प्रतिकूल 
समझी जाती थी, अब वहाँ भी घान की सफल उत्पादिन होने लगी। उत्तरी मध्य 
होकडो में जहां ग्रीष्म ऋतु का काल अत्यन्त अल्प होता हैं वहां भी धान की 
कृषि का प्रसार हो गया । होकैडो में नायोरों वेसिच (६७५०० 8887) 44 ९ 
]0९ उत्तरी अक्षांश पर स्थित होने पर भी सिचित धान उत्पादन के लिए 
विख्यात हैं। 20वी शताब्दी के प्रथम तीन दशकों मे मिरन्तर कृषि क्षेत्रों का 
विकास होता रहा, परन्तु 932 के पश्चात कपि-क्षेत्रों के प्रसार में कमी आई 
क्योंकि तीत्र बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण चगरों का प्रसार कृपि क्षेत्रों पर होने 
लगा । 

ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती हुई जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति कृषि 
उत्पादन करने में असमर्थ होने लगा। प्रथम विश्व य्रुद्ध के कारण जापान की 


04 ] आपान को भौगोलिक समीक्षा 


आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी अधिक बदतर 
हो गई । इसलिए, निर्धनता, वेरोजगारी आदि समस्याओं से ग्रस्त ग्रामीण जन- 
संख्या नगरों की ओर प्रस्थान (934 ई०) करने लगी | 4937 के बाद नगरों 
की ओर प्रस्थान में अधिक तीबन्ता आई जिसके परिणामस्वरूप आशिक स्थिति में 
आंशिक सुधार हुआ । इस प्रकार 4930 के दशक में भी कृषक अनेफ़ प्रकार की 
आधिक समस्याओं से ग्रस्त रहे । 


]945 के बाद कृषि का विकास 

* * द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात विशेषकर 955 के बाद कृषि की तुलना में 
ओद्योगिक उत्पादन में अधिक वृद्धि हुई । फिर भी 4945 की तुलना में कृषि में 
सुधार हुआ । इस सुधार के कारण कृषकों के स्तर में भी सुधार हुआ। पद- 
दलित कृषक समृद्धि के कारण मध्यम वर्ग में गिने जाने लगे । ठेलीवीजन, टेली- 
फोन, सिंचाई के साधन, सड़कें, परिष्कृत रत्तोईधर, गैस या बिजली के स्टीव; 
जल गर्म करने का हीटर, नये-नये वेद्युतिक सामान तथा मोटर-नाड़ियों से युक्त 
अधिवास आर्थिक समृद्धि एवं उन्नत आथिक स्तर के परिचायक हैं | सन्‌ 950 
के बाद जापान के प्रगति में और अधिक तीबन्ता आई क्योंकि यहां प्रति व्यक्ति 
आय में सनन्‍्तोषजनक तेजी आयी | ग्रामीण क्षेत्रों में वेरोजगारी के समय कृपक 
ओऔद्योगिक प्रतिष्ठानों में अंशकालिक कार्य (?8/ धग० ]००5) करके आर्थिक 


स्थिति सुधारने का प्रयास करते हैं। जापान में 30 प्रतिशत से 75 प्रतिशत 
कपक अ शका लिक कार्य करते हैं । चुगोक्‌ प्रदेश के शिमाने श्रिफेक्चर, किनकी, 


प्रदेश के क्योटो और हयोगो प्रिफेक्चर, होकूरिक्‌ प्रदेश के फूकुई, इशीकावा तथा 
तोयामा प्रिफिक्चर तथा तोशान प्रदेश के ग्रिफू प्रिफेक्चर के 75 प्रतिशत से 
अधिक कृषक अन्शकालिक काये करते हैं | होकैडी में यह प्रतिशत सबसे कम 
(35 प्रतिशत) है । 

वास्तव में जापानियों की आर्थिक दशा में सुधार युद्ध से पहले से ही हो 
रहा था। नगरों की जनसंख्या 940 के दशक के प्रारम्भ में वहुत अधिक हो 
गयी थी । परन्तु 945 में संयुक्तराज्य अमेरिका के बम प्रहार से जनसंख्या में 
गिरावट आ गई । नगरीय क्षेत्रों से लोग ग्रामीण क्षेत्रों में चछे गये | सन 946 


और 947 के मध्य नगर निवासियों के जीवन स्तर में गिरावट आने का मुख्य 
कारण ग्रामीण क्षेत्रों से खाद्य पदार्थों की आपूर्ति का अभाव था जिसका प्रमुख 


कारण उत्पादन में कमी और युद्ध की विभीषिका थी | यहां तक कि महिलायें 
ग्रामीण क्षेत्रों से ऊंची दरों पर अचाज खरीद कर ले आती थीं । जापान में 
30000 से कम जनसंख्या वाले क्षेत्रों को नगरीय क्षेत्र नही मानते हैं। तालिका 
6.] से स्पष्ट है कि ऐसे ही क्षेत्रों में प्रत्रजत के कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि 


हुई । 


कृषि [ 405 
तालिका 4.4 - 


ग्रामीण एवं नयरीय क्षेत्रों में (आकार के अनुपार 
जनसंख्या का प्रतिशत 7940-50 








वर्ष 40 लाख... आकार वर्ग (000 में) 





से 500 ]00 50 40 30 30 से योग 
अधिक 999 499. 99 49. 39 कम 
(निकल न मर किक न टन कलम रत रह लगती नकल अर कलकीली पलक जलन लक 
940 (7.2 2.7 9.5 5.2 १4,7 2.8 60.9 400 
944 6.,3 26 १].3 95.5 4.8 3.3 58.2 00 
945 5.4 2.8 7.0 7.5 27 3.5 74.0 400 
950 44.4 2.4 2.0 7.6 2.7 3.4 80.9 400 


अ्पनमम्यूका- दैडअअम्करनकरडान्पक कर. मपा पट धाम ,काइमी चीज एसावा७ कक 








युद्धोत्तर काल में भूमि सुधार 
युद्ध से पूवें तक जापानी कूपकों की आय ओर स्तर में हुए सुधार को युद्ध 
की विभीषिका ने कमी ला दी, परन्तु युद्ध के बाद जापानियों ते तीत्र गति से इस 
अप्रणीय क्षति को पूरा करने, का प्रयास किया । अथक परिश्र मं, लगन तथा 
राष्ट्रीयता की भावना एवं कूपि भूमि कानून (897०ए6७ए7० .90 4.8४/) के 
कारण 952 तक जापान पुनः एक शक्तिशाली देश के रूप में प्रसिद्ध हो गया । 
सन्‌ 4952 के कृषि भूमि कावून के द्वारा जापान में 3 हेक्टेयर ( 7 35 एकड़ ) 
से अधिक भूमि के स्वामित्व पर षावन्दी लगा दी गई। इसके अतिरिक्त कोई भी 
कृषक एक हेक्टेयर ( 2.45 एकड़ ) से अधिक भूमि किराये पर वहीं उठा सकता 
है। होकैडा में जनसंख्या की कमी तथा सत्ती भूमि के कारण यह सीमा क्रमशः 
42 और 4 हेवटेयर कर दिया गया । सत्‌ 947 और 4949 के मध्य के वर्षो 
में सम्पत्ति का पूर्ण रूपेण स्थातान्तरण हुआ परन्तु 949 के वाद इस पर रोक 
लग गई। यह स्थानान्तरण तभी सम्भव था जब समुदाय के सदस्यों द्वारा चुनी 
गई कमेटी प्रिफेक्चर के: गवर्तर को अपनी संस्तुति प्रदाव करती थी । यह कार्य 
लिखित रूप से किये जाने लगा जिससे पूर्व के दो वर्षों में आई हुईं समस्‍यायें दूर 
हो सके । 
युद्धोच्तर कालमें भूमि, सुधार कानूनों हारा अनेक समस्‍यायें उत्पन्त भी हुई। 
इसलिए वदलते परिवेश के कारण कुछ काचून तुरन्त रद्द करे दिये गये और कुछ 


06 ] जापान फी भौगोलिक समीक्षा 


धीरे-धीरे समाप्त कर दिये गये ! परन्तु कुछ कानून आज भी लागू हैं। प्रथम 
समस्या ग्रामीण क्षेत्रों मे अधिक जनसंख्या के कारण बेरोजगारी की थी | इसके 
अतिरिक्त 60 लाख जापानी एशिया के विभिन्‍न देशों से अपने देश वापस था 
गये जिससे बेरोजगारी की समस्या और अधिक विकट हो गई। परन्तु 4960 के 
बाद रोजगार के अनेक साधन जुटाये गये । 


भूमि स्वामियों के सामने द्वितीय समस्या सस्ते और अनुबन्धित मूल्य पर 
सरकार द्वारा भूमि की खरीद और उसके भुगतान की थी | यह क्रय युद्ध से पूर्वे 
की कीमतों के आधार पर हुआ, इसलिए 4947ओऔर 946 के मध्य लैण्डलाडों 
ने यह अनुभव किया कि कानून द्वारा उनकी वास्तविक क्षतिपृति नही हो सकी है 
और उन्होंने यह अनुभव किया कि उनकी सम्पत्ति जब्त कर ली गई है। इसलिए 
लैण्डलाडों ने इसका विरोध किया परन्तु 954 में सुप्रीम कीर्ट ने इस विरोध को 
अनुचित करार दे दिया और उनकी धन सम्बन्धी वापसी मांग पर कोई ध्यान 
नही दिया गया । अन्त में 960 के दशक के प्रारम्भ में सोसलिस्ट, कृम्युनिस्ट 
और अन्य सरकार विरोधी गुटों के विरोध के परिणामस्वरूप सरकार को झुकना 
पड़ा और 55 लाख डालर का भुगतान करना पड़ा | 


तृतीय समस्या लैण्ड लार्डो से सम्बन्धित है जो ऊंची दर के किराये पर 
खेतों को उठाते थे । ग्रामीण क्षेत्रों पर नगरीय विकास के कारण क्रुषि योग्य 
भूमि में संकुचन होता रहा । होकेैडो और टोहोकू में भूमि-सुधार अत्यन्त 
कृष्टसाध्य होने के कारण अपेक्षाकृत कम हुआ। भूमि सुधार के सम्बन्ध में 


यद्यपि 960 के पूर्व से ही प्रयास हो रहे थे परन्तु सर्वाधिक ध्यान 4960 के 
बाद से दिया जा रहा है । इसका प्रमुख कारण बढ़ती हुई जनसंख्या और नगरों 


का कृपि-योग्य भूमि पर प्रसार है| भूमि-सुधार के साथ-साथ नई-नई तकनीक, 
कीटनाशक दवाओं, पौधों तथा उर्वरकों के प्रयोग से कृषि उत्पादन में पर्याप्त 
वृद्धि हुई । द्वितीय विश्वयुद्ध से पर्व की स्थापित सहकारी समितियां कृषि उत्पा- 
दनों को क्रय एवं विक्रय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं | ये समितियां 
सस्ते व्याज पर ऋण एवं वित्तीय सहायता प्रदान करती है. सहकारी समितियां 
समयण-समय पर तकनीकी ज्ञान भी प्रदान करती है और नये-तये शोधों से 


अवगत कराती हैं। ऋण एवं वित्तीय सहायता, भूमि सुधार आदि की सरकारी 
नीति ने भी कृषि की प्रगति में साथ दिया है। सरकारी नीति के अन्तर्गत 


होकडो के दलदली क्षेत्रों को कृषि योग्य, बनाया गया | ओकोयामा की कोजिमा 


खाड़ी तथा एकिता के हैशिरों झील (#००४॥० [-वध००॥) में भूमि सुधार 
सम्बन्धी परियोजनायें लागू की गई। इसके अतिरिक्त जलविद्युत व बाढ़ 


नियन्त्रण के लिए भी परियोजनाये लागू की गयी । 


कपि [ 07 


इस प्रकार अनेक प्रकार की सुविधाओं के कारण जापानी कृपकों की दशा 
में सन्‍्तोपजनक सुधार हुआ | सन्‌ 4945 ई० के बाद का समय कृपि पृनर्जा- 
गरण (#धांए080/9॥ 39)95060०6) काल माना जाता है। कृषि की प्रग्रति 


के कारण पशुपालन व्यवसाय में प्रगति आई | चोपाये, सूअर थौर मुगग्रियों की 
संख्या में तीत्र गति से वृद्धि हुई । पशुओं से सम्बन्धित उत्पादों की ओर विशेष 
ध्यान दिया गया ) दुग्ध उद्योग के कारण पनीर वताने तथा सूखे दृध को डिव्वे 
में बन्द करने के कारखाने खोले गये । जापान की जलवायु, जो फलोत्पादन के 
प्रतिकूल समझी जातो थी, तयी-नयी तकनीकों के आधार पर फलोत्पादन में 
तीत्रता माई। अंगूर का उत्पादन, जी पहले यामानाशी श्रिफेक्चर के कोफू वेसिन के 


सीमित क्षेत्र तक ही स्रीमित था अब इसका उत्पादत सर्वत्र होने लगा है। 
शराब उद्योग जो युद्ध से पूर्व अस्तित्व में ही नहीं था, पृर्णहृपेण विकसित उद्योग 
वन गया और अब यहाँ उत्तम किस्म की शराब तैयार की जाती है । 


विश्व युद्ध के पश्चात चावल के उत्पादन में निरन्तर बुद्धि होती रही 
जिसके परिणामस्वरूप 960 के दशक के प्रारम्भ में ही जापान चावल के 
मामले में आत्मनिर्मर हो गया। उर्वरकों, उन्‍्तत बीजों, कीटनाशक दवाओं, 
मशीनों एवं उन्नत तकनीकों के कारण 955 के बाद से अप्रत्याशित उत्पादन 
होने लगा | यही कारण है कि 4977 में 6,.2 लाख टन चावल का अधिक 
उत्पादन हुआ जबकि युद्ध से पर्व आवश्यकता का केवल 75 प्रतिशत चावल ही 
उत्पादित होता था । जापान की कृपि में महत्वपूर्ण परिवर्तत शीतकालीन कृषि 
में हुआ । सन_4960 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका से नयी-तयी तकतीकों 
और उन्‍नतिशील बीजों फे आयात से कठोर शीत्त ऋतुमें भी कुछ महत्वपूर्ण फसलों 
का उत्पादन सम्भव हुआ । गेहूं, जी, राई और ज्वार-वाजरा की कृपि की जाने 
लगी। इन्हीं क्षेत्रों में फ्तों का भी उत्पादव किया जाने लगा है! कृपि उत्पादों 
से सम्बन्धित अनेक बड़ स्तर के उद्योग (3ातठु० 5028७ [7009909) जापान के 
अनेक भागों में स्थापित किये गये । ये उद्योग कम्प्यूटर से चलाये जाते हैं जिसमें 
अधिक कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं होती है । 


जापान केवल चावल के मामले में आत्मनिभ्र है जबकि अनेक फसलों जंसे 
गेह', जो, जई आदि का उत्पादन अपेक्षाकृत बहुत कम है। जैसे-जैसे चावल 
का उत्पादन और क॒पि क्षेत्र बढ़ रहा है वेसे-वैसे अन्य फसलों का उत्पादन 
ओर कपि क्षेत्र घट रहा है। जापान में उत्पादन लागत की तुलना में आयातित 


408 ] - जापान की भौगोलिक समीक्षा 


मूल्य कम होता है फिर भी जापान सरकार विदेशी मुद्रा की बचत के लिए 
आयात की अपेक्षा उत्पादन पर विशेष ध्यान देती है । 


मशीनीकरण से पहले घान की नर्सरी विशेष रूप से तैयार किये गये खेतों 
में हाथ से वैठाई जाती थी, परन्तु अब नर्सरी मशीनों द्वारा छिछले लकड़ी या 
प्लास्टिक के बकक्‍शों मे डाली जाती है और यह सम्पूर्ण कार्य प्राय: 42 घच्टे में 
हो जाता है। इन बक्शों मे रासायनिक खादों से युक्त मिट्टी डाली जाती है। 
पुनः उनमें जल डालकर ग्रीन हाउस (67670 [40०७४) में तब तक रख -दिया 
जाता है जब तक रोपाई के लिए इनकी लम्बाई 20 से 30 सेमी० की नहीं हो 
जाती है। तैयार नसेरी की मशीन द्वारा रोपाई की जाती है। इस मशीन को 
एक पीपे (?७॥0००॥)पर चढ़ा दिया जाता है, जिससे यह जल में डूबने न पाये । 
यह मशीन एक साथ दो लाइनों की रोपाई करती है । वर्तमान समय मे प्रायः 
प्रत्येक परिवार के पास ऐसी मशीने हो गयी है । यही कारण है कि बचे समय 
को अशकालिक कार्यो (?४-४॥9 3००) में लमकर कृषक अपनी अथ में 
वृद्धि फरते हैं । 


जापानी कृषि की समस्‍यायें (200]6॥78 ० 38098686 /घ70०7५०) 


विकसित देश होने के बावजूद भी जापानी क्रषि की कुछ आधारी समस्याये है। 
तीव्र ओऔद्योगिककरण एवं नगरीकरण के कारण क्रषि योग्य भूमि का दिन-प्रति 
दिन हात हो रहा है । इसके अतिरिक्त जलबायु, कृषि क्षेत्र (केवल 45%) 
की कमी, अनुपजाऊ मिट्टी अच्छी जापानी कृषि की प्रयति में बाधक हैं । यहां पर 
खेतों का आकार छोटा होने के कारण मशीनों से सुगमतापूर्वक कार्य नहीं हो 
सकता है। इसके अतिरिक्त क्षषि-क्ष थों पर बढ़ते नगरीय आधिपत्य के कारण 
ओर अधिक समस्या उत्पन्न होती जा रही है । 


जापान में अंशकालिक कार्य का बड़ा महत्व है क्‍योंकि कृपक श्वोली 
समयों में वेह्नार नही बठे रहते है। सन_977 में 6,48,000 फार्म परिवार 
(सम्पूर्ण का 25 प्रतिशत) ही कृषि कार्यो में लगे थे । इसलिए सबसे बड़ी समस्या 
श्रम आपूत्ति की है । यहाँ युवक पूरुष श्रमिकों का नितान्त अभाव है। इसलिए 
जापानी कृपि में बड़े स्तर की मशीनों के प्रयोग की आवश्यकता है। परन्तु यह 
तब तक सम्भव नही है जबतक खेतों का आकार बड़ा न किया जाय जो अपने 
में एक गंम्भीर समस्या है क्योंकि धरातज्लीय (समस्या सर्वेज्ञांत है। विभिन्‍न 
फंसलोंके अन्तर्गत्‌ कूपि भूमि का वटवारा निम्व तालिका से स्पष्ट है। 


क्‌षि [09 
तालिका 6.2 


विविध फसलों में संलून भूमि, 4985 














फसलें संलग्न भूमि (हजार हेक्टेयर में)  %फसलगत मूमि 
धान 2342 * | 
जो 443 »* जक, 
गेहू' 234 7.7 
जई 3 0.| 
राई १४ -- 
शकरकंद 90 2.2 
आलू 30 4.3 
दालें 88 3.0 
चाय 6] 2.0 
चारागाह 6]6 - 
जंगल 2598 ध् 


रमन». ००4०-५० 9५ ०५--->)न०-५७+ रास पा पता गा याइ २५५३ इ298५5 :69॥ पाइप भा पक ५५३. +2७488७५+थ३००५.०+*५»७५->.५०कभ 4७१० ५.७७५५++ ५६६७“ कक भा पापा मा ल्‍४०३) उन" पध:उ:-न्राकभाान समान उन भन्‍ अमान भ ३१७३३ ५ ० पान पाप कल्‍ कक भा ००५३४३०ाह न भाप एम हमार पाम मा 2 पाक" 





कामना“ भा भाभ मा भ न सी डट* भध: पद" ध्भाह साहा एम ह१५३९३७१ ५४ पापा गंवा न ता वि भह॥००५४४॥०#४० ३५ ३ दम पा पाप कु पर याह एप. 


खोत-एफ-. ए. औओ, प्रोडक्शन ईयर बुक, 985, 


जापान के कृषि प्रदेश (897707॥0:४। प७छव०१७ एज 3898४) 
जापान को कृपि प्रदेशों में विभक्त करना एक जटिल कार्य है क्योंकि 
उत्तर से दक्षिण जलवायबिक विपमताओं के काशण फसलों के उत्पादन में भी 


विपमतायें पाई जाती हैं। जापान में धान अत्यन्त लोकप्रिय होने के कारण 
दक्षिणी क्ष त्रों के साथ-साथ उत्तरी क्षत्र होकडो में भी उगाया जाता है। 


होकडो के शीतलतम क्ष त्र होने पर भी धान यहां की मुख्य फसल है। 


संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चिमी पर्वतीय क्रम और मध्यवर्ती मंदानी 
भाग की भाँति जायान में कोई विशेष भौतिक विभेंद (#॥9४80प्वा ०0 
0०७88) नहीं पाया जाता । यहां पर फमलों के उत्तादन में ही भादेशिक 
अन्तर परिलक्षित होता है। यह महत्वपूर्ण अन्तर तीन क्षेत्रों में पाया जाता है- 
प्रथम मैदान्तों एवं घाटियों की जलोढ़ मिट॒टी का सिचित क्षेत्र, द्वितीय-शुष्क 
नदी वेदिकाओं (४८5 ॥७77708५) और ऊचे भागों में जहाँ ग्रेहू, जौ, फल 
और सब्जियों की कृषि होती हैं और तृतीय वह पर्वतीय ढलान क्षेत्र जो जंगलों 
से ढका है। 


440 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा- 


जापान के प्रत्येक प्रिफेक्चर में निम्नवर्ती धान क्षेत्र, उच्च कृषि क्षेत्र 
और जंगल क्षत्र पाये जाते है । जापान को कृपि प्रदेशों में विभाजित करने के 
मुख्य तीन आधार-फस्तल प्रकार, फसल की सघनता और खेतों का आकार हैं । 
गिन्स वर्ग (७%2०79) ने धान क्षत्र, उच्च प्रदेश और जंगलों के आधार पर 
जापान को कृपि प्रदेशों मे विभक्त किया है जिसमें उन्होंने यह दर्शाने का प्रयास 
क्या है कि भूमि उपयोगों का प्रारूप किस प्रकार से आ्रादेशिक स्तर की अपेक्षा 
भौतिक स्वरूपों के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर भिन्‍न पाया जाता है । 
इन्होने जापान को छ: प्रधान कृषि प्रदेशों (चित्र 6.ब) मे विभक्त किया है- ' 


[-. निम्नवर्ती धान प्रधान कृपि क्षेत्र ([0ज्ञांगात 9940५ 00779700 
हैदांएपॉफएा३। पि6७धां०ा) 


2- उच्च प्रदेशीय धान प्रधान कृपि क्षेत्र (छररभात 98प0५ 0णा7रशा।80 
530(7700॥0॥9| 8४0७ 0॥)) 


कक उच्चतर कृषि प्रदेश ((॥[00970 89/0७०॥५७४४। +69छ07) 


4- उच्चतर भूमि प्रधान कृपि प्रदेश (मांग्ाक्षा भाव वभो। 
लिद0णॉ६ण४। +०४४०7) 


5- वन प्रदेश (#07९5( .970) 


6- वन प्रधान कृषि प्रदेश (#368 कात त0ग्राशाब्व०४ 8087॥07073| 
७७४०7 


मिन्सवर्ग का यह विभाजन बड़े प्रादेशिक स्तर पर न होकर स्थानीय 
फसलों के उत्पादन एवं वनह्पतियों पर आधारित है। इन्होंने जापान को कृषि 
प्रदेशो मे विभाजित करने के लिए केवल उच्चावच (88॥0) का ही सहारा 
लिया है| अतः यह विभाजन कृषि प्रदेशों के लिए न होकर भूमि उपयोग के 
लिए रह गया है । 


जापान को कुपि प्रदेशों भे विभक्त करने के लिए खेतों का आकार, कृषि 
की सघनता और अधिवासों की स्थापना को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। 
उदाहरणार्थ, 360 उत्तरी भक्षांश के दक्षिण गर्म जलवायु के कारण दो फसलें 
उगाई जाती हैं । ग्रीष्म ऋतु की धान की क्ृपि के पश्चात शीतकालीन गेहु , 
जौ और सब्जियों की कृषि की जाती है । यह क्षेत्र 7वीं शताब्दी में बसा। 
मुख्य औद्योगिक क्षेत्रों के निकट के अधिकांश कृषक शहरों में काम करते हैं । 


» कप [ !4] 


यहां पर दो फसलों के उत्पादन के कारण छोटे से छोटे खेतों से भी एक परिवार का 
भल्री भांति भरण-पोपण हो जाता है जबकि 37" उत्तरी बक्षांश से उत्तर में 
ग्रीष्मकालीन कृपि के पश्चात अन्य किसी भी फसल का उत्पादन 
सम्भव नही है । इसलिए एक परिवार के लिए अपेक्षाकृत बड़े खेत की आवश्य- 
कंता होती है । होकेडो में कठोर शीत ऋतु के कारण सघन कृषि का अश्चाव है । 

इन विश्लेषणों के आधार पर जापान को ओगासावरा' ने दो बड़े तथा अनेक 
मण्डली उपकृषि प्रदेशों में विभकत किया है ( चित्र 6.2 ) 


- प्राचीन जापान (00 3887) 
2- होकडो (0००८४ं००) 


॥- प्राचीस जापान :--- जलवायविक विपमताओं, फसलों की सधनता, 
खेतों के आकार, एवं उत्पादन के आधार पर इसे 3 मंडलों में विभकत किया 
गया है- 

(अ) केन्द्रीय मंडल 
(व) परिघीय मंडल- 
(स) सीमान्तीय मंडल 


(अ) केच्द्रीय घंडल(00०7७ 200७):-इसे जापान का हृदयस्थल (।4७४7 [870 ) 
क्षेत्र कहते है जो 7वीं शवाब्दी में सर्व प्रथम वबसा।| अधिक आबादी के कारण 
खेतों के आकार अत्यन्त छोटे हो यये हैं जिनका बौसत क्षेत्रफन .25 एकड़ है। 
अंत: जनसंख्या का अन्य भागोंकी अपेक्षा यहां पर अधिकतम दवाव है। इसलिए 
इस,भाग में सघन कृषि (हर/क्षाआ५७ *2०ए६प७) की जाती है। यहाँ एक 
वर्ष में दो या तीन फसलें उत्पन्त की जातो है | यहा पर घाव की कृषि 
के साथ-साथ ग्रेहु, जो जई, फल और सब्जियों की कृषि होती है | कृपि क्षेत्र 
पर अधिक दवाच होने के कारण पर्वतीय ढलानों पर सीढीदार खेत बनाये गये 
हैं। इस मंडल के कृषक रिक्त समय में शहरों में काम करने चले जाते हैं । मत: 
उनकी आय जापान-के अन्य भागों की अपेक्षा अधिक है । 


उच्चावच, विभाजित आऊार, जलवायु, कृपि सघनता आदि कारकों के 
आधार पर केन्द्रीय मंडल को 7 उपकपि प्रदेतों में विभक्त किया जा सकता है-* 


. 02852 फप्रका8 70 एाएढ शाशं०, 00, 3४६., 070. 92-8 


442 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


- सेतोयूची-कि्निकी कृपि प्रदेश. 
2- उत्तरी क्यूशू कपि प्रदेश 

3- चुक्यों कृपि प्रदेश 

4- तं'काई कृपि प्रदेश 

5- पश्चिमी कान्‍्टो कृषि प्रदेश 
6- टोसान कृपि प्रदेश 


7- होक्रिक्‌ कृपि प्रदेश 





जापान 
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(75५७ 
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5६+0059 -।६॥१८॥ र्ध्ा 2. ० 
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॥(४४७5।+ 





चित्र 6.2 जापान : कृपि प्रदेश 
4-प्रधान क्षेत्र (007 4॥98) 2-उपक्ष त्र 


क्‌षि [ 443 


3- सेतोयूची-किनकी कृषि प्रदेश (98०ए०ां-ए्त शशांप्परोध्याव)। 
र७धां0॥) क हे 


इस कृषि प्रदेश के अन्तर्गत आन्तरिक सागर का निकटवर्ती प्राचीत जापान 
का प्रधान क्षेत्र भाता है। यह कृषि प्रदेश चुगोक्‌ प्रदेश के हिरोशिमा, ओकायामा 
किनकी प्रदेश के उत्तरी वाकायामा, उत्तरी नारा, पश्चिमी मी, जोसाका,दक्षिणी 
ह्योगो, दक्षिणी क्योटो, दक्षिणी शीया तथा शिकोक्‌ प्रदेश के इहिसे, काग्रावा 
तथा उत्तरी ठोकृशिमा प्रिफेक्चर में फला है । यहाँ पर खेतों का भाकार , 
अत्यन्त छोटा (0.5 से 0,6 चो) है परन्तु सघन कृषि की जाती है। यहां के ' 
खेत छोटे-छोटे मैदानों और वेसिनों में विघरे हुए हैं। यहां शीतकाल में भी 
जलवायु सम होने के कारण 80 प्रतिशत क्षेत्र पर घाच का उत्पादन होता है। 
इस प्रदेश में फलों और सब्जियों का उत्पादव विकटवर्ती नगरों को निर्यात करते 
की दृष्टि से किया जाता है। ऊचे भागों में, जहां को ग्रीष्म शुष्क होती है कोर 
समुद्री प्रभाव नगण्य होता है, वहां भी फलों की कृषि सरलता से की जातों है । 
आन्तरिक सागर का उत्तरी तट मांस वाले पशुओं के लिए विर्पात है । 


कृषि की सघनता का बोध इस तथ्य से हो जाता है कि यहां पर एक 
इच भी भूमि वेकार नहीं पड़ी रहती है। यहाँ तक कि पर्वतीय ढालों पर 
नारंगी तथा अन्य फलों की कृषि की जा रही है। कृषि के लिए उवाजिमा 
(0५७४8॥॥४॥४) के तिकट सीढ़ीदार खेत ग्रीष्मऋतु में णकरकन्द (3५७७४ 
708(0) के उत्पादन के लिए विश्यात हैं? ये सीढ़ीदार खेत अत्यन्त श्रम- 


साध्य है क्योंकि इनकी ऊंचाई 6 फुट और कृषि योग्य भूमि की चौड़ाई केवल 
एक फुट है । शीतकाल में इस पर गेहूं की सफल कृषि की जाती है । 


काग्रावा प्रिफेक्चर में बोचोबुराक्‌ (80०00 80४८७) जो उत्तरी शिकोक 
के सानुकी (9800४) म्ोदात में स्थित है, सघनतम कृषि के लिए विख्यात है । 
यहाँ पर मशीनों के अधिक प्रयोग एवं बहु-फसली कृषि के कारण 965 में 
भूमि का 62 प्रतिशत उपयोग हुआ जो जापान में सर्वाधिक था । बोचों 000 
वर्ष पूर्व बसा । यहां के खेत जोरी पद्धति (207 8५४७४) पर बनाये गये । 
जापान का 66 प्रतिशत सिचित जल विभिन्न नदियों से आता है परन्तु बोचो में 
निकटवर्ती पहाड़ियो से सिंचाई हेतु जल शप्त होता है। यहां पर ढाल तीक्न है 
'जससे जल वर्षा ऋतु में तेजी से बहु जाता है | अत: क्ृपक पर्वतीय क्षेत्रों में 
छोटे-छोटे बांध बनाकर और धान के खेतों में जलाशय वनाकर जल को एकत्रित 


76 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


यहां की भूमि शहतूत, सोयाबीन और सब्जियों की कृषि के लिए अनुकूल है । 
उच्च भूमि पर धान का भी उत्पादन होता है। छोटे-छोटे खेतों मे सघन कृषि 
की जाती है । यहां पर पश्चिमी भाग में खेतों का औसत क्षेत्रफल 0.7 से 
0.9 चो है परन्तु पूर्वी भाग में खेतों का आकार बड़ा है जिनका क्षेत्रफल .0 
से.2 चो है । 


6. टोसान क्‌षि प्रदेश) ग08०7 &0670फएए०! १४७7०॥)-इंस क्‌धि प्रदेश के 
अन्तर्गत टोकाई प्रदेश के पूर्वी आइशी, उत्तरी शिजुओका वथा ठोसान प्रदेश 
के पूर्वी गिफू और नगानों प्रिफेक्चर आते है। यह परववेतीय क्षेत्र है जो यत्र- 
तत्र टोल, शितानो, तेनरिउ तथा किसो नदियों द्वारा कटा-फटा है। यहाँ का 
अधिकांश उच्च क्षेत्र वनस्पतियों से ढका है। कृषि थोड़े भाग पर की जाती है । 
पर्वतीय जटिलता के कारण 496 में भूमि उपयोग दर केवल 40 प्रतिशत 
से 29 प्रतिशत के मध्य थी। धान की कृपि मुख्य रूप से नदियों हारा 
निर्मित तंग मोौदानों में होती है। इसके अतिरिक्त नदी वेदिकाओं शिं५छ 
ग७78०७७) के ऊ'चे भागों एवं पर्वेतीय ढालो पर भी कूपि कार्य होता है। जो 
कृपि क्षेत्र आसान पहुंच(/००९५७४४०।७)में आते है वहां प्रति चो उत्पादन सर्वाधिक 
है। यहां से फलों एवं सब्जियों का. निर्यात टोकियो जैसे निकटवर्ती नग्ररों को 
होता है । यहां पर रेशम के कीड़े भी पाले जाते है। आलू, जौ. मोथी (806 
४/४४८)या राई (१५8४) उगायी लाती है । अतः यह कृषि प्रदेश जापान 
का 50 प्रतिशत से अधिक रेशम का उत्पादन करता है । 
अधिक ऊचे भागों में अपेक्षाकृत कम सघन कृषि की जाती है। फसलों 

में गेहू , जो, आलू, सोयाबीन, मवका (४26) प्रमुख है जो दो वर्ष के अन्त- 
राल पर बोये जाते है। तीन हजार फीट से अधिक ऊ चे भागों मे जहाँ शीत- 
काल अत्यन्त ठण्डा होता है। कुछ पठारी भागो पर सरकार चारागाहों के 
विकास का प्रयास कर रही है। यहां परखेंतों का क्षेत्रकलल 0.7 से 0.9 
चो है । 

7. होकूरिक्षू कृषि प्रदेश ( श्रातणात्य 88[०पफाबव। गि९प्ांणा )-- यह 
कपि प्रदेश होक्रिक्‌ प्रदेश के पूर्वी फ़ुकुई, इशीकावा, टोयामा और नियाता 
प्रिफेक्चर मे फैला है । इस क॒पि प्रदेश की उत्तर-दणिण लम्बाई भधिक है 
परन्तु चौड़ाई अत्यन्त कम है। यह प्रमुख धान उत्पादक कृपि प्रदेश है । यहां 
प्र उत्पादन अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा प्रति चो भशधिक है। यहां पर खेतों का 
आकार भी बड़ा है। पश्चिमी भाग में खेतों का आकार 0.7 से 0.9 चो है 
जबकि पूर्वी भाग में खेतों का आकार 4.0 से 4.2 चो हैं। सन्‌ 496 में 


क्पि [._447 
पश्चिमी एवं पूर्वी भागों (फुकुई और निगाता प्रिफेक्चर)में भूमि उपयोग दर 40 
प्रतिशत से कम थी परन्तु मध्यवर्ती भाग (इशीकावा और टोयामा ) में भूमि दर 
440 प्रतिशत से 29 प्रतिशत के मध्य थी । यहां पर मशीनीकरण अधिक हुआ 
हैं क्योंकि खेतों का आकार बड़ा है। शीतकाल में ठण्डक के बावजूद इस कृषि 
प्रदेश का 45 प्रतिशत चावल उत्तन्‍्न होता है। यहां के 50 प्रतिशत से अधिक 
कषक अन्य कार्यो से अपनी आय में वृद्धि करते हैं। अतः प्रति व्यक्ति आय में 
वृद्धि पायी जाती है । 
2. परिधीयष मण्डल (?क्][ए7शर्श 2णा०)-- 
इस मण्डल के अन्तर्गत दक्षिणी शिकोकू और काई के पर्वतीय क्षेत्र जापान 
सागर तदीय भाग और मध्य क्यूश के क्ष त्र जाते हैं। इस क्षेत्र का विकास तोकूगावा 
(70(088५४७)के प्रारस्भिक काल में हुआ । खेतों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा 
है। यहां पर केन्द्रीय मण्डल की भांति सघन कृषि नहीं होती है। साथ ही उत्पादन 
भी प्रति चो कम होता है! यहां किन्‍्हीं-किन्‍्हीं क्षेत्रों में वर्ष में केवल एक ही फससें 
का उत्पादन होता है। मक्का (#०ांट8) ज्वार (शा॥७) बौर मोची (800६ 
५४४४४) यहां की मुख्य फसलें हैं। यहां के कूषक अवकाश के दिनों में भी अन्यंत्र 
कारखानों में कार्य नहीं करते हैं | अत्त: प्रति व्यक्ति आय केर्धीत मप्डल को 
तुलना में कम है। यहां के पव॑तीय क्षेत्रों में माँस वाले पशुओं को पाला, जाता 
है । परव्॑तीय क्षेत्र होने के कारण काष्ठ उद्योग विकसित है । 


इस मण्डल को चार उपकृपि प्रदेशों में विभक्त किया जा सकता है--- 
।- मध्य क्यूशू कृषि प्रदेश 
2- सेन इन कृषि प्रदेश 
3- दक्षिणी शिकोक और काई क्ृपि प्रदेश 
4- हिंडा कृषि प्रदेश 


4- मध्य क्यूश्‌ कृषि प्रदेश (शञात-(५एशञाप #हागंएणापाव। १७2०) 

इस कृषि प्रदेश के अन्तर्गत क्यूशू प्रदेश के नागासाकी, पश्चिमी सेँगा, 
कुमामोटों, ओइंटा तथा उत्तरी-पश्चिमी मियाजाकी प्रिफेक्चर आते है। यह 
प्रिधीय मण्डल का सम्पन्न क्षेत्र है। मध्य क्यूशू की भासो की पर्वतीय ढालों 
पर विस्तृत चारागाह होने के कारण पशुओं को चराया जाता है। इस कृषि 
प्रदेश के पश्चिमी और पूर्वी भागों में भूमि उपयोग की दर 40 भश्रतिशत से 
60 प्रतिशत है जबकि केचद्धीय भाग में यह दर 60 प्रतिशत से भी अधिक 
है । नागासाकी तथा ओइटा (0॥9) प्रिफेक्चर में खेतों का आकार 0.5 से 


48 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


0.6 चो है जबकि शेष भागों में खेत वड़े आकार के हैं जिनका क्षेत्रफल 0.7 
से 0.9 चो है । 


2- सेन-इन कृषि प्रदेश (98॥ ॥ 4छ70एए७/४।| +6970॥ --यह कृषि प्रदेश 
दक्षिणी-पश्चिमी हांशू के जापान सागर तटीय भाग में उत्तर'पूर्वे से दक्षिण- 
पश्चिम संकरी पट्टी में फैला है। इसके अन्‍्तर्गत चुगोक्‌ प्रदेश के शिमाने, 
टोठोरी (0007) तथा किनकी प्रदेश के उत्तरी ह्योगो और उत्तरी क्योटो 
प्रिफक्चर आते हैं । यह कृषि प्रदेश यद्यपि दक्षिण में स्थित है परन्तु शीतकाल 
में अधिक वृष्टि होती है । यह तटीय कृषि प्रदेश शीतकाल में 70 प्रतिशत से 
80 प्रतिशत दिनों वादलों से आच्छादित रहता है । अतः शीतकालीन कृषि 
नगण्य है । यहाँ पर मांस वाले पश्ु पाले जाते हैं । इस कृषि प्रदेश के मध्यवर्ती 
भाग में भूमि उपयोग दर 40 प्रतिशत से 460 प्रतिशत है जबकि पश्चिमी 
भाग में 40 प्रतिशत से 429 प्रतिशत ओर सुद्र पूर्वी भाग में 0 प्रतिशत 
से कम है | यहां पर खेतों का आकार 0.7 से 0.9 चो है परन्तु पूर्व में उत्तरी 
_हयोगो और क्योंटो प्रिफेक्चर में खेतों का आकार अपेक्षाकृत छोटा (0.6 चो 
से कम) है । 


3- दक्षिणी शिकोकू और काई कृषि प्रदेश ($0णका 8॥#0000 
भाप (ी #प्रांए्णापा०। 6०७700)--यह कृषि प्रदेश शिकोक्‌ प्रदेश के दक्षिणी 
ईंहिमे, कोची, टोकृशिमा तथा किनकी प्रदेश के दक्षिणी वाकायामा, दक्षिणी 
नारा और दक्षिणी मी प्रिफेक्चर में फेला है। शिकोकू पर्वत श्रेणियां कृषि 
कार्य में बाधक हैं । यहाँ जंगलों को जलाकर अस्थायी कृपि भी की जाती हैं । 
यहां की फसलों में मक्का, सेम (8९875) मोथी (800८ ५श]४४) तथा ज्वार 
है | अनुपजाऊ मिट्टी होने के कारण प्रति चो उत्पादन अन्य भागों की अपेक्षा 
कम है| दक्षिणी शिकोकू में भूमि उपयोग दर 440 प्रतिशत से 460 प्रतिशत 
है परन्तु पूर्वी शिकोकू मे यह दर 460 प्रतिशत से अधिक है। पूर्वी किनर्क 
प्रदेश में भूमि उपयोग दर कम (40 प्रतिशत से 39 प्रतिशत) है | यहाँ पर 
खेतों का आकार बहुत छोटा (0.6 चो से कम) है परन्तु किनकी प्रदेश के 
दक्षिणी मी प्रिफेक्चर में खेतों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा (0.8 चो) है । 


4- हिडा कृषि प्रदेश (#१9 897०प/४प०।| प868०१)--हिडा कृषि प्रदेश 
का विस्तार होकूरिक्‌ प्रदेश के दक्षिणी फुकुई, किनकी प्रदेश के उत्तरी-पूर्वी 
शीगा, उत्तरी मी तथा टोसान प्रदेश के गिफ्‌ प्रिफेक्चर में है । यह एक पर्वतीय 


कृषि [39 


० 


क्षेत्र है जिसमें जापान आल्प्स की पव॑त श्रेणियां फैली हुई हैं । इस कृषि प्रदेश 
को ये पर्वत श्रेणियां पूर्वी एवं पश्चिमी दो भागों में विभाजित कर देती हैं । 
पूर्वी भाग में कियो नदी जापान आत्प्स से निकलकर दक्षिण की ओर बहती हैं। 
इस प्रदेश के पश्चिमी एवं पूर्वी भागों में भूमि उपयोग की दर 40 प्रतिज्रत से 
[29 प्रतिशत के मध्य है, परन्तु मध्यवर्ती भाग में यह दर 440 प्रतिशत से 
60 प्रतिशत के मध्य है| प्रदेश के मध्यवर्ती भाग में खेतों का क्षेत्रफल 0.6 
सो से कम है परन्तु पश्चिमी एवं पूर्वी भागों में खेतों का क्षे त्रफल 0.7 से 0.9 
चो है। पर्वतीय एवं वियपम क्षेत्र होने के कारण यहां कम जनसंख्या निवास 
करती है | यहाँ निर्वाहमुलक (5फ79शं5४9709) कूपि की जाती है| यहां पर 
काष्ठ उद्योग प्रगति पर है | 


(स) सीमान्‍तीय मण्डल ([#07007/ 2070) 


इस मण्डल का विकास केन्द्रीय मण्डल ((07७ 207७) के बाद तोकगावा 
के समय में हुआ । अतः यहां केन्द्रीय मण्डल की भाँति ने तो सघत कृपि ही की 
जाती है और न अधिक विक;स ही हुआ है। यह कृषि प्रदेश जनसंख्या के सघ- 
वतम जमाव वाले क्षत्रों से अलग होने के साथ-साथ पिछड़ा क्षेत्र है ) यहां प्रति 
चो उत्पादन अच्य क्षेत्रों की अपेक्षा कम होने के कारण आय अन्य भागों की 
तुलना में न्यूनतम है । यहां ताम-सात्र के परिवार ऐसे हैं. जो अशकालिक कार्य 
अन्य क्षेत्रोंमें करते है। सीमान्तीय मण्डल को 2 उप कृषि प्रदेशोंमें विभक्त किया जा 
सकता है -- 


]- दक्षिणी व्यूशू कृपि प्रदेश 
2- टोहोक्‌ कृपि प्रदेश 


[- दक्षिणी क्यूश झृषिप्रदेश (90जा]छता (५/पचमप 4छ्ञांप्णापा३। +०७४०7) 

यह कृपि प्रदेश वयूशू प्रदेश के कागाशिमा तथा दक्षिणी-पूर्वी मियाजाकी 
प्रिफेक्चर में फैला है। उपोष्ण (500-80]|908|) कड़िवन्धीय भाग में स्थित 
इस कृषि प्रदेश में सघनतम कृषि की जाती है। यहां पर भूमि उपयोग की दर 
१60 प्रतिशत से अधिक है परन्तु यहाँ के खेत अत्यन्त छोटे हैं। मियाजाकी में 
खेतों का औसत क्षेत्रफल 0.8 चो है परन्तु पश्चिमी भाग अर्थात कागाशिमा में 
खेतों का क्ष त्रफल 0,6 चो से भी कम है । यहां की कृषि पिछड़ी हुईं है । अधि- 
काँश कठोर प्रेनाइड शैल पर उपजाऊ मिट्टी की पतली परत हैं जिस पर ज्वा- 
लामुखी राख का जमाव हुआ है । अतः ग्रह पर अन्य भागों की तुलता में प्रति 


420 ] जापास की भोगोलिक समीक्षा 


चो पैदावार बहुत कम है | यहां पर क्रियाशील जनसंख्या के 45 प्रतिशत भाग 
कृषक हैं जो जापान में सर्वाधिक है | दक्षिणी क्यूज्रू की ग्रमें जलवायु नारंगी, 
नीबू, गन्ना, सब्जी, फलों एवं पुष्षों के लिए अत्यन्त अनुकूल है । परन्तु इनके 
उत्पादन में लागत अधिक आती है। अतः यहां के कृषकों की आय जापान के 
अन्य भागों की तुलना में निम्नतम है। अधिकांश कृषक उच्च भूमि पर दाल 
ओर चुकन्दर की कृषि करते है। धीरे-धीरे फलों एवं सब्जियो की कृषि तथा 
पशुचारण का विकास हो रहा है। कुछ लोग स्थानीय चावल की मिलों, चाय 
के कारखानों में अंशकालिक काय करते हैं । 


नगरीय क्षेत्रों से अधिक दूरी होने के कारण यहाँ पर कृषि की नई तक- 
नीकों का विकास नहीं हुआ है । पूजी ओर उपजाऊ मिट्टी के अभाव के कारण 
आय और प्रगति में व्यवधान आया है । यहाँ पर चावल का उत्पादन प्रति चो 
राष्ट्रीय उत्पादन से कम है । उच्च भागों की कृषि अत्यन्त दयनीय हैँ। ग्रीष्म- 
काल में चुकन्दर, धान, मूंगफली और सब्जियों की कृषि होती है परच्तु 
पतशझ्ड़ ऋतु में नारंगी तथा शीतऋतु में जो, जई और चारे का उत्पादन 


होता है । 


0 टोहोक कृषि प्रदेश (णाएप #छगां०्पाणव। टि७धवांणा)--इस कृपि 
प्रदेश के अन्तर्गत टोहोक्‌ प्रदेश के आभोमोरी (8&077ण7), एकिता, इवाटे, 
यामागाता, मियागी, फुकृशिमा तथा कान्टो प्रात के पूर्वी एवं उत्तरी इवारागी 
तथा पूर्वी चिबा श्रिफक्चर आते हैं । यह अपेक्षाकृत ठण्डा प्रदेश है | यहां की 
शीतऋतु लम्बी होती है तथा भ्रपेक्षाकत॒ कम सघन कृषि की जाती है। यहां 
पर खेतों का क्षेत्रफल जौसतन .] चो पाया जाता है जो दक्षिणी क्यूशू की 
तुलना में अधिक है । शीत प्रदेश होने के कारण वर्ष में केवल एक ही फसल 
उत्पन्त की जाती है। इसलिए यहाँ भूमि उपयोग की दर कम है। पश्चिमी भाग 
(भूमिदर 0 प्रतिशत से कम) की तुलना में पूर्वी भाग में भूमि दर अधिक 
(20 प्रतिशत) पायी जाती है | यहां जापान का सबसे निर्धन कृषि प्रदेश है। 
उच्च भागों का विकास कम हुआ है। यहां का ग्रीष्मकाल भी अत्यन्त ठण्डा 
होता है जो चावल के लिए अनुकूल नहीं है । इसलिये यहां के निधन कृषक 
निर्वाह मृलक कृषि करते हैं | ज्वार, मोथी, जई, आलू का उत्पादन अर्सिचित 
क्षेत्रों पर होता है। विश्वयुद्धसे पूर्व स्थानान्तरणशील कृपि(8#ध 4970प॥- 
७:6७) का प्रचलन था परन्तु वर्तमान काल में दुग्ध उद्योग का विकास तेजी से हो 
रहा है | 


कृषि [ ॥2। 


| 


भूमि उपयोग की दरों के आधार पर इस कृषि प्रदेश को तीन उप प्रदेशों 
में विभक्त किया जा सकता है जो निम्न है-- 


() मरुत्सु उप कृषि प्रदेश 
0) देवा उप कृषि प्रदेश 
(7) पूर्ण कान्‍टो उप कृषि प्रदेश 


देवा उप कृषि प्रदेश जापान सागर तटीय भाग और अच्य दो कृषि अदेश 
पूर्वी भाग में स्थित हैं। देवा में भूमि उपयोग की दर 40 प्रतिशव से भी 
कम है। मुत्सू के उत्तरी भाग की तुलना में दक्षिणी भाग में भूमि उपयोग की 
दर अधिक (0 प्रतिशत से 29 प्रतिशत) है। पूर्वी कास्टों में भूमि उपयोग 
की औसत दर १20 प्रतिशत है। मुत्सू के क्रिठाकामी पठार पर खेतों का 
औसत क्षेत्रफल 2.5 से 3 चो है परन्तु प्रति चो उत्पादन कम होते के कारण 
यहां के कृषक अत्यन्त निर्धन हैं। इस पठारकों जापान कातिब्बत(708) कहते हैं 
क्योंकि आवागमन के साधनों का अपेक्षाकृत कम विकास होने के कारण यह 


निम्नवर्ती क्षेत्रों की तुलना में सुगरस्य नही हैं। यहां पर कृपि कार्य अत्यन्त 
कठिन है। कृषि में अधिकांशतया मानव श्रम का उपयोग होता है क्योंकि तीब- 
गामी नदियों द्वारा ग्रेनाइट पर निक्षेंपित ज्वालामुखी राख अपरदित होकर 
वह जाती है। इसलिए निम्तवर्ती क्षेत्र ही धान की कृषि के लिये उपयुक्त हैं । 


क्यूरोशियों की गर्म और व्यूराइल की ठण्डी घाराओं के मिलने से धना 
कुहरा पड़ता है जो फसलों के लिये हानिकारक है। यहां पर सिंचाई के लिए 
जल की कमी रहती है । सामान्यत्तया प्रति तीसरे वर्ष कुहरा (7०9) तापमान 
को जुलाई में औसत से 207 सेग्र ० तक नीचे गिरा देता है। ऊचे भागों मे 
फसल-चक्र विधि से कृषि की जाती है । शीत ऋतु में गेहूँ और जी की क्षि 
की जाती है। सोयावीन प्रमुख मुद्रादायिनी फसल हैं, जो ग्रीष्म ऋतु की 
फसल है । 


इवाटे प्रिफेक्चर के निवासी जंगलों से अपनी आय प्राप्त करते हैं। 
इसके अतिरिक्त अन्य स्थानों पर अंशकालिक कार्य करते हैं। घरों में टोक- 
रियों के निर्माण के साथ-साथ तम्बाकू की पत्तियाँ तैयार की जाती है । इसके 
विवरीत पश्चिमी टोहोक्‌ के देवा उप प्रदेश में मशीनीकरण अधिक होता है 
और भूमि भी अपेक्षाकृत अधिक उपजाऊ है | इसलिए यहाँपर धान का 


>> +ल->>-- 
ज् ऑणजण- 


422 ] जापान की भोगोलिक समौक्षा 


उत्पादन स्थानीय खपत से अधिक होता है । यहां के कृपक पूर्णरूपेण कृषि पर 
निर्मर हैं । पूर्वी कान्‍टो उप प्रदेश नगरीय भ्रभावों से दूर है जबकि यह टोकियों 
के निकट है । इसका मुख्य कारण टोनू नदी की बाढ़ है। यहां पर निर्वाहमृल्य 
कषि होती है | दलदली क्षेत्रों में उत्पादन प्रति चो कम है । 


2-- होकडो (40!0(840) 

यह जापान का सुदूर उत्तरी कृपि प्रदेश है । यहाँ पर कृपि का विकास 
]869 ई० के बाद हुआ। उस समय यहां की आबादी मात्र 58 हजार थी जो 
दक्षिणी प्रायद्वीप के तटीय भागों में केन्द्रित थी जिनका मुख्य व्यवसाय मछली 
मारना और निर्वाहमुलक कृपि थी । सन्‌ 4869 ई० में मिजी (४०॥) सर- 
कार ने होकैडो के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया | उस समय होकीडो के भावी - 
विकास और खझूस के प्रसार को रोकने के उद्दं श्य से उत्तरी भाग में अधिवासीय 
विकास पर ध्यात दिया जिसके परिणामस्वरूप इशीकारी घाटी में सड़कों के 
किन रे-किनारे सैनिकों को बसाया गया परन्तु ये सैनिक क्ृषि कार्यो में अपेक्षित 
सफलता नहीं पाये । सन्‌ 4895 के बाद होकीडो में आन्नाजकों (हा॥979॥9) 
के लिए कालोनियाँ बनाई गयी । अतः 4890 तक पूर्वी भाग में अमेरिकोय 
. प्रारूप के अनुसार फार्म हाउस (मगर 40056) बनाये गये और प्रत्येक फार्म 
हाउस के लिए 5 5 चो (2.5 एकड़ ) प्लाट प्रदान किये गये । इस प्रकार 
होकडो का विकास चार चरणों ([॥॥88०$) मे हुआ | प्रथम-दक्षिणी भाग में 
निर्वाह मूलक कृषि और मछली मारना, द्वितीय-होकडो के पश्चिमी अद्ध भाग 
में संनिक वसाव और धाव की कृपि का विकास, तृतीय- 4940 से 4930 के 
मध्य होकडोके पूर्वी उच्च भागमें सेम तथा जई जैसी फसलों के विकासके साथ- 
साथ चारागाह का विकास और अन्त में कालोनियों का निर्माण । 


होकंडो में खेतों का औसत क्षेत्रफल प्राचीन जापान के खेतों के क्षेत्रफल 
से 6 गुना अधिक है ! परन्तु यहां पर भपेक्षाकत कम सघन 
कृषि होती है । यह जापान का सुद्दूर उत्तरी भाग है । अतः शीत ऋतु अत्यन्त 
कठोर होती है । इसलिए वर्षे में केवल एक ही फसल ली जाती है। इस प्रकार 
यहाँ पर भूमि उपयोग को दर केवल 400 प्रतिशत- है । होकडो 
में कठोर शीतल जलवायु के बावजूद भी धान अपेक्षाकृत अधिक क्षेत्र पर बोया 
जाता है (चित्र 6.3 अ) | जहां कहीं भी सिंचाई के लिये सुविधायें उपलब्ध हैं, 
चावल की कृषि को जाती हैं | सुदूर उत्तरी और पूर्वी भागों में धांन की कृषि 


कपषि 


इसलिए सम्भव. नहीं है, क्योंकि यहां की ग्रीष्म ऋतु में भी कठोर ठण्ड ह 

है । अत: धान की फसल पक नहीं पाती । ऐसे शीतल क्षेत्र जापान में 44 
प्रतिशत क्षत्र पर फंले हुए हैं, जबकि यह क्षेत्रफल होकेडो में 20 प्रतिशत पाया 
जाता है । पू्वे में जहां उच्च भूमि की कृषि अधिक मात्रा में की जाती है वह 
कृषि पश्चिमी यूरोप को भाँति है । यहां पर हल घोड़े खींचते हैं | फसलों में 
सेम, आलू, जई, चुकन्दर आदि मुख्य हैं। होकडो में जापान के सम्पूर्ण चारा- 
गाह का 90 प्रतिशत चारागाह पाया जाता है जो धोड़ों के भोजन की : 33 
प्रतिशत पूति करता है। इन चारागाहों का उपयोग गायों के लिए भी किया 
जाता हैं जो जापान के समस्त दुग्ध उत्पादन का 26 प्रतिशत उत्पादन करती 
है । इसके अतिरिक्त सुअर और भेड़ भी पाली जाती हैं । 


होकेडो की मिट्टी अनुपषजाऊ है । अतः पैदावार प्रति वो कम है। पश्चिम 
को छोड़कर अन्य क्षत्रों में जलोढ़ मिद्दी का अभाव है। पर्वतीय क्रम के उत्तरमें 
चीका प्रधाव मिद्ठी है परन्तु दक्षिणी भाग में अनुपजाऊ ज्वालासुखी की राख 
प्रधान मिट्टी है जिसमें ह्यूमस की कमी है। इशीकारी,टेशियों (79890)टोकाची 
और कुशिरो की नदी घाटियों में पीट मिट्टी का का वाहुल्य है। होकंडो की 
अधिकांश बाय कृषि पर आधारित है । केवल 46 प्रतिशत आय फृषि अतिरिक्त 
अन्य कार्यों से प्राप्त होती है। मछली मारना, फारेस्ट्री तथा लौह इस्पात उद्योग 
अशकालिक कार्य महत्वपूर्ण है। कृषि की सघतता के आधार पर होकीडो को 
तीन उप क्रषि प्रदेशों में विभक्त किया जा सकता है-- 


(- पश्चिमी होकडो उप कृषि प्रदेश । 
2- मध्य होकडो उप कृषि प्रदेश ! 
3- पर्वी होकेडो उप कृषि प्रदेश । 


[- पश्चिमी होकंडो उप कृषि प्रदेश (४४४४७० |नर्णतंद्यांत० 5प9०-#वाए- 

०परॉए/8 रि6कांणा)--इस भाग का विकास अन्य भागों की अपेक्षा पहले 
हुआ । ओशिमा प्रायद्वीप में स्वश्थ्म अधिवासीय विकास प्रारम्भ हुआ, क्योंकि 
अन्य भागों की अपेक्षा यहां की जलवायु अत्यधिक कष्टप्रद नहीं है। यहां पर 
निर्वाहमूलक धान की कृपि की जाती है। परन्तु उत्तरी भाग में ठण्डक के 
कारण घान की कषि सम्भव नहीं है। अतः आलू तथा जई की कृषि पूर्वी 
यूरोपीय प्रारूप पर की जाती है। यहां पर डोकडों के अन्य भागों की बपेक्षा 


]24 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


खेतों का आकार छोटा है । इस प्रदेश में धान की कृषि 893 में प्रारम्भ 
हुई भौर 930 तक सर्वत्र फैल गई । 


धान मुख्य रूप से कामीकावा बेसिन में उत्पन्न होता है. क्योकि समुद्री 
प्रभाव के कारण यहां पर ग्रीष्मकालीन तापमान ऊचा (अगस्त में औसतन 24" 
से० ग्र ०) पाया जाता है जो चावल के अनुकूल है । सन्‌ 4896 में कामीकावा 
में सिंचाई के साधनों के विकास के कारण धान की खेती का सव्वंत्र प्रसार 
हुआ । 920 में चावल की नयी जातियों की खोज से प्रति चो उत्पादन में 


वृद्धि हुई है। यत्र-तत्र फलों की खेती भी होती है । सेव अमुख फल है। इशी- 
कारी घाटी की उच्च भूमि मे भी धान की कृषि होती है । सप्पोरो के 
निकट योइची (५०ंणएं) क्षेत्र में सेव, चेरी (॥०५) अगर, फूलों एवं 
सब्जियो की कृपि होती है । 


2- मध्य होकेडो उप कृषि प्रदेश (८७ाव] ॥0000०  900-/970०- 
[0४ १690॥)--इस प्रदेश के आभायताकार उच्च भूमि के खेत जो टोकाची 
मैदान में ज्वालामुखी राख से युक्त हैं, मध्य तथा पश्चिमी अमेरिक्रीय खेतों की 
भांति दिखाई पड़ते हैं क्योकि यहां पर. अमेरिका की भांति फार्म हाउस पाये 
जाते हैं ! 940 से 920 के मध्य टोफाची के मैदानमें प्राचीव जापान से आये 


हुए कूपक सर्वप्रथम आलू, गेहूं, जी और सेम का उत्पादन प्रारम्भ किये। प्रथम 
विश्वयुद्ध के समय खाद्यान्न की कमी के कारण उत्पन्न मूल्य वृद्धि को देखते हुए 
कूपकों ने सेम और आलू का व्यापारिक स्तर पर उत्पादन प्राएम्भ किया । 
१930 के दशक में उ्वेरकों के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि हुई। अतः खाद्यान्न 
की कीमत में पुनः गिरावट आयी | इन परिस्थितियों के कारण कृषकों को 
मसल परिवर्तन करना अनिवाये हो गया । अतः फ्तल-चक्र विधि को अपनाने 
से मृदा अपरदन में कमी के साथ-साथ उत्पादन में भी वृद्धि हुई। टोकाची के 
मेदान के उच्च भागो पर पशुचारण का विकास हुआ। चारे वाली फसलों में 
जई, मक्का, आलू जो, चारे की फसले इत्यादि तथा मुद्रादायिनी फसलों में 
सेम, फ्लेक्म (6900) तथा चुकन्दर महत्वपूर्ण हैं । खेती का मुख्य कार्य घोड़ों 
द्वारा होता है | सुभर, भेड़ तथा मुर्गी पालन से इस प्रदेश में कषि उत्पादन की 
30 प्रतिशत आय होती है । समस्त आय का 50 प्रतिशत भाग सेम उत्पादन से 
होता है-। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात दुग्ध उद्योग में प्रगति हुई। महत्वपूर्ण 


कपि [ 4235 


हर] 


पशुओं को अन्यत्र स्थानों से लाया गया अतः 955 और 4966 के मध्य गायों 
की संख्या में तीन गुनी वृद्धि हुई ओर टोकाची मैदान के 40 प्रतिशत क्षेत्र पर 
गायें पाली गई । प्रत्येक कृषक के पास औसतन 7 गाये थी जो व्यावसायिक 
दृष्टि से कम हैं । सन्‌ 96] में सोयाबीन के मूल्य में कमी के कारण इसको 
कृपि में कमी हो गयी । वर्तेमान समय में 90 प्रतिशत सोयाबीन संयुक्त राज्य 
अमेरिका से आयात की जाती है। सोयावीत का उपयोग जापानी भोजन में 
अधिक करते हैं जिप्ते मिसो (४5०) कहते हैं। मिस्ती (सोयाबीन की लुगदी) 
का प्रयोग सब्जियों को सुरक्षित रखने में करते हैं। सोयाबीन के सूप को, जो 
नाश्ते के रूप में उपयोग होता है, उसे मिसोशिर ([४5० 5#70) कहते हैं । 
सोयाबीन में प्रोटीन की मात्रा अधिक होने के कारण मास और मछली के 
विकल्प के रूप में जापानी इसका उपयोग अधिक करते हैं । 

(ग) पुर्वो होकैंडो उप कृषि प्रदेश (६8४७४॥ #००ंंव० $फ9- 

डिदा0ए पॉप ता विधव0०7) 


इसका विकास सबसे बाद में हुआ । यहां पर जंगनों को साफ कर कृषि 
क्षेत्रों दा विकास किया गया। यहां के कुछ भागों का विकास हो रहा है। यहां 
को कृषि निर्वाह मुलक है। जई, बक हृवीट और आलू के उत्पादन के साथ-साथ 
पशुपालन भी होता है। यहां पर खेतों का क्षेत्रफल 3.5 चो से अधिक है 
परन्तु भूमि उपयोग की दर 00 प्रतिशत से भी कम है। यहाँ पर कठोर शीत 
और क्यूराइल की ठन्‍्डी धारा के कारण ग्रीष्म ऋतु भी चत्यन्त शीतल होती 
है जो फसलों के उत्पादन में बाधक है। यहां की अधिकांश भूमि पर जंगलों का 
बाहुल्‍य है | यही कारण है कि यहाँ पशुचारण अधिक होता है जिनमें कोंगधारी 
वृक्ष प्रमुख है । जई का अल्प उत्पादन प्रदेश के उत्तरी भाग में होता है । 


ऊंषि में परिवर्तन (00979898 9 7877770 ) 


जापान में पिछले 00 वर्षों के उधल-पुथल अर्थात्‌ औद्योगिक क्रान्ति 
और जनसंख्या मे दुगनी वृद्धि के कारण खेतों का आफ़ार अ्रत्यन्त छोटा हो 
गया है। इसलिए मशीनों से कार्य करना अत्यन्त कठिय हीता जा रहा है । 
ब्रिटेन में औद्योग्कि एवं कृषक क्रान्ति के परिणामस्वरूप अधिकांश क्रषि एवं 
मजदूर खंती करना छोड़कर नगरों की जोर प्रस्थाव कर गये । भतः खेतों के 
आकार में वृद्धि हुई और उनमें मशीमीकरण भी अधिक सुगस हो गया, परू्तु 
जापान में ऐसा नहीं हुआ । जापान में बड़े पुत्र को भुमि का स्वामित्व मिलता 


26 ) जापाव की भौगोलिक समीक्षा 


है और उसने ही माता-पिता की देखभाल का दायित्व सौपा जाता है। वर्तेमान 
समय में 5.6 मिलियत फाम 45 मिलियन एकड़ पर है। इस प्रकार कृषित 
भूमि का ओसत केवल 2.7 एकड़ है। खेतों का छोटा आकार मशीनों को 
चलाने में बाधक है। जापान में प्रत्ति 3 कृपक पर एक कल्टीवेटर का औसत है। 


जापान में कृषि कार्य आर्थिक दृष्टिकोण से उद्योग की तुलना में गौण 
है। 880 में कृषि कार्यो में लगे व्यक्तियों की संख्या 44 मिलियन थी जो 
आज घटकर 9.7 मिलियन रह गईं है । 880 में अधिकांश कार्य मानव श्रम 
(89 प्रतिशत) द्वारा सम्पादित होते थे, परन्तु ।967 में यह श्रम घटकर 49 
प्रतिशत रह गया, जिसका अम्रुख कारण मौंद्योगिक एवं हरित कान्ति है । 
959 के बाद मानव श्रम में तेजी से गिरावट आयी है फिर भी धिश्व के 
अन्य भोद्योग्िक देशों की तुलना में यह प्रतिशत अधिक है। यू०के० में कृषि 
कार्यो में 4 प्रतिशत एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में 44 प्रतिशत श्रम शक्ति लगी 
हुई है । जापान के विभिन्‍न प्रदेशों में श्रम शक्ति क्ली मात्रा में अच्तर पाया 


जाता है। टोहोकू, दक्षिणी क्यूश, णैन इन और तोशान जैसे अविकत्तित तथा 
कम ओद्योगीकृत उपास्तीय प्रदेशों में श्रम शक्ति का प्रतिजत अधिक पाया जाता 
है । इन क्षेत्रों की 40 प्रतिशत जनसंख्या कृषि कार्यो में लगी हुई है। ओऔद्यो- 
मित्र क्षत्रों में 20 ध्रतिशत से भी कम जनसंख्या कृषि कार्यो में लगी है । 


959 तक बड़ा पुत्र घर की देख-रेख करता था तथा छोटे लड़के एवं 
लडकियां नगरों में कार्य करने जाते ये । अतः 3959 से श्रम की अधिक मांग 
होने लगी | अत: कृषि दारयों मे औद्योगिक कार्यो की भाँति उच्च मजदूरी देता 
अनिवार्य हो गया। अतः जापान में दिन-प्रतिदिन कृषि कार्यों में लगे लोगों 
की संख्या में कमी हो रही है । 958 मे कृषि कार्यो में लगी 44 मिलियन 
जनसंडय्रा 967 तक घटकर केवल 9.7 मिलियन हो गई । तनाका में 30 वर्ष 
से दम उम्र का कोई व्यक्ति कृषि कार्यों में नहीं लगा है। इसका प्रमुख कारण 
ओद्योगिक प्रतिष्ठानो में मिलने वाला उच्च पारिश्रमिक हैं। अधिकांश अपने 
खेती को बेवकर नगरों मे कार्य करने चले जाते है | 


द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात कृपि समृद्धि में वृद्धिहुई है । सन्‌ 4966 तक 
कृपि से प्राप्त होने वाली आय में यद्यपि 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई परन्तु यह्‌ आय 


ओद्योगिक उत्पादनों से प्राप्त आय की मात्र 33 प्रतिशत थी | कृषि में आयी 
प्रमृद्धि का मुख्य कारण उनन्‍्वत किस्म की फसलें, अधिक श्रम, तकनीक के कारण 


कृषि [27 


अधिक उत्पादन तथा भूमि सुधार है। सन्‌ 4966 में 52 प्रतिशत आय 
कृष्येतर कार्यो से हुईं। आवागमन के साधनों के विकास के कारण कारखानों में 
अंशकालिक काय॑ द्वारा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई। 75 लाख व्यक्ति 
शीतकाल में उद्योगों में कृषि कार्यो के अभाव में कार्य करते हैं और ग्रीष्मकाल 
में अपने कृषि क्षत्रों को वापस चले जाते हैं । 


धौद्योगिक मण्डल आस्तरिक सागर से ठोकियों तक कृषि क्षेत्रों का आकार 
बहुत छोटा हैं। साथ ही यहां पर अन्य कई प्रकार के कार्य उपलब्ध हो जाते 
हैं। अधिकाँश लोग अशकालिक कार्य करते हैं और अपनी आय का 50 प्रतिशत 
भाग कृष्येतर कार्यों से प्राप्त करते हैं । होकीडो और दोदोकू में यद्यपि खेतों 
का आकार बड़ा है फिर भी यहां के लोग अंशकालिक कार्य करते हैं। इसी 
भांति दक्षिणी क्यूशू में जहां पर उद्योग के द्वारा रोजमार उपलब्ध है वहां पर 
भी 33 प्रतिशत आय अन्य प्रकार के कार्यों से प्राप्त होती है। जापान सागर 
तटीय भाग में अधिकांश लोग शीत ऋतु में आंशिक कार्यों में लगे होते हैं क्योंकि 
इस समय कठोर शीत के कारण कृषि कार्य सम्भव नहीं होता है| 


जापान में कृपि कार्य धीरे-धीरे अशकालिक कार्य (१98६-79 209) 
होता जा रहा है कवि कार्यो में अधिकांशतया स्त्रियाँ लगी 
होती हैं। सन्‌ 967 में कृषि कार्यो में लगी स्त्रियों की संख्या 5.3 मिलियन 
थी जब कि पुरुषों की संख्या 4.4 मिलियन थी। उल्तत पशुओं और लाभक री 
फसलों के उत्पादन से कृपि से प्राप्त होने वाली आय में वृद्धि हुई। फलों में 
सेव, नारंगी, और सब्जियां तथा पशुओं में गाय, सूआर, आदि तथा फसलों में 
गेह, जो, सोयाबीन एशं शहतूत मुख्य है। सन्‌ 947 में भूमि सुधार के बाद 
कृषि उत्पादन में दो गुना वृद्धि हुई। इन परिवर्तनों के कारण कूपकों की आय 
में वृद्धि हुई और वे एशिया के अच्य देशों के कृपकों की तुलना में अधिक समृद्ध 
हो गये । युद्ध से पूर्व की तुलना में उतकी आय में 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई । 
आज भी जापान के कृषि क्षेत्रों में अधिकांश कार्य मानव श्रम द्वारा होता है। जो 
कपक अपने खोतों पर मशीनों का प्रयोग करने में असमर्थ होता है. उनकी भाय 


न केवल जापान में अपितु पाश्चात्य देशों के कृपकों की तुलना में कम होती है । 
जापान में कृषि कार्यो में आने वाली सबसे बड़ी समस्या खेतों का छोटा आकार 
है । यही कारण है कि ऐसे कृषि क्षत्रों में उत्पादन मंहगा पड़ता है । 


428 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


कृषि उत्पादनों में परिवर्तन (00गाप९७ क॥ शत यि0०!प्रशांणा) 


4945 के पश्चात जापान के कृषि उत्पादनों में महत्वपूर्ण परिवर्तन 
आया है। फसलों में धान अग्रयण्य है जो 44 प्रतिशत भूमि पर उग्राया जाता 
है ओर उन सम्पूर्ण क्षंत्रों में इसकी खेती होती है जहां सिंचाई के साधन 
उपलब्ध होते है । नगरीय आय के कारण फलों, सब्जियों, अण्डों, मांस, मक्खन 
ओर दूध की मांग की अधिकता के कारण इनका उत्पादन तथा गायों और 
सूअरों का पालन अधिक होने लगा है । नाइलान और मानव निर्मित प्रसाधनों 
के कारण शहतूत और रेशम के उत्पादन में गिरावट आई है। गेहे और धान 
के स्थान पर अधिक उत्पादन देने वाली फप्तलें बोयी-जाती है सन्‌ 4964 से 
विदेशी सस्ता सोयाबीन के आयात से इसके उत्पादन में ग्रिरावट आई है। 
जापान मे 90 प्रतिशत आयातित सोयाबीन को प्रयोग होता है । 


_घाच (87८९) 22000 मु 


धान जापान की प्रमुख फसल है । 4966 में सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र के 92 
प्रतिशत भाग पर घाव का उत्पादन (चित्र 6.3 अ) हुआ। सन्‌ 4987 में 
जापान में चावल का उत्पादन 433.2 लाख मी० टन हुआ जो 4985 में 
बढ़कर 445.78 लाख मी ० ठन हो गया। विभिन्‍व वर्षो में चावल के उत्पादन 
का विवरण तालिका 6 3 से प्राप्त होता है । 


तालिक 6.3 
विभिन्‍न वर्षो में चावक का उत्पादन (हजार मी० टच) 
कक सम न नकल सिम जत कलम शक नल, बशट तट निकरविम न टन शक म 





चषे क्षेत्रफल ( हजार हेक्टेयर ) उत्पादन. वृद्धि-दर % 
4984 2384 43320 न्‍- 
4982 न न -- 
983 2273 29358 2.72 
]984. . 23॥5 44848 44.59 
4985 2342 ]4578 .82 





स्नोत:- यूरोप ईयर बुक, 983, वा0, पृ०558 तथा एफ०ए०ओ० प्रोडक्शन 
ईयर बुक, 985, वा० 39, पृ० 08 


| 


क्रषि : [29 


जापान में 984 में 23,84,000 हेक्टेयर भूमि धान के अन्तर्गत लगी 
थी जो 4983 में घटकर 22,73,000 हेक्टेयर रह गयी परन्तु 984 के बाद 
भूमि-सुधार के कारण धान के क्षेत्रफल में वृद्धि हुई। यद्यपि 984 को तुलना 
में 4985 में चावल का क्षेत्रफल अधिक था परन्तु उत्पादन अपेक्षाकृत कम 
रहा । 44 प्रतिशत कृषि उत्पादनों की आय में चावल से भाप्त आय 42 
प्रतिशत थी । फल और सब्जी के बाद प्रति एकड़ सर्वाधिक आय चावल से प्राप्त 
होती है । धान की सफल और अधिक कृषि करने में यहाँ के कपक गये महसूस 
करते हैं। यहां के 80 प्रतिशत कृपक चावल के लिए आत्म निर्मर हैं। जापानी 
सरकार चावल के उत्पादन के लिए कृपकों को प्रोत्साहन के साथ-साथ आशिक 
सहायता भी प्रदान करती है। कृषि क्षेत्रों के विकास एवं विस्तार के लिए 
अनुदान और ऋण प्रदान करती है। 


विश्व युद्ध के पश्चात नगरों के विस्तार के कारण धान की कृषि पर 


' गहरा प्रभाव पड़ा है। इसलिए ऊ'चे भागों में सीढ़ीदार खेत बनाये गये हैं साथ 


ही उधजी झीलों और दलदलों को सुधार कर कृषि योग्य बनाया ग्रया है। 
यद्यपि ये सुधरे हुए कृषि क्षेत्र उन क्षेत्रों की भांति उपजाऊ नहीं हैं जो नगरों 
के विस्तार के कारण समाप्त हो गये, फिर भी आधुनिक तकनीक के कारण 
पैदावार में दिमोदिन वृद्धि हो रही है। चावल के उत्पादन को ओर विशेष ध्यान 
देने का मुख्य कारण घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति है युद्ध से पर्व जापान की 
आवश्यकता का 46 प्रतिशत चावल आयात किया जाता था जो 4966 में 
घटकर केवल 7, प्रतिशत रह गया । यहां पर धान उत्पन्त करने का सबसे 
बड़ा दोष यह है कि उत्पादन लागत आयातित चावल की तुलना में 50 प्रतिशत 


अधिक होता है। यहाँ के कपक आयातित चावल को अपेक्षाकृत कम पसन्द 
करते है | 


सर्व प्रथम जापान में चीन से लगभग 2000 वर्ष पहले धान लाया गया 
था, जिसे जापान से सुद्रा के रूप में सदियों तक समझा जाता रहा । जापान के 


गांव प्राय: धान उत्पादन क्षेत्रों में ही पाये जाते हैं। जापान की संस्कृति चावल 
की संस्कृति से जुड़ी हुईं है । यहां तक कि अनेक प्रकार के उत्सव पर्च, विवाह 
आदि चावल के उत्पादन के साथ-साथ मताये जाते हैं। जापातियों का भोजन 
मुख्यतया चावल पर आधारित है। जापान में पके हुए चावल अर्थात भात को 


430 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


गोहन (90॥0॥) कहते है जो जापानियों के भोजन में चावल के महत्व को 
प्रदर्शित करता है। नगर निवासियों के नाश्ते में युद्धधाल से गेहूँ की रोटी 
लोकप्रिय हुई है । जापानियों की सम्पन्नता के कारण उनके भोजन में' अब माँस, 
फल और सब्जी -का महत्व बढ़ता जा रहा है। इसलिए प्रति व्यक्ति चावल की 
खपत दिनोंदिन कम हो रही है। सन 935 में प्रति व्यक्ति चावल की खपत 
454 किग्नरा० थी जो 965 में गिरकर 439 किलोग्राम हो गयी । 





हर के 
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लित्र 6.3 जापान : (क, धान की कृपि का क्षेत्रीय स्वरूप 

प्रत्येक विन्दु 40 हजार टन का द्योतक 

(ख) गेहू की कृषि का क्ष नीय स्वरूप 

प्रत्येक विन्दु 0 हजार टन का द्योत्तक 
सभी उच्च क्षेत्रों और सामान्य कृषि क्षेत्रों मे छान उगाया जाता है जिसके 
लिए जापान की जलवायु अत्यन्त अनुकूल है । वसन्‍्त ऋतु के प्रारम्भ में बाई-यू 
वर्षा ( 8-0-३०॥95 ) धान की फसल को बढ़ने के लिए अत्यन्त बहुत होती 


हे श्च्र 


कक ७ न... जा आफ अत 
वियीत _... अमनअामवन्‍न्‍माममा 4037:+4: भलाभ्याम्यपानक -हन, 
र् 


नसीक के «० ता --»ेनीनमीनीयनी न +»-ननन-ानीय-ि3००++ कक क०-+०० अमन >- कान, लक 
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4३०४, 


अन्य हरागोमीकीक किला -+ सा. इुम८आ #न पल... हामगक॥. ली... आम“ -भर्आमअम्पाम कण का ता की ऋ कगीक.. कक नाच... #न ही. 









कृपि - [ 43॥ 


है। ग्रीष्म कालीन वर्षा की कमी को सिंचाई द्वारा पूरा किया जांता हैं। 74 
प्रतिशत सिंचाई नदियों, 8 प्रत्तिशत सिंचाई जलाशयों व तालाबों और 8 प्रति- 
शर्त सिंचाई भूमिगत जल संसाधन द्वारा होती है । धाव की कृषि को पश्चिम में 
टाइफूनों द्वारा, उत्तर में कठोर ठण्डक से तथा पतश्नड़ ऋतु में कटाई के समय 
वर्षा द्वारा प्रचुर नुकसान होता है। जापान में प्रति एकड़ धान का उत्पादन 
(60 बुश्ेल) भारत से अधिक है। धान की कृषि के लिए पहले नसेरी डाली जाती 
है जो 40.दिन बाद खेतों में रोपी जाती है। टोकियों के दक्षिण धान की फसल- 
कटने के बाद गेहूं और जो की कषि की जाती है । 


जापान में धान को कृषि यायोयी ( ५०४० ) काल से की जा रही है । 
प्रारम्भ में दक्षिणी पश्चिमी जापान के दलदली क्षेत्रों में कृषि प्रारम्भ की गई जो 
जोरी पद्धति ( 307 85५»0७॥ ) पर आाधारित थी | जैसे-जैसे जनसंख्या वढ़ती 
गई और कपक निपुण होते गये इसकी कृषि उन क्षोत्रों में भी की जाने लगी जहाँ 
पर सिचाई के लिए जल की आवश्यकता थी । वियत शताब्दी में मनेक नयी-नयी 


प्रणालियों का आविष्कार किया यया जिसके परिणामस्वरूप 890 से 4930 
तक धान की कृषि उत्तरी क्षेत्रों के साथ-साथ ऊ'चे पर्वतीय भागों में भी की जाने 


लगी । होकैडो, जो जापान का शीतलतम क्षेत्र है, सम्पूर्ण कृषि क्षेत्र के 20 प्रति- 
शत भाग पर धान उगाया जाता है। होकीडो के इन क्षेत्रों में जुलाई ओर अगस्त के 
आवश्यक तापमान 20 ? से० ग्रें० से भी नीचे गिर जाता हैं । अत: इत भागों 
में धान की फसल को बढ़ने के लिए कम समय मिलता है। जिस निम्न तापमान 


प्र जापान में धान उगाया जाता है उस निम्न तापमान पर अन्य देशों में धान 
की कृषि सम्भव नहीं है जिसका प्रमुख कारण जापान में उन्‍नत तकनीक एवं धान 
की विशिष्ट प्रजातियां हैं । 44 ? 0' उत्तरी अक्षाँश तक ही विश्व में धान 
उत्पादन के लिए अनुकूल है। कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में धान 4400 फीट की ऊचाई 


पर भी उगाया जाता है। वैज्ञानिक विधियों द्वारा धान के बीजों को जल्दी 
अंकुरित कर दिया जाता है। बीजों के जमने के लिए कृत्रिम ढंग से तापमान 


बढ़ाया जाता है । नसेरी डालने के वाद धान बीजों पर प्लास्टिक की शीट विछा 
दी जाती है जिससे मिट्टी का तापमान बढ़कर बीज को जल्दी अंकुरित कर सके। 
ऐसा करते से पौधे 0 दित पहले तेयार हो जाते हैं। नर्सरी के खेतों में पानी 


अर विया जाता है जिससे रात के समय भी तापमान नीचे न गिर सके । विशेष 
मामलों में धान के खेतों को सस्ती जल विद्युत द्वारा मिट्टी के अन्दर तारों को 


पौलाकर गर्म किया जाता है । कभी-कभी वाष्पीकरण को रोकने ओर खेतों को 


हक करने के लिए सेटिल ( 0७७५॥ ) एलकोहल का छिड़काव भी किया जाता 
! 


432 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 
हु | (४४॥०० 


जापानमें गेहुंके उत्पादों की माँग 945 से बढ़कर दोगुनी हो गयी हैं। युद्ध 
के बाद चावल आपूत्ति में कमी आई है और गेहूं से बनी ब्रेड का महत्व बढ़ा है | 
नगरों में नाश्ते में चाचल के स्थान पर गेहूं से बची ब्रेड दा प्रयोग होता है। गेहूं के 
आटे से बनी केक दिनोंदिन लोकप्रिय हो रही है । एक ओर जहाँ गेहूं के उत्पादों 
की लोकप्रियता बढ़ रही है वही दूसरी ओर 4960 से गेहूं के उत्पादन में कमी 
आयी है | सन्‌ 4966 में 960 की तुलना में केवल 55 प्रतिशत गेहूं का 
उत्पादन हुआ जो सम्पूर्ण उत्पादन का केवल एक प्रतिशत था | 4985 में जापान 
में 874,000 मी० टन गेहूं का उत्पादन हुआ जो 4984 की तुलना में 7.95 
प्रतिशत अधिक है । जापान में विभिन्‍न वर्षो मे गेहूं का उत्पादन इस प्रकार 

रहा है। 


तालिका 6.4 


विभिन्‍न वर्षो में गेहूं का क्षेत्रफल एवं उत्पादन (हजार मी० ठन) 

















वर्ष क्षेत्रल (हजार हे०) उत्पादन. उत्पाद वृद्धि दर % 
4982 न 742 *- 
983 229 । 695 6.33 
98 4 232 747 8.02 
4985 234 875 >>. 7.995 


#पयाा या च॒तान्‍भाममक पट 





- 











क+ ” पत्सामकाशमांकआओ 


स्रोत-यूरोपा ईयर बुक, 987, वा० ), प्ृ० 4558 तथा एफ० ए० ओ० 
प्रोडक्शन ईयर बुक 4985, वा० 39, पृ० 408. 


यद्यपि 982 की तुलना में 4983 में गेहूं के उत्पादन में गिरावट आई 
परन्तु बाद के वर्षो में गेहूं के उत्पादन मे निरन्तर वृद्धि हुई है। सन 4960 की 
तुलना में !966 में जी का उत्पादन केवल 60 प्रतिशत हुआ । जापान में गेहूं के 
साथ-साथ जौ वी भी कृषि की जाती है। जो का उत्पादन गेहूं के उत्पादन का 


लग भग 50 प्रतिशत है जो तालिका 6,5 से स्पष्ट है । 





क्‌पि | 433 


०. 


तालिका 6.5 


विभिन्‍न वर्षो में जो का क्षेत्रफल एवं उत्पादन ( हजार मी० टन) 














वर्ष क्षेत्रफल हजार हेक्टेयर. उत्पादन. उत्पादन वृद्धि दर % 
१962 न्‍- 34॥ “- 

4983 ]24 340 0.29 
984 [47 333 3,82 
9895 १43 340 “3.00 





राणा" नम 
स्रोत-युरोपा ईयर बुक, 4987, बा० [, पृ० 558 तथा एफ० ए०ओ० 
प्रोडक्शन ईयर बुक 985, बा० 39, पृ० 08 


जापान में उत्पादित गेहूं आयातित गेहूं से महंगा एवं निम्नकोटि का होता 
है । आयातित गेहूं की कीमत उत्पादित गेहूं की तुलना में 33 प्रतिशत कम होती 
है | उच्च भागों में उगाये जाने वाले धान के पश्चात यह दूसरी फसल है 


(चित्र 6.3 ब) | शीतकाल में पेंदवार कम होती हैं जिसका प्रमुख कारण प्रति- 
कूल एवं कठोर ठण्डक है । 


गेहूं का प्रति एकड़ उत्पादन कम होने के कारण सरकार इसे प्रोत्पाहित 
कर रही है। किन्हीं-किन्ही भागों में धाव की फसल कट जाने के बाद बिना 
जुताई किये गेहूं की रोपाई तथा गेहूं के त्रीज वो दिये जाते हैं । इस विधि से 20 
प्रतिशत उत्पादन वढाया जा सकता हैं। साथ ही काम करने के दिनों को भी 
घटाया जा सकता है। प्रति एकड़ काम करने के दिनों को 40 से 408 दिन कम 
किया जा सकता है। यह विधि उन भागों हैमें ही सफल जहां की भूमि दलदली 


नही हैं। 
फलों, सब्ञियों और फूलों का उत्पादन 
( 70000 07 रण ७5, ४४६७ ४४४५ 97० #॥0५४७४७ ) 
युद्ध के वाद जीवन स्तर में सुधार होने के कारण फ्रलों, सब्जिणों और 


फूलों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। 955 भौर 966 के मध्य फलों, विशेषकर 
नारंगी और सेव के उत्पादन मे दो गुनी वृद्धि हुई | इस काल में सब्जी के उत्पा- 


“ ॥34 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


दन में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई । 4965 में उत्पादित फलों और सब्जियों का 
मूल्य सम्पूर्ण कृषि उत्पादनों का. 23 प्रतिशत था। कुछ स्थानों पर फलों और 
सब्जियों की कृषि घरेलू मांग की पूर्ति के लिए होती है, परन्तु कुछ क्षेत्रों जैसे- 
टोकाई, आन्तरिक सागर के निकट ओर उत्तरी ठोहोक्‌ में व्यापारिक स्तर पर 
फलों बौर सब्जियों को क्ृपि की जाती है । चावल का उच्च मृल्य होने के कारण 


प्रमुख धान उप्पादक क्षेत्रों में कृषक फलों के उत्पादन पर अधिक ध्यान नहीं 
देते । 


29 
47 7६७८६ ५ 


| ॥। 
054. | +.+« 

(छ-- 400,000 व्न 

॥00000 ०» 





चित्र 6.4 जापान : (क) फलोत्पादन 
4. सेवे 2. संतरा, 3. अंग्र, 4. आड़ 
(ख) दुधारू गायों का वितरण प्रतिरूप 
एक बिन्दु 2 हजार गाय का द्योतक 


कृषि 839» ) 


््ड 


नारंगी([0797989) 

जापान में फलों में नारंगी और सेव अत्यन्त महत्वपूर्ण फल हैं। टोकाई के 
शिजुयोका प्रिफेक्चर से जापान की 33 प्रतिणत नारंगी उत्पन्न होती है। यहां 
की गर्म जलवायु, धूपयुक्त दिन और पहाड़ी ढाल नारंगी हो वागाती कृषि केलिए 
अनुकूल हैं। आत्तरिक सागर के उन भागों में भी तारंगी का उत्पादन होता है 
जो शुष्क एवं धृपयुक्त क्षेत्र है । 957 से 4966 तक नारंगी के उत्पादन में 
400 प्रतिशत की वृद्धि हुई 98 5 से जापान में नारंगी का उत्पादद 900,000 
मी० टन हुआ जो 984 की तुलना में 27,000 मी० टन, कम है। “इसका 
विवरण तालिका 6.6 से प्राप्त हो जाता है। 


तालिका 6.6 


विभिन्‍न वर्षों में नारंगी का उत्पादन (हजार मी० टन) 











वर्ष उत्पादन उत्पादन वृद्धि दर % 
987] 866 न्‍+ 

982 न 52 

4983 844 4 “2.54 

984 927 9.83 

49835 900 --2.94 


'सनिसमेड#पतमपरछएए पर फमक्र उप पदभार ककाजास कला 


स्रोत-एफ० ए० ओ० प्रोडक्शन ईयर वुक, 985, वा० 39 पृ० 08 


सिंचाई की सुविधा, आधुनिक तकनीक, उर्वेरकों का प्रयोग तथा कौटना- 
शक दवाओं के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि हुई है । 


शिजुओका प्रिफेक्चर की समस्त पर्वतीय ढालों पर नारंगी की कृषि होती 
है । यह पर्वतीय ढाल समुद्र के निम्रट हैं। यद्यपि तंग नदी घादियों द्वारा यह 
पव॑ तीय क्षेत्र कटा-फटा है फिर भी उत्तम परिस्थितियों के कारण सीमित क्षेत्र 
में भी नारंगी का अधिक यत्पादन होता है। सीमित क्षेत्र होने के कारण तीत्र 
पर्वतीय ढालों पर वेदिकारें (७7908७) वनाकर नारंगी का उत्पादन किया जा 
. रहा है | शिजुओका में हमादा झील का तटवर्ती क्षेत्र चारंगियों के उत्पादन के 
लिए महत्वपूर्ण है। तटीय भाग तटबन्धों द्वारा सुरक्षित है। धान के निन्‍नवर्ती 
क्षेत्रों में भ्रोष्म ऋतु में वफ पिघलने से बाढ़ आती है इसलिए नारंगी की कृषि 
उच्च के धान क्षेत्रों में होती है । 


436. ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


युद्ध से पूर्व नारंगी की कृषि का विशेष-महत्व नही था परन्तु वर्तमान 
समय में उत्तरी अमेरिका और यूरोप में मांग के कारण नारंगी के उत्पादन मैं 


वृद्धि हुई है। उत्तरी अमेरिका के पश्चिमी तट पर नारंगी की कृषि में प्रगति के 
कारण जापान से नारंगी के निर्यात में गिरावट आई है। 4959 की तुलना में 


966 में निर्यात घटकर केवल 50 प्रतिशत हो गया । निर्यात घटने का सबसे 
बड़ा कारण जापानियों के जीवन स्तर में सुधार है। नारंगी की मांग और उच्च 


मूल्य ने कृपको को पर्वतीय ढालों को सीढ़ीदार खेत बनाने के लिए आकपित 
'किया है। कहीं-कही नारंगी के पेड़ों के वीच-बीच में आड़ (2७७०॥) और चाय 
का उत्पादन होता है परन्तु ऐसी कृषि अधिक श्रमसाध्य तथा व्ययशील है। केवल 
बड़े-बड़े कूपक ही एक से अधिक फसल उग्राने का प्रयास करते है। शिजुओका 
में नारंगी का अधिकांश विक्रय सहकारी समितियां करती है जो नारंगी को मुख्य 
नगर के बाजारों तक ले जाती हैं । 
सेव (83|00!89) 
870 ई० के पहले उत्तरी टोहोक्‌ में आओमोरी ( 8&०॥/0 ) प्रिफेक्चर 


का हीरोसाकी क्षेत्र सेव. का एक मात्र उत्पादक क्षेत्र था। आज भी जापान 
का 50 प्रतिशत उत्पादन आओमोरी से ही आता है। वतंमान समय में नगानों, 


पुकुशिमा, और यामागुची की पर्वतीय घाटियों में सेव की सफल कृषि हो रह 
है | गोल्डेन, डेलीसस, रेड डेलिसस ओर जानेथन सेव की मुख्य प्रजातियांँ है। 


नागनों और हीरोसाकी में धान के साथ-साथ सेब का भी उत्पादन होता है । 
चावल की तुलना में सेव से अधिक आय होने के कारण बहुत से कृषक धान 


के कृपि क्षेत्रों में सेव के बागीचे लगा दिये गये हैं। इसलिए जहां धान क्षेत्र में 
- दिनों-दिन्‌ कमी आए रही है, वही सेब के उत्पादन क्षेत्र में व॒द्धि हो रही है । 
जापान में सेब का सर्वाधिक उत्पादव 983 मे हुआ। 4984 में उत्पादन में 
कमी आ गई । सरकारी प्रयास के कारण बाद के वर्षो में सेब के उत्पादन में 
' वृद्धि हो रही है जो तालिका 6.7 से स्पष्ट है । 
तालिका 6.7 
विभिन्‍न वर्षो में सेव का उत्पादन (हजार मी० टन) 


दे 





जय नी. ७9७आ०--पकमथा-गकफ ५ [ २०माइुकपक पककवनानी. ७०७७ ० कर पका» ९-६5 नयुथ+-3न्याफमनमम नाना + 9. -न-मभार+ ही, कौ ७३ /पममनय कटे कर्क रे -पननेक।. -वलक+क+-जनाओीण.. ++०__ -.. 


ह 
7 








बाप, उत्पादन वृद्धि दर प्रतिशत 
4984 22997 -७-<७ूछ७छ2' 
982 *- 
983 4048 ः 48,28 
984 82 _ 22.52 
4985 907 4.70 


ज्ोत : एफ. ए. भो. प्रोडक्शन ईयर बुक, 7985, वा 39 पृ० ]08 





_सककबक 3.०... 


कृषि [ 437 


इस प्रकार 98 की तुलना में 983 में सेव के उत्पादन में 48.28 


प्रतिशत की वृद्धि हुई, परन्तु 4984 में वृद्धि दर 22.52 प्रतिशत घट गयी । 
पुत्र; 4985 में .70 प्रतिशत की वृद्धि हुई । 


सेब की कृपि के साथ-साथ अनेक प्रकार के फलों का भी उत्पादन होता है 
जिससे फिसी भी प्रकार को हानि होने पर उस कमी को दूसरी फसल द्वारा पूरा 
किया जा सके । नगानों में फल उत्पादन में जितनी भूमि लगी है उसके 66 
प्रतिशत भाग पर सेव और शेष भूमि पर अंगूर, भाड़ , आदि लगाये जाते हैं । 


धान की कृषि की तुलता में सेव की कृषि में अधिक श्रम की आवश्यकता 
पड़ती है । जून के महीतों में सेवों को कागज के थलों में पेड़ पर ही बाँध्र दिया 
जाता है जिससे उन्हें कीड़ों से बचत हो तथा उनके प्राकृतिक रंग में कमी न हो । 
फलों को तैयार होने के दो या तीन सप्ताह पहले कागज निकाल दिया जाता 
है। फल तैयार होने का समय मध्य अगस्त से नवम्बर है । 


अन्य फल और सब्जियां (0000 ।705 ॥0 ५४७४०७४३०।७५) 
सेव और नारंगी के अतिरिक्त जापान में अन्य फलों का महृत्व बढ़ रहा 
है जिससे आड़ प्रमुख है। हांशू के अधिकांश भागों में जाड़ का उत्पादन हो रहा 
है। परन्तु ओकायामा, फुकृशिमा और सैटामा प्रिफेक्चर आड़ के उत्पादन में 








तालिका 6.8 
विभिन्‍न वर्षों में फलों का उत्पादन (हजार मी० दस) 
फल वर्षों में उत्पादन 
498 983 . 984. 4985 
. अंगूर 328 324 30 3]7 
2. नाशपाती 500 503 479 470 
3, आड़ 253 237 26 205 
4. बेर 58 67 78 80 
5, केला ] । ] 
अन्य 


फूलों का सम्पूर्ण 
उत्प.दव खरवृज को * 
छोड़कर 6325 _. 6405 5482 5862 


स्रोत ; एफ, ए. थो, प्रोडक्शन ईयर बुक, 4985 बा० 39, १० 498. 





हे 
हे 


स्ज्टौ 


438 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


अग्रगण्य हैं। अंगूर का उत्पादत सैटामा और नगानों के वाह्य भागों में होता 
है। इसके अतिरिक्त नाशपाती (7८७०७) और परम्मिम्मन(?९७/७॥॥7॥0॥9) का भी 
यत्र-तत्र उत्पादन होता है। जापान में विभिन्‍न प्रकार के फलों के उत्पोदन का 
विवरण तालिका 6.8 से प्राप्त हो जाता है । 

फलों के साथ-साथ जापानियों के भोजन में सब्जियों का महत्व बढ़ता जा रहा 
हैं। समएणणं कषित उत्पादन मूल्य का 2 प्रतिशत मूल्य सब्जियों से प्राप्त होता 
है। सब्जियों की कृषि नगरीय केन्द्रों के निकटवर्ती भागों में अधिक होती है । 
जापान में 985 में 5,47,000 मी० टन सब्जियों का उत्पादन हुआ। विभिन्‍न 
प्रकार की सब्जियों का उत्पादन का विवरण तालिका 6.9से प्राप्त हो जाता है । 


तालिका 6.9 
विभिन्‍न वर्षो में सब्जियों तथा खरबृूज का क्षेत्रफल(हजार हेक्टेयर) एवं उत्पादन 
(हजार भी० टन) 











प्रकार वर्षो में उत्पादन 
98] 983 984 985 
उ0 क्षेत्र०. उ०» क्षे० उ0 क्ष0. उ० क्षे० 


], आलू 3299 425 3566 28 3707 3] 3735 30 

2. शकर- 7378 65 4379 65 400 65. 4527 66 
क्न्द 

3.याम [44 8 332 8 ]60 8 [68। 8 

4, तारो 430 3॥ 393 29 347 29 350 29 


(काकोयाम ) 
5. बीन 02 8॥ 93. 98 868 96' 44॥ 85 
6. मटर 2 2 2 7 2 १व 2...|4 
7. सोयावीन 792 440 277  43 238 34 238 34 
8, मृगफली 22 5 2 5 22 #. 22 
9. रेपसीड 4 2 3 2 3 9 2? || 
40- अन्य 9657 +- 9084 - 9247 - 9229 - 

नया न--त-त-त-_॒-+.त8ब80ह0]3औ.80___ छा 
योग 45230 4892 ]5264 5407 


जल आलम ओरल + ही नकल कल जनक इक अजमेर श कद जलन मिनी िक 
सोत : एफ० ए० ओ७० प्रोडक्शन ईयरबुक, 4995, बा० 39, प्रृ० 08 


क्र्षि [ 39 


चाय (०8) 


का 3--अाबनणि: हे 

जापान के प्रमुख पेय पदार्थों में चाय का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां पर 
प्रति व्यक्ति चाय की खपत )4 पौण्ड है जबकि यह खपत ब्रिटेन में 8 पौण्ड है। 
चाय जापान की प्रमुख मुद्रा दायिनी फसल है । भारत, श्रीलंका और चीन के 
_ पश्चात जापान विश्व का चतुर्थ बड़ा चाय उत्पादक देश है। शिजुओ का के 
पर्वतीय एवं पठारी ढालों पर जापान की 50 प्रतिशत चाय उत्पन्न को 
जाती है यहाँ की उष्णाद्र ग्रीष्म ऋतु चाय के पौधों को बढ़ने के लिए 
अत्यन्त अनुकूल है । यद्यपि जनवरी माह का तापक्रम 4 सेग्रे ० पाया जाता हैं 
जो चाय फे लिए अनुकूल नहीं है, फिर भी चाय की उत्तम खंती होती है क्योंकि 
शीतकालीन समय और निम्न तापक्रम अल्प दिनों के लिए होता है। 


क्योटो के निकट यूजी (णत) में स्व प्रथम 9वी शताब्दी में चांय की खेती 
प्रारम्भ की गई | आज भी यूजी उत्तम किस्म की चाय का प्रमुख केन्द्र है। इसे 
॥०0॥78 ० ॥79 9०५६ ठणशभा५ ६४8 क्हा जाता है। यूजी की उत्तम मिट्टी, 
चाय चुनने एवं तैयःर करने की नई पद्धति के कारण यहां की चाय की कीमत 
अधिक हैं। यही कारण है कि यहां के चाय की मांग जापान में अधिक है। 


शिजुओका में मंकीनोहारा ( 80878 ) पठार चाय उत्पादन के 
लिए विख्यात है | ओई नदी के निकटवर्ती क्षेत्र चाय की झ्ञाड़ियों से युक्त हैं । 
पर्वेतीय ढाल चारों ओर से चाय की झाड़ियों से ढके दिखाई पड़ते हैं। चाय के 
पौध से पाँच वर्ष में उपयुक्त फसल ली जाती हैं। उत्तम किस्म की चाय प्राप्त 
करने के लिए चाय के पौधों की कटाई-छटाई की जाती हैं। मई जौर सिम्बर 
के मध्य एक वर्ष में चार वार चाय के पौधों की कटाई-छटाई की जाती है जिसे 
छोटे-छोटे कारखानों में हरी चाय ( 9/89॥ 788 ) बनाने के लिए भेज दिया 
जाता है। इन कारखानों में चाय की पत्ती कटने के तुरन्त बाद भाष के द्वारा 
सुखाया जाता है जिससे पत्तियों का रंग काला न पड़े , ये कारखाने वर्ष के 
लगभग दो माह ही चलते हैं। सभी कार्य मशीनीकृत होने के कारण चाय की 
गुणवत्ता बढ़ जाती है । 


इसके अतिरिक्त काली चाय बनाने के बड़े-बड़े कारखाने पाये जाते हैं 
क्योंकि काली चाय तैयार करने में शीक्रता नहीं रहती है। चाय का मुल्य अधिक 
होने पर भी अधिकांश किसान अपने खेतों में विशेषकर मैकिनोहारा पठार पर 
चाय नहीं उगाते हैं क्योंकि जापान में कृषि क्षेत्रों की कमी है। कुछ कृपक अपने 
खेतों की ढालों पर पंक्तिवद्ध चाय का उत्पादन करते हैं। जापान में प्रति चो 


| 


| 


440 , ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


चाय का उत्पादन विश्व में सर्धाधिक है जिसका प्रमुख कारण उर्बेरकों का प्रचुर 
प्रयोग, अनुसन्धान एवं नयी तकनीक है । 


इसके अतिरिक्त चाय की खेती टोकाई के काण्टो मैंदाव तथा दक्षिणी 
क्यूशु में भी होती है परन्तु यूजी की तुलना में यहां कम गुणवत्ता पायी जाती है। 


यूजी की तुलना में यहां चाय का उत्पादन प्रति चो अपेक्षाकृत कम है। धान 


की प्रचुर कृषि भी चाय की कृषि के विकास में बाधक हैं । 


युद्ध के पश्चात जपानियों के जीवन स्तर में सुधार होने के कारण चाय 
की मांग मे वर्द्धि हुई है। नगरों में यद्यपि कहवा अधिक लोकप्रिय होता जा रहा 
है फिर भी चाय की खपत दिनों दिन बढ रही है। युद्ध के समय प्रति व्यक्ति 
चाय की खपत 8 गैण्ड थी जो ॥965 में बढ़कर १॥ पौण्ड हो गयी । युद्ध से 
पूर्व की तुलना में दो गरुनी वद्धि हुई | विश्व बाजार में जापान की चाय को भार- 
तीय, चीनी और अफ्रीकी चाय से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। युद्ध 


से पूरे जापान की समस्त चाय कया 33 प्रतिशत चाय निर्यात की जाती थी 


जिसके ग्राहक देश संयुक्त राज्य अमेरिका, उत्तरी अफ्रीकी और आपफयानिस्तान 
थे परन्तु वत्त मात समग में चाय का प्रार्यात घटकर १0 प्रतिशत से भी कम हो 
गया है। 


चुकन्दर ( 80087 86७ ) 
चुकन्दर की खेती सर्वे प्रथम होकैडो मे 949 मे प्रारम्भ की गई । इसके 
उत्पादन के लिए जापान सरकार ने अनुदान के रूप में कृपकों की आर्थिक सहा- 
यता किया । ण्यपि चुकन्दर से बनायो गयी चीनी आयातित चीनी से महंगी 
पड़ती है फिर भी विदेशी मुद्रा बचाने के लिए जापान सरकार विशेष ध्यान दे 
रही है । 7955 की तुलना में 967 में चुकन्दर के उत्पादन में 5 गुनी वृद्धि 
हुई । जापान में 985 में चुकन्दर की कृषि के अन्तगंत 73.000 हेक्टेयर भूमि 
लगी हुई थी जिसमें 39,2,000 सी० टन चुकन्दर का उत्पादन हुआ । विभिन्‍न 

वर्षो में चुकन्दर का उत्पादन (तालिका 6.40 से स्पृष्ट) 


चुकन्दर के कृषि के अन्तर्गत गन्ने की कृपि को ,तुलना में 6 गुनी भूमि 
लगी हुयी है। गनन्‍्नें की कृपि का महत्त्व कागोशिमा में सर्वाधिक है जहां इसकी 
कृषि के लिए अनुकूल परिस्थितियां है परन्तु, आन्तरिक सागर के निक्रटवर्ती 
क्षेत्रीं में चुकन्दर की गहन कृषि की जाती है । चुकन्दर की सफल कृषि के कारण 
जापान के चीनी आयात में कटोती हुई हैं। अब जापान आनी आवश्यकता 





क़्षि [ 4| 
तालिका 6.40 


विभिन्‍न वर्षो में चुकन्दर का क्षेत्रफल ( हजार हेक्टेयर ) एवं उत्पादन 
( हजार मी० टन ) 





४४ 





वष क्षेत्रफल उत्पादन 
987 66 346 
4982 भ् म 
983 पर 73 ३3३77 
4984 75 4040 
4985 73 392] 








रबकायातपर साकार धरपआकात- तार फकयाहााायार5 


स्रोत : एफ० ए० ओ०, प्रोडक्शन इयर बुक, 985, बवा० 39 पृ० 408 


का 50 प्रतिशत ही चीनी आयात करता है । आर्थिक दृष्टि से चुकन्दर की कृषि 
का महत्व जापान में अधिक है क्योंकि यह मिठह॒टी की उ्वेरा शक्ति को कम 
मात्रा में लेता है तथा चुकन्दर का अवशेप चारे के कूप में प्रयोग होता है। 
]955 में टोकियो के दक्षिग शीत ऋतु में सफल कूपि करने के लिए अनेक 
अनुसन्धान कार्य किये गये। दक्षिणी-पश्चिसी जापान में इसके लिए अनुकूल 
परिस्थितियां है जहां पर उच्च क्षेत्रों मों शीतकाल में भी अगस्त और फरवरी 


के मध्य इसकी कृषि की जाती है। चुकन्दर से चीनी बनाने के कारखाने चुगोक्‌, 
शिकोक और वसुश्यृ में हैं । 


पशु ( &४॥795 ) 


।960 ओर 966 के मध्य जापान में पशुओं की संख्या मे दुगुनो वरद्धि 
हुयी । 966 सें .3 मिलियन दूध के, .6. मिलियन मांस वाले पशु, 5 
मिलियन सुअर और 09 सिलिमत सुर्गियां थी । 986 में गोपशुओं को संख्या 
47,42,000, भेड़ोंकी संख्या 26000, बकरियों की संख्या 48000 तथा धोड़ों 
की संख्या 23000 थी । जापान में विभिन्‍न वर्षी में पशुओं (५४९४००() का 
विवरण तालिका 6.44 से ग्राप्त हो जाता है | 


१42] जापान की भौगोलिक समीक्षा 
तालिका 6,4 


विभिन्‍न वर्षो मे जापान में पशुओं की संख्या (हजार में 





०-3 


पशु वर्ष 
4982 963 4984 4985 986 








कि की की 3 मजा 2 “ला औ नूर नल" जलन शुनिाााााााााांभााा्ााणणाााणाणआआणएंआएएएाा 





पुहपयारमककमारत+# कर पादा:: आमातनद १ राया तप उमा मेट फ॥7 . ००: जप" 


. गोपशु 4485 4590 4682 . 4698 4742 
2. भेड़ 9 2] 22 24 26 
3, बकरी 60 57 54 5] 48 
3* घोड़े 23 24 24 23 23 
5. सुअर [0040 40273 0423 0778  06] 


6. मुर्गी 299]28 307288 309205 


स्रोत : यूरोपा ईयर बुक, 4987 वा० , वा० 558. 
इतनी अधिक संख्या के बावजूद 50 प्रतिशत प्रोटीन मछलियों से प्राप्त 
होती है । विगत शताब्दी में अधिकाँश पशुओं को मांस के लिए पाला जाता था 
क्योंकि किसानों के पास चारे के लिए अतिरिक्त भूमि नही है | इसके अतिरिक्त 
जापान में पर्वतीय ढालों पर चारागाहों की कमी है क्योंकि उपयुक्त स्थलों पर 
फलों और सब्जियों की खेती होती है। दक्षिणी होकडो, उत्तरी टोहोकू, मध्य- 
वर्ती चुगोक्‌ और मध्यवर्ती क्यूश मे ही चारागाह पाये जाते है। युद्ध से पहले 
पशुओं का पालन कृपि कार्यो, यातायात एवं कम्पोस्ट खाद के लिए भी होता था 
परन्तु आधुनिकता के कारण कृषि कार्यो में मशीनों का प्रयोग होता है और 

पशुओं का पालन मात्र मांस और दूध के लिए होता है। 





नगरों में दूध की मांग अधिक होने के कारण पशुपालन की ओर विशेष 
ध्यान दिया गया । यही कारण है कि 4950 और 966 के मध्य दुग्ध उत्पादन 
में दुगुनी वृद्धि हुई | 950 में पशु सुधार और वृद्धि कानून के द्वारा किसानों 
को पशु खरीदने के लिए सरकार की ओर से ऋण दिये गये। गायों की संख्या में 
वृद्धि होने पर भी केवल 8 प्रतिशत कृषक ही गायों को दूध के लिए पालते हैं । 
अनुसंधान एवं विभिन्‍न तकनीकों का प्रयोग चारागाहों एवं दुग्ध उत्पादन में 
वृद्धि हेतु हो रहा है। भनेक प्रकार की नस्‍लों में सुधार के कारण मांस के साथ 
साथ दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हो रही है (चित्र 6.4 ब)। होल्सटीन (।40]/0॥ा) 
जापान में अधिक दूध देने के लिए प्रसिद्ध है। जापान का 95 प्रतिशत दूध इसी 
नश्ल के गायों से प्राप्त होता है । 


क्च्पि 43 ।) 


सम्पूर्ण जापान कीं 55 प्रतिजत बायें होकेडो में पाली जाती है। यहां के 
25 प्रतिशत विसान दुषध उद्योग में लगे हैं | यहां से वाजार दूर होने के कारण 
अधिकांश दूध से पनीर तथा सूखा दूध तेयार किया जाता है। मोरतीचागा, 
स्नोब्राण्ड तथा मीजी कृम्पतियों का दुःध उत्पादों पर विशेष नियन्त्रण है। काण्टो 
मंदान एवं निकट्वर्ती क्षेत्र तगरों के लिए विज्वेष रूप से दुरघ का उत्पादन करते 
हैं | हान्शिन क्षेत्र के लिए आन्तरिक सागर तट पर स्थित ह्योगो प्रधुख दुब्ध 
आपृत्ति का केच्र है। चारे की उच्च कीमत एवं मशीनों के प्रयोग के कारण 
जापान के दुग्ध उत्पादों की कीमत आयात की तुलवा में 50 प्रतिशत अधिक 
पायी जाती है। 


जापान का ब्राउन ( 870शश) ) चौपाये का प्रयोग मांस के लिए होता है। 
जिन क्षेत्रों में पचछुओ का पालन होता है उनमें से अधिकांश का प्रयोग माँ के 
लिए किया जाता है । पश्चिमी जापान, दक्षिणी क््यूशू और चुगोक में चारायाह 
की उपलब्धि के कारण पच्युपालन व्धिक होता है | कोबे मांस के लिए विख्यात 
है। हयोगों में अनुसस्धान के कारण उत्तम प्रकार का मांस तैयार किया जाता है। 
जापान में विभिन्‍न प्रकार के पशु उत्पादों का विवरण तालिका 6.2 से प्राप्त 
हो जाता है | 


तालिका 6.42 


ब७क 


विभिन्‍न वर्षो में पश्ु उत्पादों का विवरण (मोी० टन) 





पश्षु उत्पाद दर्ष 

4982 4983 984 985 
). गोमांस और वील 480962 494934 5358057 555379 
2. सूअर मांस ]427626 428824  4424204 4534729 
3. पोल्ट्री मांस 450965  4584092 685453 4763205 
4. गाय का दूध. 6747806 7042300. 7437500 7380400 
5. मक्बन 63857 74259 77704 88933 
6. पनीर 7394 67800 69326 68367 
7. मुर्गी का अण्डा. 2057420 2085644 2429948 2440727 
8, कच्चा रेशम ]2904 42457 40780. 9592 


त्लोत : यूरोपा ईयर बुक, 987, वा० ! पृ० 558 





444 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 





चित्र : 6.5 (ब) मांस पल्चुओं का वितरण 
एक विन्दु 2हजार पशु दा द्योतक 
(अ) कोकून उत्पादन का क्षेत्रीय स्वरूप 
एक विन्दु पांच सी उत्त का द्योतक 


सुअर ( 095 ) और घुगियां ( टाल ) 

4960 और 967 के मध्य सुअरों की संख्या में तीन गुनी वृद्धि हुई । 
4986में जापानमें सुअरों की संख्या 4,06,000 थी (तालिका 6.2) काण्टो 
के मंदान में उच्च भूमि पर वर्तान चारागाहु सुमरों के पालने के लिए अनुकल हैं। 


यहां से तेयार सुअरों को टोक्यो भेज दिया जाता है । होकैडो और कागोशिमा 
में भी सुअर पाले जाते हैं । वत्तमान सगय में जापान में गोमोौस के स्थान पर 


सुअर का मांस अधिक लोकप्रिय हो रहा है । (चित्र 6 5 अ) 


सुअरों को भांति मुगियों की भी संख्या में 960से 967 तक तीन गुनी 
वृद्धि हुई। सन्‌ 984में मुगियोंक्री संघया 32,92,05000 थी (तालिका..6.2) 


न 


कृषि प[45 


मुरगियों की मुख्य विशेषता यह है कि ये भौद्यीगिकं; मण्डल में हों भुख्य रूप-से 
पाली जा रही हैं। टोकियों से किताक्यूशू के औद्योगिक मेखला में इनको सुख्या 
अधिक हैं । 


28 हे 
५ 23 
५ का न्क का 

मु 


जापान में भेड़ पालत अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण है जिसके प्रेमुंख कारण . 
यहां की कठोर शीत ऋतु है । 986 में भेड़ों की संख्या 26000 थी। कोरी- 
* डेल (207 998७) शीत प्रदेशों में पाली जाती हैं | इनके प्रमुख क्षेत्र होकैडो 
और टोहोक्‌ है। इनका पालन ऊम की प्राप्ति के लिए होता है परन्तु इनकी 
संख्या में दिनों दिन गिरावट जा रही है। 

जापान सरकार मांस और दुःध उद्योग पर मूल्य नियंत्रण के द्वारा उत्पा- 
दन में वृद्धि पर जोर दे रही है परन्तु पशुओं से सम्बन्धित अनेक उत्पादों का 
लागत मूल्य आयातित मुल्य से अधिक होने के कारण प्रगति में बाधक है। 


रेशस (9॥0 


जापान में 4985 में 9592 मी० टन कच्चे रेशम का उत्पादन हुआ 
( तालिका 6.2 )| जापान का अधिकांश कच्चा रेशम शहतृत की झाड़ियों पर 
रेशम के कीड़े पालने से होता है। उच्च क्षत्रों में शहतृत उगाकर रेशम के 
कीड़े पाले जाते है । पूर्वी काण्टो और ठोशान के परव्व॑तीय क्षत्रों में यह कार्य 
प्रगति पर है। गुम्मा, नगानों, सेटामा और यामानाशी क्षेत्र सम्पूर्ण जापान का50 
प्रतिशत रेशम उत्पन्न करते है। शेष रेशम निकटवर्ती क्षेत्रों और अन्य पर्वतीय 
क्षत्रों से प्राप्त होता है। कठोर शीत ऋतु के कारण एक मात्र होकैडो प्रिफे- 
क्चर में रेशम के कीड़े नहीं पाले जाते हैं ; 


जापान में 49वीं शताब्दी के उत्तराद्ध में रेशम उत्पादन के प्रति उत्सु- 
वता बढ़ी । उस समय विश्व में रेशम की मांग अधिक थी। साथ ही रेशम के 
वीड़ों की वीमारियों के कारण फ्रांस और इटली में उत्पन्त होने वाले रेशम में 
अधिक कमी हो गयी । इस आवश्यकता की पूति के लिये जापान में रेशमी वस्त्र 
उ्योग का विस्तार हुआ। मई से अक्टूबर के मध्य का समय रेशम के कीड़ों 
के लिए अनुकूल होता है (चित्र 6.5 ब)। रेशम के विकास का मुख्य कारण यह 
है कि उच्च क्षत्रों में जो मिट्टी अनुपजाऊ एवं वेकार होती है वह भी शहतूत 
की कृपि के लिए अनुकूल होती है । सहकारी नसंरियों में रेशम के कीड़े पाले 
जाते हैं और लावा (।४४५४४) कृषकों को बच दिये जाते हैं जो 20 से 30 
दिन में कोकून (८००००॥७) तैयार करते हैं। जो कृषक कोकन तैयार करते हैं 


266. ] जापान की भौगोलिक समीक्षा" 

प्राय: मकान के ऊपरी तल को*रेशम के कीडों के लिए7,सुरक्षित रखते हैं इंस 

ः्द्ोए्से बहुत “अधिक लाभ नही होता क्योंकि इनके चनंने-में बहत अधिक श्रम 
! आवश्यकता होती है । फिर भी यह धान की फसल कटने से ! पूर्वे,ग्रीष्म 

एन 'ी लाभकारी फसल है । 


का सका ) के 


. 392 $० तक जाणन के 33 प्रतिशंव कृपक रेशम के .कीड _पालते थे । 
उमर समय, रेशम जापान की प्रसुख सुद्गादायिनी फसल थी । _जापान के. सम्पूर्ण 
निर्यात में 39 प्रतिशत योगदान रेशम उत्पादों _का था।, 4930ई० में रेशम 

। संर्वाधिक उत्पादन हुआ परन्तु 4938 तक नाइलान और « भरर्न्य सिम्थेटिक 
धायों के कारण इसे गहरा धक्का लगा क्योंकि चाइलान और सिन्थेटिक धागों 
की उत्पादन लागते कम होने के कारण इसकी कीसेत॑ रेशत' की तुलचां में बहुत 
कैम थी । ः 


। का 


युद्ध से पूर्व भी शहत्‌ृच के कपि क्षत्र मे कृमी आती गयी और युद्ध के 
समय जब आयातित खाद्य पदार्थ को“रोंक दिया गया तो अधिकाँश कपक शह- 
तूृत_ की झाईियों के स्थान पर खाद्यात्र कत उत्पादन करने लगे.। यही कारण है 
कि ]94»3 तक शहतूत की कृषि के छे३१ फल. में 66प्रतिशत्त की कमी हुयी। व्तें- 
मान समय में यद्यपि रेशम के उत्पादन में कुछ वृद्धि हो रही है परन्तु श्रम की 
कमी के कारण यह हम की ओर उन्मुख है! प्रति चो. उत्पादन अधिक होने के 
कारण क्षेत्रफल की तुलना में उत्पादन मे, (5 + प्रतिशत) . उतवी गिरावट नही 
आयी है | वर्तमान समय में केवल-0 प्रतिशत,क॒पि क्षेत्री पर रेशम के कीड़े 
ले जाते हैं । रेशम की घरेल माग अधिक होने के कारण 4964 से रेशम का 


आपात होने लगी है। अतः जो रेशम निर्षात किया जाता था उसमें वहत 
अधिक कमी आयी है । 


4२ १ 


+ ... कृषि उत्पादन में वि 


का 


द युद्ध के पश्चात जावान मेन्परायः सभी फ़सलों के उत्पादन * में वृद्धि 
हुई है, - जिसके परिणाम वरूप- कूबहों फो आय भी में दुढद्धि हुयी. । इस 

पादत वृद्धि का मुख्य कारण उच्च तकनीक, नयी कृपि-पद्धतियाँ, उन्नत बीज, 
भिचाई की सुविधा, 3 व रको का प्रयोग ,तथा नये-नये अनुसंधान है 4 . प्रति-चो 
उत्पादन विश्व के प्राय. सभ्नी देशो से अध्निक्र है, । | ०, 


पे 


है 


५; मित्री काल के बाद सरकार ने' फसलो'का उत्पादन बिढ़ीने के' लिए पर्किय 
योगदाना दिया । अनैक॑ प्रकीरं केशयोध संस्जार् खोले? यर्ये'।! खाय्येत्रेः्की ओआएँति 
क लिये ये -अनुतंध्रान केन्द्र: अधिकाशतया चाचल; केलिए, स्थापित ऊफिंयेगैयेः | 


कपि | (47 
युद्ध के पूर्व अनुसंधान के परिणाम स्वरूप ही कृषि क्षेत्र , में विकास ,हुआ। 
945 से 955 के मध्य उत्पादन में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुयी | यह वृद्धि 
मुख्य रूप से चावल में हुयी | उत्पादन-के - साथ-साथ घान के क्षेत्रफल में भी 
5 प्रतिशत-की वृद्धि- हुयी । युद्ध- से पूव खाद्यान्‍्त की पूत्ति के लिए 6 प्रतिशत 
चावज्न का आयात होता था-परत्तु 955 तक- जापान चावल के लिए आत्म- 
निर्मेर हो गया | - | 


4962 से चावल के उत्पादन में थोड़ी गिरावट आयी जिसका प्रमुख 
कारण श्रमिकों की कमी थी। अतः-966 में 7 प्रतिशत चावल का आयात 
किया गया. जापानमें प्रति-चो धान का उत्पादन एशिया मंहाद्वीपके करिसीभी देश 


से(अधिक है । 


«.. जापान ,में चावल सर्वाधिक लोकप्रिय खाद्यान्त:हैं। इसलिए जाप्रान के 
जिस किसी भी क्षत्र पर सम्भव है, वहाँ. धान उगाया जाता है। यहां तक-कि 
शीतल, बाढ़, अध्तिचित-आदि-क्षेत्रों में भी धान उगाया जाता है। ओगासा- 
वारा (098959५४०४79) में ऐसा समझा, जाता हैं कि 30 प्रतिशत - धान उन, 
क्षेत्रोंपर उग्ाता, जाता है जो धाच की कपि के सवेथा अनुपयुक्त है । 


धान का प्रति चो उत्पादन तोशान प्रदेश के नगानो प्रिफेक्चर झौर 
तोशगान के पश्चिमी तट पर सर्वाधिक है। यहां पर उन्नत किस्म के वीज और 
बपि में नई-नई तकनीकों का प्रयोग होता है। यहां की भूमि उपजाऊ है और 
लनिचाई के साधन भी उपलब्ध हैं। भूमि की उबेरा शक्ति को ब्लाये रखने के 
जिए धान के खेतो में कोई भी णीतकालीन फसल उत्पन्त नही की जाती है। 
क्यूबू, शिकोक्‌ और पश्चिमी हांशू में प्रति चो उत्पादन कम है | यहां पर विश्व 
युद्ध के बाद » उत्पादन में अपेक्षाकृत कम वृद्धि हुई है। भूमि से अधिक फसल 
लेने के कारण कोड़ो एवं बीमारियों: का प्रकोप वना रहता है। दक्षिणी-पश्मिचृम्ती 
जापान में यद्यपि उत्पादन में सुधार हुआ है ,फिर भी टाइफूनों से घात्‌ की 
फसल की असीम क्षति उस समय होती है. जत़।धान्त क़ो फसल में मुंजरों; निक़- 
लने का समय होता, है । वर्त्ृतान सुमय, में _हानि,को, कम करने ;और उत्पादन 
बढ़ाने के उ्ंश्य से:दक्षिणो ,शिकोक़ ओर . दक्षिणी व्यूझ में , धान के खेतों;से 
केवद्)दो फस्नले ली जाती है ॥- मार्च के महीने,मे ,जल्द पके वाली) प्रभजातिां 
को रोपा जाता।,है। जिसने नर्सरी के -लिए ह्लास्टिकॉडककर- +उष्मा को -संतु« 
लिक्ल रज़ा जीद़ा हैं मा्जक्री3 यह फसल, जुलाई करे! अख़ तक भौढ्र टाईफूक आने से 
पूरे शतैयार द्वो-जाती है . इसी समय द्विवीय डाज़ी ग्रई वर्य॑री।की सोपाई:ख़ेतों: में 


448 | जापान की भोगोलिक समीक्षा 


कर दी जाती है और नवम्बर में काटी जाती है। फलतः: अगस्त और सित- 
अर में बाने वाले. टाइफूनों से अपेक्षाकृत कम हानि होती ' है" क्योंकि धान 
की फसल छोटी होती है । इन दोनों फसलों से उत्पादन 60 प्रतिशत से 70 
प्रतिशत एक फ़सेल की तुलना में अधिक होता है परन्तु 30 से 40 प्रतिशत 
अतिरिक्त उबरक की आवश्यकता होती है। जिन स्थानों पर दो फसल छेने की 
अनुकूल परिस्थितियां नहीं हैं वहां अनुकल एवं उत्तम किस्म की जातियों की 
केवल एक ही फसल ली जाती है । 

।' युद्ध के बाद से चावल के" उत्पादन में सुधार हुआ है, जिसका प्रमुत् 
कारण जल आपूर्ति .पर- नियन्त्रण है। जिन क्षत्रों में उत्पादन 'अ्रति चो कम, है 
वहां पर सिंचाई के साधन एवं जल अपवाह दोपपूर्ण है। जापान के 40 प्रति- 
शत खेतों को सिंचाई की सुविधाए' उपलब्ध नहीं हैं तथा 25 प्रतिशत खेतों 
का 'जल-निकास दोपपूर्ण है। इसलिए उत्पादन में सुधार लाने के लिए यह 
आवश्यक है कि बाढ़ पर नियन्त्रण लगाया जाय तथा अर्धतिचित क्षेत्रों में सिंचाई 
कींसुविधा उपलब्ध करायी जाय ग्रीष्म कालमें आने वालीं वाढों के लिए टोहोक्‌ 
के ' किटाकामी में बांध बनाया गया है।जो जल जमाव के क्षेत्र हैं वहां जल 
निकास की व्यवस्था की गईं है। नोवी मैदान में स्थित आइशी(6४०४४), जो टोन 
और किसो नदियों के कारण शीतकाल में जल लगाव से ग्रस्त रहता था, वहां 
सुधार ऋरके चावल के उत्पादन में वृद्धि की गयी है। आज भी होकूरिकू और 
सैनइन के 75 प्रतिशत्त धान के खेत शीतकाल के जल जमाव से ग्रस्त है ] 
टोच चदी के निकट धान के खेतोमें कभी-कभी फसल नावमें बैठकर 
काटी जाती है । | 


बा, 


असिचित क्षेत्रों में सिचाई के साधनों का विकास करके उत्पादन बढ़ाय 
जा रहा है । आन्तरिक सागर के निकटवर्ती शुष्क एवं अंसिचित क्षेत्रों मे बांध 
बताकर सिचाईं के साधनों का विकास किया गया है। धाव के उच्च कृपि 
क्षेत्रों में त्रांध बनाकर सिंचाई की सुविधा के कारण उत्पादन मे चृद्धि हुई है। 
१950 से अनेक बहुद्देश्यीय योजनायें प्रारम्भ की गई हैं। साथ ही बाढ़ों पर 
नियन्प्रण, सिंचाई के साधनों का विस्तार और विद्यत शक्ति की उपलब्धि से 


सन्‍तोपजनक कक हुआ है । किटाकामी नदी, जो बाढ़-विभीषिका के लिए 
प्रसिद्ध है, 'किंटाकामी नदी विकास योजना” के अन्तगंत बाँध वबनाकर-विद्य॒ त 


उत्पन्त की जा रही है और सिंचाई के लिए जल की सुविधा उपलब्ध है। 
आइशी में बाढ़ नियन्त्रण एवं सिंचाई योजना 968 में पूर्ण हुई जिसके परि- 
णामस्वरूप किसो वदीपर बाँध बनाकर 35000 एकड़ भ्रूमिको सिचाईकी सुविधा 


कर 


' कृषि ! 49 


प्रदान की गई । सिचाई के साथ-साथ इस परियोजना से 30 किलोवाद जल 
विद्यृत शक्ति उपलब्ध हुई और बाढ़ पर नियन्त्रण पा लिया गया। सँगरामी 
पठार (88997 ?8०80) [जब तक सिंचाई के साधनों से दर रहा तव 
तक मात्र सनिक क्षेत्र के ही रूप में रहा परन्तु अब वहां धान की कृषि हो 
रही है | आइशी में भत्सुमी प्रायद्वीप पर 45000 एकड़ धान क्षेत्र है तथा 
40000 एकड उच्च कृषि क्षेत्र का सुधार तोयो (0,0) नदी द्वारा सिचाई' 
से हुआ है । 


जापान के सम्पूर्ण कृपि क्षेत्र का 38 प्रतिणत कृपि क्षेत्र उच्च भूमि कृपि 
क्षेत्र के अन्तर्गत आता है जिसे हेटेक (#8908७) कहते हैं । यहाँ पर प्रति चो 
उत्पादन अपेक्षाकृत केम है और सुधार एवं उत्पादन में वृद्धि धीरे-धीरे हो रही 
है | यहाँ की अनुवं रक हलकी, आसानी से अपरदित होने वाली अथवा कमजोर 
ज्वालामुखी की राख से निर्मित मिट्टी के कारण प्रतिव्यक्ति जाय कम है । परन्तु 
जिन क्षेत्रों में सब्जियां एवं फनों की खेती होती है वहां. प्रति व्यक्ति आय 
बहुत अधिक है । गेहूं, जो और वीन उच्च भूमि की प्रमुख फसलें हैं। चूकि 
धान जापान की प्रमुख फसल है इस लिए विभिन्न प्रकार के अनुसंधान इसी 
फसल के लिए किए गये । यही कारण है कि अन्य प्रकार की फसलों के उत्पा- 
दन में चावल की तुलना में सुधार कम हुआ है) वर्तमान समय में गहरी जुताई 
तथा उर्वरकों के अधिक प्रयोग एवं उन्‍नत किस्म के बीजों के प्रयोग से सन्तोप- 
जनक परिणाम निकले हैं। मिद्दी को अपरदन से बचाने के लिए फसल-च क्र 
टा०90860०॥) का प्रयोग बढ़ रहा है। जापान में पशु-उत्पादों([]५७-४००९- 
9?70060९०॥$ ) की मांग बढ़ने के कारण चारे वाली फप्तलें अधिक उय्ाई 
जाती हैं। अत: शीत काल में केवल 50 प्रतिशत कृपित क्षेत्र पर ही धान की 
फसलें उगायी जाती हैं । | 


जापान की मिट्टी ग्रीष्म कालीन तूफानी वर्षा के द्वारा अपरदन के 
कारण अधिक उपजाऊ नहीं रह जाती है। सदिणो से धान की गहन कृपि के 
कारण मिट्टी में खनिजों, जीवाश्मों एवं जेवीय तत्वों की कमी हो गई है । यह 
कमी उन क्षेत्रों में और भी अधिक है जहां वर्ष में धानकी दो फसलें ली 
जाती हैं। जापान सरकार ने 955 में एक श्वेत-पत्र जारी किया जिसमें बताया 


१50। ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


गया कि 27 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि की मिट्टी “अनुपयुक्त है। अतः वैक्षों-की 
पत्तियों एवं जानवरों से निर्मित कम्गेस्ट खाद एवं "मल*+पमृत्र को खाद के रूप मे 
उपयोग किया गया । वर्तमान समग्र मे रासायनिक उवेरकों_ का प्रयोग तेजी से 
बढ़ रहा है। जापान नीदरलैण्ड के पश्चात प्रति चो उवेरकों का प्रयोग विश्व मे 
सबसे अधिक करता है । उर्व॑रकों का अधिक प्रयोग यद्यपि फमलों के' उत्पांदव 
को बढ़ा देता है परन्तु यह भूमि की उर्थरा शक्ति को; लम्बे समय तक 'सुरक्षित 
नहीं रखे सकता है। * , 
वैज्ञानिक विधियों द्वारा यहाँ के कृषक भूमि की उवबेरा शक्ति बनाये 
रखने के लिए अनेक प्रयास कर रहें है। भूमि में लौह, मौयनीज, बोरैकक्‍्स आदि 
तत्वों को देकर उसकी शक्ति को बनाये रखने का प्रयास किया जा रहा है । 
फसल-चक्र द्वारा अपरदन को रोका जा रहा है । फसलो में विभिन्‍न प्रकार के 
कीटनाशक दवाओं के प्रयोग से प्रति चो उत्पादन मे अधिक वृद्धि हो "ही है । 
इन दवाओं के प्रयोग से कृषको को फसल की देखभाल अब उतनी नही करनी 
पड़ती है । हु 
वर्ष में दो या तीन फसेलों को लेने से ज'पान में उत्पादन में बहुत अधिक 
वृद्धि हुयी है। 932 में जापान में भूमि उपयोग की औसत दर 8 प्रतिशत 
थी परन्तु 4955 में यह दर बंढ़कर' 59 प्रतिशत हो गई । जापान में अधि- 
कांश क्ेपक खाली समयों में बेकार नही रहते हैं । वे विभिन्‍त कोरखानों अ।दिं मे 
अंशकालिक कार्य करके अपनी आय बढाने का प्रयास" करते है | इसलिए भूभि 
उपयोग दर घटकर १965 में ।23 प्रतिशत हं। गयी । जल प्रवाह प्रणाली एवं 
उपयुक्त जल निकास व्यवस्था के कारण शीतकालीन गेहूं, जौ, आदि की कृषि 
में प्रगति हुई है। वर्तमान समय मे समस्त चावल क्षत्र के 33 प्रतिशत क्षेत्र 
मे शीतकालीन फसलें उगराई जाती है । जापान में मास के साथ-साथ फैलो, 
सब्जियों एवं चाय के उत्पादन का महत्व बढ़ता जा रहा है । इसलिए मिगरों के 
त्िकट दिनों-दिन सब्जी एवं फल वी खेती का विस्तार वढ रहा है। कभी-कभी 
शीतकालीन गेहूं और जई की फसल के स्थाव पर प्लास्टिक के घरो में फल 
और सब्जी की खेती की जाती है| फसलों की कतारो के बीच में भी फल और 
सव्जी उगाई जाती है | यह पद्धति दक्षिण-पंश्चिमी जापान के उच्च क्षेत्रों में 
विशेंप रूप से प्रचलित है। 
5 ।जापान में भूमि उपयोग की दर उत्तर से दक्षिण! एक समान नही है | 
होंकेडों और पश्चिमी टोहोक्‌ मे भूमि उपयोग की दर 0 प्रतिशत से कम है 
जबकि क्यूझू में यह दर 440 प्रतिशत से भी-अधिक है । क्यूशू में भूमि उपयोग 


कृषि । !5| 


की उच्च दर का मुख्य बारण अपेक्षाकत गर्म शीत ऋतु है, जहां पर शीत ऋतु 
में भी सफत्त कृपि सम्भव है। इसके विपरीत होकीडोी' के. अधिकांश भार्य॑ श 
ऋतु में वर्फ़ से. ढके रहते है। सप्योर) का शीतकालीन ,तापंमान -4 ८ से ० 
पाया,जाता है परन्त .कायोशिमा का शीतकालीन तापसात्त 82 सेग्रे ० पाया 
जाता हैं इसलिए निस्‍्तवर्ती . एवं उच्च भागों में संबंत्र धान को. सघन कृषि 
जाती है | मध्य जापान में खेतों का आकार _ छोटा... होने के, कारण तथा 
अधिक. जनसंख्या भार के क्रारण कृपक_ धान -की सघन _ कृषि के, साथ-साथ 
नगरों में विक्रम हेत फलो और सब्जियो की भी कृषि करते हैं। जापान के केवल 
उन क्षेत्रों में चाचल की एक फसल उत्पन्न की जाती है जहां पर जल लगाव 
है । कान्‍्टो के केवल ऊंर्षेरी भागों मे शीतकाल में चावल ' की 'एक'. फेंसल ली ' 
जाती है ।: 37० उत्तरी अक्षाँश के उत्त र टोहोकू और 'होकैडो में भूमि उरपधीग 
की दर में कमी-आनी/जांती हैं। इसेंके अतिरिक्ते उत्त र० में जापान ' सागर. के! 
तटीय पर्वतीय - झेंब्रेनें, में, भी शीतंक्गल मं <धोंन उगाने में बाधा पंडंती है'। 
टोहोकू और होकीडो के क्ृपि क्षेत्र बड़े आकार के है इसलिए यहा प्र एक से 
अधिक्‌ फसल उगाने की और जलवायविक,, विपमता के कारण क्ृपक ध्यान 
नही देते है । उच्च- प्रदेशों में उन क्षत्रों मंः शहतूत, ज़्ारेंगी,.सेव. आदि की खेती . 
की.जाती है जो. नगरीय क्षत्र के निकट है। की पे 8 


हो 


च्च 


2 


पान में 877 में कृषि विस्तार सेवा (&दांत्पॉका8 . 26४०7 
587५ं0७) को स्थापना हुई जिसका मुख्य कार्य नये-नगें शोधों एवं तकनीकों की 
जानकारी कुृपकों को उपलब्ध कराना हैं। जापान॑ को 98 -प्रतिशत साक्षरता 
प्रति दो व्यक्तियों पर एक समोचा”' यंत्र, प्रत्येक धरो में द्राशजिस्टर तथा 96 
प्रतिशत घरो में टेलीविजन की सुविधा होने के कारणं कृपको को मई-नई जांन- 
कारी होती रहती है| इसके अतिर्रिक्त अनेक क्रपि के विद्यालय कृषकों की 
सहायता भी करते है। १30 0 


एग्रीकल्चर एक्सटेंशन में 3000 सलाहकार नियुक्त किये गये है । इसके 
अतिरिक्त धाव उगाने, फल, पशु 'आदि के विशेषज्ञ तथा अनेक-भहिंलायें 
कृपकों की महिलाओ को उनकी घरेलू समपथाओ दा सम्बन्ध में ,, सलाह देती ' 
हैं । प्रत्येक सलाहकां र का एक'सीमिति क्षेत्र होता है जिसमें कई सो कृषि क्षेत्र 
आते हैं। यह' सलाहकार एक कृषि अध्ययन क्लब बनत्ता है जंह्वां मित्थ नई-नई ., 
संमस्योओं- पर दिचार-चिमर्श होता है तथा एग्रीकल्चर एक्टशन संबविस द्वारा: 
तैयार शोध पत्रों को पढ़ा जांतों'है जिससे लग लाभ: उठा सकें । यह क्लब - 
प्रयोगात्मक वेरंद्रों (५[)७8॥7970(8॥ 9886073), 'उन्नेतिगील कपि-द्षेत्रों,' प्रंद- 


हा # 
> 


52 ] .._ जापान की भौगोलिक समीक्षा 


शंच के लिए चुने गये क्ष त्रों पर भी समय-समय पर जाकर वहाँ की प्रगति का 
अवलोकन करके नई-नई जानकारी उपलब्ध कराता है। इन स्थानों पर नई-नई 
कम्पनियों द्वारा उत्पादित नये-नये उर्वरकों का भी प्रदर्शन होता है। एक्सटेशन 
सर्विस रेडियो, दूरदर्शन, प्रदर्शनी, व्याख्यान, फिल्‍म आदि की भी व्यवस्था 
करता है। इसी भाँति घरेलू सलाहकार स्टोव, पकाने के ढंग, बच्चों की देख- 
भाल आदि के सम्बन्ध में कार्यक्रम प्रदशित करते हैं।6 वर्ष से 23 वर्ष के 
युवक लोगों के लिए निर्मित क्लब का नाम 4-एच. है जो कृषि सुधार सम्बन्धी 
प्रबन्ध करता है । कुछ सदस्य प्रगतिशील फार्मो पर उसे 6 माह कार्य करके नई 
नई जानकारी प्राप्त करते हैं । 


सहकारिता आन्दोलन (00- 679979५8 ०५श॥९०॥) के कारण कृपेक 
समृद्ध हुए हैं। अधिकांश कृषक मिलकर एक साथ कृषि कार्य करते हैं । क्यूभू के 
मिनामिदनी (॥/)रधागांता) में कृषक सिंचाई, कीट नाशक दवाओं का छिड़- 


काव, धान की रोपाई तथा फसल काटने का कार्य मिल-जुलकर करते है | 
ये लोग मिलकर मकान एवं सडक बनाते हैं। चू कि जापान में साथ-साथ कार्य 
करने की परस्परा सदियों से हैं इसलिए यहां पर सहकारी समितियों का 


विकास प्रगति पर है। सहकारी समितियों का विकास मुख्य रूप से 26वीं 
शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ | 920 ई० तक प्रत्येक गांव मे एक सहकारी 


समिति की स्थापना हो चुकी थी। नेशिमे (४४,॥॥॥७) सहकारी समित्ति 
के सदस्यो' की संख्या 2200 है जबकि यहां पर सम्पूर्ण परिवारो की 


संख्या 2300 हैं । 60 व्यक्ति समिति की चार शाखाओं में विभाजित है जो 
चावल, जौ, तम्बाकू, शकरकन्द, नारंगी, सब्जी एवं पशुओ' की विक्री की 
व्यवस्था करती है। प्रत्येक शाखा की एक दुकान होती है जो बिक्री की व्यवस्था 
के साथ-साथ बैंकिंग की सुविधा प्रदान करती है । इस शाखा के पास चावल 
मिल तथा चाय तैयार करने के कारखाने होते है। शाखा के सात सदस्य 
कृपको को उचित परामर्श भी देते हैं। 


949 ई० में प्रत्येक नगर में सहकारी समितियों की स्थापना हुई जो 
लगभग 50 प्रतिशत कृषि उत्पादों का विक्रय तथा 40 प्रतिशत कृषि क्षेत्रों की 
जरूरतों को पुरा करती थी जिनमे उवंरक, बीज, कीटनाशक दवायें आदि 
सम्मिलित थीं। ऐसी समितियों की संख्या 966 में2000 थी। अनेक समितियाँ 
दूध उत्पादों को तैयार करती थी । इनके पास आटे और तेल की मिले होती 

- थीं। परामर्श के साथ-साथ चिकित्सीय और पुस्तकालयीय सुविधाओं को भी 
ये प्रदान करती थी । भोबिहिरों की सहकारो समिति कृषकों की प्रगति के लिए 
विभिन्‍्त प्रकार की मशीनों को किराये पर देती है। कुछ समितियों के पास 


कृपि [ 53 


हे 


शादी-विवाह आदि के उत्सवों को मनाने के लिए किराये के मकान हैं | कभी-- 
कभी शादी आदि कार्यो के लिए किराये पर कपड़े प्रदान करती हैं। नगानों की 
सहकारी समित्ति कृषकों को टेलीफोन की भी सुविधा प्रदान करती है । 


जापान में कुछ फसलों के लिए विशेष सावधानी एवं तकनीकी ज्ञान की 
आवश्यकता होती है । कोकन, पशु उत्पाद, फल और सब्जी आदि के उत्पादन 
में वृद्धि के लिये विशेष प्रकार की सहकारी समितियां हैं। नेशिमे (१४७॥॥7०७) 
में तम्बाक और फर्चीचरके लिए विशेष प्रकार की सहकारी समिततियाँ है। फलोंकी 
बिक्री सम्बन्धी कार्य की पद्धति प्रत्येक प्रिफेक्चर में सवान नही है । भआाओमोरी 
के सेब प्राय: व्यापारियों द्वारा पैक किए और बाजार तक बिक्री के लिए लाये 
जाते हैं क्योंकि उनके रख-रखाव के लिए कोल्ड स्टोरेज तथा अधिक पूजी की 
आवश्यकता होती है। परन्तु शिजुओकी की 70 प्रतिशत नारंगी की बिक्री होसो 
((१090७) में स्थापित समिति द्वारा की जाती है) सम्पूर्ण जापान में प्रति 
समिति पर परिवारों का औसत 8.3 है। 


भूमि-सुधार ([8॥0 १७४०१) 


युद्ध के वाद जापान की कृषि में जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ 


वह है, भूमि सुधार (चित्र 6.6 ) जिसने पट्टे पर दी जाने वाली भृमि में 
बड़ी कमी कर दी । 


4947 में इस प्रकार की भूमि की मात्रा 46 प्रतिशत थी जो 948 में 
घटकर मात्र 40 प्रतिशत रह गयी । जापान की 33 प्रतिशत भूमि पट्ठ दारों को 
वेच दी जातीथी। इस प्रथाका विकास पिजी कालमें हुआ क्योंकि उससमय चावल 
का मूल्य कम होनेके कारण कृषक भूमि-कर चुकाने में असमर्थ थे। व्यावसायिक, 
सम्पन्न एवं पू जीपतियों हारा भूमि को छोटे-छोटे क्षंत्रां (लगभग 30 एकड़) 
के अन्तर्गत रखा गया | भारत की भांति जापान में बड़ -वर्ड लैण्डलार्ड नहीं 
थे परन्तु 4947 में 8 प्रतिशत लैण्डलार्डो के पास जापान के 50 प्रतिशत कृषि 
क्षेत्र हो गये । इनमे अधिकाँश लैण्डला्ड नगरों में रहते थे और भूमि को पट 
के रूप मों उच्च कीमत पर कृपकों को देते थे । यहां तंक कि वे 50 प्रतिशत 
तक उत्पादन ले लेते थे । 


इस शोपण के परिणाम स्वरूप पढे दारों में असन्तोप की भावना उत्पन्न 
हुयी और एस. सी. ए. पी. (80ए/0॥9 एणाधधाापश ै8७४ 655) 
मे एक आदेश के माध्यम से जापान में भूमि सुधार की भावना कूपकों में जागृत 


54 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


किया । जापान-सरकार' ने 946 में एक. अध्यादेश- 'जारी' किया जिसेके अनु- 
सार/जावान में-कोई' भी ; कपक डाई एकड़- पहोकीडो! में दस एकड़) से! अधिक 
कपि क्षेत्र का-स्वामी नही 'रह"सकृताहै 'तथा 7.5 एकड़ (होकडो में :30 एकड) 
से अधिक क्षेत्र पर कृषि नही कर सकता-है ।-बची :हुयी. अतिरिक्त भूमि जापाव 
सरकार ने खरीद लिया । इस- प्रकार जापान में खेतों.का. ज्राकार और-भी-छोटा 
हो गयां। किराये के रूप में उत्पादन. का. 25 प्रतिशत लेने का: निणय:.फकिया 
गया । भगतान 22 वर्षो में वाण्ड. के रूप में करने का - प्रावधांच-छूखा,ग्रया । 
भूमिसुधार के द्वारा जापान में. 53मिलियव एकड़ भूमि जो..समस्त कूंपियोग्य सूमि 
का 33 प्रतिशत है, सुधार किया गया । -कुछ कृषकों ने भूमि-.का.-.स्वामित्व 


मिलने पर किराया न देने के कारण जचे, हुए-पैसे से मशीन, -ज्लिचाई- के साधन 
और उर्वरकों के-प्रयोग से. गहन कृपि-करना-प्रारम्भ किया ,।-युद्धोत्तए की; -सुद्रा 
स्फीति ने वाण्डो की कीमत को; गिराने के साथ-साथ कृपि क्षेत्रों की-कीमत 
को वढा दिया जिसके परिणाम स्वरूप ऋणों के भुगतान में: कुप्रकों, को: सुविधा 
हुई, परन्तु लैण्डलार्डो को अधिक हानि उठानी पड़ी । 


इस प्रकार 947 और 949 के मध्य के परिव्तेनों का कृषि पर गहरा 
प्रभाव' पडा । लैण्डलार्डो और कपकों के मध्य आय सम्बन्धी अन्तर अन्य-एशि- 
याई 'देशों की 'भांति नही आया '। 4965 तक 80प्रंतिशत्त कृषेक 'भूमि के स्वामी 
बन गये । तनाका वुरैक (80८७) में सभी कृपक भ्रूमि सुधार के पहुंके 
उत्पादन का 53 प्रतिशत लैण्डलार्डो को टैक्स के रूप में दे देते थे ।, इन कूपको 
की आय जापान के अन्य कृपको की तुलना में नग्ण्य है। परल्तु भूमि सुधार के 
कारण अब ये कृपक इतने सम्पन्न हो गए है कि तत्ताका बुरकू के .भ्रत्यंक प्रकार 
के क्रियाकलाब में उनकी राय ली जाती है । ह ः 


जी ] 
जन 


हे भूमि संशोधन ([9॥0 मि०९४89॥79/0॥) 

जापान एक- परव॑ततीय एवं.,पठारी<देश है। |यहां 'की 85प्रतिणत॒-,भुमि 
कृषि -के दवंथा अयोग्य है । इसलिए>यहा के-क पक्रो को कैपि हेतु, उपजाऊ:भूमि 
की-कमी हे । अतः उन्होंने दलदलों,-उथली, झीनों,- तटीय मैदानी, »जंगलों-आर 
ऊबड-खाबड क्षेत्रों को कृषि योग्य बनाना प्रारम्भ किया । , यह कार्य--तोकूगावा 
(70(५६2०५४७)शासनकालमें मुख्यरूप से प्रासम्भ हुआ जिसके परिणामस्वरूप कूवि 
क्षेत्र में 50, प्रतिशत की, उृद्धि हुई ।), मिजी सरकार'ने “होकडो में कृषि - योग्य 
भूमि में , मुधार करके 25-प्रतिशकःकृयि. योग्य भूमि तैयार /कराया ॥ इस"“प्रकार 
]946 से 955ल्‍तक., 2.8:मिलियनः एकड; अतिरिक्त क्रपि योग्य ? भूमि की 


- कषि [ 455 


प्राप्ति हुई। 4966 में कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रकसल :3 मिलियन 'एकड *' था 
जवकि 890 में यह क्षेत्रफल !2.5 मिलियन एकड था। -इस कमी का मुख्य 
कारण मगरों का विस्तार था। 4984 में कृषि योग्य मूमि घटकर केवल.42.2 
लाख ' हेक्टेयर रह गयो। एक और जहां 2.8 मिलियन एकड (सम्पूर्ण -छोती क्षेत्र 
का 20 प्रतिशत ) अतिरिक्त कृषि ग्रोग्य भूमि प्राप्त हुई. वही -नगरीकरण ने 
अधिकाश भूमि पर कब्जा वर लिया | 960. और 965 , के .मध्य केवल 
8 हजार एकड क्षत्र को खोती योग्य बताया -यया ] भ्रूमि सुधार में .नगरीकरण 
एवं ओऔद्योगीकरण की प्रक्रियायें बाधक रही हैं । 


। 


' ]945'के पश्चात भूमि सुधार दी ओर विशेष ध्यान दिया-गया जिससे 
देश खाद्यान्न के मामछे में आत्मनिर्भर हो। भूमि सुधार-अधिकांजतया -:उन 
क्षेत्रों में? हुआ है. जो अपेक्षाकृत उच्च क्षेत्र ((/9वाएं (४8७३) हैं (चित्र 6.6) । 
80 हजार एकड में 70.हजा[र एकड़ भूमि उच्च क्षंत्र की है जिसका सुधार 

कया गया | इस क्ष त्र की भिट्टों वपेक्षाकृत क््म उपजाऊ है ! होकँडो सं 50 


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खित 65.6 जापान ; ओकायामा क्षेत्र से भूमि उद्धार की प्रगति 
प्रतिशत और टोहोक में 25 प्रतिशत उच्च भूमि का सुधार किया गया। इसके 
अतिरिक्त कयुशु ,कान्टो औरटोशान प्रदेशोंगें सुधारकिया गया । साथ हीओद्योगिक 
क्षेत्रों के मिकठ की भूमि में सुधार किया गया । होकेडो और टीहोकू कीःकम 
उपजाऊ भूमि के कारण इस मोर अधिक-ध्यान दिया गया । 


456] जापान की भौगोलिक समीक्षा 
जल अपवाह (079799७) 


भूमि सुधार में अनेक क्षेत्रों के जल-अपवाह तन्त्र पर भी प्रभाव पडा 

आन्तरिक सागर के उत्तरी किनारे पर ओकायामा में कोजी मैदान (((णु 
?977) का सुधार यायोई (४०४०) काल से हो रहा है। कोजी मैदान का 
निर्माण कोजिमा (](०)79) खाड़ी में निरमज्जित क्षेत्रों (?00७7७) पर निश्षे- 
पण से हुआ है | मेसो लिथिक (/९5०॥ (70) काल मों कोजिमा ग्रंताइट क्षेत्र 
कोजी मैदान के दक्षिण में आन्तरिक सागर में द्वीप के रूप में था। इसका 
प्रथम विकास जोमोन (3०गगराणा) काल में हुआ जब समुद्र का जल घटवे लगा 
ओर नवियों में पुनयेवन (फशुंएश्शाव४०7) प्रारम्भ हुमा। अतः नदियों ने 
खाडी मे दक्षिण की ओर नये क्षत्र का निर्माण किया जो कोजी मैदान के नाम 
से विख्यात है | मैदान का विस्तार पूर्व में सैदाइजी (58097) से भोकायामा 
ओर किदी होते हुए पश्चिम में कुराशिकी (।(७ए३आांध) तक है। यहां खेती में 
जोरी पद्धति प्रारम्भ की गई। तटबन्धोंके सहारे-सहारेअधिवासों का निर्माण हुआ 
और 46 वी शताब्दी से पहले शेष सम्पूर्ण क्षत्र पर खेती की जाने लगी । 


कोजिमा खाड़ी में भूमि का सुधार जारी रदा जिसके कारण खाड़ी का 
क्षेत्रफल केवल 5 प्रतिशत रह गया। यह खाडी 47वीं शताब्दी में मुख्य 
स्थल भाग से जुड गयी और पश्चिम में स्थित अचीगाता (४०॥8०४9) खाडी 
से अलग हो गई | 48वी शताब्दी के प्रारम्भ म॑ स्थल खण्डों का विकास हुआ 


परन्तु अधिकार की होड़ ने झगड़े का रूप ले लिया। यही कारण है कि 49वीं 
शताब्दी के प्रारम्भ तक भूमि सुधार क!य॑ रूक गया। 9वी शत्ताब्दी में पुनः 


वीजेन (8|]श) वर्ग के लोगों ने मैदान के पश्चिम व दक्षिण में नये-नये 
निमंज्जित क्षत्रों (१00७75) का सुधार किया । 


भूमि सुधार के विकास का तृतीय चरण 868 में मिजी शासन काल के 
वाद हुआ । सरकार ने बांध का निर्माण करके पीने एवं तिचाई के लिए जल 
उपलब्ध कराया । नये-नये पोल्डर का सुधार किया गया । बांध बनने से 
पूर्व वर्षा के जल द्वारा सिंचाई को पूर्ति नहीं हो पाती धी। बांध के निर्माण 
से खारा जल खेतों तक नहीं पहुच पात्ता है जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति 
क्षीण नही होती है। युद्ध के बाद अनेक नये-नये कृषि क्षेत्र स्थापित किये गये 
जो आकार मे छोटे है परन्तु यहाँ सघन कृषि की जाती है। सबसे वे आकार 
वाले खेंतों का क्षेत्रलल 5 एकड़ तक है । इनमें धान की क्ृपि की 
जाती है। यहां के खेतों में सतसे बड़ी कमी नमक के कारण रह जाती है 
क्योंकि वर्षा ऋतु में नमक की कुछ मात्रा खेतों में जम जाती है । 


कपि 57] 


कोजोसन (](0]05थ॥) संणोधित पोल्डर का प्रमुख स्थान है जिसका 
विकास 870 में हुआ । यहां का अधिकांश श्र कृषि कार्यों और सिंचाई में 
लगा है। यह जापान का सर्वाधिक सशीनीकृत गांव है। जुरोकुमई (फजतशाग०ें) 
में 4960 में 7 कृषकों पर 0 कल्टीवेटर तथा 5 कृपकों पर एक ट्रक्‍्टर था | 
जुरोकुमेई में खेतों का आकार बड़ा होने के कारण खेतों में मश्नों द्वारा कार्य 
सुगमता से किया जाता है। ग्रीष्म ऋतु में घान तथा शीत ऋतु में गेह', 
और जौ की क्वपि होती है । यहां के लोग चिकेन भी पालते हैं। किताकोबिराकी 
(008८०)790) वुरैकू का विकास पोल्डर के संशोधन से 290 वर्ष पूर्व 


द्वितीय चरण में हुआ जो कुराशिकी के ,पूर्व ओवी ( 008 ) करे के 
पास है। यहाँ पर कोजोसान की तुलना में मिट्टी उपजाऊ है जिसमें जीवांश की 
मात्रा अधिक है | यह इगुसा (8058) उत्पादन का मुख्य क्षेत्र है। यह (इग्ुसा) 
दलदल में उगने वाला ऐस' पौधा है जो धान के पुआल के साथ मकानों में 
प्रयुक्त होता है। इसे टटामी(9979) कहते हैं। तोकूगावा काल में ओवी (09७) 
प्रमुख. कपास उत्पादक क्षेत्र था परन्तु अब इथुसा उगाया जाते लगा है क्योंकि 
कपास की उत्पादन लागत आयातित कपास से अधिक होती थी । इगुसा धान 
के बाद दिसम्बर और जनवरी में लगाया जाता है और जुलाई में लेयार होता 
है। आन्तरिक प्लागर के निकट 6000 श्रमिक इगुसा उत्पादन में लगे हैं। जुलाई 
में कटने के बाद इसे धूप में सुखाया जाता है | विभिन्‍न लम्बाइयों में इसे काट- 
कर विक्री योग्य बनाया जाता है | इसके उत्पादन में जहां अधिक श्रम की आव- 
आवश्यकता होती है चही यह भुमि की उपजाऊ शक्ति को भी अधिक नष्ट 
करता है । परन्तु गेहूं की तुलना में इग्रुसा से दुगुना लाभ होता है। इगुसा के 
उत्पादन से जुरोकुमेई के कृपक सम्पन्न है ! 

जापान में भूमि सुधार के लिए कई प्रोजेक्ट चलाये जा रहे है। पश्चिमी 
वयूशू के एरियाकी खाड़ी (870५७ 89५) तथा पश्चिमी टोहोक्‌ के हैशिरों 
झील (४०४0 ॥.9|८8७) प्रोजेक्ट के मुख्य क्षेत्र हैं। एरियाकी खाड़ी के तट 
को 600ई० से ही सुधार किया जा रहा है जिसके परिणामस्वरूप सैगा मैदान 
का आकार वढ़ रहा है । इसी भांति टोहोक्‌ के एकिता प्रिफेवचर में हैशिरो 
झील 5 फीट गहरी थी जिसका सुधार 4957 से हो रहा है । 4957 से अब 
तक 5000 से अधिक नये फार्म बनाये गये तथा 7000 पुराने फार्मो को विस्तृत 


किया ग्यो। इस प्रकार 40 वर्ग मील क्षेत्र का विस्तार किया गया है। 


458 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


पश्चिमी होकेडो के इशीकारी घादी में पीट बोग” (7७४६ 8088) के 
संशोधन से भी अपेक्षित परिणाम भमिकले है | टेढ़ी-मेद्दी इशीकारी नदी को सीधा 


एवं नियंत्रित करने के किए 43 बाँध बनाये गये है तथा पीटबोग को सुखाया 
जा रहा है । इससे 4,20,000 एकड़ भूमि प्राप्त होगी तथा 4500:नये फार्मो 
को उत्पत्ति होगी । ह 


क्न्क 


कृषि योग्य बनाई गई सझुमि ([97व एा०गांगप) ८५ ५ 


पूर्वी ,होकैडो में कोनसेन, टोकाची तथा आओमोरी के कामीकिता क्षेत्र में 
जंगलों को साफ कर कृषि की जा रही है और उच्च भूमि का विक्रास किया जा 
रहा है । कोनसेन मैदान के कुछ भाग का विकास 945 से ही रहा है। यहा 
पर गहन कृपि अभी नही हो रही है | यहाँ प्रधानतः निर्वाहयूलक कृषि की 
जाती है। इसक्रे-अतिरिक्त यहा के कूपक घोड़ो और गायो को पालते है । प्रत्येक 
फार्म पर औसतन 4 घोड़े और 3 गाये अवश्य दिखाई १ड़ती है । 


कोन्सेन मंदान के विकास की नई योजना क्रे अच्तगंत 7,50 000 एकड़ 
भूमि को सुधारने का लक्ष्य रखा गया है। इस क्षेत्र पर 9000 कृषकों को 
बनाने: का भी प्रात्रधान है | यह योजना विश्व बैंक (४४/0०ाघवं 8970) की 
सहायता से 4955 मे प्रारम्भ की गयी । इस दिशा में सरकोर सतत पसलनणील 
है? वुलडोनर, ट्रेक्टर आदि के प्रयोग से ऊची-नीची भूमि को कृषि योग्य 
वनादा जा रहा है। इन विकासजील थोजनामों के माध्यम से- णापात खाद्यान्न 
के मामछे गे आत्मनिभर होने का प्रयास कर रहा है परूतु कृपकों के सामने 
सबसे वड़ी कठिनाई पृ जी की है। आयातित खाद्यान्न गृह उत्पादन वी तुलना में 
सस्ता पडता है। इसके अतिरिक्त जापान के कृपक कारखानों में अशकाबनिक 
कार्य करके अपनी आय बढ़त्ते है । 


यन्त्रीकरण (००।००४2०(०॥) 


युद्धोत्तर काल मे कृषि कार्यो मे मगीनो का प्रयोग बढ रहा है। (चित्र 
67) स्वचालित हल्‍्टीवेटरो क्वा प्रयोग 959 से प्रारम्भ हुआ और 
966 तक प्रत्येक 3 किसानों पर एक कल्टीवेटर की संख्या हो गई। इस काल 
में 88 प्रतिशत धान के खेतों की जुत्ताई इन्ही मशीनों से होती रही है। बैलों 
ओर धोड़ों का प्रयोग जुता३ के लिए मात्र 20 प्रतिशत कृपक ही' करते - थे गे 
जावान में 976- मे 70030 ,ट्रैेस्टर, 432366 हारतरेस्टर, 23000 छूघ 


कृपि । [ 59 
दुहने की मेंगीने थी। बाद के वर्षो में इंनकीः सेडया में निरेन्तर-वुद्धि “हुई- है जो 
तालिका 6.3 से स्पष्ट है। | 


+ ध् 
् 


जे ' *. तालिका-6.3 ' 
विभिन्‍न वर्षो में मशीनों क्वा विवरण' 


रा] 





| 








. वर्ष” 
प्रकोरं 
982 4983 4984 
4< ट्रैक्टर. 4526000। /* १584300.... ,650300 | 
2+ हार्वेस्टर . 974200! :' 0479009 ... 047800 । 
3- दूध दुह़ने की ्ः आर 
भणीने 442000 : 44000 ]460090+% 


न 
3 | 








श्रोतः एफ एं ओ प्रोडक्शन ईयर बुक, 4985, व्‌ल्यूस 39, प०.297.. 


इस प्रकार मणीत्रों के प्रशेव से क्रपि उत्पादनों में पर्याप्त वृद्धि हुई 
जापान में मशीनों के प्रयोग में सबसे बडी समस्या यहाँ के छोटे-छोटे खेत हैं। 
क्षेत्रफन में छोटे खेत होने के कारण उनमे मशीनों द्वारा कार्य सुगमता से नही 
हो पाता है ) मशीनों के प्रयोग के बिना कृपक्र अधिक आमदनी नही प्राप्त कर 
सकता है। खेतों में पशुओं से जुताई आदि कायहजेने |से धान की एकः+ एकड़ 
की कषि 280 दिन में तेयार होती है जवबि मशीनों के प्रयोग से-20 - एकड़- 
खत तैयार किया जा सकता है और फसल तैयार होने में मात्र 480 दिन 
लगते हैं। जापान॑ में खेतों का औसत क्षेत्रफल-2.7 ' एकड़ है. इसलिए मशीनों 
का प्रयोग समस्याप्रद है, जबकि 'पाश्चात्य विकसित देणों 'मे ः बड-बड़े खेतों 
में मशीनों का प्रयोग असान है । इसलिए यहां के कृपकों की' आय पाश्चात्य 
कृपको की-तुलना'म कम'है । कृपको की आय में वृद्धि तभी हो सकती हैः 
खेती का आकार घड़ा किया जाय जिससे उनमें मशीनों का प्रयोग' सुगमता से 
हों सके ड़ 


| मं ल्‍ 


» “,955 ई तक जो ल्ली८ शोध: किये गये, उनका - लक्ष्य, बढ़तीफ हुई 
जनसंख्या के"भरण-पोपण: के लिए उत्तादन:में वद्धि-करता, था।। .इसलिएः खाद्दों 


760 ] जापान भोगोलिक समीक्षा 


के अधिक प्रयोग, उत्नतिशीत्र 
वीजों का प्रयोग और तकनीक 
2, की ओर विशेष ध्याव दिया 
गया । इसलिए जापान में 
प्रति एकड़ उत्पादन विश्व के 
अन्य देशोंकी तुलना में सबसे 
अधिक है। यद्यपि जापान में 
कृषि उत्पादन में, पर्याप्त 
वृद्धि हो रही है फिर भी 
औद्योगिक. उत्पादन की 
तुलना में यह मात्र 33 
प्रतिशत ही है। यह अन्तर 
दिनो-दिन बढ़ता जा रहा 
है। ब्रिटेन की तुलना की 
!00 200 300 जापान में प्रति श्रमिक 

॥॥ ६5 उत्पादन कम है। ॥960 
ओऔर (966 के मध्य 





चित्र 6.7 जापान : 985 में प्रति 400 कृषि फार्मो पर ट्रक्‍्टरों की संख्या 
।-5 “से कम, 2-5-0, 3-0-5, 4-45 से अधिक 


औद्योगिक उत्पादन में दुगती और कृषि उत्पादनों में एक तिहाई की वृद्धि हुई । 
अत्यधिक उत्पादन होमे पर भी जापान के 9.7 मिलियन कृषक, जिनकी 49 
प्रतिशत श्रमशक्ति कृषि कार्यों में लगी है, १966 में राष्ट्रीय आय का मात्र 42 


प्रतिशत आय कृषि से प्राप्त किये | 


६ 


नीके बुरैक ([॥9 8970७) में 9956 से ही एशिया फाउन्डेशन 
(898 #0070800॥) हारा शोध काये हो रहा है। आन्तरिक सागर तट पर 
ओकायामा प्रिफेक्चर में स्थित इस बुरैक की विभिन्‍त समस्याओं का विश्लेषण 
हो रहा है। नीके में जापान के अन्य क्षेत्रों की भाँति खेत छोटे-छोटे होने के 
कारण मशीनों का प्रयोग बाधक है। यहां पर खेतों का औसत्त क्षेत्रफल 2 
एकड़ से कम है । इस समस्या को टूर करने के लिए जापान में कई प्रकार से 
प्रयास हो रहे हैं। कई-कई कषक मिलकर एक ट्रैक्टर खरीदते हैं तथा किराये 
पी मशीयों का प्रयोग दिनों-दिन बढ़ रहा है। 965 में 8 प्रतिशत कृपकों ने 
संयुक्त रूप से पावर कल्टीवेटर खरीदा परन्तु उनके रखरखाव के लिए सबसे 


क्‌्पि [ 6. 


्् 


बड़ी समस्या उत्पन्न हुई । 2 प्रतिशत कूपकों ने सहकारी समितियों के किराये 
के टक्टरों का उपयोग किया | 


965 में जव बउ-बड़ कृषि क्षेत्रों के लिए अधिनियम बना तो सहकारी 
कृषि क्षेत्रों की संख्या में चुद्धि होने लगी | कई-कई फार्मों को एक में मिला 
दिया गया । 4958 में होकडो के नाकाशिवेत्सू (४८४७॥)०७४७७) में चार 
फार्मो को मिलाकर !27 एकड़ का एक फार्म बताया गया । 4965 में ऐसे 
फार्मो की कुल संख्या 380 थीं और प्रत्येक फार्म में परिवारों का जौसत 5.3 
था । यह विधि देखने में ग्राहय्य तो है परन्तु सबसे बड़ी समस्या आय का वितरण 
है। विभिन्‍न प्रकार के अलग-अलग कार्यो मे लगे लोग क्या आनुपातिक ढंग से 
क्षाय का बटठवारा पसन्द कर सकते हैं ? 


नीके वरैक्‌ तथा कई अन्य क्षंत्रों में एक ही कृषक के कई-कई छोटे-छोटे 
फार्म यत्र-तत्न बिखरे हुए हैं। ऐसी दशा में मशीनों का प्रयोग हो ही नहीं 
सकता है । 960 की (('७909 ० #87०7/५७7७) गणना के अनुसार प्रत्येक 
फार्म पर बिखरे हुए प्लाटों की औसत संख्या 5.2 थी । यह विखराबव प्लाटों के 
समय-समय पर की जाने वाली बिक्री के कारण हुआ । इन बिखरे हुए खेतों 
के लिए चकवन्दी करने का प्रयास किया गया तो सबसे बड़ी बाधा कृपकों 
की असहमति थी क्योंकि प्रत्येक कृषक अपने-अपने फार्मो को भिन्न-भिन्न 
फसलों के लिए विशेष लाभकारों समझते है । 


छोटे-छोटे एवं विखरे हुए फार्मो को समस्याओं की कुछ अंश तक जापान 
सरकार ने छोटी-छोटी मशीवों के निर्माण के द्वारा हुल करने का प्रयास किया 
है और इसमें सफलता भी मिली है। 5 हासे पावर तथा 35 एकड़ प्रत्ति दिन 
की जुताई की क्षमता वाले कल्टीवेटरों के स्थान पर 3 एकड़ प्रतिदित की 
जुताई को क्षमता वाले कल्टीवेटरों का आविष्कार क्रिया गया। ये कल्टीवेटर 
कृपकों में काफी लोकप्रिय हैं। हलके एवं छोटे होने के कारण ऐसे कल्टीवेटरों 
का प्रयोग सिचाई, जुताई, कीटनाशक दवाओं का छिड़गाव भादि कई कार्यों 
के लिए किया जा रहा है। युद्ध से पूर्व जिन वड़ी-बड़ी मशीनों का प्रयोग होता 
था, अब उनके स्थान पर कम लागत की छोटी-छोटी मशीनों का अधिक प्रयोग 


हो रहा है जो अधिक लाभप्रद सिद्ध हुई | युद्धोत्तर काल में जापानियों की आय 
में पर्याप्त वृद्धि हुई तथा सरकारी प्रोत्साहन और सस्ते दर पर ब्याज की 
उपलब्धि के कारण क्षृषकों का ध्यान मशीन खरीदने की ओर गया जिसके 
परिणामस्वरूप जापानी कृषि में अभूतपूर्व प्रगति हुई । 


62 ] जापान की भोगोलिक समोक्षा 


जापानी खेतोंसें एक भोर जहां मशीनों के प्रयोगमें बढ़ोत्तरी हुई वहीं दुसरी 
ओर कृषि फार्मोपर कार्य करने वाले पशुओं की संख्या में तेजी से गिरावट आई' 
होकंडो और टोहोक्‌ में अब भी घोड़ों का उपयोग बड़े-बड़े फार्मों पर किया 
जाता है क्योंकि शीतकाल में वर्फ जमने पर भी थे घोड़े उपयोगी है। वयूशु 


के फार्मो पर भी घोड़ों का उपयोग हो रहा है। पश्चिमी जापान मे जहां खेत 

छोटे-छोटे है वहां बड़े-बड़े घोड़ो के स्थान पर छोटे-छोटे बैल रखे जाते है. 
ताकि उन्हें कम खिलाना पड़े । सभी प्रकार के कार्य इन्ही बैलों से लिए जोते 

हैं | जहां पर मशीनों का प्रयोग अधिक खर्चीला है, वहां पर इन्हीं बलों का 

उपयोग होता । घोड़ों की तुलना में चौपायों की रांख्या में गिरावट नहीं आयी 

है। इसका मुख्य कारण मांस एवं दूध के लिए चोपायों का पालन है । 


यद्यपि जापान में कृषि फार्मो पर अधिकांश कार्य मशीनों द्वारा ही किया 
जाता है फिर भी सर्वत्र मशीनों का वितरण समान रूप से नहीं पाया जाता 
है। कान्‍्टो मंदान में, जहाँ के खेत अपेक्षाकृत बड़े है, वहां के फार्मो पर 
कल्टीवेटर का प्रयोग होता है | होकूरिक्‌ में फसलों के बढ़ने एवं पकने का 
' समय कम होता है क्योंकि शीतऋतु अत्यन्त कठोर होती है. और तटीय भाग 
घनाच्छादित रहता है, इसलिए यहां मशीनों का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक होता 
है । 934 में ओकायामा प्रिफेक्चर में बल्टीवेटरों का प्रचलन हुआ भीर 
4958 तक यहां कल्टीवेटरों की संख्या सर्वाधिक हो गई इसी तरह टोकाईकान्टो 
मंदान और होकूरिक्‌ में 4962 तक वल्टीवेटरों की संडज्या अधिक हो गई । यहां 
पर कल्टीवेटरो की संख्या वृद्धि का मुख्य कारण प्रति एकड़ अधिक उत्पादन 
एवं कृपकों को सम्पन्नता है। दक्षिणी शिकोकू और दक्षिणी क्यूशू में जहां 
कृषि कार्य अपेक्षाकत छोटे है और आय कम है, अपेक्षाकत्त कल्टीवेटरों की 
संख्या कम पायी जाती है (चित्र 6.7) । 


जापान में मशीतो के प्रयोग से यदि लगी हुई पूजी और आय में सामनन्‍्जस्य 
हो तो लाभकारी है। सामान्यतया देखा जाता है कि अधिकाधिक मशीनों के 
प्रयोग से उत्पादित वस्तु का लागत व्यय आयाधित खाद्यान्त मूल्य से अधिक 
हो जाता है, फिर भी जापान में अधिकाधिक मशीनों के प्रयोग का मुख्य कारण 
समय की बचत है जिसके परिणाम स्वकू। यहा के कूपक अपनी आय बढ़ाने के 
लिए अशकालिफ कार्य करते है। 


कृषि [ 63 


मशीनों के प्रयोग से उत्पादन लागत अधिक पड़ने के कारण कृपकों का 
ध्यान उन उत्पादनों की ओर है जिनसे अधिक आय प्राप्त होती है। इसलिए 
बचे हुए समय में फलों और सब्जियों की कृषि की जाती है। दूध ओर . माँस 
के लिए गायें, सुअर और चिकेन भी पाले जाते हैँ । नींके (|३॥६७) में वचे 
हुए समय में कृपक पर्वतीय ढालों की भूमि को सुधार कर उस पर वीन, मटर 
तथा अधिक आय वाली फलों का उत्पादन करते हैं | शीश के घरों में अगर की 
भी कृषि की जाती है | कुछ कृपक इग्रुसा ([9५94) भी उत्पन्न करते हैं। खाली 
समयों मे यहा के लोग अनेक प्रकार के कुटीर उद्योगों में भी लग द्धाते हैं। यहां 
के कुछ कृपक टटामी (887४) की बुनाई करते हैं। साथ ही साथ वे घान 
क्रे पुवाल से रस्सियां, थले व चटाई बनाते हैं। : 


यहां के कृषक 50 वर्ष की अवस्था पर कृषि कार्यो से छुट्टी पा जाते हैं 
और वे आराम ग्रहण करते है । कृषक अपना कुछ समय कृषि सम्बन्धित समाचार 
पत्रों, पत्रिकाओं आदि के अध्ययन में लगाते हैं ओर ,समय-समय पर स्थानीय 
शोध केन्द्रों और उन्‍्ततिशील फार्मो में नयी तकनीक सौखमसे हेतु जाते हैं। नीक़े 
की स्त्रियां एक क्लब बनाती हैं जिसमें घरेलू समस्याओं के विपय मों विचार- 
विभर्ण करती हैं । 


मशोनों के निरन्तर बढ़ते प्रयोग से फार्मो पर कार्य करने चाले कृपकों की 
संख्या में जहां कमी हो रही है वही कार्य 'कुशलता के साथ-साथ समय की 
वचत हो रही है । 966 में कृषि फार्मो पर कार्य करने वाले कृपकों की संछ्या 
].] मिलियन थी जो 967 में घटकर 97 मिलियन रह गई। उत्पादन मों 
वृद्धि होने के कारण ओर फार्मो पर कृपकों की संख्या मों गिरावट के कारण 
फार्मो की आय गो वृद्धि हुई है। जिस समय फार्मो पर अधिक श्रम की आवश्य- 
कता होती है उस समय कम संख्या के कारण मजदूरी में तीन्र होती है जिसके 
परिणामस्वरूप खेतों को बड़े आकार में बनाने के साथ-साथ भशीनों का प्रयोग 
अधिक, वढ़ रहा.है 955 में प्रति फार्म का बौसत क्षेत्रफल 2.4 एकड़ था जो 
बढ़कर 4966 में 2.7 एकड़ हो गया | 


सरकारी नीति (60५४27077९7+ #००५) 


सरकार देश की बढ़ती हुई आबादी के भार तथा सीमित क्ृवि क्षेत्र को 
देखते हुए अनेक प्रकार के प्रयास कर रही है। नगर और ग्रामीण क्षेत्रों की 
आय के अन्तर कों कम करने के लिए तथा अधिकाधिक मशीनीकरण के लिए 


464 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


सस्ते दरों पर कृपकोंको ब्याज दे रही है। साथ ही सहकारी समितियोंका विस्तार 
कर रही है जिससे कृपकों को अपने उत्पादनों के विक्रय में किसी भी प्रकार की 
असुविधा न हो । यहां की सबसे वड़ी समस्या है उत्पादित वस्तुओं का अधिक 
लागत मूल्य । आयातित चावल, गेहू, चीनी, सोयाबीन, दुर्धसे बने पदार्थयहां के 
उत्पादन की तुलना में 50 प्रतिशत सस्ते पड़ते हैं। जापान सरकार विदेशी मुद्रा 
की बचत के लिए कृपि उत्पादों को संरक्षण प्रदान करती है। 955 में जापान 
ने अपनी आवश्यकता का 6 प्रतिशत खाद्यान्न आयात किया था जो 966 
में बढ़ कर 23 प्रतिशत हो गया । जापान के 70 प्रतिशत उत्पादन को सरकार 
संरक्षण प्रदान करती है । 


ओद्योगिक विकास 


जापान एशिया महाद्वीप का एक ऐसा अग्रणी देश है जो अपने औद्यो 

विकास को उन ऊचाइयों तक पहुंचाने में मफल हुआ है जहां संयुक्त राज्य अमे- 
रिका, रूस एवं पश्चिमी यूरोप के देश पहुच कर विकसित देश कहलाने लगे 
है | जापान की प्रतिभा का लोहा मातने-के/लिए विकसित राप्ट्र मजबूर हो 
गये है ; यहां पर भोगोलिक बाधाओं के बावजूद औद्योगिक विकास हुआ है । 
जापान में प्राकृतिक संसाधनों और कृषि योग्य भूमि (5 प्रतिशत) की नितान्‍्त 
कमी है । यहां उद्योगों के लिए आवश्यक एवं आधारभूत संसाधनो की कमी है 
जापान अपनी आवश्यकता का 50 प्रतिशत से अधिक कोयला, लोहा एवं 
इस्पात तथा 80 प्रतिशत से अधिक खनिज तेल का आयात करता है। 


आज से चार दशक पहले जापान का सामाजिक, आर्थिक और राजनी- 
तिक स्वरूप भिन्‍न था । सन_868 तक यहाँ के कृपक निर्वाह मुलक कृषि 
करते थे। व्यापारी घोड़ों पर अथवा अपनी पीठ पर समान लादकर मंडियों में 
ले जाते थे । उस समय हस्तचालित उद्योग अधिवासीय मकानों तक ही 
सीसित थे। परन्तु बतेमान समय में जापान का यातायात, व्यापार एवं औद्यो- 


गिके संगठन विश्व के अन्य विकसित देशों की तुलना में सुसगठित है । आज 
यह देश संयुक्त राज्य अभरिका, सोवियत रूस और पश्चिमी जमेनी के सशकेक्ष 


है। संसार में जलपोत, कमरा, ट्रांजिस्टर आदि के उत्पादन में प्रथम तथा विद्युत 
समान, मशीनरी, सिन्थेटिक फाइवर, टेलीविजन और वस्त्र उद्योग में संयुक्त 


राज्य अमेरीका के बाद द्वितीय एवं इस्पात, वाहन, सीमेन्ट और प्लास्टिक के 
उत्पादन में इसका तृतीय स्थान है। पिद्धलें तीस सालों में जापान की अर्थ 


व्यवस्था में दस प्रतिशत की वापिक वृद्धि हुई जो विश्व के किसी भी देश की 
तुलना में सबसे अधिक है । जापान की प्रगति का आकलन इस तथ्य से हो 
जाता है कि जापान के लोगों की औसत आायु में दस वर्ष एवं दो साले के 


466 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


बच्चों की जौसत ऊ चोई में 2.7 इंच की वृद्धि हुई है। 968 में जापाच के 96 
प्रतिशत घरों में ठेलीविजन, 85 प्रतिशत घरों में धुलाई मशीन भौर 78 प्रति- 
शत्त घरों में रेफ़ीजरेटर थे जो यू० के० की तुलना में (क्रमश: 82 प्रतिशत, 4६ 
प्रतिशत, 30 प्रतिशत) सर्वाधिद् है । ओसाका और टोकियो के बीच संसार की 
तीव्रतम रेल सेवा सुलभ है। जापान के उच्च श्रेणी के कैमरे, टेपरिजाडेर, 
रेडियो, जहाज और कार पाश्चात्य विकमप्तित औद्योगिक देशों में गये के साथ 
खरोदी जाती है । 


वतंमान समय में जापान में क्रियाशील जनसंख्या का अधिकांश भाग 
रोजगार परक है जिसका प्र मुख कारण औद्योगिक प्रगति है। 4985 के अनु- 
सार 5,80,70,000 जनसंख्या रोजगार परक है जबकि बेरोजगार व्यक्तियों को 
संख्या केवल 5,60 000 है ' क्रियाशील जनसंड्या का विवरण इस प्रकार है । 


तालिका 7.] 
रोजगार परक जनसंख्या का स्वरूप (हजार मे) 


+मह-0०-या७ माइक भभटि ० ८०:4६: कमी आकर >> 








3 











ह चप 2ः्म०क-#ा १४४ 

प्रकार हर 

१982 983 4984 985 
), सरकारी सेवा 4950 950 4950 9५20 
2. कृषि एवं वनों पर आधारित 5020 4850 4680. 4640 
3. मत्स्य उद्योग 450 460 440 450 
4. खनन 400 १00 80 90 
5, विनिर्माण )3800 44060 44380 44530 
6. विद्य त, गेंस और जल 340 360 350 330 
7. निर्माण 5440 540 5272 5300 
8. व्यापार 2960 3430 43490 43480 


9. यातायात और संचार 3490 3500 3440 3430 
40,फाइनेन्सिग, इन्श्योरेन्स 


रियलइस्टेट 2060 2730 2460 2470 
44.विविध् 30800 44370_ 44750 4960 





योग--- 56380 57330 57660 58074 


| ध्यकरारमहम३जभम2>नपा. कक. टू 4० -पा॑ “कान. 





सन्‌ 982 में जापान में क्रियाशील जनरख्या 5,63,80.000 के 25 प्रति- 
शत से अधिक लोग वेरोजगार थे परन्तु 4985 में इस दर में कमी आ।ई | 





औद्योगिक विकास [ १67 


985में 5,80,70,000 रोजगार परक लोगों की तुलना में बेरोजगारों की संख्या 
मात्र 45,60,000 हो रही जो तालिका 7.2 से स्पष्ट हैं- 




















बालिका 7 2 
रोजयार एवं बेरोजगार जनसंख्या (हजार में) 
वर्ष रोजगार वेरोजगार 
4982 : 56380 4360 
983 57330 4560 
984 57660 4640 
985 58070 560 


आयानयाममनक नम ॥-.. या करू, 





स्रोत--यूरोगा ईयर बुक, 7987, बा० 7, 


जापान में क्रियाशील जनसंख्या का .3 प्रतिशत (980) भाग घरेलू 


कार्यो तथा 7.8 प्रतिशत भाग विभिन्न प्रकार की इकाइयों में कार्य रत हैं जो 
तालिका 7.3 से स्पष्ट है। 


विभिन्न प्रकार के उद्योगों में ।920 में कार्य करमे वाले श्रमिको की 
संख्या 27264 थी जो १980 में वढ़कर 55665 हो गई। इसका मुख्य कारण 
आद्योगिक विकास है । [220 में जब गौद्योगिक प्रदति अत्यन्त मनन्‍्द थी, प्राथ-- 
मिक उद्योगों में 53 8 प्रतिशत जनसंख्या लगी थी परन्तु वर्तेमान समय मे 
केवल 0,9 प्रतिशत जनसंख्या लगी है। तृतीयक उद्योगों में कुल 55.4 प्रति- 


शत जनसंख्या लगी है। विभिन्न प्रकार के उद्योगों में लगे श्रमिकों का विवरण 
तालिका 7,4 से स्पष्ट है । 


तालिका 7.3 
क्रियाशील जनसंख्या का प्रतिशत 
चवे स्वनियुक्त नियुक्त अवेतरनिक 
| श्रमिक श्रमिक घरेलू श्रमिक 
960 22.] 53.9 24.0 
4965 49,7 50.8 9 5 
]970 9.5 64.2 86.3 
975 [7.7 69.2 ]3.॥ 
4980 6,9 7.8 4.3 








स्रोत--पापुलेशन आफ जापान, यूनाइटेड नेशच्स, न्यूयाक 





468 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 





तालिका 7.4 
विभिन्‍न उद्योगों के सेक्टर में लगे श्रमिकों का विवरण 

वर्ष उद्योगों के सेक्टर (प्रतिशत) 

शमिकी को / न जज गनटड सर साररना कक लक ट न 

संख्या प्राइमरी  सेकण्डरी टशियरी अन्ञत्त 
4920 27264 53.8 20.5 23.7 2.0 
930 29620 49.7 20.3 29.8 0.2 
4940 32483 44,3 26.0 29.0 0.7 
]950 36025 48.5 2१.8 29.6 0.] 
4960 44042 32.7 29.7 38.2 0.0 
4970 52593 9.3 34.0 46.6 0.] 
4980 55665 0.09 33.5 55.4 02 


(4333343333++++ 0७ ++७३७५४४+++ ५५५88 ५+० 3५ -+>3>;>आक पर.» +.+3+3+83आ ७० भा+++ ३» +आर कक »++आआआ नम ७+७३३५७५३७३३३३ए पाक» ५ आए ५४४. ५५+००० ५५५० >अममा९७७५#एन३००५७५ ७-९ #प७०-५७५५॥७णक+ब का 





(कमल रदार-कर 7८०० 


स्रोत-पापुलेशन आफ जापान, य्ताइटेड नेशन्स, न्‍्यूयाके, 4984 


जापान के भारी उद्योगों ((१४४५४ [000५768) में धातु, मशीन, 

, रसाथन आदि तथा हल्के उद्योगों ([॥8 [700$0]88) में खाद्य, वस्त्र, बरतंन 

आदि उद्योग आते है । दोनों प्रकार के उद्योगों में लगे श्रमिकों की संख्या सें 

लगभग समानता है क्‍योंकि भारी उद्योगों में 49.3 प्रतिशत और हल्के उद्योगों 

में 50.7 प्रतिशत श्रमिक लगे है। चित्र 7.4 एवं तालिका 7.5 में भारी और 
हल्के प्रकार के विभिन्‍न्र उद्योगों में लगे श्रमिकों का विवरण दिया गया है। 


तालिका 7.5 
उद्योगों में लगे श्रमिकों का विवरण 
"टन सनम नया मनन सर जन्‍म नरक कान र+स»» सम न +अक नाश पलक नरन मनन मन बन + मनन) प++ जन न >ज-2> 0०2०-०४ 3८ 4२०५ ४८००७ अ 3०9 
प्रकार अभिकों की संख्या सम्पूर्ण श्रमिकों का प्रतिशत 
अ-भारी उद्योग 5368770 89.3 
(।) धातु 470450 3.5 
(2) मशीन 3444240 34.6 
(3) रसायन 457380 442 
व-हलल्‍के उद्योग 5524230 50.7 
(4) खाद्य १]65230 40.7 
(2) वस्त्र 845700 -. ]3.0 
(3) बर्तन 2940300 27.0 
_ ब्रोग-+..... 6890606 ्ा्ा्रम््शखांॉंपछ5+7 ]00.00 


.. ज्ञौत--पापुरेशन आफ, जापान, यूनाइटेड नेशन्त, स्यथाक उ984 न्युयाके, 4984 


औद्योगिक विकास [ 469 


एशिया महाद्वीप 

का मात्र जापान ही 
हट] 8६०७४ ॥35 % मे रच हक बी से ऐसा देश ् जो 
॥35 + ॥53 % पृणरूपेण विकसित हे । 

यहां की भौद्योगिक 

प्रमति मे समस्त पाञ्चा- 
त्य देशों' को आश्चर्य - 
चकित कर दिया है। 
इलेक्ट्रानिक्स उद्योग में 
वर्तमान समय में 


रस 2 
/ ४ है 2 कक 8 

2 4 १8 नी जापान के समकक्ष विश्व 
१0 (9 ४११ ' का कोई देश नहीं है। 
| औद्योगिक प्रगति के 

'हिडसरपननपरर कारण ही जापान में 

आय्िक वृद्धि का प्रतिं- 
शत जनसंख्या वृद्धि के 
चित्र 7.] जापान: भौद्योगिक रोजगार की वृद्धि. प्रतिशतसे कई गुना अधिक 










+37++87 
+++44 १६७ -70 *, 


शा 9 क्ष है की 





१५६ 5५ 
। 00 अमीर नम मलिनि मिलन लि नमी लिकद, 











(4980-85) है जो इस प्रकार हैं। 
तालिका 7,6 
आविक और जनसंख्या वृद्धि का-मनुपातिक स्वरूप (अतिश्वत मे) 
पट मल 
जल आशिक वृद्धि जनसंख्या वृद्धि प्रति व्यक्ति 
; आय वृद्धि 
पका ७७५७ ३७७५3» ७७७3७ 33५५)५०७७०३७००७९०७५००७५०५५७.३५०५५०५७०५५३०७५०५५०५७७५५५७-.२५७३७०५-५२५०५००७०४७०५४३५० 3० ५०७०५४०७+ ०७ +0 मम ००८५० ०३०३५ का नम रकम मकर ज*क 
960 2,5 0.9 44 7 
4965 5.7 4,0 4.6 
970 40.4 4.7 9.2 
975 3.6 .4 2.5 
979 5.5 0.8 4.7 





न मनकनानन कम नन मनन कक नंबर ० +++>+० >> 323०3... >++८२२+० २०० > अमन पर«> रन >०9० निशान व था नल चााइााारााा॥ा॥४)|ंभ__एए॥५्स्‍घ्घघछ्घ्घ््घाां 
लोत--परापुछेशन बराफ जापान, यूनाइटेड नेशन्स, स्यूयाक, 984 


तालिका से स्पप्ट है कि 960 में जायान की जनसंख्या मे 09 प्रतिशत 
की वापिक वृद्धि हुई | इसकी तुलना में देश की आधिक वृद्धि 42.5 प्रतिशत 


470 ] जापान को भोगोलिक समीक्षा 


हुईं जो इसकी समृद्धि का परिचायक है। बाद के सभी वर्षो में आर्थिक वृद्धि 
जनसंख्या वृद्धिसे अधिक रही है। 960 मे प्रति व्यक्ति 44.7 प्रतिशत की आर्थिक 
प्रतिशत हुई जो 4975मे घटकर 2.5 प्रतिशत हो गयी। जनसंख्या वृद्धि पर निय- 
न्त्रण तथा आर्थिक समृद्धि के परिणामस्वरूप 979 मे पुनः प्रति व्यक्ति आथिक 
वृद्धि 4.7 प्रतिशत हो गयी । जापान में प्रति व्यक्ति ग्रास नेशनल प्रोडक्ट 
(जी० एन० पी०) .655 मिलियन येन है। 


जापान के लोगों में राष्ट्रीय भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। यहां का 
कोई व्यक्ति खाली समय में वेकार नही बैठा रहता है। आय में वृद्धि करने के 
लिए यहाँ के लोग विभिन्‍न प्रकार के उद्योगों में आ शकालिक कार्य करते है। 
960 में 6.3 प्रतिशत ऐसे व्यक्ति थे जो अशशकालिक कार्यों में लगे थे। अश- 
कालिक कार्य करने वाले लोगों की संख्या में दिन प्रतिदिन वृद्धि हो रही है जो 
इस प्रकार है ! 


तालिका 7.7 


अंशकालिक कामगारो का विवरण (हजार में) (कष्येत्तर उद्योग) 








वर्ष कामगार अशकालिक कामगार प्रतिझ्त 
4960 206 33 63 
965 2773 [78 6,6 
970 3222 2]6 6.7 
१975 3556 353 9.9 
]980 3886 390 हं 0,0 


(३932 कर > गा रा ५ पक नमनमाक ४३०५०...» 4५०० माना++ पार कक 


स्नोत:- पापुलेशन आफ जापान, यूनाइटेड नेशन्स, न्यूयार्क, 984 


तालिका से स्पष्ट है कि जापान के लोगों में अपनी आय में वृद्धि करने की 
होड़ सी लगी हुयी है क्योकि यहां के लोग खाली समय में बेकार नहीं बेठ रहते 
है। यही कारण है कि अ शकालिक काये करने वाले लोगों की संख्या में उत्त रो- 
त्तर वृद्धि हो रही है। 960 में अंशकालिक कार्य करने वाले लोगों की संख्या 
33000 (सम्पूर्ण का 6.3 प्रतिशत) थी जो 4980 में बढ़कर 390000 
(40.0 प्रतिशत) हो गयी । 





संसाधनों का अभाव और राष्ट्रीय जागृति ये दो ऐसे कारक है जो जापान 
की औद्योगिक प्रगति के सृत्रधार है । यदि ऐसन होता तो द्वितीय विश्व युद्ध में 





ओद्योगिक विकास [ 7! 


ही रोशिमा और नागासाकी जैसे नगरों पर संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भिराये 
गये बम के प्रह्मर से हुई असीम क्षति के बावजूद प्रगति कैसे कर सकता था ? 
आज जापात की भोद्योगिक प्रगति उस स्तर तक पहुंच गयी जिसे अमेरिकी 
विशेषज्ञ जापान जाकर अवलोकन करते है। इसलिए संसाधनों के साथ-साथ 
उप्तकोी राजनीतिक स्थिति. सामाजिक विकास एवं आर्थिक पृष्ठ-भूमि पर दृष्टि- 
पात करना अत्यावश्यक है । इस विवरण हेतु जापान के औद्योगिक विकास को 
चार कालों में विभाजित किया जा सकता है जो इस प्रकार है। 


. आद्योगिक विक्वास की नींव वा काल ( 4868--880 ) 


2, ओद्योगीकरण का प्रथम चरण ( 884-493[ ) 
3. औद्योगीकरण का द्वितीय चरण ( 932-95व ) * 


4. ओऔद्योगीकरण का त्तीसरा चरण ( १95 के पश्चात ) 


4. औद्योगिक धिक्रास की चींद का कार 


बल 


जापान का विकास प्रिजी सरकार के शासनकाल से प्रारम्भ हुआ । निर्वाह 
मूलक खेती (509श/शाएप /970०फ०५:७), का विकास किया गया। इसके 
स्थान पुर सघन खेत्ती अपनायी गई और भूमि उपयोग की दर को 400 प्रतिशत 
से 68 प्रतिशत तक बढ़या बया। अतः भओद्योगिक विकास के लिए पर्याप्त 
पूजी की उपलब्धि हुई । इसके साथ ही वढ़ती हुई जनसंख्या से भी अधिक 
खाद्यान्त का उत्पादन होने लगा | इस सरकार का मुख्य लक्ष्य राष्ट्र को सैसिक 
एवं आर्थिक दृष्टिकोण से सम्पन्त एवं सुदृढ़ खवाना था। इस समय जापानियों 
की धामिक एवं राष्ट्रीयता की भावना ने सरकार का धरपूर सहयोग किया । 
65वीं से लेकर नवीं शताब्दी के चीनी प्रभाव के स्थान रप 9वीं शताब्दी में 
पाश्चात्य सभ्यता के विकास के कारण जापानियों के दष्टिकोण में पर्याप्त परि- 
वर्तेन आया । 


इस कालमें सैनिक विकास प्रचुर मात्रामे किया गया! अतः जर्मनी और ब्रिटेन 
से सैनिक सलाहकार बुलाये गये जिसके परिणामस्वरूप हथियारों को वनाने के 
लिए एक लौह एवं इस्पात उद्योग का घिकास किया गया । सरकार ने अन्य 
उद्योगो को लगाने के लिए दूसरे देशों से सलाहकार के साथ-साथ कदपुर्नो का 
आयात किया ! 49वीं शताब्दी में ऑद्योगिक विकास बहुत कुछ खेती की प्रगति 
पर निर्भर था क्योंकि प्रारम्भिक औद्योगिक विकास के लिए खेतीगत कच्चे माल 
की आवश्यकता होती है इसलिए अधिक उत्पादन के लिए उत्तम बीजों तथा 
खादों का प्रयोग किया गया । यह उत्पादवत औद्योगिक विकास के लिए पुजी के 
साथ-साथ कारखातों में कामगारो के लिए अत्यधिक खाद्यान्न प्रदान किया है। 


]72 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


सरकार ने बीजों के सुधार और खेती तकनीक में विकास के लिए प्रोत्साहन के 
साथ-साथ पूजी प्रदान की | अधिकांश बड़े किसानों को अपने पड़ोसी किसानों 
को प्रशिक्षित करने का उत्तरदायित्व सौपा गया। किसानों की तीज प्रगति 
का आकलन इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि उत्पादन का 30 प्रतिशत से 
40 प्रतिशत टैक्‍स देने के बावजूद परिवार के भरण-पोषण हेतु पर्याप्त खाद्यान्त 
था । इस प्रकार 880 तक उत्पादन में 80 प्रतिशत की वद्धि हुई और खैती के 
क्षेत्रों का विकास 35 प्रतिझत तक हुआ | एक बोर जहाँ किसानों की आय में 
वृद्धि हुई वहीं दूसरी ओर अत्यधिक टैक्स प्राप्त करने के कारण औद्योगिक 
विकास के लिए सरकार को पर्याप्त पुजी की उपलब्धि हुई । 


इस काल में ऊचे टेक्‍स और विदेशी कपास तथा चीन की प्रतिस्पर्धा के 
कारण किसानो पर भारी दबाव पड़ा । अतः ऊ चे टेकक्‍स के कारण कुछ किसानों 
ने अपनी भूमि बेच दी | और किराये पर (क्राध0 खेती करने लगे। इस 
प्रतिस्पर्धा के कारण किसानों को खेती के कार्य में आमूल एरिवर्तेत करना पड़ा। 
गन्ना और कपास, जो आन्तरिक सागर के निहूट उत्पन्त किये जाते थे उनके, 
स्थान पर शहतूत (॥४७७०७॥]०७७) फल, तथा सब्जियां उगाई जाने लगी 


क्योंकि कपास और गन्ना का सस्ते दर पर आयात हो जाता था। मिजी सरकार 
ने सामाजिक स्तर में परिवतंन किया | शिक्षित एवं समर्थ लोगों को उद्योगों को 


लगाने के लिए प्रोत्साहित रिया जिनमें काम करने के लिए वे लोग सम्मिलित 
किये गये जो खेती के कार्यो से वंचित थे । सरकार ने तकनीकी ज्ञान में बुद्धि के 


लिए 4872 मे शिक्षा को अनिवाय॑ के कर दिया । शिक्षा के इस प्रकार के प्रसार 
से खेती एवं ओद्योगिक विकास में वृद्धि हुई |तोकगावा काल (600ई. से 
3868 ई*) में केवल 30 प्रतिशत साक्षर थे परन्तु मिजी काल में 65 प्रतिशत 
बालक और 37 प्रतिशत बालिकायें साक्षर थी। 


ओद्योगिक विकास के लिए सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं और सुविधाओं 
का विकास किया । ब्रिटिश सलाहकारों की सहायता से 4872 ई० में टोकियों 


से याकोहामा के मध्य प्रथम रेलवे लाइन का निर्माण शुरू हुआ। अनेक 
सड़कों की मरम्मत की गई । सामुद्रिक व्यापार एवं जलसेता के लिए जलयातनों 


का निर्माण किया गया। 87] ईं* में डाकघरों और दूरभापों का विकास 
किया गया। शोगुन द्वारा स्थापित प्राचीन औद्योगिक इकाइयों को आधुनिक 


बनाया गया। प्राचीन, सूती, रेशमी, इस्पात, कागज ग्रास, सीमेंट आदि उद्योगों 
को नया रूप दिया गया | 877 में सरकार ने खेती एवं औद्योगिक ज्ञान की 
वृद्धि के लिए टोकियो में एक विशाल प्रदर्श नी का आयोजन किया । सरकार ते 
पुरानी इकाइयों को सस्ते दामों पर बेच दिया तथा अनेक इकाइयों को समुराई 


भौद्योगिक विकास [ 473 


पा) परिवारों को दे दिया जो ओद्योगिक प्रगति के कारण अत्यधिक 
न हो गये थे। इस सम्पन्न ग्रप को ज॑ंबात्सू ( 28080 ) कहते थे जिनमें 
3ई (॥8७) मित्सूबिशी (॥रश5प99) सुमितोमों (5प्ञा//070) और 

/ (दा(४०४५४००४)ग्रुप प्रमुख थे । 
'. समणए्त औद्योगिक विकास के लिए निरन्तर पूजी की आवश्यकता थी। 
७ पूजी दूसरे देशों से तथा कुछ पुजी घरेलू टेक्‍्स और समुराई वाण्ड से 
प्त होती थी। इस प्रकार धीरे-धीरे औद्योगिक विकास होता गया क्योंकि 
एप्ट्रीय हित को ध्यान में रबते हुए कामगारों को वेतन कम दिया जाता था 


प्रोर शेप लाभ औद्योगिक विकास मे लगाया जाता था। सरकार ने व्यापार को 
अपने नियन्त्रण में ले लिया । अतः रेशम,चाय, तांवा और कढ़ाई के सामानों के 


निर्यात से प्राप्त दुर्लभ विदेशी मुद्रो का प्रयोग उद्योगों की मशीनों और कच्चे 
करे आयात पर लगाया मया। प्राय सभी नये उद्योग आयातित कच्चे 
प्राल्ष पर ही आधारित थे । वस्त्र उद्योग के लिए रेशम तथा ईधन के लिए 
कोयला एवं लकड़ी के लिए देश बात्मतिर्भर था परन्तु मशीनरी, लोहा एवं 
क्रपास का आयात करना अनिवार्य था। 4869 के पूर्वाद्ध में सरकार ने व्यापा- 
रिक ब्यूरो (007रशष्ठाएं४ 8प्ाघ80) की स्थापना की जो निर्यात के स्तर के 
सुधार पर ध्यान देता था। इस प्रकार मीजी सरकार ले एक ओर जहां साक्ष-- 
रता में वृद्धि की वही दूसरी शोर औद्योगिक विकास की नींव भी रखी । बौद्यो- 
गिक विकास एवं विस्तृत व्यापार के कारण जैवात्सू ग्रुप हारा निजी क्षेत्रों में 
भारी मात्रा में उद्योगों का विकास हुआ | 


2. ओद्योगीकरण का प्रथम चरण (88-93]) 
(॥6 छा98 ?॥288 ० ॥गञताए।9872900) 
जापान भें 4880 से 93] के मध्य का काल राजनीतिक स्थिरता और 
ओद्योगिक विकास का काल था । मिजी काल में स्थापित झौद्योगिक इकाइयों 
का बड़ पेमाले पर विस्तार किया गया । 880 के पश्चात शोगुन (5॥080॥) 


ओर पु जीपतियों द्वारा स्थापित पुराने कारखानों को आधुनिक बनाया गया 
तथा वस्त्रोद्योग की अनेक इकाइयां स्थापित की गई । 4890 के पश्चात लौह 


इस्पात उद्योग, इन्जीनियरिंग उद्योग, तथा पोत छत्तरी क्यूभू, ओसाका 
और टोकियो में लगाये गये। कोयले और तांबे की अनेक 


खाने खोली गई । इसके अतिरिक्त कामज, शीशा, सीमेट, सिरामिक आदि 


उद्योग लगाये गये । )894-95 में चीन-जापान युद्ध के कारण जापानियों में 
राष्ट्रीय चेतना जायूत हुई । अतः पर्याप्त औद्योगिक विकास के कारण जापान 


सुदूर पूर्व कां एक शक्तिशाली राष्ट्र बन गया। जाप्रान अपने साम्राज्य को 
बढ़ाने में लग गया। 86 में बोनिव, 075 में 870 में क्यूराइल रियृक्‍यू तथा 


474 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


में [89 5में इसने फार्मसोसा पर अधिकार कर लिया। 4905 में सोवियत रूस को 
हराकर दक्षिणी सम्रालिन पर और]940में कोरिया पर अधिकार कर लिया। प्रथमौ 
विश्व युद्ध (97-5) के समय उसने मैरियाना, कैरोलीन और माशैल द्वीवपों 
पर जमंत्ती <पनिवेश को समाप्त करके 9]8 में अधिवार कर लिया । 937 
में मचूरिया पर क्रधिकार कर लिया इस प्रकार छितीय विश्व युद्ध।94-45) 
तक जापान का नियस्त्रण न्‍्यूमिती से मंचूरिया तक हो गया था । 


इस चरण में वस्प्रोद्योग का विकात अन्य उद्योगों की तुलना में अधिक 
हआ । सूती और रेशमी वस्त्रों के उत्पादव में आशातीत वृद्धि हुई। 900 ई. 
में सभी उद्योगों के श्रमिकों के 66 प्रतिशत श्रमिक वस्त्रोद्योग में लगे थे । यह 
उद्योग कुटीर उद्योग के रूप में भी विकसित हुआ । रेशमी वस्थों के उत्पादद 
के लिए कच्चा माल स्थानीप क्षेत्रों से भिलने लगा परन्तु सृती वस्त्रों का 
उत्पादन अपर्याएा था फिर भी जापान में कमर मजदूरी होने के कारण यह 
उद्योग इ गलैण्ड के लंकाशायर वस्त्रोद्योग को अधिक प्रभावित किया क्योंकि 
बस्त्रो का दाम अपेक्षाकृत्त कम था । 


सरकार ओद्योगिक भुदृश्यों के विकास क लिए सतत प्रयल्वशील थी । 
)0] प्‌ यावाता आइस एण्ड स्टील बक्से की स्थापना उत्तरी क्यूश में की 
२९६ । इस कारखाने के लिए ईंधन स्थानीय क्षोत्रों से प्राप्त होता था परन्तु 
५ बचे लोहे का आयात किया जाता था। मित्यूविशी पोत निर्माण या 
पे। विकास नव सेना के लिए किया गया । ओसाका और टोकियों में विदेशी 
केस्पनियों के सहयोग से कई प्लास्ट पाये ग्रये;इनमे डनलप, फोर्ड और जनरल 
मोटर कम्पनी प्रमुख है "अनेक देगों के सीथ व्यापारिद सम्बन्ध भी स्थापित 
. किया गया । उद्योगपत्तियों की पू जी में पर्याग्य वृद्धि होने के कारण बड़े पैमाने 
(॥.878० 8०80) के उद्योग लगाये गये । टोडफ़ियो से लेकर उत्तरी क्यूश तक 
एक औद्योगिक मोखता बने गई जिप्में लोह-इस्पात, भारी मशीन, पोत निर्माण, 
सीमेंट, कागज, शीशा, अलकोहल, उर्वरक, वर्तंन आदि के उद्योग स्थापित किये 
गये । इसमे पर्याप्त पू जी, उच्च तकनीक एवं सघन श्रम की आवश्यकता होती 
है। उत्तरी क्यूशू लौह इस्पात तथा ओसोका वस्त्रोंद्ोग के केन्द्र के रूप में विक- 
सित हुए। इसी काल में व्यावारियों द्वारा केद्रीय मण्डन (006 28॥6) 
में छोटे-छोटे घरेलू वर्कंशाप स्थापित किये गये जिसका परिणाम अत्यन्त सन्‍्तोप- 
जनक रहा । घरो में वर्कशाप स्थापित करते से कम लागत पर ही उत्पादन में 
वृद्धि हुई क्योकि व्यापारियों को इसके लिए अलग से न तो मकानों की आव- 
श्यकता पड़ी और ने महँगे श्रमिक । ओसाका के निकटवर्ती क्षेत्रों में छोटे-छाटे 
इंजीनियरिंग के सामान, साइकिल के पुर्जे, रेशम और सूती वस्च की इकाइयाँ, 


औद्योगिक विकास [ 475 


स्थापित की गई | इसके अतिरिक्त प्रेतो (580) बोर एरिता (#पराध)मे वतन 
तथा क्योटा में कढ़ाई के वर्कशाप विकसित किए गये । इस प्रकार छोटी-छोटी 
घरेलू ओद्योगिक इकाइयां बड़ी-वड़ी इकाइयों की पूरक के रूप में जापानी 
समद्धि भें सहायक रही । 


जापान के औद्योगिक विकास ने यहां के व्यापारिक प्रारूप को परिवर्तित 
कर दिया जिसके परिणामस्वरूप अनेक प्रकार के उत्पादनों का निर्यात होने 
लगा। सूती एवं रे५मी वस्त्रों का निर्यात ०0 प्रतिशत से भी अधिक होने 
लगा । कच्चे माल की आपूर्ति के लिए सरकार ने आयात के लिए सुविधाए 
प्रदान किया । आयात की जाने वाली वस्तुओं में कपास, लोह खनिज तथा 
मशंनें मुख्य थी | 984 से 7934 के मध्य का समय जओद्यागिक भूदश्यों के 
विक्रास वा था। इस समय कृषि उत्पादों में जहां सुधार हुआ वही सिचित क्षेत 
को यात्रा में वृद्धि हुई । किन्तु बढ़ती जनसंख्या के कारण 30 प्रतिमत खाद्यान्न 
का आयात होने लगा | इसमें आयातित चावल की मात्रा 20 प्रतिशत थी । 
प्रथम विश्व युद्ध के कारण एशियायी एवं यूरोपीय वाजारों से मशीनरी, पोत, 
वस्त्र, रमायत आदि वस्तुओं का आयात-नर्मात बन्द हो गधा था इसलिए इस 
मांग की पूति हेतु जापान में जौद्योगिक विश्ञास अनिवाय हो गया । 930-3॥ 
का समय जापान के औद्योगिक एवं व्यापारिक प्रगति के उतार का काल था 

रस्‍्तु १93 के वाद राष्ट्रीय भावना एवं नई पद्धति के कारण भौद्योगिक 

उत्पादत में अधिक वृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप उत्पादनों की कीमत में 
गिरावट आई | लौह एवं इस्पात, इंजीनियरिंग, पोत निर्माण तथा वस्त्र उद्योग 
के उत्पादनों में अधिक गिरावट आयी । 


इस काल में अनेक जेैवबात्सू (28059) उद्योगों का विस्तार हुआ 
और यह एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति के रूप भें उयरा। सैनिक महत्व की 
दृष्टि से सरकार ने लौह एवं इस्पात तथा पोत्त निर्माण उद्योग को अपने हाथ में 
ले लिया। ]920 और 30के मध्य जापांत से अ)ना प्राभव एवं नियन्त्रण निकट- 
वर्ती एशिया पर बढ़ा लिया । जापान की इस विस्तारवादी नीति के कारण 
उसे सस्ते मूल्य पर खाद्यान्व एवं कच्चात्माल मिलने लगा | फारमोसा से चीनी 
और चावल, कोरिया से चावल, मंचूरिया से कोयला एवं लौह खनिज की पूर्ति 
होने लगी, परन्तु चीन जापान के वाजारों के लिए कच्चे माल का सबसे प्रमुख 
स्रोत था। इस प्रकार अधिक जनसंख्या के कारण चीन वस्त्रों, मशीनों, और 
अन्य औद्योगिक उत्पादों के लिए एक विस्तत वाजार के रूप में उपलब्ध हो 
गया । [94] से 4945 के मध्य मलाया से रबर और टीन, भारत से लौह 
खनिज, वर्मा और थाईलैण्ड से चावल, पूर्वी द्वीप समूह से खनिज तेल और 


का 


]76 | जापाव की भौगोलिक समीक्षा 


रबर की पूति होने लगी । इसके बदले जापान से तैयार माल इन देशों को 
निर्यात किया जाने लगा। 


[920 और 30 के मध्य अधिक जनसंख्या, सीमित खाद्यान्न उत्पादन 
तथा कृषि योग्य भूमि की फमी के कारण जापान सरकार यहां के निवासियों 
को निकटवर्ती क्ष त्रो मे बसाना चाहती थी, परन्तु ठण्डक के कारण यहां के लोग 
मंचूरिया में जाना पसन्द नहीं किये साथ ही अन्य देश जापानियों को अपने यहां 
आने की अनुमत्ति प्रदान नहीं किये । जिसके परिणामस्वरूप 938 तक केवल 
7 लाख 50 हजार जापानी ही दूसरे देशों की ओर प्रस्थान कर सके | 
अधिकांश लोग हवाई, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राजील को बोर प्रस्थान 
किये । वर्तमान समय में केवल दस लाख जापानी ही विदेशों में निवास करते 
हैं जिनमें 50 प्रतिशत ब्राजील मे और लगभग 40 प्रतिशत संयुक्त राज्य अमे- 
रोका में निवास करते हैं । 


ओद्योगीकरण का हितीय चरण (957 | 
(7क्‍6 86९070 ए॥986 0 प्रावाहाएं श24॥0) 


इस काल में जंसवात्सू राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरे जिसके परि-- 
णामस्वरूप औद्योगिक विकास में तेजी आयी । लौह एवं इस्पात उद्योग, रसायन 
उद्योग थोर इंजीनियरिंग उद्योग में विविधता आई। 930 के दशक मे 


जापानी निर्यात व्यापार में परिवर्तन आया। वस्त्र उद्योग, धातु, इ जी नियरिय 
और रसायन उद्योप्रो की तुलना में कम महत्वपूर्ण हो गये। 930 मे 59 
प्रतिशत बस्त्रों का निर्यात होता था जो 936 में घटकर केवल 38 प्रतिशत 
रह गया जवकि धातु और इंजीनियरिंग के उत्पादनों मे दंसी काल से ]6प्रति- 
शत के स्थान पर 28 प्रतिशत तथा रासायनिक वस्तुओं की 8 प्रतिशत के स्थान 


पर ]] प्रतिशत कीवृद्धि हुई । इस समय भी जापान लोह खनिज एवं इस्पात 
पिण्डों का आयात करता था क्योंकि जहाज निर्माण, इंजीनियरिंग तथा अनेक 


प्रकार के पुर्जे एवं औजारों का निर्माण इन्ही खनिज पदार्थों से होता था । विश्व 
युद्ध के कारण जापान की बहुत बड़ी पराजय हुई जिसमें जापान के 44प्रतिशत 


प्लांट तथा मशीनरी नष्ट हो गयी । अतः इस समय ओऔद्योगिक उत्पादन केवल 
30 प्रतिशत हुआ | 945 और ॥947 के मध्य जापान में औद्योगिक चिकास 
करने की नई चेतन। आयी । इस काल में 50 अधिशत से अधिक का व्यापार 
खाद्यान्न को आयात करने में होता था । 


औद्योगिक विकास [ 477 


ओऔद्योगीकरण का तृतीय चरण (95 के पश्चात) 
([06 ॥॥#9व श896 ० 608४ थौॉट४00॥) 


95 के बाद जापान औद्योगिक विकास के तृतीय चरण में प्रवेश किया 
. और!955 तक युद्ध से पूर्व की स्थिति को प्राप्त कर लिया। 3955 और 960 के 


मध्य औद्योगिक सत्पान में 200 प्रतिशत और 960एवं 950के मध्य 400प्रति 
शत की वृद्धि हुई । 960 में जापान संयुक्त राज्य भमेरिक, सोवियत रूस और 
'पश्चिमी जर्मनी के पश्चात ब्रिटेन के समांत संसार का चौथा औद्योगिक एवं 
व्यापारिक राष्ट्र हो गया । /000 तक इतनी तीन गति से विकास हुआ कि 
प्रति व्यक्ति भाय इंटली के बराबर, पुतेगाल की दूनी और भारत की दस गुनी 
हो गयी । जापात यद्यपि विकासशील देशों की तुलना में एक विकसित राष्ट्र है 
'फिर भी ब्रिटेन में प्रति व्यक्ति आय की तुलना में आधा तथा संयुक्त राज्य 
अमेरिका के प्रति व्यक्ति आय की तुलना में आय केवल ]/4 है । औद्योगिक 
एवं कृषि उत्पादन में 966 में चार गुनी वृद्धि हुईें। 4967 में सम्पूर्ण श्रमिकों 
के 45 प्रतिशत श्रमिक उद्योगों में लगे थे जबकि कृषि कार्यों में इनकी संख्या 
केवल 9 प्रतिशत थी ! 


जापान में श्रम साध्य उद्योगों के स्थान पर कम पूंजी वाले उद्योगों को 

लगाते पर अधिक बल दिया गया । वस्त्र उद्योग तथा अन्य छोढे सामान वर्केशापों 
में तैयार किए जानते लगे जर्बाक ये उद्योग मावर्कासत देशों में श्रम प्रधान है 
यद्यपि 4945 से वस्त्र उत्पादन में वृद्धि हुई है परन्तु सम्पूर्ण औद्योगिक उत्पादनों 
के मुल्य की तुलना में इसका मूल्य मिरा है। 935 में इसका सम्पूर्ण उ त्वादन 
का १9 प्रतिशत था जबकि 4962 में घटकर यह केवल 0 प्रतिशत रह गया । 
इन्जीनिर्यारिय उद्योग में तीज़ विकास होने के कारण उत्पादन मूल्य बढ़कर 36 
प्रतिशत हो गया । इसके अन्तर्गत जहाज निर्माण, इलेक्ट्रानिक, वेद्यूतिक सामान 
. एवं मोटर गाड़ियां प्रमुख हैं । वस्त्रोद्योय जौद्योगिक विकास के प्रथम चरण में 
अधिक उपयुक्त था क्योंकि उस समय इस उद्योग में कम पूंजी की आवश्यकता 
होती थी तथा मजदूरी की दर कम थी, परन्तु वर्तमान समय में जापान में श्रम 
की दर भारत, चीन आदि विकासशील देशों की तुलना में कई गुना अधिक है। 
95 के पश्चात उद्योगों में विकसित तकनीक के प्रयोग के साथ पूंजी का 

निवेश किया गया 4 सरकार ने मूलभूत - उद्योगों को बढ़ाते के लिए प्रोत्साहन 
दिया जिनमें लौह एवं इस्पात, वैद्य तिक सामान, यातायात, खनिज तेल शोधन, 
पेद्ोकेमिकल, सिन्थेटिक फाइबर, रेजिच (86७॥) तथा मभोदर उद्योग प्रमुख हैं । 
जापान ने यद्यपि द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात ही तीत्र औद्योगिक विक्रास किया है, 


478 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


फिर भी वह संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चात सिन्थेटिक फाइबर तथा वस्त्र 
उद्योग में द्वितीय स्थान रखता है। मीटर उद्योग में विश्व में इसका तृतीय 
स्थान है । 4956 के पश्चात जहाज निर्माण, स्टील, रेडियो, वैद्यतिक सामान 
प्लास्टिक के सामातों में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है। जापान में 955 से 
प्रति वर्ष 0 प्रतिशत की वापिक उत्पादन वृद्धि संसार के किसी भी देश की 
तुलना में अधिक है । 955 भौर १966 के मध्य भौद्योगिक उत्पादन में 4 
गुनी वृद्धि हुई जबकि यह वृद्धि सोवियत रूस में दुग्रुती, यू. के. में ॥/3 ग्रुनी 
एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में 45 गरुनी हुयी । 4955 और १966 के मध्य 
यू. के. के निर्यात में जहां केवल 34 प्रतिशत की वृद्धि हुई वहीं जापान में 260 
प्रतिशत की वृद्धि हुई । 960 और 966 के मध्य जापान मों औद्योगिक आय 
में 29 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 4978 से इस्पात उत्पादन में जापान का तृतीय 
(संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के बाद) ओर निर्यात में प्रथम स्थान है । 
विश्व निर्यात वाजार में जापान का 30 प्रतिशत का योगदान है । यदि 975 
को समस्त मशीनरी उत्पादन का सुचकांक 400 मान लिया जाय तो 960 के 
दशक में यह जहां 6.5 आता है वही 978 में 3.3 आता है जो जापान 
की औद्योगिक प्रगति का सूचक है | इस समय वस्त्रोद्योग का प्रगति सूचकांक 
07.7 तक पहुँच गया | 4978 से सीमेन्ट के उत्पादन में सोवियत रूस के 
बाद जापान का विश्व में द्वितीय स्थान है। जापान का औद्योगिक विकास निर्यात 
वाजोर और खपत के क्ष न्र प्र आधारित है | यहां का 29 प्रतिशत उत्पादन 
निर्यात किया जाता है। इस प्रकार हम सह सकते हैं कि जापान का औद्योगिक 
विकास विश्व की समृद्धि एवं विस्तृत बाजार पर आधारित है । 


वर्तमान समय मों 4973 की तुलना में जापान के विभिन्‍न प्रकार के 
उद्योगों में रोजगार प्रतिशत तालिका 78 से स्पष्ट है । 


तालिका से स्पष्ट है कि सर्वाधिक श्रमिक अवेद्युतिक (. प्रतिशत) 
और वेद्युतिक (3.9 प्रतिशत) मशीनों के निर्माण में लगे है। खाश्र पदार्थ 
वाले उद्योगो में इनकी संख्या 9.8 प्रतिशत है। यातायात और धातु 
उत्पादनमें लगे लोगों की संख्या क्रमशः 8.7 प्रतिशत और 7.7 प्रतिशत है। अन्य 
किसी भी उद्योग में श्रमिकों की संख्या 5 प्रतिशत रे भी कम, है। सबसे कम 


श्रमिक (0.3 प्रतिशत) चमड़ा और चमड़े के सामान बनाने वाले उद्योगों में 
लगे हैं । 








ओद्योगिक विकास [ 479 
तालिका 7.8 
विधिध उद्योगों में रोजगार का प्रतिशत भाग 

प्रकार 4973 98॥ 
- खाद्य 8.3 9.8 
2-  बरत्र 9,6 7.3 
3- कढ़ाई 3,6 4.4 
4- चमड़ा और चमड़े का 

सामाव 0,3 03 
5- फर्नीचर ' १.6 .6 
6- कागज 2.0 2.7 
7- छपाई और प्रकाशन 4.4. 4,7 
8- रसायन 2.3 2.0 
9... रबड़ उत्पाद .3 4.3 
40- प्लास्टिक उत्पाद 2.8 3.4 
44- चीनी मिट्टी के बर्तन 28 3.4 
42- कांच 07 0,6 
43-- लौह-ईस्पात 4.8 4.0 
]4- अलौह धातु 4.5 [4 
85- धातु उत्पाद 8.0 7 
6- अवेद्य तिक मशीन [|.4 4.4 
7- वेद्युतिक मशीन : 42.6 3.9 
48- यातायात सामान 8.7 8.7 
9-- वेज्ञानिक सामान 2.0 2.4 
20- अन्य विनिर्माण 2.] 2.] 
24- फुट वियर 0.3 0.3 
22- लकड़ी और लकड़ी उत्पाद 4.8 3.9 





स्रोत: यूनिडो हेण्ड बुक आफ इन्डस्ट्रियल इस्टेटिस्टिक्स, 4984, पृ० 49 


4955 भें जापान का कुल ग्रास नेशनल प्रोडक्ट 8864.6 बिलियन येन 
था जो 975 में बढ़कर 49634.6 बिलियन येत हो गया । विभिन्न वर्षो में 
जापान का राष्ट्रीय उत्पादन (6 प7?)इस प्रकार रहा । 








80 | जापान की भौगोलिक समीक्षा 


तालिका 7.9 
कुल राष्ट्रीय उत्पादन (जी. एन. पी.) (विलियन येन में) 

वर कल 
4955 8864.6 
960 6207.0 
965 3283.7 
4970 73049.5 
4975 74963].6 





ज्रोत : जापान स्टैटिस्टिकल ईयर बुक, 978 


तालिका से स्पष्ट है कि प्रत्येक 5 वर्षो में जापान की सम्पूर्ण राष्ट्रीय 
आय में लगभग 00 प्रतिशत की वृद्धि हुईं है। 965 की तुलना में 970 
में दो गुनी से भी ज्यादा वृद्धि हुई है। जापान में क्रियाशील जनसंख्या के 
परिवारों की औसत मासिक आय 286,000 येन है जबवर्कि खर्च 227,600 येन 
है । यह आय और व्यय 965 की तुलना मों बहुत अधिक है । विभिन्‍त वर्षों 


के परिवारों के आय एवं व्यय का विवरण तालिका 7-0 से प्राप्त हो 
जाता है । 


तालिका 7.0 
श्रमिकों के परिवारों का मासिक आाय-व्यय (हजार येन में) 








वर्ष 
मद 
[965 970 975 4977 
(अ) आय ' 65.4 209.9 236.2 286.0 
4. मजदूरी 60.7 405.5 222.5 269.2 
2. अन्य 4.4 म्र्ठ 3.7 6,9 
(व) व्यय 54.9 9].9 86 7 227.6 
, रहन-सहन 49.3 82 6 66.9 ]97:9 
2, भोजन 7.9 26.6 49 8 580 
3. आवास 4.9 9.3 46.6 48.7 
4. ईंधन भओऔर प्रकाश 2.2 3.0 6.2 हम 
5. वस्त्र 5.7 8.8 47.2 49.3 
6. अन्य 24.4 44.2 96.9 24, 0 
(स) बचत ' 40.2 24.] 49.5 58.4 


स्रोत-स्टैटिस्टिकल हैण्ड बुक आफ जापान, 4978 


मामा इक मम 


औद्योगिक विकास ह [ 8] 


औद्योगिक विकास के आधारी तत्व 


शबित संसाधन (?०४४श 880 ७7025) संसाधन (70५ २8४५0७7865) 


जापान के तीत्र ओद्योगिक विकास के कारण जापान को प्रति पांचवें 
वर्ष शक्ति संसाधनों में 00 प्रतिशत की अतिरिक्त वृद्धि करनी पड़ती है। 
शक्ति संसाधनों में कोयला, जल विद्युत शक्ति, खनिज तेल आदि जापान 
की आवश्यकता को पूर्ण करने में असमर्थ है । इनसे 50 प्रतिशत से भी कम 
आवश्यकता की पूति होती है । खनिज त्तेल जापान में प्राप्त घटिया किस्म के 
कोयले की तुलना में सस्ता और आसान पड़ता है परत्तु इसका आवात जापाव 
फी अर्थ व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालता है। जापान में प्रथण आणविक शक्ति 
स्टेशन 960 में बचा जिसे 74 प्रतिशत आयातित ईघव पर आश्रित होता 
पड़ा । शक्ति संसाधनों में 4967 में 66 प्रतिशत योगदान भायातित खनिज तेल 
और गैस का, 24 प्रतिशत कोयले का, जल विद्युत शक्ति का ) प्र तिश॒त, लकड़ी 
का एक प्रतिशत और आणविक शक्ति का योगदान सात्र 0.) प्रतिशत था । 
थौद्योगिक विकास के लिए शत्रित के साधन प्रथम आधारी तत्व हैं क्‍यों कि 
बिना शक्ति के साधनों का आज औद्योगिक विकास कठिन है । 

 कोबरब्छ(०००) ह 


आधुनिक शक्ति संसाधनों में कोयला का महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी उप- 
योगिता को देखते हुए इसे काला सोचा, काला पत्थर आदि नामों से पुकारते 


हैं। जापान की 24 प्रतिशत शक्ति की पूति (967) कोयले से होती है | विश्व 
युद्ध के पूर्व अन्य शक्ति संसाधनों की तुलना में यह अग्रगण्य था परन्तु जल 
विद्यत शक्ति और खनिज तेल की प्रतिस्पर्धा के कारण कोयछे का महत्व गौण 
हो गया है । 966 में जापान अपनी आवश्यकता का 7० प्रतिशत कोयले का 
उत्पादन करता था जो घटिया किस्म का होने के साथ-साथ कोक के अयोग्य 
था। खानों से निकालने में महु अधिक व्यय साध्य भी था। इस कारणों से 
आयातदित कोयला सस्ता पड़ता था। 96 में कोयले का उत्पादन 35 मिलियन 
टन था। घटिया किस्म का होने के कारण उद्योगों में उपयोग धीरे-धीरे 
कृम होने लगा । अतः 967 में इसका उत्पादन घटकर केवल 48 मिलियन 








482 ] जापान को भोगोलिक समीक्षा 


टन रह गया । जापान में 984 में ,66,45 हजार मी० टन कोयले का 
उत्पादन हुआ । विभिन्‍त वर्षों मों कोयले का उत्पादत इस प्रकार है । 


तालिका 7.]4 


विभिन्‍न वर्षो में कोयले का उत्पादन (हजार मी० टन) 


कोयले का उत्पादव हि 








हाई कोयला. ब्राउन कोल एवं 

लिगनाइट योग 
4974 20333 75 20408 
975 ]8999 6 9060 
976 ]8396 53 48449 
]977 [8246 हा 48303 
व978 48992 , 39 903१ 
4970 47644 32 4१7676 
4980 ' 8027 25 448052 
4984 47687 20 7707 
4982 ]7606 |8 ]7624 
4983 ]7062 - 5 47077 
4984 40645 दा 0845 


"धाााााााभकक: आला काक्षामममाककछ 7 ऋतु र"पजाआ"ााााााअल>. मल ललनललु नल चल लबक है नल न मल लक नल ली ला 2, 
स्प्रोत- यरू० एन० इंडस्ट्रियल स्टेटिस्टिकल इयर बुक, 983 बा० ], पृ०] 
तथा यूरोपा ईयर बुक, 4987, वा० १, पुृ० 4558, 


प्रस्तुत तालिका से ज्ञात होता है कि जापान में कोयले के उत्पादन में 
उत्तरोत्तर कमी हो रही है । 974 में कुछ 2,030,8,000 मी० टन कोयले 
का उत्पादन हुआ जो बाद के वर्षो में घटता गया । 977 में कोयले का उत्पा- 
दन घटकर 48303000 मीं० ठन हो गया परन्तु 4978 में बढ़कर 9034000 
 मी० ठव हो गया । पुचः 7979 में उत्पादन घटकर 7676000 मी० टन हो 
गया । 984 में कोयले का उत्पादय घटकर 6645000 मी० ठव हो गया । 
ड्रस कमी का मुख्य कारण घटिया किस्म का कोयला: है । 


औद्योगिक विकास [| 83 


जापान का 80 प्रतिशत कोयला टरशियरी युगीन चट्टानों में पाया जाता 
है। यहां पर पाया जाने वाला निम्त कोटि का विदृमिवस कोयला है जिसमें 
कार्बन की बहुत कम मात्रा पाई जाती है-। सम्पर्ण कोयले का केवल 25 प्रति- 
शत कोयला ही कोक के योग्य पाया जाता है। इसलिए जापान को अपनी 
-सम्पृर्ण आवश्यकता का 90 प्रतिशत से अधिक कोयले का जायात करना पड़ता 
है। इसके अतिरिक्त जापान में खानों से कोयला निकालना अत्यस्त मंहगा पड़ने 
के साथ-साथ खतरनाक भी होता है क्योंकि भूमियत सोतों (897799) गैसों 
एवं भूकम्पों (£8/0प५४४८७७) का भय सदा बना रहता है खानों के आधु- 
निकीकरण के लिए अधिक पू'जी की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं कारणों से 
यहां कोयले का प्रति व्यक्ति प्रति शिफ्ट (($%#) केवल 4.5 टन है जो ब्रिटेल 


हल #7६0.05 
; कि ८0०४५ #६॥.0$ 


2॥4..3.000 १०३5 57 6०#।. | 


शप 
छपी: 2 
7 0 / 


| 
| 


!75000 ॥+९॥0.0.9.।7६85 
(0000 ; गा 
5000० ५ 





चित्र 7.2 जापान : ऊर्जा के प्रधान श्रोत्त 
क-खनिज तेल एवं कोया के उत्पादन क्ष तर 
।-तैल क्षेत्र, 2-प्रमुखकोयला क्षेत्र 3- अच्य कोयला क्षेत्र 
ख-तेज शोधन क्षमता का क्षेत्रीय स्वरूप 


॥84 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


(.85 टन) तथा संयुक्त राज्य अमेरिका (6 टन) से कम है। इसलिए संयुक्त 
राज्य अमेरिका से आयात्तित कोयला उत्पादित कोयले की तुलना में ' सस्ता 
पड़ता है । 

कोयला उत्पादक क्षेत्र 


दो कोयला क्षेत्र जापान के 89 प्र तिशत कोयले का उत्पादन करते 
(चित्र 7.2)है। उत्तरी वयूशू और होकेडो जापान के प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र 
हैं। इसके अतिरिक्त दक्षिणी-पूर्वी टोहोकू में जोबान ((3३७४०) तथा पश्चिमी 
चुगोक में ऊबे (006) अपेक्षाकृत छोटे खादान क्षेत्र है। 


. $, उत्तरी वयुश्‌ ((४०7॥0॥॥ (५०७0५) | 

यह जापान का प्रमुख कोयला उत्पादक क्षत्र है। कोयले की अधिकांश 
खाने क्यूश्‌ के उत्तरी भाग और चुगोकू प्रदेश के यामागरुच्ची प्रिफेक्चर में पाई 
जाती है । यह क्षत्र जापान का '44 प्रतिशत कोयला उत्पन्न करता है। टेक्टो- 
निक गति के कारण यह क्षेत्र कई कोयला उत्पादक वेसिनों में वंट गया है । 
प्रमुख कोयला उत्पादक वेसिन किता क्यूशु के निकट उत्तरी पूर्वी तट पर चिकृुहो 
वेसिन (0000 89०४) है | दूसरा भ्रमुख वेसिन क्षेत्र उ त्तरी-पश्चिमी 
क्यूज में मिके (४॥।९७) बेसिन है। इसके अतिरिक्त सासेबो में कोयले का उत्पा- 
दन होता है । यहां का कोयला घटिया किस्म का है और इसे निकालने में भी 
अधिक कठिनाई होती है । यहां पर कोयले का उत्पादन सर्चप्रथम प्रारम्भ हुआ 
अत: यहां की अधिकाँश खाने अयोग्य हो गई है। साथ ही यहाँ कोयले के 
उत्पादन में भी दिन प्रतिदिन गिरावट आ रही है । 962 में कोयछे का उत्पा- 
'दन 27 मिलियन ठने हुआ परच्चु 4905 में त्रदकर फैल 2] मिलिप्रत ठव रह 
गया । विरव युद्ध के समय, जब कोयले की नितान्त आवश्यकता थी, उस समय 
अधिकांश खानों में खतन कार्य हुआ। 


यहाँ की खा्नों को सबसे बड़ा लाभ यह है कि ये समुद्र की आसान पहुच 
में है जहाँ से जहाजों में कोयला लाद कर जौद्योगिक केन्द्रों को पहुचाया जाता 
है। उत्तरी व्पूशु में चिकुहो कोयला क्षेत्र में अधिकांश ओ द्योगिक इकाइया 
स्थापित की गई है। लौह एवं इस्पात उद्योग तथा रसायन उद्योग, जिन्हें ईंधन 
के रूप में अत्यधिक कोयले की आवश्यकता होती है, उनका विकास यहां अधिक 
हुआ है | ु 
2. होकेडो (।400(७४0०) 

यह जापान का द्वितीय प्रमुख कोयला उत्त्पादक क्षेत्र है। यह कोयला क्षेत्र 
इशीकारी वेसिन के पूर्वी भाग में स्थित है। युवरी (७27) यहां का प्रमुख 


ओद्योगिक विकास [ 285 


खनन नगर है । यहां पर कोयले की पूर्ते बपेक्षाकृत मोटी हैं। अधिकांश 
पर्तों की मोटाई दो से तीन फीट है | अत: यहां पर उत्पादन अपेक्षाकृत अधिक 
, होता है। 965 में प्रत्येक माह में मौसतन 43 टन कोयले का उत्पादन हुआ 
जबकि वयूशू में मात्त 3.6 टन था । यहाँ की खाने उत्तम किस्म के कोयले का 
उत्पादन करती हैं जिनमें 50 प्रतिशत को किंग कोल सम्मिलित है। यहाँ का 
कोयला विदूमिनस और लिग्रनाइट किस्म का है। 4955 (!॥ सिलियन टन) 
की तुलना में 4965 में दुगुता (22 मिलियन टन) उत्पादन हुआ । यह उत्पादन 
क्यूग के बरावर है । परन्तु यहां से ओद्योगिक केन्द्रों तक पहुचने की दूरी 
अधिक है । यह क्षत्र टोकियो ओंद्योगिक क्षेत्र से 000 मील दूर है। इसके अति- 
रिक्त तटीय भागों से इनकी दूरी 35 मील है। मुरोरान में इस्पात तैयार करने 


का कारखाना लगा है। कोयले का मुख्यतया प्रयोग प्रशान्त महासागरीय 
तट पर स्थित दक्षिण भाग में नगोया और जापान सागरीब तट पर 


स्थित नियाता जैसे सुद॒र क्षेत्रों में होता है! जोवान कोयला क्षेत्र गपेक्षाक्रत 
का महत्वपूर्ण है जबकि यह टोकियो के नजदीक है। यह क्षेत्र लिगनाइट कोयले 


का उत्पादत करता है । कोयले की खपत के लिए निकटवर्ती क्षेत्रों में छोटे-छोटे 
रसायन उद्योग विकसित हैं। 


चुगोक प्रदेश के यामागुची प्रिफेक्चर में ऊबे (४७७) कोयला उत्पादक क्षेत्र 
अपेक्षाकृत छोटा है! जापान में प्रत्येक व्यक्ति कोयले का उत्पादन यद्यपि बढ़ 
रहा है फिर भी खनिज तेल गौर अमेरिकी कोयले की तुलना में मंहया पड़ता 
है। आयातित खनिज तेल भौर कोयले की तुलना में जापान में उत्पन्त कोयले 
का प्रयोग तिरथंक है फिर भी सरकार खातों में सुधार के लिए सदेव प्रयोग 
करती रहती है। 4959 के वाद जापान की 66 प्रतिशत कोयछे की खाने 
समाप्त कर दी गईं जिसके परिणामस्वरूप 2 लाख 56 हजार श्रमिकों की संख्या 
घटकर 4 लाख 4 हनार हो गई । 4959 में कोयले का उत्पादन जहां 47 
मिलियन ठत हुआ वहीं 967 /# घटकर 45 मिलियन टन हो गया। शेष 
खानों को और बाधुनिक बनाया गया जिससे कम श्रमिकों के वावजूद अधिक 
उत्पादन हो । वे रोजगार श्रमिक्कों को रोजगार/” ने के लिए सरकार इस बात के हि 


लि प्रयत्नशील है कि कोयले की खातों के निकट ही सम्बन्धित उद्योग लगाये 
जाँय । इससे देश को दुहरा लाभ होगा क्योकि रोजगार के साथ-साथ उत्पादक 
क्षेत्रों के पास उद्योगों की स्थापना से परिवहन व्यय कम पड़ेगा। वे उद्योग जो 
भार-हास (४४७४॥६ ॥0099) की श्रेणी में आते हैं उनकी स्थापना के लिए खनन 
क्षेत्र अधिक उपयुक्त होगा । 





86 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


व्यापार (7790०) 
युद्ध से पूर्व जापान का अधिकांश कोयला चीन से आयात किया जाता था 
परन्तु व965 के बाद अधिकांश कोयला आस्ट्रेलिया से आयात किया जाने लगा। 
4967 में आस्ट्रेलिया से जापान की आवश्यकता का 42 प्रतिशत कोयले का 
भआायात् हुआ। अन्य निर्यातक देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, कनाडा, 
चीन इत्यादि है। संयुक्त राज्य अमेरिका से जायान का 37 प्रतिशत कोयला 
मंगाया जाता है। 


खनिज तेल (॥/॥७7४| 0/) 
आधुनिक शक्ति के संसाधनों में खनिज तेल का महत्वपूर्ण स्थान है । 
जापान में तेल का उत्पादन विश्व युद्ध के पश्चात यद्यपि दुगुता हुआ है फिर भी 
वतंमान समय में यह अपनी आवश्यकता का केवल एक प्रतिशत ही उत्पन्न करता 
है । जाएान की ईंधन. शक्ति में तेल और प्राकृतिक गैस का 66 प्रतिशत योगदान 
है । जापान में 4984 में 2732023 हजार घन मीटर गैस का उत्पादन हुआ 
जो तालिका 7.!2 से स्पष्ट है । 


तालिका 7.2 
विभिन्न वर्षो में प्राकृतिक गैस का उत्पादन (हजार घन मीटर) 








वर्ष उत्पादन 
4976 2493१97 
4977 2804064 
4978 ः 2640670 
979 24400905 
4980 2497489 
498 हा 
4982 2047439 
983 2085392 
4984 232023 





हिण्णणण्पाक 533: 3 +___ तन सतत -++3333-+नाम५+भनन-ा++-+न+ सा» कक. भा ५++ ७७333» आर +५+७ 3-3 ज-कनपपलन ने +-++ २ लना- ७». >> 
स्रोत :- गूरोपा इयर बुक, 987 वा० 4, पृ० 4558. 


तालिका से स्पष्ट है कि 4982 से पूर्व उत्पादन में गिरावट आयी परन्तु 
बाद के वर्षो में प्राकृतिक गैस के उत्पादन में वृद्धि हो रही है । प्राकृतिक गैस 
का उत्पादन 977 में 2804064 हजार घन मीटर हुआ जो 982 में घटकर 


4०२०-०५ र+कल्‍लम+-०---रज वहा: 4:>गुझमाा सर, 








आऔद्यगिक विकास ( १87 


247439 हजार घच्र मो० हो गया । 982 से उत्पादन में- सतत वृद्धि हों 
रही है । ४ 

जापात की आशिक प्रगति के कारण उद्योगों के लिए यह एक अनिवार्ये 
शक्ति संसाधन है । रसायन उद्योगों में खनिज -तेल का उपयोग कच्चे माल के 
रूप में होता है। यातायात हेतु तेल को खपत में पिछले दशक की तुलना में 40 
गुनी वृद्धि हुई है। 4940 में जापान को जहां सम्पूर्ण ऊर्जा की 5 प्रतिशत 
खनिज तेल की आवश्यकता थी वहीं 967 में यह बढ़कर 66 प्रतिशत हो गई । 
जापान में 984 में कुल 474 मिलियन लीठर खनिज तेल का उत्पादन हुआ । 


विभिन्‍न वर्षो में खनिज तेल के उत्पादन का विवरण तालिका 7-3 प्राप्त हो 
जाता है ! 


तालिका 7.43 
विभिन्‍न वर्षो में खनिज तेल का उत्पादन (मिलियच लीटर) 





७०४ ०७एरणकंधआआरंऊ वी 








वर्ष (उद्पादन) 
974 6/5 
१975 606 
4976 580 
4977 586 
978 ६०१७ है 
4979 4682 
4980 4.2 8 
98] 387 
]982 397 
983 4[8 
98 4 47] 





त्नोत :- यु. एच. इण्डट्रियल स्टैटिस्टिकल ईयर बुक, 4983, वा० व 
पृ० तथा यूरोपा ईयर बुक, 987, वा० । पृ० 4558. 


शिमरमायभकालताउ/कापभापफदमकर वरना 


तालिका से सःष्ठ है कि खनिज तेल के इत्पादन में भी कमी होती गई 
है। 974 में 675 मिलियन लीटर खनिज तेल का उत्पादव हुआ जो 4975 में 
घटकर 606 मिलियन लीटर हो गया | 498] में यह उत्पादन घटकरमात्र 
58 प्रतिशत हो गया किच्तु बाद के वर्षों में उत्पादन में वृद्धि हो रही है। 98 
. “में जहां केचल 387 मिलियन लीटर खनिज तेल का उलरादव हुआ वेहीं 7984 


में उत्पादन बढ़कर 474 मिलियन लीटर हो गया । 


488 ) जापान कौ भौगोलिक समीक्षा 


प्राप्ति के क्षेत्र 


जापान के सीमित क्षेत्रों पर तेल निकाला जाता है। जापान के हांशू द्वीप 
के होकूरिकू और पश्चिमी टोहोकू प्रदेशों में तथा होकंडो के इशीकारी यूफृत्सू 
निम्नवर्ती क्षेत्र में तेल के कुय्यें पाये जाते है। (चित्र 7.2 व) हांशू जापान का 
99 प्रतिशत खनिज तेल टोहोकू प्रदेश के एकिता, याम्रागाता, तथा होकूरिक्‌ 
प्रदेश के निगाता फिकचर से प्राप्त करता हैं। 950 ई० तक अधिकांश तेल 
का उत्पादन सरकार द्वारा नियंत्रित एक बड़ी कम्पनी करती थी। प्राकृतिक गेस 
टोहोक्‌ प्रदेश के एकिता, होकू-: कू प्रदेश के निगाता से प्राप्त होती है। प्राकू- 
तिक गैंस की पाइपलाइन निगाता से टोकियो तक बिछाई गई है। 


ष्यापार 

युद्ध से पूर्व जापान का अधिकांश तेल कैलीफोनियों ते आयात किया जाता 
था परन्तु वर्तमान समय में घनिज तेल के मुख्य निर्यातक मध्य पूर्व के देश है । 
इसके अतिरिक्त कुछ तेल इण्डोनेशिया से प्राप्त होता है। जापान में 4960 
और 4966 के मध्य तेल शोधन में पांच गुनी वृद्धि हुई है और सोवि- 
यत रूस तथा संयुक्त राज्य अमरीका के पश्चात तेल शोधन में इसका तृतीय 
स्थान है। अनेक तेल शोध शालायें प्रशान्त तट पर वर्तमान भौद्योगिक केन्‍्द्रीं के 
निकट हैं। इसके अतिरिक्त कुछ शोध शालायें पश्चिमी टोहोक्‌ में उन क्षेत्रों में 
स्थापित की गई है जहां घरेलू उपयोग के लिए खनिज तेल का उत्पादन होता है 
(चित्र 7.2 ब) । 

विद्यत....> 

जापान में विद्युत शक्ति का महत्व दिनों-दिन बढ़ रहा है । 4960 की 
तुलना में 966 में विद्युत उत्पादन मे दो गुनी वृद्धि हुई है। विश्व युद्ध से पूर्व 
जापान में समस्त विद्युत शक्ति का 85 प्रतिशत भाग जल विद्युत शक्ति से 
प्राप्त होता था परन्तु आवश्यकताओ में वृद्धि के कारण वर्तमान समय में 64 
प्रतिशत विद्युत शक्ति कोयला और खनिज तेल से ताप विद्य॒ त्त के रूप में प्राप्त 
होती है । 983 में जापान में कुल 602357 मिलियन किलोबाट विद्यत का 
उत्पादन हुआ। विभिन्‍न वर्षो में विद्युत का उत्पादन तालिका 7.]4 से स्पष्ट है । 


तालिका से स्पष्ट है होता है कि जापान में विद्युत उत्पादन में उत्तरोत्तर 
वृद्धि हुई है। 974 में 45904 मिलियन किलोवाट विद्य त का उत्पादन 
हुआ जो 979 में बढ़कर 589644 मिलियन किलोवाट हो गईं। परन्तु 
980 में उत्पादन घटकर 57752] मिलियन किलोवाट हो गया। भांग की 
अधिकता के कारण विद्य त्त उत्पादन “की ओर विक्षेप ध्यान दिया गया इसलिए 


ओद्योगिक विकास ( 89 


तालिका 7.4 


विभिन्‍न वर्षो में विद्युत का उत्पादन (मिलियन किलोवबाट) 











शत 








चप " उत्पादत 

तहलका पम्प -७७ऊ« पल ऊ >मन कक आप न्‍;४/० जा .-दकाक..परम काका 

४ 4974 45904] 
975 475724 
976 5]793 
977 532609 
978 563990 
979 ह 589644 
980 57752] 
[98] .. 58324 
982 58333 
993 602357 


िा ये अम«»क न्केः कक 








पभरथरआाकनर पका मल 


स्रोत :-यू. एन. इण्डस्ट्रियल स्टैटिस्टिकल ईयर घुक, 4983 ,वा० 44, पृ० 4. 


उत्पादन में पुनः उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी और 98 में उत्पादन बढ़कर 
583244 मिलियन किलोवाद तथा 983 में बढ़कर 602357 मिलियन किलोर 
वाट हो गया । ः 


अधिकांश जल विद्युत शक्ति केख्ों का विकास मध्य हान्कु में हुआ है जहां! 
प्र सततवाही चदियों के कारण सर्देव जल की प्राप्ति होतीं रहती है (चित्र7,3)। 
मध्य हाँश का टोन, तेनरिंउ और किसो नदियां जो प्रशान्त महासागर में अपना 


जल गिराती हैं, जल विद्य॒त उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त 
जापान सागर में गिरने वाली अग्रानों, और शिनानों भी जल विद्युत ऊत्पादन 
में उल्लेखनीय हैं। इनमें कुछ बदियां ऐसी हैं जो ग्रीष्म ऋतु में वर हु 
बोर ग्रीष्म ऋतु में प्राप्त वर्षा के जल के कारण ही जल विद्य्‌ 24 

योग्य होती है । इसके अतिरिक्त जापान सागर और प्रशान्त महा 

बहने वाली छोटी-छोटी तीन गामी नदियों का भी प्रयोग जल 


में होता हैं | 








[90] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


क्यूशू और पश्चिमी 
टोहोकू में भी जब 
विद्यंत्त का उत्पादन 
होता है । जिन स्थानों 
प्र तीप् ढाल पाया 
जाता है वहीं पर 
विद्युत उत्पादन के 


लिऐ अनुकूल परिस्थि- 

न ( वियां हैं । होकैडी ओर 
जा! ॥! | । चुगोक्‌ में पर्व॑त्ी की 
न ऊंचाई कम होने के 


कारण जल चिच्ूतत 
का उत्पादन कम मात्रा 
में होता है क्योंकि ये 
सत्ततवाही नदियां नहीं 
होती हैं और पदव॑तों 





लिन 7.3 जपान : जल विद्युत विकास का क्षेत्रीय 
स्वरूप, - वृहद विद्य त केंद्र 


की कम ऊचाई के कारण पानी का वेष कमर होता है। पश्चिमी और उत्तरी 
जापान में जल विद्युत के लिए अनुकूल परिस्थितियां व होने के कारण ताप 
विद्यत का महत्व बधिक है । 


जल विद्य॒त शक्ति की खप्त जापान सागर तट पर स्थित होकूरिक्‌ के 
बतिरिक्त प्रशान्त तट पर केन्द्रित कीहिन (((शहा), हान्शिव (90शगा), 
चुक्यो (0॥0/:५0) आदि जौद्योगिक प्रदेशों म॑ होता है । जापान में यद्यपि जल 
विद्यत्त उत्पादन के लिए कुछ प्राकृतिक परिस्थितियां (उच्चावचव ओर दीक 
वर्षा) अनुकूल है फिर भी अनुपयुक्त जलवायु जल विद्यत उत्पादन के विकास में 
बाधक है । यहाँ की वदी घाटियों के छोदी होते के कास्ण जल की मात्रा में कमी 
पाई जाती है। इसके अतिरिक्त मौसमी वर्षा के कारण त्रीष्म ऋतु में एक ओर तो 
नदियों में बाढ़ भा जाती है परन्तु दूसरी और शीत ऋतु में ये सूख जाती है ) 
अत: सततवाही भ होने के कारण वर्ष भर विद्युत का उत्पादन नही हो सकता 
है। शीत ऋतु में जापान सागर तट को छोड़कर अन्य भागों में वर्षा नहीं होती 
है। इसके अतिरिक्त पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षा हिम के रूप में होती है। उच्च 
बक्षांशों में अनेक नदियों का जल जम जाता है । तीज ढाल होने के कारण जला- 
शय हुँतु वांघ का निर्माण जत्यधिक व्ययशील है । अनेक जल विद्य त उत्पादन 
के मन्त्र छोटे-छोटे हैं और वे नदी के तटवन्धों पर लगाये गये हैं। जल विद्य त 


ओद्योगिक विकास | 9] 


का उत्पादन नदी के वेग पर॒ आधारित है, इस लिए सर्वेत्र विद्यवत का उत्पादन 
एक ज॑सा नहीं है। ग्रीष्म ऋतु में जल विद्युत का अत्यधिक उत्पादन होता 
है परन्तु शीत ऋतु में जल विद्यूत शक्ति की कमी को ताप बिद्युत द्वारा पूरा 
किया जाता है | 


किटाकामी,तेनरिउ और इशीकारी नदियों पर बहुद्देशीय परियोजचायें (७७४ 
70056 20[|७०७)स्थापित किये गये हैं परन्तु जापान में समस्त विद्य तउत्पार 
दन क्षमता का केवल 40 प्रतिशत ही जल विद्युत उत्पस्त होती है। 987 में 
तेल की ज़ोकप्रियता के कारण 73प्रतिशत विद्य त तेल से प्राप्त हुई जबकि।944 
में यह शक्ति केवल १6 प्रत्तितत थी। अधिकांश ताप विद्युत केन्द्र औद्योगिक 

व्वों के निकट उन क्षेत्रों में स्थापित फिये गये हैं जो जल के निकट है क्योकि 
जल क्षेत्र के निकट होने के कारण कोयला और तेल मंग्राने की सुविधा होती है । 


महगी जल विद्य त शक्ति, आयातित तेल और कोयले के कारण बाणविक 
शक्ति का महत्व दिनों-दिन बढ़ रहा है जिसके परिणामस्वरूप 966 में टोकियो 
के उत्तर इवारागी प्रिफेक्चर में टोकाई आणविक स्टेशन की स्थापना की गई । 


हर ओसाका के उत्तर सुदगा (प5परापठु9) तथा टोकियों में स्थापित किये 
गये हैं । 


लोह एवं इस्पात इचयोर वे इस्पात इचयोग (0 दया 566 धाप॑प५9५) 


जापान में लौह एवं इस्पात के आधुनिक उद्योगों की स्थायना के पूर्व इस्पात का 
उत्पादन स्थानीय लार्डो तथा शोगुन (500ध0॥) द्वारा निजी सेताओं के हथियार 
के लिए किया जाता था। परन्तु आधुनिक ढंग पर इस्पात का उत्पादन 90॥ 
ई० से प्रारम्भ हुआ। सरकार ने प्रथम उद्योग हान्शू और ब्यूशू के सध्य शिमोनो- 
पेकी जल डमरूमध्य (589) के विनारे उत्तरी-पुर्वी क्युशु में डोकाई (008) 
खाड़ी पर स्थिति छोटे से गांव यावाता (४4७४४(४)में लगाया जो जापान के सबते 
वड़े कोयला उत्पादक्ष क्षेत्र के तिक़ट है। इस गाँव की स्थिति खाड़ी के पास्त 
होने के कारण चीन से कोयला आसानी से आयात किया जाता था । 967 में 
यावाता कम्पनी ने जापान के पिग आयरव का 25 प्रतिशत और इस्पात का 9 
भतिशत उत्पादन किया | इस उद्योग का विकास 930 के दशक तक निरन्तर 
: होता रहा क्योंकि सैनिक सरकार द्वारा इसके विकास में पूर्ण सहयोग मिला । 
परस्तु विश्व युद्ध के समय उद्योग का अधिकांश भाग नष्ट हो गया, जिसके पारि- 
णामस्वहूप 4946 में एसण्सी०ए०पी० के अधीन इस्पात वन उत्पादन सग्रण्य 
रहा, लेकिन युद्ध के वाद ,इस औद्योगिक केन्द्र की मरम्मत की गई ओऔर पुन: 
इस्पात के उत्पादन में वृद्धि होने लगी । 4953 ई० तक इस केन्द्र में उत्पादन 


]92 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


की गति धीमी रही । परन्तु उसके उसके वाद इस्पात के उत्पादन में 9 गुनी 
वृद्धि हुई । 


जापात में 4964 की तुलना में 967 में इस्पात के उत्पादन में 00 
प्रतिशत की वृद्धि हुईं। विश्व के अन्य देशों की तुलना में जापान में इस्पात का 
उत्पादन तीत्र गति से वह रहा है। यही कारण है कि यह विश्व का तृतीय 
बड़ा स्टील उत्पादक देश है। 063 में जापान ने 97 प्रतिशत लोह खनिज 
एवं 70 प्रतिशत कोयले का भायात क्रिया गया फिर भी इस्पात के उत्पादन 
में इसने पश्चिमी जमेत्री को पीछे छोड़ दिया। जापान ने 4967 में विश्व का 
3 प्रतिशत इस्पात का उत्पादन किया । अपने समस्त उत्पादन का 20 प्रतिशत 
दूसरे देशों को निर्यात किया। जापान में तीत्र यति से बढ़ता हुआ इस्पात उत्पादन 
न केवल जापान की इंजीनियरी आदि उद्योगों को इस्पात की आपूर्ति करता है 
अपितु विश्व वाजार में खपत हेतु निर्यात भी करता है। 967 में 62 मिलियन 
टन इस्पात का उत्पादन हुआ जबकि ब्रिटेन मे यह उत्यादन 967 में केवल 25 
मिलियन टन था । इस प्रकार युद्ध-काल की तुलना में इस्पात के उत्पादन में 
भाठ युत्ती वृद्धि हुई है। यह उत्पादन संयुक्त राज्य अमेरिका के उत्पादन का 50 
प्रतिशत है । 

जापान में 984 में 05586000 मी० टन कच्चा इस्पात का उत्पादन हुआ 
जबकि 4983 में यह उत्पादत 97]69000 भी० ठन था । पिग आयरन, फेरो- 
एल्वाय तथा कच्चा इस्पात का विविभिन्‍न वर्षो में उत्पादन इस प्रकार रहा। 


तालिका 7.45 


विभिन्न वर्षो में उत्पादन (हजार मौ० दन) 
न्न्लकओफ सस्ती चलन. «७-७० ७७७७०क७७ ७ ७०७७५७०३७५२७काकन७५»००००००५५१०३४७५०५५००.४०५७७०० ०००५ ०33७७१०२३३००५०५७७४७७» 
प्रकार वर्षे ष् 


4982 4983 984 
4. पिग आयरन 77658 73936 80402 
2. फेरो एल्वाय 8589 258 44]8 
3. कच्चा स्टील 99548 97469 05586 


। 3 कर शरद व नर कलम लीक 
स्रोत :- यूरोपा ईयर बुक, 9 86, पू !496 
न सा जम है कि पिग आयरन और कच्चा स्टील के उत्पादन में 
न्तर वृद्धि हुईं हूँ । इसके फैरो एल्वाय के उत्पाद में 
का कही | वपरीत फे गे एल्वाय के उत्पाद में गिरावट आई 
है पा उत्पादन 982 में 77658 हजार मी० टन हुआ जो 
7983 में घटकर 73936 हजार मी० ठन हो गया परन्तु 984 में पुतः 


ओद्योगिक विकास [ 293 


उत्पानन बढ़ कर 80402 मी० ठन हो गया । इसी भांति कच्चा स्टील का भी 
उत्पादन 4982 (99548 हजार मी० टन) की तुलना में 4983 (9769 
हजार मी० टन) घट गया परन्तु 4984 में उत्पादन बढ़कर 405586 हजार 
मी० टन हो गया । फेरो एल्वाय के उत्पादन में भी यही क्रम रहा परन्तु 4984 
का उत्पादन (4॥8000 ज्ी० टब ) 4982 को तुलना (549000 मी० टन) 
में कम रहा । 


लौह एवं इस्पात उद्योग पूर्ण रगेण आयातित लौहु खनिज और इस्पात 
स्क्रप (5027) पर आधारित है। जापान अपनी भावश्यकता का केवल 3 प्रति-. 
शत लौह खनिज उत्पन्त करता है जो आयातित खनिज की तुलना में निम्नकोटि 
का है । यहाँ की लौह खनिज की खानें होकेंडो और उत्तरी हांज् में हैं जिनमें 
उत्पादन नगण्य है। लौह खनिज उत्पादन की सबसे बड़ी खान पुवी टोहोक की 
कार्मणी (((४॥7४५॥7) खान है । यहां पर खनिज में लोहांश की मात्रा 57 
प्रतिशत है । " 


8967 में 30प्रतिशत लौह खनिज दक्षिणी अमेरिका से आयात किया गया 
जिसमें चिली (4 प्रतिशत) और पीरू (2 प्रतिशत) दक्षिणी अमेरिका के प्रमुख 
निर्यातक देश सम्मिलित थे । इसके अतिरिक्त जापान ने भारत से 49 प्रतिशत, 
आस्ट्रेलिया से 5 प्रतिशत, दक्षिणी-पूर्वी एशिया से 42 प्रतिशत तथा उत्तरी 


अमेरिका से 9 प्रतिशत, लौह खनिज का बायात किया | आयातित स्पात्त 
स्फौप (5७87) का 75 प्रतिशत भाग संयुक्त राज्य अमेरिका से आयात किया 


गया । इस उद्योग के लिए कोक कोयला संयुक्त राज्य अमेरिका, आस्ट्रेलिया, 
सोचियत रूस और कनाडा से आयात किया गया। जापान में पिग आयरन की 


तुत्नना में आयातित स्टील स्क्रैप से जापान का अधिकांश स्टील तैयार होता है 
और यह विश्व का तीसरा स्टील निर्माता है । 


आयातित लौह खनिज एवं कोयला अधिक मंहगे पड़ते हैं इसलिए जापान 
में 4962 में इस्पात निर्माण के लिए कच्चे माल की कीमत प्रति टन 40 डालर 
थी जो संयुक्त राज्य अमेरिका जोर पश्चिमी जमंती में 37 डालर के वरावर थी। 
इसका प्रमुख कारण यह है कि जापान उत्तम किस्म का लौह खनिज, कोयला एवं 
अन्य कच्चे माल का आयात करता हैं। जापान अपने इस्पात का 20 प्रतिशत 
इस्पात निर्यात करता है। विश्व वाजार में अपनी ख्याति बनाये रखने के लिए 
जापान उत्तम किस्म का इस्पात तैयार करता है | 495], १956 कौर 4967 
में अनेक प्रकार के तकनीकी सुधार किये गये जिसके परिणामस्वरूप एक ठन 


पिग आयरन तैयार करने के लिए लौह खनिज की मात्रा में कमी लायी गयी 
यह कमी 967 में 95] की अपेक्षा 25 प्रतिशत तथा कोयले में 50 प्रतिशत 


94 ] जापान की भोगोतिक सकीक्षा 


की लायी । जापान 4965 में एक मीौ० टब पिग आयरन तैयार करने के लिए 
507 किलोग्राम लोह खनिज का इस्तेमाल करता था जबकि संयुक्त र/ज्य अमेरिका 
में एक मी० टन पिय आयरन तेथार करने के लिए 676 किलोग्राम लौह खनिज 
की आवश्यकता होती थी । 960 की तुलना में 4967 में प्रति व्यक्ति इस्पात 


का उत्पादन दुगुना हो ग्रया। इच् प्रकार 4956 में प्रति कामग्रार का 
स्टील का उत्पादन 487 टन था जवकि संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति कामगार 
इस्पात का उत्पादन 67 ठरु जौर यू. के. में 443 टन था। जापान के स्टील 
उत्पादक यन्त्रों की क्षमता सर्वाधिक है । 


जापान का इस्पात उद्योग केवल रेलों और प्लेटों का ही निर्माण नहीं 
करता अपितु उच्च श्रेणी का विशेष इस्पात तैयार करता है जिसका उपयोग 
इन्जीनियरिंग और वाहन उद्योगों में होता है क्योंकि यहां का इस्पात उत्तम 
किस्म का होता है। इसके अतिरिक्त इस्पात का उपयोग भारी मशीनों, जहाजों 
और रेल इन्जनों के वनाने में होता है। शिन, निष्पन, सीटेत्स (9/98$0) 
निप्पन स्टील, कावासाक्ी, सुम्रितोमों और कोचे स्टील प्रमुख उद्योग है जो 
जापान का 66 अतिशत इस्पात तैयार करते हैं ।967 में शिन, निष्पन, सीतेत्सू 
तथा कावासाकी ने 6 प्रतिशत जापान का पिग आयरन तैयार किया। कच्चे 
माल के लिए मलाया, ब्रानील, फिलीपोन, पाकिस्तान, रोडेशिया, भारत और 
स्वाजीलण्ड से समझौता किया गया। इसके अतिरिक्त आस्ट्रेलिया और अमेरिकी 
देशों से भविष्य में भी कच्चे भाल की पूर्ति के लिए समझौता किया गया 
जिसके परिणामस्वरूप स्टील के उत्पादन में लागत व्यय वाम हो गया । यही 
कारण है कि आज जापानी इस्पात संयुक्त राज्य अमेरिका और प्र.के, के समकक्ष 


हैं | जापान 20 प्रतिशत इस्पात का प्रति वर्ष निर्यात करता है जो जापान के 
निर्यातों में बवोपरि है । 


जापान का 85 भ्रतिशत्त इस्पात विनिर्माण उद्योग की मुख्य मेखला से 
तयार होता हैं। उत्तरी वेज के यावात्ता में वर्तमान आधुनिक लौह एवं इस्पात 
उद्योग घरेलू कच्चे मालों पर आधारित है। इसे कोयले की आपूर्ति चिकुहो से 
होती है। चीन से लौह खनिज एवं चूना पत्थर आप्त हो जाता है। विश्व युद्ध 


से पहले उत्तरी पइश जापाव का लगभग 50 प्रतिशत इस्पात तैयार करता था। 


परन्तु 967 में यह घटकर 48 प्रतिशत हो गया । इसके अतिरिक्त आज इस्पात 
उत्पादक कैंद्ध लोहे और कोयले की खानों के पास स्थित है । मुरोरान (शएा७- 
ए27) के समौष स्टील के प्लांट लगाये गये हैं जो जापान वा 6 प्रतिशत इ्स्पात्त 


पवार करते हैं। यहां पर घरेलू कच्चे माल का उपयोग हीता है। इशीकारी 


औद्योगिक विकास [295 


कोयला क्षेत्र म्रें कोयला, उत्तरी टोहोक से लौह खनिज प्राप्त होता है। कार्मेशी 
जापान का 3 प्रतिशत इस्पात तैयार करता है । 


विश्व-युद्ध के 
पश्चात लॉह-इस्पात 
केन्द्रों का विकास 
हि मुख्य औद्योगिक क्षेत्र 
न सका ४४] ह के निकटवर्ती भागों में 
7॥0+08 70/२5 | तेजी से हुआ हे 
/्ट 4 (चित्र 7.4) क्‍योंकि 

वन्दरगाह की उपयुक्त 
सुविधा के कारण लौह 
खनिज, स्टील स्तक्रीप 
और कोयला सुग्रमतार 


पर्वक आयात किया 
जाता है। हान्शिन जो 


॥00 200०0 390 





#0६5 


चित्र 4.7 जापान : लौह इस्णत उद्योग 
(- इस्पात उत्पादन 2- लौह उत्पादन 


जापान का-32 प्रतिशत इस्पात उत्पन्न करता है, दक्षिण में सकाई (5969) मे 
पश्चिम में कोवे तक विस्तृत है जहां पर भारी इंजीनिर्यारिंग के सामान, जहाजों 
के लिए इस्पात की चददरे तथा रेल के पुर्जे बनाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त 
कीहिन (((8॥४॥) तथा चुक्यों बौद्योगिक केन्द्रों में क्रशः 25 और 9 प्रतिशत 
इस्पात का उत्पादन होता है जिनमें इस्पात की चद्दरे, हलके इन्जीनिर्यारिंग के 
सामान, वाहन के सामान, रेफ्रीजरेटर तथा धुलाई की मशीन के पूर्जे बनाये 


जाते हैं । 


अन्य खनिज (0907 9799) 
इसके अतिरिक्त जापान में ताॉवा, जिक, सीसा([.७80 ०7७) ,सल्फर, सिल्वर 
टीन, सोना, मंगनीज, टंगस्टन, क्रोमियम का अल्प मात्रा में उत्पादन होता है । 
इन खनिजों की खारनें अत्यन्त छोटी हैं जिससे जापान की आवश्कता की पूर्ति 
नहीं हो पाती है। उत्पादन में कमी के कारण उत्पादन लागत कविक पड़ती है। 


जापान में विभिन्‍न प्रकार के खनिजों का विवरण तालिका 7.6 से प्राप्त हो 
जाता । ु 


जापान की भौगोलिक समीक्षा 





96 ॥ 


हे 


*8५५]॥ ०५४ [ ०॥४ /86| ५४ »४४ 40०४ : ४७ 


के कक 








७० 8०२ नं 


थकान साधना धाम सापयलाापरथाह-८०८८पप कादर कर पुथकापपदए वा. >पकायप देटपा दास. पाक रद ाराकस ए व क्ा८८८---परायाफ भार परे +* पम्प पापा, गरम पी यधराकरपरावयए पी एफ [दल ाभना शा उदपथा( आपका एम दाफकमन गुर ए7 अूकानपाक्‍ा फ़छत शगगा 7 
ना नुल्‍कन्‍र-क-»-न्‍ममनाक.. 7 ऊ का 


8)28 6६६ 6६८६ “5. ६88 0८6६ ८6699 ६६99 86# (४382५) 4४(४ '0] 
5६८8४ 88899 ६८858. +. 97८77 62697 68799 #?9/४६ 999५ (/2 0,४) 4»(७ '6 
60६68 57099 85909 + 895८9 00069५ 560/ 96६8 909|8 (४2 0(७) ॥४४ '8 
[009 96688  6टठ0)॥.  + >+ 0095: ५06॥ 9698 88/। 0प५वट (2 ०१७) 259% *9 
[72869] 08/69] 65589॥ 5 +... 08/98॥ ॥8८८8॥ #४८6 ।द#58] 0६४८#ा 82३ ४8।)2 *9 
६८6६॥ ६८८६॥ 6#5+ “.. 0/778 9४८६६ 6/6)॥ 9086 6268 02७ /५॥2]४| '५ 
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[86;४ 086 6८6॥/ 8८6 ८&८6।/ 9८6; २५१४६ 


7986] ६86। ८86+ 
२. ५3939 4+++ 9५८ >> मम मम मन 
(४2 ०४ >७8) ४४॥४२९ 2५% [//2|22 | 3.00 2702 





आम, 





हन्‍मदुक्ाइगाके एक... आना 








जनक. 





9॥'/ )५॥2)॥४ 








औद्योगिक विकास 


तालिका से स्पष्ट है कि केवल सिलिका स्टोन और चूना पत्थर के ही 
उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है। सिलिका स्टोन का उत्पादन 4976 में 
8929000 मीट्रिक टन हुआ जो बढ़कर 4984 में 43973000 भी० टन हो 
गया। इसी भांति 976 में चूना पत्थर का उत्पादन 447530000 मी. टन 
से बढ़कर 3984 में 6982000 मी, टन हुआ । इसके विपरीत जस्ता, 
लोहा, लोह पाइराइट्स, मेंगनोज, क्रोमाइट, ताँवा, सोसा, सोचा आदि सभी 
खनिजों के उत्पादन में कमी आयी है । इस प्रकार 976 के उत्पादन की तुलना 
में 984 में जस्ता में 3 प्रतिशत, लोहा में 42 प्रतिशत, लौह पाइराइट्स में 
“3 प्रतिशत, मंगतीज में 56 प्रतिशत ब्रोमाइट में 73 प्रतिशत, ताँवा में 47 
प्रतिशत, सीसा में 6 प्रतिशत और सोने के उत्पादन में 25 प्रतिशत की कमी 


हुई । 


5 है 


हार रौ० टम ., 


# ही 


॥॥ 


न्‍ 





चित्र 7.5 जापान : (क) बलोह धातु उद्योग 
4-सीसा, 2-जस्ता, 3-तांवा 


(ख) विद्युत मशीन उद्योग का क्षेत्रीय स्वरूप 


498 ) जापान की भोगोलिक समीक्षा 


इन्जी निर्षारग उद्योग (६४798४॥08 [॥00579) 
विश्व-युद्ध के पश्चात अन्य उद्योगों की तुलना में मशीनरी के उत्पादन में 
तीव्र-वृद्धि हुई है जिनमें जहाज, मोटर गाड़ी तथा वैद्युतिक मशीनें मुख्य हैं । 
इंजीनियरिंग जापान का सवसे वड़ा उद्योग है६ुजिसमें967 में समस्त उत्पादित 
वस्तुओं के मूल्य का 4 प्रतिशत उत्पादत हुआ | 955 में यह उत्मादन केवल 
6 प्रतिशत था। इस प्रकार 7960 और 966 के मध्य उत्पादन में 400 
प्रतिशत वृद्धि हुई । इन उत्पादों में वैद्युतिक समान 9 प्रतिशत, जहाज 6 प्रति- 
शत गौर मोटर गाड़ियों का उत्पादव 2 प्रतिशत है। इन मानों का उत्पा- 
दन बड़े से छोटे सभी वर्कंशापों में होता है। जहाजों का त्िर्माण हान्शिन 
औद्योगिक प्रदेश में होता है। बाइशी (&0०7) में टोयोटा कार फैक्ट्री उल्ले- 
नीय है । 
इसके अतिरिक्त इच्जीनिर्यारय उद्योग कीहिन औद्योगिक केन्द्र में भी 
केन्द्रित है जिसमें 34 प्रतिशत इंजीनियरिंग सामानों का उत्पादन होता है । 
हान्शिन औद्योगिक केन्द्र में जापान की मशीनरी का 2] प्रतिशत और चुक्यों 
बोद्योगिक केन्द्र में[[प्र तिशत, इंजीनियरिंग सामानों का उत्पादन होता हैं। युद्ध से 
पूर्व इंजीनियरिंग उद्योग समस्त औद्योगिक उत्पादव का केवल 26 प्रतिशत उत्पा- 
दनव करता था। 3930के दशक में जब सेना का विस्तार किया गया तो आवश्य- 
कृताओं की मांग के अनुरूप इस उद्योग का विकास किया गया। अनेक प्रकार 
के तकनीकी सुधार किये गये जिससे उत्तपपादन में वृद्धि हुई । इस प्रकार 7937 
की तुलना में 4940 में तीन गुना अधिक उत्पादन हुआ | द्वितीय विश्व युद्ध में 
जापान की पराजय के कारण इन्जीनियरिंग उद्योग में गिरावट आयी परन्तु 
१949 के वाद उसने पु: समस्त उद्योगों में प्रथम स्थान बना लिया । आशिक 
समृद्धि तथा वेच्यूतिक सामानों की मांग के अत्तिरिक्त घरेलू उपयोग सें भी 
विद्युत के सामानों की अधिक मांग के फलस्वरूप अनेकों वर्कशाप खोले गये । 
इस प्रकार 7960 और 966 के मध्य वैद्य तिक मशीनरी के उत्पादन मे 
00 प्रतिशत की वृद्धि हुईं। रेडियो, टेलीवीजन सेट, धुलाई मशीन, रेफ्रिजरे- 
डर, तया सचार के उपकरणों का अधिकाधिक उत्पादन हुआ। यातायात के 
वाहनों के वियति से जापान को अधिक लाभ हुआ जिनमें छोटे ट्रक, कार 
जौर मोटर साइकिले मुख्य थी। इसके अतिरिक्त कैमरा जहाज, आदि का भी 
उत्पादय मधिक हुआ । 


जहाज निर्माण उद्योग (599 800॥7१७5४५) 


965 के बाद से जापान विश्व का अग्रगण्य जहाज निर्माण करने वाला 
देश हो गया है। 967 में जापान ने संसार के ' सम्पूर्ण भारी जहाजों का 48 








जआोद्योगिक विकास 399 ) 


प्रतिशत उत्पादन किया जिनमें बड़े-बड़े टेंकर भौर विशाल _कंरियर सम्सि- 
लित हैं | उत्पादन यु० के० तथा पश्चिमी जर्मनी के उत्पादन को 6 गुना है। 
सन_[960 की तुलना में जायान में जहाज निर्माण में चार गुना वृद्धि हुईं । 
980 में जलयानों की कुल संख्या 0568 थी । 978 में जापाव ने 35 यात्री 
जहाजों का विर्माण किया जो तालिका 7.7 से स्पष्ठ है । 


तालिका 7.7 
विभिन्‍्त वर्षो में यात्री जहाजों का निर्माण 


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977 44 
978 35 
979 अचु ० 
980 अनु० 
986] है अनु० 
982 अचु० 
983 अनु० 











स्रोत:---यू ० एन० इण्डस्ट्रियल स्टेटिस्टिक्स ईयर बुक, 983, वा० ॥[, पृ० 7 


इंजीनियरिंग उद्योगों में लोह इस्पात एवं वैद्युतिक समान के उद्योग के 
पश्चात जहाज निर्माण का तृतीय स्थान है। जहाज का निर्माण कार्य मुख्य 
औद्योगिक मण्डल में होता है जहां पर 6 यार्ड 20,000 ठन से ऊपर के 
जहाजों का निर्माण करते हैं । अधिकांश जहाजों का रख रखाव हांशिन 
ओर आन्तरिक सागर के ज्ेत्रों में होता है जिन्हें उपयुक्त बन्दरयाह की सुविधा 
उपलब्ध है । इसके अतिरिक्त उत्तरो-पश्चिमी क्यूग, नागासाक्री और ससेवो 
(95९००) बन्दरगाहु और याकोहामा के निकट कावासाकी बन्दरगाह में होता 


है जो किहिन और हाँशित के लिए स्थानीय स्टील की आपूर्ति करते हैं । 
आधुनिक शिपयार्ड सर्वप्रथम सरकार द्वारा 878 में याकोहामा के 

बाहर कावासाकी में स्थापित किया य्या जो बाद में मित्सूवीशी जैवात्स को 

हस्तान्तिरत कर दिया गया | सरकार के सहयोग से इसका और अधिक विध्तार 


200 ] - जापान की भौगोलिक समीक्षा 


किया गया । इसमें जल सेना तथा व्यापार के लिए जहाजों का निर्माण होने 
लगा । 930 के दशक तक अनेक कम्पनियों ने शिपयाडे की स्थापना की । 
जापान की तीन कम्पनियों ने समस्त जापान के 54 प्रतिशत जहाजों का 
निर्माण किया जिनमें मित्सूबीशी (24 प्रतिशत), इशीकाचाजिमा-हरिमा (47 
प्रतिशत) और हिटाची (3 प्रतिशत) प्रभुख है। बड़े-बड़े शिपयार्डो में तीन 
लाख टन के जहाजों का निर्माण हुआ। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे शिपयार्डो में 
इंजन के साथ-साथ पुर्जो का उत्पादन हुआ । 949 के पश्चात जहाज निर्माण 


उद्योग को विकसित करने में जापान डेवलपमेन्ट बैंक[3800॥ 0०४९।०७/ 
80॥/0) का प्रमुख योगदान रहा । कोरिया युद्ध और स्वेज संकट ने जहाज 


निर्माण उद्योग को और अधिक प्रोत्साहित किया । 4950 के पश्चात जहाजों का 
निर्माण कई क्रमों में होता है। अतः श्रम की बचत के कारण 5 प्रतिशत 
उत्पादन लागत की वचत होती है। ब्नविटेन मेंजहां जहाजों के निर्माण में 6 से 
7 माह लग जाते हैं वहीं जापान में केवल उसे 4 माह लगते है। तीज निर्माण 
अपेक्षाकृत कम लागत का श्रम, आकर्षक डिजाइन एवं क्ष मता के कारण जापान 
जहाज निर्माण में विश्व में सत्रत्ते आगे हैं। यड्ी कारण है कि मों 9990 
प्रतिशत जहाजों का निर्यात किया |” 


मोटरगाड़ो उद्योग (0007 ५४९॥॥००७ |00०७॥.५ [00० ४९७॥०७७३ |॥975॥)).. 


भोटर गाड़ी उद्योग का विकास विशेष रूप से 962 के पश्चात हुआ है । 
966 में जापान ईंस उद्योग में ब्रिटेन से आगे निकल गया और विश्व का संयुक्त 
राज्य अमेरिका और पश्चिमी जर्मनी के पश्चात तृतीय बड़ा मोटर गाड़ी का 
निर्माता देश वन गया । जापान ने 967 में 3.2 मिलियन गाड़ियों का निर्माण 
किया जिसमें 4.8 मिलियन द्रक और .4 मिलिण्न कारें सम्मिलित हैं । इस 
उद्योग के विकास के लिए सरकार ने अनेक प्रकार की सुविधाओं को प्रदान 
किया | इसलिए 983 में बसों और मोदर गाड़ियों की संख्या 59548 हो गई 
जो 7282 की तुलना (02835) में कम है। 983 में कारों की संख्या 
782000 तथा लारियों की संख्या 3897000 थी जो तालिका 7.8 से 
स्पष्ट है । + 
जापान में मोटर गाड़ियों के उत्पादन में वृद्धि होने के कारण कीमतों में 

भारी गिरावट जायी जिससे विश्व बाजार में जापानी गाड़ियों की मांग चढ़ गई। 
967 में सम्पूर्ण उत्पादन की 20 प्रतिशत कारें तथा 50 प्रतिशत ट् के निर्यात 
कर दी जाती है । छोटी-छोटी कारों का निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका तथा 
बरोप भौर छोटी ट्रकों का निर्यात दक्षिण पूृ॑ एशिया के देशों को हुआ । इससे 
हैते उत्पादन कम होने के कारण 960 में 90 प्रतिशत कारे सरकारी कार्या- 


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औद्योगिक विकास 


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पृ० 496. 


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202 ॥। जापानकी भौगोलिक समीक्षा 


समुह हो गये जिनमें, टोयोटा, निसान, मिल्सूबीशी आदि प्रमुख हैं । टोयोटा 
कम्पनी ने 967 में 35 प्रतिशत टुक और 46 प्रत्तिशत कार तथा निसान ने 
25 प्रतिशत ट्रक और 35 प्रतिशत कारों का निर्माण किय्ा। मिल्सूबीशी में यह 
उत्पादन दोलों कम्पनियों की अपेक्ष। कम रहा। यहां पर 4967 में ट््‌ कों और 
कारों का प्रतिशत ऋ्रश: 40 और 8 रहा । 


टोयोटा कम्पनी 933 में चुक्यों और कीहिन औद्योगिक क्षेत्रों में तथा 
मिसान कीहिन औद्योगिक प्रदेश में विकसित हुई। देश में मोटरसाइ किलों की 
अधिक मांग के कारण इस उद्योग का सर्वाधिक विकास हुआ। 4960 के वाद 
से ही जापान का मोटरसाइकिल उद्योग विश्व में सबसे बागे है।967 में 
2.5 मिलियन मोटरसाइकिलों का उत्पादन हुआ जो संसार के सम्पूर्ण उत्पादन 
का 40 प्रतिशत था जिप्तलें 38 प्रतिगत मोइरसाइकियतें निर्धात कर दी गई । 
मोटरसाइकिल उद्योग सें तीत कम्पनियों, होण्डा (57 प्रतिशत), सुजुकी (20 
प्रतिशत) भोर याहामा (8 प्रतिशत) ने 95 प्रत्तिशत मोद्रसाइकिलो' का 
उत्पादन किया। अधिकांश मोटरसाइकिलें एशिया और दक्षिण अमेरिकी एवं 


एवं उत्तरी अमेरिकी देशों को निर्यात को गई। मोटरसाइकिल उद्योग 
मुख्य रूप से चुकयो और टोक़ियो में केन्द्रित है । 


4930 से ही मोटरपाइकिल उद्योग में जापान का वर्च॑त्व श्हा है! 
967 में यह उत्पादव 3 9 मिलियन तक पहुँच गया जिसकी 50 प्रतिशत 
मोटरसाइकिले संयुक्त राज्य अमेरिका को तिर्यात कर दी गई । मोटरसाइकिलों 
के पू्ज घरेलू वर्कशायों में निर्मित होते हैं और पुनः छोटे-छोटे कारखानों में 
मोटरसायकिलों का निर्माण होता है। 


वच्युतिक उद्योग [६0८07०७ |0089) 


वंद्यू तिक उद्योग का विकास विश्व युद्ध के पश्चात हुआ है । वतंमान 
समय में इस उद्योग का जापान में चौथा स्थान है । जापान में लोह एवं इस्पात 
उद्योग के पश्चात यह ह्वितीय बड़ा उद्योग है। 4950 के दशक के पश्चात इस 
उद्योग ने जापानियों के जीवन स्तर को ऊचा उछा दिया क्योंकि अधिकांश 
लोगों के पाप्त चावल व्वायलर, पंखे, इस्तरी, रेडियो / टेलीविजन, धुलाई मशीन 
रेफीजरेटर, रिकाडे प्लेयर, और टेप रिकार्डर विद्यम्नान थे॥ १9 88 भें 95 
अतिशत परिवारों के पास टेलीविजन, 85 प्रतिशत के पास घुलाई मशीन और 
78 प्रतिशत परिवारों के पास रेफ़िजरेटर थे । | 960 और 966 के मध्य 
वंच्ुुतिक सामानों के उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ निर्यात में प्री व द्धि हुई । 


औद्योगिक विकास [ 203 


रेडियो माइक्रो टेलीविजन, टेप रिकार्डर, संचार उपकरण तथा पंखों के निर्यात 
में तीन्र गति से वृद्धि हुई क्योंकि इन उत्पादनों का मुल्य विश्व के बाजार में 
अपेक्षाकृत सस्ता था। रेडियो के उत्पादन में संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद 


जापान का दूसरा स्थान है। परस्तु संचार के उपकरणों के उत्पादन में जापान 
का विश्व में प्रथम स्थान है। इस उद्योग के विकासके लिए अमेरिकी और 


डर्च कम्पनियों से तकतीकी समझौता हुआ है। इन उद्योगों में जापान की 


घरेलू महिलाओं का आधिकाधिक योगदान है जिसके परिणामस्वरूप ये वैद्युतिक 
सामान विश्व बाजार में कम मूल्य होने के कारण लोकप्रिय होते जा रहे है । 


इस उद्योग का विकास कोहिन और हान्शिन भद्योगिक प्रदेशों में हुआ 
है इस उद्योग के हल्के सामान नयी-नयी कम्पनियों तथा 


धरेलू वर्कंशापों से आते हैं परन्तु भारी वैद्यू तिक सामान (जैसे जनरेटर) छह 
बड़ी कम्पनियों द्वारा निमित होता है जिनमें हिटाची, मित्सुबीशी और फ्यूजी 
प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त मनेक छोटे -छोटे कारखानें हैं जो वैद्य तिक उपकरणों 
को मात्युशिता (४॥७४७०७॥॥७) कारखाने के लिए बनाते हैं ! 
हल्के इन्जीनियरिंग उद्योग (99 ६70977०07॥79 [70087॥95) 
इल्के इंजीनियरिंग उद्योगों में अनेक प्रकार के सामानों का उत्पादन होतो 
है जिनमें सिलाई मशीन, कैमरा, दुरवीन आदि का महत्वपूर्ण स्थान है । जापान 
में 4984 में 88774000 कैलकुलेटर मशीन, 43582900 रेडियो रिसीवर, 
4549300 ठहलीवीजन रिसीवर, 5337000 कैमरा, 7900 सिनेमा के 
कैमरे निरमित हुए | सन_979 में टेलीफोनों की संख्या 52937200 थी। 


इस प्रकार सो व्यक्तियों पर टेलीफोनों की संख्या 458 थी । कैमरा, रेडियो, 
टलीविजन आदि के उत्पादन का विवरण तालिका 7.9 से प्राप्त हो जाता है। 
तालिका का 9 के मै 
हल्के इच्जीतियरिंग सामानों का विभिन्‍्त वर्षो में उत्पादन (हजार में) 














भकार उत्पादते ॥॒ बज र म कम 
4982 पु 984 7 

). कलकुलेटिंग मशीन 58458 6०547 89774 
2. रेडियो 4956 43339 3589 
3. टेलीविजन 3398 43279 45493 
4, सामान्य कीमरा 43850 4484 45337 
5. सिनेमा कैमरा 480 १0 79 
6. घड़ी ]46232 73549 220565 


'एननामममाइकक.... 





धममाममभा करा भा भा पर धइ*पहपकहभयान्‍ पा पाक भा३० १२३ पाए काम कमान पका] भाभा:ञफराउ पार गगन क" अमन“ ननन- न >>» >.मन्न-+०-कनकनक> आफ, 


त--थूरोपा ईयर बुक, 986, पृ. 496, 





पा) 


204 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


तालिका से स्पष्ट है कि 4982 की तुलना में 4984 में रेडियो तथा 
सिनेमा कैमरा के उत्पादन में कमी आई है परन्तु कलकुलेटिंग मग्गीन, टेलीवि- 
जन, सामान्य कैमरा तथा घड़ियों के उत्पादन में वृद्धि हुई है। 
इन सामानों की भांग विदेशों में उत्तरोत्तर बढ़ रही है। इन सामानों 
का निर्यात उत्तरी अमेरिका यूरोप और आः'स्ट्ूँ लिया जैसे महाद्वीपों के लिए 
होता है। इन सामानों का निर्माण घरेलू वकेशापों में होता है। पुनः इन पूर्जो 
को छोटी-छोटी फैक्टरियों में मेज दिया जाता है जहां इनका निर्माण 


होता है । अपनी उत्तमता एवं गुणवत्ता के कारग ये सामानविदेशों में लोकप्रिय हैं। 


कैमरे के उत्पादन में जापान विश्व में अग्रणी है। 4960 से प्रतिवर्ष 
कैमरे का उत्पादन लगभर 4 मिलियन है। वतंमान समय में जापान में यद्यपि 
कैमरे की मांग नहीं है परन्तु 700 और 4966 के मध्य कैमरे के निर्यात में 
दोगुनी वृद्धि हुई है। 984 में 5337000 सामान्य तथा 79000 सिनेमा 


कैमरों का उत्पादन हुआ । 966 में संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरीप के 
लिए 50 प्रतिशत (2 मिलियन) कैमरों का निर्यात किया गया। सिने कमरा, 
टेलिस्कोप, वाइनाकुलर आदि की मांग विदेशों में उत्तरोत्तर बढ़ रही है । 


जापान विश्व की 40 प्रतिशत सिलाई मशीन का उत्पादन करता है। 
अनेक छोटे उद्योगों की भांति यह उद्योग नगोया में विकसित है जहां घरेलू 
वर्कंशापों में उपकरणों को बनाकर कारखानों को मेज दिया जाता है | जापान 
में पाश्चात्य पोशाकों को लोकप्रियता के कारण जापान के अधिकांश परिवार 
सिलाई मशीन अपने पास रखते हैं । इसके अतिरिक्त 60 प्रतिशत सिलाई 
मशीनों का निर्यात संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे विकसित देश को किया जाता है 
जो जापान की सिलाई मशीन का सबसे बड़ा ग्राहक देश है । 


इसके अतिरिक्‍त जापान की व्यापारिक मशीनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है 
जिनमें टाइप्राइटर, कम्प्यूटर, फोटोस्टेट भशीच, डिक्टेटिग मशीन तथा टेप-- 
रिकाडर महत्वपूर्ण हैं। 7860 के पश्चात जापान में घड़ियों के उत्पादन में 
वृद्धि हुई | 960 की तुबना में 967 में जापान की घड़ियों के उत्पादन 
में दुगुनी वृद्धि हुई । (32 मिलियन) हुईं । 4984 में 22। मिलियन घड़ियों का 
उत्पादन हुआ । वर्तेमान समय में इस घड़ियों के निर्यात मे तीजन्न गति से वद्धि 
हो रही है । न्‍ 

रसायन उद्योग (ट0०४४०० ]00809५)» 


यह जापान को महत्वपूर्ण उद्योग है । 967 में समस्त औद्योगिक उत्पा- 
दनों का |[ प्रतिशत उत्पादन रसायन उद्योग का था। 955 म्रें पेट्रोके मिकल 


उद्योग प्रारम्भ हुआ । इसके पश्चात इस उद्योग में उत्तरोत्तर विकास होता 


ओऔद्योगिक विकास [| 205 


गया । उर्वरक, पेच्ट, रंग, दवाइयां आदि बचाने वाले उद्योगों का विकास हुआ 
जिनमें अपेक्षाकृत कम पू'जी और हलके तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता होती है । 
इसके अतिरिवत प्लास्टिक, सेन्येटिक फाइबर, रेजिग्स आदि उद्योगों का विकास 
हुआ जिनमे अपेक्षाकृत अधिक पृ जी और उच्च तकनीक को आवश्यकता होती 
है । यद्यपि युद्ध से पूर्व भी जौद्योगीकरण के दूसरे चरण में जापान में रसायन 
उद्योग का महत्वपूर्ण स्थाव था परल्तु पेट्रोकेमिकल उद्योग के कारण इस उद्योग 
में भीर भी अधिक तीज गति से प्रगति हुई । 960 से 966 के मध्य पेढ्रोके 
केमिकल उद्योग में दस गुनी वृद्धि हुई | वर्तमान समय में सम्पूर्ण उत्पादन 
में 30 प्रतिशत उत्पादन रसायन उद्योग से आता है। रसायन उद्योग के 
विभिन्‍न उत्पादों का विवरण चित्र 7.6 एगं तालिका 7.20 से स्पष्ट है। 


हि 86£0..0४४ 40 से ढत 


|» 5४0२7॥६7१८  #॥87६ 
० | 8#१४ 07 


चित्र 7,6 जापान : (अ) रसायन उद्योग का क्षेत्रीय स्वरूप 





(ब) कृत्रिम धागा उद्योग का वितरण 


|-क्त्रिम घाया, 2-रेयत 


206 १ 


तालिका 7.20 


जापान की भौगोलिक समीक्षा 


विभिन्‍न वर्षो में रासायनिक पदार्थों काउत्पादन (हुजार मी ० टन) 








प्रकार उत्पादन 
4982 983 ]980 
]. बेंजीन 4844.7 4938.0 229.5 
2. कास्टिक सोडा 2792.7 2863.3 3085,3_ 
3. सोडा ऐश 462.4 4403.4 4036-2 
4, अमोनियम सल्फेट 689.7 ]749.6 829.4 
5. नाइट्रोजन युवत एवेरक 4253,0 4426,0 076.4 
6, फासफेट 580.0 625.0 647.0 
7. प्लास्टिक तथा सेन्थिटिक रेज्ज्सि 9570.0 अनुपलब्ध अनु पलब्ध 
8. सिन्‍्थेटिक रवर 930.7 002.5..._60.6 
9. सल्फ्यूरिक एसिड 6530.9 666[.8 645].4 
0. हाइंड्रोक्लोरिड एसिड 548.5 560.] अनुपलब्ध 
][. नाईंट्रिक एव्िड 52] .0 ४40.0 अनुपलब्ध 


43-43: >.....क्‍. 3 ७... ४४००-००» ३७०७० मी हा 
राणा“ <+ जम + मल 


यूरोपा ईयर बुक 4986, पर. 4495 द 


॒ तालिका से स्पष्ट है कि बेंजीन, कास्टिक सोडा, अमोनियम सल्फेट 
फास्फट तथा सिन्थेटिक रबर के उत्पादनों मे 4982 की तुलना में 984 च 
वृद्धि हुई है जबकि सल्फ्यूरिक एसिड, सोडा ऐश और ना 
के उत्पादन में 984 में कमी हुई है । सम्पूर्ण रसायन उद्योग में 4984 में 
समस्त रोजगार के 2 श्रतिशत व्यक्ति लगे थे जबकि 4974 में यह 23 प्रति- 


इट्रोजन युक्त उर्वरकों 


955 से पूर्व रसायन उद्योग 


पूर्णरूपेण कच्चे माल में 
न के रूप में कोयले पर 


कोयला उत्पादक प्रम्ुब् क्षेत्र उत्तरी क्यूशू का चिकुहो 


औद्यौगिक विकास [207 


(0!॥00॥0) क्षेत्र है। यही कारण है कि अधिकाँश र७ायन उद्योग के कारखाने 
उत्तरो क्यूश ओद्योगिक क्षेत्र में ही लगाये गये | कोक के भिर्माण फे कारण 
अनेक प्रकार के सम्बन्धित उद्योगों का विकास हुआ जिनमें उर्वरक, प्लास्टिक, 
रेजिन, वेकलाइट / सिच्येटिक, पालिमर (नाइलान के लिए) रंग, दवाएयां, फीट- 
नाशक दवाइयां, प्रसाधन सामग्री तथा पेन्ट आदि प्रमुख हैं। लीह एवं पस्पात 
उद्योग के निकट हाल में आवसीजन बनाने का कारखाता लगाया गया है जो 
लौह एवं इस्पात की तीत्र गति से पिघलाने के काम में आता है। भाक्सीजन 


बनाने के नितेत्सू (ध799॥५) तथा यावाता कारखाने टोबादा (780868) में 
स्थापित किये गये हैं । इसी भांति अन्य क्षेत्रों में भी लोह-इस्पात उद्योग के 
साथ-साथ रसायन उद्योगों का विकास हुआ है। ऐसे औद्योगिक क्षेत्र चिबरा 
तटीय जऔद्योगिक क्षेत्र, सेकाई (580४7) तट, ओसाका के दक्षिण में केन्द्रित हैं 
जहां लोह एवं इस्पात के वर्ड -बड़ प्रतिष्ठान स्थापित फिये गये हैं। होकटो के 
मुरोरान (शपएाणआ)) तथा जोबान कोयला क्षोद्ष में भी ये उद्योग लगाये 
गये हैं । 


इलेक्ट्रोकेमिकल उद्योग भी इसी उद्योगके बन्तर्गत थाताहै जो मुप्य रूपसे जल 
विद्युतशक्ति पर आधारित है। यह उद्योग होकरिक्‌ के तटीय क्षेत्रोंमिं निगाता और 
टोयामा प्रिफेक्चर, चुक्‍्यो क्रीद्योगिक क्षेत्र, शिकोकू तथा दक्षिण पश्चिमी वसययुधु 
के नोवियोका ([४0920(९8) में स्थापित हैं। शिकोक में सुमीटोमो कम्पनी ते 
अनेक रसायन उद्योगों को जल विद्य त शक्ति के आधार पर विकसित किया है। 
इसके साथ ही साथ तांबे तथा अनेक अलोह धातश्रोंकों पिधलाने वाछे उद्योग भी 
विकसित हैं । 


पेट्रोकेमिकल उद्योग का विकास 955में प्रथम योजना के धन्तर्गत हुआ | 
इस योजना में देश के बड़े-बड़े औद्योगिक समूह चार बड़े पेटोग्रेविकल उद्योगीं 
की स्थापना के लिए सहमत हो गये जिनतपें प्रत्येक उद्योग के पास एक तेल 
गोधमाला, एक नेप्या [५४.॥॥8) क्रैकिंग (0279060॥8) प्रतिस्ठान तथा तैल से 
चलने वाले एक विद्यतगृद् थे। हिरोशिमा के निकट आस्तरिक सागर के पश्चिम 
इवाकुनी में एक मित्युड (/॥४ए)) प्रतिप्ठान, ठत्तारों शिक्रोक्ू के रखायन दबोग 
के निकट तींह्वामा में सुमीटोमी प्रतिस्दात, आईश खाड़ी के सिकठ योवकाइनी में 
मित्मूवीजी प्रतिप्दान तथा कावासाकी में निश्वन वैड्रीकमिकल प्रतित्दान स्थायित 
किये गये | इसके अतिरिक्त पांच बड़े प्रतिस्यानों को 7986 तक पूरा कर टिया 
गया और 4969 तक्र दो और ने उद्योग लगाये गये । 


मी आय ही अा श्र अत्पाद छा. आका कि धर ही |: 
पेसोकरैमिकल उद्योग के सहत्वयर्ण उद्वादनों में सिम्थेद्िक क्राटबर (2२ी- 
नी का | $ 


३६. 
हि] 
है] 


208 ) जापान की भौगोलिक समीक्षा 


लोन, एक्रीलान आदि) अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि इनका उपयोग अलग-अलग 
तथा प्राकृतिक धागों के साथ होता है। जापान के लिए यह अत्यन्त महत्वपूर्ण 
है क्योंकि जापान में प्राकृतिक ध्वागों के संसाधनों का अभाव है । अनेक प्रकार के ु 
प्लास्टिक तथा रेजिन्स का उत्पादन होता है जिनमें मेलामाइन ([४७शाएं॥6), 
पालीथीन, पालिस्ट्रीन आदि महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त सिन्येटिक रबर का 
भी उत्पादन होता है। इन सभी उत्पादनों का मुख्य संसाधन खनिज तेल है। ह 
पेट्रोकेमिकल उत्पादनों ने लकड़ी, धातु और सीसा से निर्मित उत्पादनों को 
महत्वहीन कर दिया है, क्योंकि पेट्रोकेमिकल के उत्पादनों में कन्टेनर, पाइप, 
चर, मेजपोश और खिलौने अपेक्षाकृत अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं| विश्व में 
इनकी मांग दिनों-दिन बढ रही है । यही कारण है कि इनसे सम्बन्धित उद्योग 
जापान में दिनों-दिन विकसित हो रहे है । 


इस प्रकार के प्रतिष्ठानों का विकास मुख्य रूप से तटीय -भागो की ओर 
हुआ है जहाँ पर समुद्र की गहराई सामानों को मंगाने एवं भेजने के. लिए अनु- 
कूल हो अर्थात्‌ बन्दरगाहों की सुविधाओं से वे क्षेत्र परिपूर्ण हों । इसलिए इस 
प्रकार के उद्योग वा तो औद्योगिक मण्डल में विकसित हैं अथवा उनके निकट । 
फीहिन, हान्णिन और चुक्यो जैसे विशाल औद्योगिक क्षेत्रों तथा आन्तरिक 
सागर के तटीय भागों में इस प्रकार के उद्योग विकसित हैं। आन्तरिक सागर मे 
पेट्रोरसायन उद्योग नीहामा के प्राचीन रसायन उद्योग तथा रेयान उद्योग के 
निकट विकसित है। इसके अतिरिक्त ओकायामा के मिजूशिमा तथा टोकाई के 
मिशिमा क्षेत्र में भी ऐसे प्रतिष्ठान लगाये गये हैं । 

वर्तमान समय में इस उद्योगकी तकनीकी क्षमता और विस्तार में पाश्चा- 
त्य विकसित देशों की तुलवा मे वृद्धि हुई है। अनेक प्रकार की विदेशी कम्प-. 
तियों के साथ किये गये समझोतों के कारण इस उद्योग मे और भी अधिक वृद्धि 
हो रही हैं| अत्यधिक उत्पादन के कारण उत्पादनों के मूल्य में गिरावट आ 
रही है जिसमे इस उद्योग के उत्पादनों की खपत के लिए विशाल विश्व बाजार 
हा ह सुविधा उपलब्ध है। 960 की तुबना में 967 में पेट्रोकेमिकल के उत्पा- 
दरों की कीमत में 33 प्रतिशत गिरावट आई । रसायन उत्पादनों का निर्यात 
दक्षियी-पूर्वी एशियाई देशों तथा साम्यवादी देशों की मुख्य रूप से होता है। 


पस्न्र उद्योग (7०)०॥० (005$89) 
जापान के ओोद्योगीकरण में वस्त्रोद्योग का महत्वपूर्ण स्थान है। द्विवीय 
विश्व युद्ध के पश्चात वस्त्रोद्योग, इ जीनियरिंग, 


रसायन और लौह एवं इस्पात 
उद्योग के पश्चात चौथे स्थान पर है, परन्तु कपास, रेबाब और सिन्येटिक फाइड 


ओऔद्योगिक विकास [ 209 


वर का निर्यात में द्वितीय (धातुओों के पश्चात) स्थान है। निर्यात मों इनका 
8 प्रतिशत का योगदान है। जापान में ब्रिठेव की तुलना में कपांस के घांगीं 
का दुगुना उत्पादन होता है| धागों के उत्पादन में संयुक्तराज्य अमेरिका और 
चीन के पश्वात जापान का तुतीय स्थाच है| अपयुक्त दोनों देशों का 33 प्रति- 
शत भागों का ऊत्पादन जापान में होता है । जापान के वस्त्र झ्योग में 498] 
के अनुसार समस्त रोजगार के 7.3 प्रतिशत लोग लगे थे । सृती, ऊनी व रेशमी 


आदि धागों के उत्पादन का विवरण निम्न तालिका से प्राप्त हो जाता है। 
तालिका 7.2॥ 


विभिन्न वर्षो वर्षों में उत्पादन (हजार मी० टन ) 








प्रकार उत्पादन 
4982 मे 4983 4984 
]- सूती धागा 470.2 337.7 436.7 
2- ऊनी धागा 20 4 4]09.0 420.9 
3- रेयान धागा 294.6 307.8 307.7 
4- सूती वस्त्र 
(मिलियन वर्गमी ०) 2029.8 2078.6 2089.8 
5- अनी वस्त्र ,, 294.5 30व.8 327.॥ 
8- रेयात वस्त्र ,, 677. 650.0 634.2 
7- रेशमी वस्त्र ,, ]36.5 42,8 45.[ 
8- सिन्थेटिक वस्त्र ,, 3024.3 3248.7 3296.] 





स्नीत : यूरोपा ईयर बुक 4986, पू० 495.. 


तालिका से ज्ञात होता है कि विभिन्न प्रकार के वस्त्रों के उत्पादन में 
982 की तुलता मों 984 में कोई अल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है. जिसका 
प्रमुख कारण अन्य देशों म॑ वस्ल्ोद्योग की प्रगति हैं। कच्चा माल आयात 
करने के कारण ये वस्त्र मंहगे पड़ते हैं। इसलिए इन वस्त्रो का उत्पादन 
| स्थिर है। केवल रेयान धागो के उत्पादन में बुद्धि हुई है। 4982 म॑ रेयान 
घागे का ऊत्पादन 29460 मीट्रिक टव हुआ जो 4984 भ॑ बढ़कर 307700 
मीट्रिक टन हो गया । जहां तक वस्त्रोत्पादन का प्रश्न है, वह रेशमी और रेयान 
वस्त्रो को छोड़कर सूती एवं ऊती वस्त्रो के उत्पादन म॑ वृद्धि हुई है । जापान 
के वस्त्र उद्योग के केन्द्र नोवी मैदान में केरिद्रित है। जहां सम्पूर्ण जापान का 





240 ] जापान की भोगोलिक समीक्षा 


33 प्रतिशत वस्त्र तैयार होता है। वस्त्रोद्योग में हान्शिन का द्वितीय स्थान 
है । बुनाई के अधिकांश उद्योग ग्रामीण क्षत्रों में केन्द्रित है । हर 
जापान में वस्त्रोद्योग का प्रचलन मिजी (४७४४) काल से ही है.। यह ' 
उद्योग छोटे माप के उद्योग के अन्तगंत जापान में उत्पन्न कपास और रेशमी 
धागों पर अ धारित है। रेशम का उत्पादन किनकी के तगरीय. एवं ग्रामीण 
दोनों क्षेत्रों में होता है। क्योंटो, फुकुई के निकट और टोशान में रेशम के कीड़े 
पाले जाते हैं । सूती वस्त्रों का उत्पादन ओसाका क्षेत्र में होता है.जहाँ कपास 
नकटवर्तीज-ष्ण शुष्क आन्तरिक सागर तटीय क्षेत्र में उत्पन्न होती है; 


सूती वस्त्र झा पहला आधुनिक कारखाना सन्‌ 4867 में दक्षिणी वशुझ्यृ में 
सत्सुमा ( 5850॥74 ) के लाड ने ब्रिटिश सहायता से लगाया। इसके पश्चात 
4878 मे ब्रिटिश विशेषज्ञों की सहायता से मिजी सरकार ने दूसरा कारखाना 
लगाया । इस कारखाने में अधिक पू'जी को आवश्यकता नहीं पड़ी तथा स्थानीय 
श्रम शक्ति का भरपूर उपयोग होने के कारण यह कारखाना जापान के लिए 
अत्यधिक अनुकूल सिद्ध हुआ । इम कारखाने में कम मजदूरी पर खेती के कार्यों 
से अवकाश प्राप्त होने पर स्त्रियां कार्य करने लगगीं। कारखाने का संचालन 3, 
पासियों में सुचारु रूप से होने लगा। इसके परिणामस्वरूप इस कारखाने में 
निर्मित वस्त्र की लागत विश्व के किसी भी देश में उत्पन्न वस्त्र की लागत से 
क्मी आई | अत: 4890 के पश्चात जापान का बच्त्र उद्योग विश्व मे प्रसिद्ध हो 
गया | द्वितीय विश्व युद्ध तक वस्त्र उपयोग में तीदआ गति से वृद्धि हुई । 966 
में सिन्थेटिक वस्त्रो के उत्पादन ओर मांग ने कारण वस्त्रोद्योग में 200 प्रतिशत 
की बढ़ोत्तरी हुई। वस्प्रोद्योग की तुलना मे इन्जीनियरिंग, रसायन और लौह 
एवं इस्पात उद्योगों मे प्रगति अत्यधिक तीन्र रही । अतः इसका स्थान चौथा हो 
गया । 934 में जापान विश्व में सर्वाधिक सूती वस्त्रोत्पादक देश था क्योकि 
वस्न्ोत्पदन सम्पूर्ण औद्योगिक उत्पादन का 34 प्रतिशत था। परन्तु 967 मे 
चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका वस्त्र उत्पादन मे जातजान से आगे निकल गये 
जिसके परिणामस्वरूप यह्‌ उत्पादन प्रतिशत घटकर केवन 9 प्रतिशत रह गया। 
4925 में जापान से सम्पूर्ण वस्त्रों का 76 प्रतिशत वस्त्र बिदेशों को निर्यात 
होता था परन्तु वाद के वर्षो में उत्पादन के साथ-साथ-निर्यात घटने लगा । 


934 मे निर्यात 60 प्रतिशत था जो 967 भें घटकर केवल ]6 प्रतिशत रह 
गया । 


जावान में वस्त्र उद्योग के विक्रास को तीन कालों में विभाजित किण जा 


गवता हू। अ्रथम काल 930 के पूर्व का है जिप्में रेशमी एवं सूती वस्त्रों का 
सर्वाधिक उत्पादन हुआ । 9वी शताब्दी के अस्त तक एक ऊनी वस्त्र के कार- 


ज्ड 


आद्योगिक विकास [ 2| 


खाने की स्थानना हुई परन्तु यह उत्पादन रेशमी एवं सूती वस्त्रों की तुलना में 
बहुत कम था । 3935 तक सूती वस्त्र का उत्पादन 50 प्रतिशत तथा रेशम का 
उत्पादन 33 प्रतिशत था : 


. द्वितीय काल 4930 के बाद से प्रारम्भ होता है जिसमें रेयान उद्योग का 
महत्वपूर्ण स्थान है। इसका महत्व यद्यपि सुतती वस्त्र और केमिकल फाइबर से 
कम था परन्तु उत्पादन रेशम की तुलना में अधिक होने लगा । इस उद्योग में 
जापान की सस्ती लकड़ी की लुगदी (?४०) लगने के कारण रेयान के उत्पादन 
में तीतन्र गति से बढ़ोत्तरी होने लगी | अतः द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व जापान 
विश्व का प्रथम रेयान उत्पादक देश बन गया । झुद्ध के कारण तथा सस्ते न्ाइ-- 
लान के कारण रेशमी वस्त्र के उत्पादवत को गहरा आधात पहुंचा और युद्ध से 
पूर्व की स्थिति में उत्पादन नहीं पहुंच सका | 

तृतीय काल 950 के बाद से प्रारम्भ होता है । इस काल में _ सिस्येटिक 
घागे जिसमें नाइलान और टेरीलीन शामिल है, उत्तने ही महत्वपृर्ण हो गये 
जितना पहले सूती वस्त्र | यही कारण है कि 967 में सिनन्‍्थेटिक बस्त्रों का 
उत्पादन समस्त वस्त्रों के उत्पादन का 32 प्रतिशत था जबकि इसी काल में सूती 
वस्त्र का उत्पादन 28 प्रतिशत तथा रेयान का उत्पादन 20 प्रत्तिशत था। 
घरेलू कोयला तथा सस्ती जन विद्युत शक्ति के कारण इस उद्योग को बड़ा लाभ 
मिला । वर्तमान समय में इन उद्योगों में आयातित खनिज तेल का प्रयोग 
बढ़ता जा रहा हैं। इस समय जापान सयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चात द्वितीय 
सबसे बड़ा सिन्थेटिक वस्त्रोत्पादक देश है । रेशमी वस्त्रों का उत्पादन दिनों दिन 
पम होने के कारण समस्त वस्त्र उत्पादन का यह केवल प्रतिशत रह गया है 
जबकि ऊनी वस्त्र का उत्पादन 8 प्रतिशत है । 


विश्व युद्ध के पश्चात लोगों के जीवन स्तर में सुधार होने के कारण वर्स्त्रों 
वी घरेलू खपत अधिक हुई है | पाश्चात्य वस्त्रों की लोकश्रियता के वावजूद ऊनी 
दसस्‍त्रों की खपत में आाशातीत वृद्धि हुई है। जापान से बस्चों के निर्यात में कमी 
साई है क्योकि जापान के वस्त्र उच्च मजदूरी, आायातित महंगी कच्ची सामग्री 
थादि के कारण भारत और चीन द्वारा उत्पादित बच्त्रों की तुलना में महंगे 
पड़ते हैं। अत: जापान उच्च श्रेणी के बस्त्रों को निर्यात करने पर अधिक बल 
देता है। जिसकी खपत संयुक्त राज्य अमेरिका, यूरोप, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका एवं 
एशियाई देशों में होती है। यहाँ की कुशल और पारिश्रमिक दृष्टि से सस्ती 
स्त्रियां भारत और चीन की तुलना में उच्च श्रेणी के वसरुत्रों का उत्पादन करती 


हैं। अतः जापान के वस्च्रों के धाग्रे ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना 
में सस्ते पड़ते है । 


जापान की भोंगोलिक समीक्षा 


6 


उद्योगों की क्षमता में दद्धि होने के कारण वस्चरों के उत्पादन मे तंत्र गति 


वि 


वृद्धि हुई है । विश्व युद्ध से पूर्व के उत्पादन की तुलना में 4967 में दुगुनी 


परन्त 4982 की तलना में 4984 में कोई उल्लेखनीय प्रयति नहीं 


सूती वस्त्र उद्योग ( ००४०४ ॥6५0॥8 ॥700७॥9५ ) ु | 

967 नें चूती व्तत्र का महत्व सिन्‍्येटिक वस्त्र की तुलना में कम हो 

गया । 4960के दाद से सूती बच्चों के निर्यात में निरन्तर कम्ती आती गई, फिर 
भी जापान इस काल तक विद्च का प्रथम सूत्ती वस्चर से सम्बन्धित सामानों का 
निर्यातक देश था । यह विज्व के समस्त निर्यात 30 प्रतिशत सूती सामान निर्यात 
करता था । कच्चे साल की पूर्ठि के लिए समस्त कपास का 50 प्रतिशत कपास 
उत्तरी बमेरिका से छायात की जाती भी । 966 में मोक्सिकों से 28 प्रतिशत 
तथ। संयुक्त राज्य अमेरिका से 26 प्रतिनत कपास का जायात किया गया । झेप 
कपास भारत, पाकिस्तान, व्राजील कौर सिद्ध से बायात की जाती थी। सस्ता 
मजदूरी पर कार्य करने के लिए यहां की सरकार महिलाओं को प्रोत्साहित कर 


तालिका 7 


विभिन्‍न वर्षो में धागा एवं वस्च का उत्पादन (हजार मी ० टन) 








3 ााभभ भा मत ६ रा मरा ८. 


प्रकार 














उत्पादन 
982 983 98 4 
नमन कक अल ,७७७७४७४४७४४८४"ए"ननशश॥//श/आशशशशशशशणशणशणशशशश/शणणनणणणनननाभााभाााा५ पा मय तन जनक लीककल मील नल लक 
- सुती धागा 470.2 437 7 436.7 
2, ऊना घागा 420.4 440.0 20.9 
3. रयान धागा 294 6 307 & 307.7 
4. चूदी वस्त्र (मिलियन 
मीटर 2020.8 2078.6 2089 ६ 
5. उनी वसच्च हक 294 .5 304.8 327.] 
6, रेयान वस्च ,, 677.4 650.0 63].2 
4. रेसमी वस्च ९ ]36.5 424.8 745.4 
8- सिन्‍्वेटिक वच्च्र रे 3024 3 3248,7 3296.8 
स्तात : 


वृरोपा ईयर दुक, 986, पृ० 4495 


औद्योगिक विकास [ 23 


रही है। जाजान में सूती धागे का उत्पादन 4982 में 470200 मी० टन था जो 
वबादके वर्षों मे घटकर क्रमश: 437700 मी० टन (983) और 436700 


मी० टन (984) हो गया । परन्तु सूती वस्त्र के उत्पादन में वृद्धि हुई। 982 
में कुल 2029800हजार वर्ग मीटर कपड़े का उत्पादन हुआ जो 4984 में बढ़ 
कर 2089800 हजार वर्ग मीटर हो गया । जो तालिका 7 22 से स्पष्ट है। 


मिजी काल से पूर्व जापान में कपास उत्पन्च की जाती थी परन्तु बाद में 
सस्ते दर पर कपास का आयात होने के कारण कपास का उत्पादन कमर हो गया 


परन्तु अधिकांश मिलें उन क्षेत्रों में स्थापित की गई जो कपास उत्पादक क्षेत्र थे। 
आन्तरिक सागर के निकटवर्ती क्षेत्र, नोबी और कास्टो मेदान तथा जापान सागर 


तदीय क्षेत्र होक्रिक्‌ के ठोयामा क्षेत्र प्रमुख कपास उत्पादक क्षेत्र थे । इन क्षेत्रों 
में स्थापित मिलों में प्राय: कतताई और बुनाई का कार्य होता है। बड़े पैमाने पर 


बुनाई का कार्य चुक्‍्यो, हास्शिन आन्तरिक सागर के उत्तरी तटीय बड़े बगरों 
तथा टोयामा में होता है । कताई का कार्य उत्तरी क्युशु और कीहिन में भी 


किया जाता है। इस समय बुनाई को कताई के साथ सम्बद्ध कर दिया जा रहा 
है । ऐसी मिलें ओसाका और नगोया में केन्द्रित हैं । 


सूती वस्त्र उद्योग लघ्‌ एवं बड़े स्तर के उद्योगों में विकसित है। अधि- 
कांश मिलें केवल एक ही कार्य करती हैं। बड़ी-बड़ी मिलों में बुनाई ओर 
रंगाई का कार्य अपेक्षाकृत कम होता है। अधिकांश बड़ी माप की इकाइयां 
कताई का कार्य विशेष रूप से करती हैं । ऐसी 0 बड़ी इकाइयों में देश का 66 


प्रतिशत धागा तयार होता हैं। साथ ही ये 33 प्रतिशत बुनाई का भी कांयें 
करती हैं जो पूर्णरुमेण निर्यात किया जाता है। छोटी-छोटी इकाइयों में मुख्य 
रूप से बुनाई का ही काय होता है। ऐमी छोटी-छोटी फर्मा में 75 फर्म ऐसी है 
जिनमें सम्पूर्ण श्रमिकों की संख्या केवल 300 है। ये इकाइयां घरेलू उद्देशयों के 
लिए वेल्वीटीन (४९८४४४०९९॥) तथा जिघम (0ध्षाआआ) वन।ती हैं तथा 
निर्यात के लिए होजरी का सामान तेयार करती है । 


रेशसी वस्चर उच्योग (9॥ |४60७४४१) 


]920 के दशक में रेशमी वस्त्र उत्पादन में जापान का महत्वपूर्ण स्थान 
था। जायान के निर्यात का 30 प्रतिशत निर्यात रेशमी बस्चत्रों का था। परन्तु 
4930 के बाद इसके उत्पादन एवं निर्यात दोनों में कमी आई। फिर भी जापान 
विश्व का प्रथम रेशम उत्पादक देश है। वर्तमान समय में 920 की तुलना में 
रेशम का केवल 50 प्रतिशत उत्पादन होता है। जापान के सम्पूर्ण धागों का 
एक प्रतिणत धागा रेशम से तेबघार होता है। जापान में सर्वाधिक रेशम का 
उत्पादन 4982 में ((364.59 लाख वर्ग मीटर) हुआ जो बाद के वर्षो में 


244 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


निरन्तर घटता गया । 4983 में यह उत्पादन घटकर 42/7.94 लाख वर्ग मी० 
तथा 984 मेंघटकर 54.6 लाख वर्ग भी० रह गया। (तालिका 7.22)।. 
देश में बढ़ती मांग के कारण [964 से कच्चे माल का आयात किया जा रहा है 
तथा निर्यात में कमी आयी हैं। हु 


रेशमी वस्त्र के कारखाने उन स्थानों पर लगाये गये है जहां पर कोकून 
((००००॥७) उत्पन्न किये जाते हैं। कास्टो सौदान के सैदामा और _ यामाचाशी 





० 50 ॥00 [50 200 





४।८६३ 


चित्र 7.7 जापान : रेशमी उद्योग, उत्पादन क्षमताका 


क्षेत्रीय स्स्रूप 


औद्योगिक विकास [ 245 


प्रिफेक्चर, उत्तरी नोवी मैदान में गिफू प्रिफेक्चर तथा दोशान के नगानों और 
गुमा प्रिफेक्चर प्रमुख रेशस उत्पादक क्षेत्र हैं । रेशम की बुनाई का कार्य छोटे-- 
छोटे वर्कशापों में किया जाता है जो दूर-दूर तक पीले हुए है । परन्तु रेशम की 
बुनाई विशेष रूप से जापान सागर तटीय क्षेत्र के फुकुई और इंशीकावा प्रिफेक्चर 
तथा क्योटो, पश्चिमी कान्‍्टो एवं दक्षिणी दोहोकू में होती है। रेशम के उत्तम 
वस्त्रों की बुनाई के लिए क्‍्योटों तथा उसका निकटवर्ती क्षेत्र विख्यात है क्योंकि 
वहाँ पर प्राचीच कालसे ही रेशमी वस्त्रव नानेका कार्य होता आया है। (चित्र 7.7) 


झनी बस्तर जचोग (७०ाशा [0७४४५ ) 

इस उद्योग की स्थापना सूती एवं रेशमी वस्त्रों के उद्योग के पश्चात हुई। 
यहां पहले ऊनी वस्त्रों का आयात विदेशों से सैनिकों के लि ए किया जाता था | 
ऊतनी वस्त्रोद्योग का पहला कारखाना उन्तीसवीं शत्ताब्दी के अन्त मे लगाया गया 
जिसके लिए कच्चा माल आयात किया जाता था। कच्चे माल की आपूर्ति 
आस्ट्रेलिया से होती थी। इसके प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र ओसाका, मगोया और 
थाकोहामा है जहां ऊनो धागे बचाये व बुने जाते है। यह कार्य छोटे-छोटे ब्को- 
शापों में कुशलतापुर्वक किया जाता है | वर्तमात में ऊत्ती वस्त्रों की साँग बढ़ 
रही है। ऊनी वस्त्रों का उत्पादन सम्पूर्ण वस्त्रों के उत्पादन का 40.3 प्रतिशत 
है। जापान में 4982 में 420400 मी० टन ऊती धागे का उत्पादन हुआ जो 
984 में में बढ़कर 420900 मी० टत हो गया । धागे की तुलना में ऊनी 
नस्त्र का उत्पादन 4982 में 294543 हजार वर्ग मीटर की तुलना में 984में 
पढ़कर 32734 हजार वर्ग मीटर हो गया | अनेक प्रकार के सिन्थेटिक बस्त्रों 
की प्रतिस्पर्धा के बावजूद ऊची बस्त्रों के उत्पादन में वृद्धि हो रही है। 

केसिकल फाइबर (८॥७770४॥ ०78७) 

जापान विश्व का सबसे बड़ा रेयान स्टेपुल (809000) तथा हितीय बड़ा 
रेयान तन्तु (लक्षात०४॥) उत्पादक देश है। सिन्येटिक फाइबर की प्रतिस्पर्धा 
के बावजूद सम्पूर्ण वस्त्र उत्पादन का 25 प्रतिशत उत्पादन करता है । प्रमुख 
उत्पादक क्षेत्र पश्चिमी जापान में केन्द्रित है । ये उद्योग भआात्तरिक सागर के 
निकटवर्ती क्षेत्रों में विकसित हैं जहां पर स्थानीय एवं आयातित लकड़ी का 
अयोग होता है | 

सिन्येटिक फाइबर का वस्त्रोत्पादत में महत्वपूर्ण स्थान है। इसका 
विकास एवं उत्पादन तीज गति से हो रहा है। 950 की तुलना भे सिन्येटिक 
फाइबर के उत्पादन में 967 में चार शुनी वृद्धि हुई है । 955 के पचात 
सिन्धेटिक फाइवर पेट्रो रसायन संयोग से तैयार किये जा रहे हैं जिसके परिणाम 


26 ] जापान की भौगोलिक समीक्षा 


स्वरूप 967 में वस्त्रोत्पादन में प्रयुक्त सम्पूर्ण धागों के 32 प्रत्तिशत धागे 
सिन्येटिक फाइबर के थे । 284 में रेयान फिलामेन्ट का उत्पादन ]॥08 00 
भी० टन फिलासेन्ट तथा 307700 मी० टन घांगे का उत्पादन हुआ जो 
तालिका 7.23 से स्पष्ट है । 





तालिका 7.23 
विभिन्‍न वर्षों में उत्पादन (हजार मी० टन) 
प्रकार उत्पादन 


982 983 4984 





4. रेयान कान्‍्टीन्यूभस फिलामेंट 86.5 84.7... 79.7 
2. एसीलेट कान्‍टीन्यूअस ,, 34,0 32.4 34. 
3. रेयान डिस्कान्टीन्यूमस फाइबर 258.8 274.0 266.6 
4. एसीलेट हिस्कानटीन्यूमस फाइबर 35.8 36.8 4.7 


5. रेयान वस्का (मिलियन वर्ग मीटर) 877,.7 650.0 634.2 





सोत-न्यूरोपा ईयर बुक, 7986, पृ०१4 95 


सिन्येटिक फाइबर के उत्पादन के साथ-साथ निर्यात में भी तीक्र गति से 
वृद्धि हो रही है। 


सिम्थेटिक फाइवर का उत्पादन बड़ी माप की ओऔद्योगिक इकाइयों ' 
में हो रहा है। दक्षिणी-पूर्वी टोहोकू के फूकृशिमा, होकूरिकू के तोयामा तथा 
इशीकावा भ्रिफेक्चर प्रमुख औद्योगिक केन्द्र हैं। इसके अतिरिक्त 966 में सम्पूर्ण 
सिन्थेटिक धागों का 32 प्रतिशत नाइलान, 26 प्रतिशत पालिएस्टर तथा 22 
प्रतिशत एक्रीलान का उत्पादन हुआ । जापान के वस्त्रोद्योग का भविष्य सती 
अथवा रेयान की अपेक्षा सिन्‍्थेटिक वस्त्रों पर आधारित है। रेशमी एवं ऊनी 
वस्त्रों का महत्व सिन्धेटिक वस्त्रों की तुलना में कम है । जापान के वस्तच्रों की 
मांग संयुक्त राज्य अमेरिका में अधिक होने के कारण इसका भविष्य उज्ज्वल है । 

खाद्य उद्योग (0०0 00509) 

फूड प्रोसेसिग (000 ॥००७५७४॥॥४) जापान का एक महत्वपूर्ण उद्योग 
है। ये उद्योग बड़े-बड़े नगरों में क्रेन्द्रित है जहाँ गेहूं को आयात करके सम्ब- 
न्धित उत्पादन तेबार फ़िया जाता है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों मों छोटी-छोटी 


औद्योगिक विकास [27 


ओद्योगिक इकाइयां चाय, केन फ्र ठ[08॥ 00, आठा तैयार करता, चावल ' 
को पालिश करना, चावल की शराब बनाना जिसे सेक(88८8)कहते हैं,त्ोयावीन 
से स्टा्चे अलग करना आदि कार्य करती हैं।ये इकाइयां प्रायः उत्पादक 
क्षेत्रों के निकट ही स्थापित की गई हैं। अधिकांश चावल, आटा एवं सेक की 
खपत निकटवर्ती क्षेत्रों में ही हो जाती है। दूध उत्पाद एवं गन्ना से चीनी बनाने 
का कार्य बडे माप की औद्योगिक इकाइयों में सम्पन्त होता है! चुकन्दर से चीनी 
बनाने की सिलें होकैडो, क्यूशू और आंतरिक सागर के तटीय क्षेत्रों में केन्द्रित 
हैं। ये मिलें प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित की गईं हैं जिससे अवशेष पदार्थ 
किसानों को वापस वेच दिया लाता है जिसका उपथोग चारे के रूप 


में किया जाता हैं। 4985 में 392/हजार मी. टन चुकन्दर का उत्पादन 
हुआ। इसी भांति क्रीम पे मबखन तथा दूध से पोठडर बनाने के 


कारखाने होकेडो, उत्तरी-पूर्तरी टहोहोकू तथा मध्य हांशू के उन 
क्षेत्रों में स्थापित हैंहुजहां पर दूध का अत्यधिक उत्पादन होता, है। दूध - 
से सम्बन्धित पदार्थ को बनाने में सिजीं, मोरोतागा तथा स्वतो ज्रान्ड फर्मो का 
महत्वपूर्ण स्थान है। 4985 में 7380400 मी० टन दूध, 88933 सी० ठस 
मवखन तथा 68367 मी० टस पततीर का उत्पादत हुआ। मछली, फल तथा 
साग एवं सब्जियों से सम्बन्धित सामानों को तैयार करने में घरेलू महिलाओं का 
महत्वपूर्ण योगदान है । जापानी बीयर (888/) के 960 के उत्पादन की 
तुलना में 4967 में दुगुनी वृद्धि हुई है जिसका उत्पादन असाही, सप्पोरों और 
किरिन कम्पनियों द्वारा किया जाता है । खाद्य उद्योग के अच्तगंत विभिन्‍न 
प्रकार के उत्पादों का विवरण तालिका 7 24 में दिया गया है । 


तालिका नं० 7.24 से स्पष्ट है कि 982 की तुलना में 4984 में जमा 

दूध, क्रीम तथा डिब्बा बन्द मछली को छोड़कर सभी प्रकार के खाद्य उद्योगों के 

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